औरत का सबसे मंहगा गहना
06-10-2017, 09:59 AM,
#1
औरत का सबसे मंहगा गहना
औरत का सबसे मंहगा गहना 

यह मेरी कहानी लंबी है पर हर शब्द कहानी में आवश्यक है। आप कहानी को अच्छे से समझने के लिए सभी पात्रों और उनकी भूमिका को भी समझियेगा, कड़ी दर कड़ी आपका रोमांच बढ़ता जायेगा। या यूं कहें कि आप एक उपन्यास पढ़ रहे हैं, जिसमें खुले शब्द और समाज की बेड़ियों से परे विचार नजर आयेंगे।
आप तो मेरे बारे में जानते ही होंगे, मेरा नाम संदीप है, मैं 5’7″ का हैंडसम सा लड़का हूँ.. ऐसा मैं नहीं कह रहा… बल्कि मुझे चाहने वाले कहते हैं।
मेरा रंग गोरा है, आँखें भूरी और सीना चौड़ा है। जो मेरे पुरुषार्थ की निशानी है वह 7 इंच का मोटा, हल्के भूरे रंग का है और थोड़ा सा मुड़ा हुआ भी है जो सहवास के वक्त मजा बढ़ा देता है।
यह कहानी तब की है जब मैं 25 साल का था।
एक दिन जब मैं बिलासपुर जाने के लिए बस में चढ़ा तो मुझे चढ़ते ही मेरा एक बचपन का मित्र रवि दिखाई दिया, वह बस में खिड़की की तरफ उदास बैठा था और खिड़की से बाहर टकटकी लगाये देख रहा था, शायद वो किसी सोच में डूबा था।
‘हाय रवि, कैसे हो?’ इतना सुनकर ही वह चौंक गया और हकलाते हुए ‘हाँ हह-हाँ हह मैं ठीक हूँ!’ बहुत लड़खड़ाती सी आवाज में जवाब दिया।
अब मैं बिना कुछ कहे उसके बगल वाली सीट पर बैठ गया, मुझे लगा कि शायद वह मुझे पहचान नहीं पा रहा है, इसलिए मैंने फिर से कहा- शायद तुमने मुझे पहचाना नहीं?
तो उसने कहा- तुम मेरे बचपन के यार संदीप हो, मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ?
इतना कह कर उसने फिर अपना मुंह खिड़की की तरफ कर लिया।
मैंने कहा- क्या हुआ यार, कुछ सोच रहे हो क्या?
तो उसने मेरी ओर नजर घुमाई, मेरी आँखों में आँखें डाल कर देखा और रोने लगा, फिर उसने खिड़की की तरफ मुंह कर लिया।
मैंने उसे और कुछ कहना उचित नहीं समझा और अपनी सीट पर सर टिका कर आँखें बंद कर ली और अपनी पुरानी यादों में खो गया।
असल में रवि और उसके परिवार को गांव छोड़े दस साल बीत चुके थे। इन दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था।
रवि के पिता बिजली विभाग के अधिकारी थे, उनका तबादला हो गया और वो कंवर्धा आ गये थे, रवि जब गांव में था तो वह मेरा बहुत करीबी दोस्त हुआ करता था, हम दोनों साथ में बहुत बदमाशी करते थे, पढ़ाई करते थे और एक दूसरे के घर आना जाना लगा ही रहता था।
रवि के माता पिता भी मुझे अपने बेटे की तरह ही समझते थे, रवि की बहनें भी मुझे बहुत इज्जत देतीं थी, रवि की एक बहन उससे पांच साल छोटी थी और एक बहन चार साल बड़ी थी। रवि के माता पिता ने बच्चा पैदा करते वक्त बच्चों के बीच अंतर का बिल्कुल ख्याल रखा था।
रवि की बड़ी बहन कुसुम का शरीर बहुत भारी था, 5’3″ की हाईट, रंग काला, रुखी त्वचा थी शायद वह बहुत आलसी भी थी।
वहीं उसकी छोटी बहन स्वाति गोरी और सांवली के बीच के रंग में थी, छरहरी सी चंचल लड़की पढ़ाई में बहुत तेज थी, हम सब साथ में कैरम, लूडो, लुका छुपी का खेल खेला करते थे, कोई भी चीज बांट कर खाया करते थे, बड़े अच्छे दिन थे।
मैं ये सब सोच ही रहा था कि हमारी बस सिमगा पहुँच गई, बस के रुकते ही मेरी आँखें खुल गई।
मैंने अपनी बाजू वाली सीट को देखा, वहाँ मैंने रवि को नहीं पाया, मैंने उसे ढूंढने नजर दौड़ाई तो मुझे रवि चना फल्ली लेते नजर आया, वो चना फल्ली का पैकेट लेकर मेरे पास आया, मुझे एक पैकेट पकड़ाया और अपनी सीट में बैठते हुए कहा- यार, बेरुखी के लिए माफी चाहता हूँ, पर मैं अभी बहुत ज्यादा परेशान हूँ।
मैंने कहा- कोई बात नहीं यार, मैं समझ सकता हूँ, पर तुम परेशान क्यूं हो?
तो उसने गहरी सांस लेते हुए बोलना शुरु किया- यार, मेरी बड़ी दीदी कुसुम की शादी हो गई थी, और अब तलाक भी हो गया और दीदी ने दो बार आत्महत्या की कोशिश भी की है, अब तू ही बता मुझे परेशान होना चाहिए या नहीं?
मैंने कहा- हाँ यार, बात तो परेशानी की ही है, पर तू मुझे जरा विस्तार से बतायेगा तभी तो मैं कुछ समझ सकूँगा।
रवि ने कहा- यार, तू तो जानता ही है कि मेरी दीदी शुरु से ही सांवली और भद्दी है। इसलिए उसके रिश्ते के वक्त बहुत परेशानी हुई, हमने बहुत ज्यादा दहेज दिया तब जाकर एक लड़का मिला था। फिर पता नहीं शादी के दो साल बाद ही तलाक हो गया।
मुझे पूरा मामला समझ नहीं आया, मैंने कहा- और आत्महत्या की कोशिश कब की थी?
तो उसने कहा- एक बार पहले और कर चुकी थी, और अभी हाल ही में फिर से कोशिश की है, मैं अभी वहीं जा रहा हूँ।
मैं अभी भी अधूरी बात ही समझ पाया था लेकिन ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा, मैंने कुछ सोच कर कहा- चल मैं भी तेरे साथ चलता हूँ।
और हम बस से उतर कर एक कालोनी की तरफ चल पड़े जहाँ उसकी बहन रहती थी।
रास्ते में रवि ने मुझे बताया कि कुसुम तलाक के बाद एक टेलीकॉम कम्पनी में काल अटेंडर का काम कर रही है, और साथ ही पी. एस. सी. की तैयारी भी कर रही है, वैसे तो उनके घर इतना पैसा है कि उसे काम करने की जरूरत नहीं है पर वो अपना मन बहलाने के लिए जॉब कर रही थी, घर वाले उसे बार बार दूसरी शादी के लिए कहते थे, इसीलिए वो बिलासपुर आ कर अकेली रह रही थी, उसने पहली बार जहर खा लिया था, और सही समय पर हास्पिटल ले जाने से जान बच गई थी। और इस बार उसने अपनी नस काट ली थी इस बार भी उसे समय पर हास्पिटल ले जाया गया, आज ही हास्पिटल से घर लाये हैं। उसने कोशिश तीन दिन पहले की थी, उसके मम्मी पापा तुरंत ही कुसुम के पास आ गये थे, पर रवि बाहर गया हुआ था इसलिए आज जा रहा था।
हम दोनों कुसुम के घर पहुँचे, उसका घर अकेले रहने के लिए बहुत बड़ा था, दो बेडरुम एक बड़ा सा हाल एक गेस्टरुम और एक किचन था। रवि ने बाद में बताया कि यह घर उनका खुद का है। जिसे उन लोगों ने किश्त स्कीम में खरीदा था।
सभी हाल में ही बैठे थे, कुसुम वहाँ नहीं थी, सभी बहुत उदास लग रहे थे, मैंने सबके पैर छुये, दस साल बाद भी आंटी अंकल ने मुझे पहचान लिया।
एक दूसरे से खैरियत जानने के बाद मैं और रवि कुसुम के रूम में गये, वहाँ रवि की छोटी बहन स्वाति भी बैठी थी।
हमारे अंदर आते ही वो जाने लगी तो रवि ने उसे रोका और अपनी दोनों बहनों का परिचय कराया, कुसुम ने कहा- हाँ, मैं इसे पहचानती हूँ… और मुझसे कहा ‘पट्ठा पूरा जवान हो गया है रे तू तो?’
मैंने मुस्कुरा कर कहा- हाँ दीदी!
और फिर स्वाति की तरफ इशारा करके ‘ये भी तो पट्ठी जवान हो गई है।’इससे पहले स्वाति मुझे आश्चर्य से घूर रही थी पर अब मेरी बातों पर शरमा गई।
यहाँ पर आपको स्वाति का हुलिया बताना जरूरी है, स्वाति को मैंने दस साल पहले देखा था, तब वह केवल दस साल की मरियल सी पतली दुबली लड़की थी, अब वह बीस साल की हो चुकी है, मतलब जवानी का रंग उस पे चढ़ चुका है, 5’5″ हाईट, बेमिसाल खूबसूरती और रंग पहले से भी गोरा एकदम साफ हो गया है। बिना बाजू वाली टाप में उसके हाथ का एक छोटा सा तिल भी बहुत तेज चमक रहा था, चेहरा लंबा, बाल कुछ कुछ चेहरे पर आ रहे थे, होंठ गुलाबी रंगत के लिये हुए, पतले मगर थोड़े निकले हुए, लगता था किसी ने खींच कर लंबे किये हों। मम्मे बहुत भरे हुए पर सुडौल थे, टॉप के ऊपर से भी बिल्कुल तने हुए थे, मम्मे नीचे की ओर न होकर ऊपर की ओर मुंह किये हुए थे, पिछाड़ी बता रही थी कि कोई भी गाड़ी चल सकती है। मगर पेट बिल्कुल अंदर था, कुल मिला कर कहूँ तो कयामत की सुंदरी लग रही थी, श्रुति हसन की छोटी बहन कह दूं या देवलोक की अप्सरा तो कुछ गलत नहीं होगा मेरा मन तो उसे देखते ही हिलौर मारने लगा था।
लेकिन अभी हालात कुछ अलग थे, अभी कुसुम कैसे दिखती है, मैं नहीं बता पाऊंगा, क्योंकि उसने चादर ओढ़ रखी थी, चेहरे में उदासी थी झूठी हंसी की परतों में उसने अपने बेइंतहा दर्द को छुपा रखा था।
अचानक ही मेरे दिमाग में एक बात आई और मैंने रवि और स्वाति को कमरे से बाहर जाने को कहा और उनके जाते ही मैंने दीदी से कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि दीदी ने कहा- अब तुम भी लेक्चर मत देना।
मैंने कहा- नहीं दीदी, मैं तो उस मैटर पर बात भी नहीं करुंगा, जो आपके जख्मों को कुरेदने का काम करे। बल्कि मैं तो बस यह कह रहा हूँ कि जो हुआ सो हुआ, अब उठो, मम्मी पापा से बातें करो मुझसे बातें करो। अपने हाथों से सबको चाय बना कर पिलाओ, सबको अच्छा लगेगा, ऐसे बैठे रहने से क्या होने वाला है।
उसके आँखों से आंसू की धारा बह निकली। उसने अपने ही हाथों से आंसू पोंछे और कहा- तुम ठीक कह रहे हो।
और बिस्तर से उठते हुए कहा- सबकी चिंता छोड़ो, यह बताओ तुम क्या पियोगे चाय या कॉफी?
तो मैंने कहा- जो आप पिला दो!
और जैसे ही वह कमरे से बाहर आई, सब चौंक गये और उसे आराम करने को कहने लगे।
कुसुम ने कहा- मैं ठीक हूँ!
तभी मैंने पीछे से सबको शांत रहने का इशारा कर दिया।
फिर कुसुम ने सबको चाय पिलाई और सबके सामने ही आकर कुर्सी पर बैठ गई। कुसुम को बातें करता देख सब बहुत खुश हुये और सबके साथ मुझे भी खुश देख कुसुम की उदासी थोड़ी कम हुई।
मैं बिलासपुर अपने काम से गया था, इसलिए मैंने कहा.. अब मैं चलता हूँ, मुझे बहुत काम है। आप सब भी हमारे घर जरूर आइयेगा, कहते हुए कुर्सी से उठ गया।
फिर सबने कहा- तुम भी आते रहना, और अगर बिलासपुर में ठहरना हुआ तो यहीं आ जाना, कहीं और ठहरा तो तेरी खैर नहीं!
मैंने ‘जी बिल्कुल!’ कहा और निकल गया।
तभी कुसुम दीदी की आवाज आई- जरा रुक तो!
मैं रुका।
वो मेरे पास आई.. और हाथ आगे बढ़ा के हेंडशेक करते हुये धन्यवाद दिया। इस समय उसकी आँखों में खुशी, आभार मानने के भाव और मेरे लिये स्नेह भी झलक रहा था। मैं जिस काम से गया था, मैंने अपना वह काम पूरा किया और समय पर घर वापसी के लिए निकल गया।
जब मैं बस पर बैठा आधा रास्ता तय कर चुका था.. तब कुसुम दीदी का फोन आया- संदीप तुम आज रुक रहे हो क्या? यहीं आ जाओ। मैंने कहा- नहीं दीदी, मैं तो निकल चुका हूँ।
दीदी ने कहा- यहीं रुक जाना था ना..! अब कभी आओगे तो मेरे पास जरूर आना और रुक कर ही जाना।
मैंने हाँ कहा और ऐसे ही कुछ और बातें हुई, फिर हमने फोन रख दिया।
कुछ दिन बितने के बाद मेरे पास एक चिट्ठी आई। दरअसल मैं बिलासपुर में एक प्राईवेट टेलीकॉम कंपनी की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था और उस चिठ्ठी में मुझे आफिस ज्वाइन करने के लिए बुलाया गया था।
मैं एक हफ्ते बाद वहाँ रहने की तैयारी करके पहुँच गया और सबसे पहले मैं कुसुम दीदी के पास गया क्योंकि इत्तेफाकन वो भी उसी लाईन के जॉब में थी।
जैसे ही दीदी ने मुझे देखा वो खुशी से उछल पड़ी, मुझे अजीब लगा पर मैंने सोचा कि अकेली रहती है तो अपने जान पहचान वालों को देख कर खुश होती होगी।
खैर मैं अंदर बैठा, फिर फ्रेश होकर हम दोनों ने चाय पी, तभी दीदी को मैंने नौकरी की बात बताई।
दीदी फिर से बहुत खुश हो गई, दीदी ने मुझसे कहा- ज्वाइन कब कर रहे हो?
मैंने कहा- आज ही करना है दीदी!
तो उसने ‘हम्म्म…’ कहते हुए कुछ सोचने की मुद्रा में अपना सर हिलाया और कहा- तू दो मिनट रुक, मैं अभी आती हूँ।
और वो अपने रूम में चली गई।
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06-10-2017, 10:01 AM,
#2
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
जब बाहर आई तो मैं उसे देखते ही रह गया क्योंकि उसने बड़ी ही सैक्सी ड्रेस पहन रखी थी, लाईट ब्लू कलर की डीप नेक टॉप और ब्लैक कलर की जींस, बाल खुले हुए थे।
हालांकि बेचारी सांवली और मोटी होने की वजह से ज्यादा खूबसूरत नहीं लग रही थी फिर भी जितना मैं सोचता था, उतनी बुरी भी नहीं थी।
दरअसल शहर में रहने वाली लड़कियाँ अपने कपड़ों और फैशन से अपनी कमजोरियाँ छुपा लेती है।
उसके हाथ में स्कूटी की चाबी और स्कार्फ थी, उसने स्कार्फ बांधते हुए ही कहा- अब चल!
मैंने पूछा- कहाँ दीदी?
तो उसने कहा- पहली बात तो तू मुझे दीदी कह के मत पुकारा कर! और अब मैं तुझे तेरे आफिस ले जा रही हूँ, वहाँ बहुत से लोग मेरी पहचान के हैं।
मैंने कहा- हाँ, यह तो ठीक है, आप भी चलो मेरे साथ, पर मैं आपको दीदी न कहूं तो और क्या कहूं?
तो उसने कहा- देख, मुझे सब किमी कहते हैं.. तू भी मुझे किमी कहा कर!
मैंने हाँ में सर हिलाया और दोनों स्कूटी से ऑफिस की ओर निकल गये।
रास्ते में बहुत सी बातें हुई, गाड़ी किमी चला रही थी, बातों के दौरान मैंने दीदी को किमी कहना शुरु कर दिया, दो चार बार अटपटा लगा फिर आदत हो गई।
आफिस पहुँचते ही वो सबको ऐसे हाय हलो कर रही थी जैसे वो रोज ही यहाँ आती हो। मैं उसके पीछे-पीछे चला जा रहा था, उसने कैबिन के सामने पहुँच कर नॉक किया और ‘मे आई कम इन सर!’ कहते हुए अंदर घुस गई।
सर ने ‘अरे आओ किमी, बैठो! कहो कैसे आना हुआ?’ कहकर हमारा स्वागत किया।
वो कंपनी के मैनेजर थे।
किमी ने खुद बैठते हुए मुझे भी बैठने का इशारा किया और उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए सर से कहा- यह मेरे शहर से आया है। मेरे भाई का दोस्त है, आप लोगों ने इसे अपनी कंपनी में जॉब के लिए सलेक्ट कर लिया है, आज ज्वाइन करने आया है।
मैंने सर को हैलो कहा और अपना बायोडाटा और वो लैटर दिया। सर ने उसे जल्दी से देखा और साईड में रखते हुए कहा- शुरुआत में 10000/- मिलेगा, बाद में तुम्हारे काम के हिसाब से बढ़ जायेगा। और रहने के लिए…
किमी ने सर को इतने में ही रोक दिया- नहीं सर, यह तो मेरे साथ ही मेरे घर पर रहेगा।
मैंने कुछ कहने की कोशिश की.. लेकिन उसने फिर रोक दिया- तू चुप कर, तू कुछ नहीं जानता।
सर ने एक गहरी सांस ली और ओके कहते हुए मुझसे हाथ मिला कर बधाई दी।
किमी ने भी हाथ मिलाया और ‘ठीक है सर… तो आप इसे काम समझा दो, मैं चलती हूँ। मैं इसे छुट्टी के टाइम वापस ले जाऊंगी।
मैंने स्माइल दी, तो किमी ने कहा- एक मिनट बाहर आना!
मैं किमी के साथ बाहर तक गया, किमी ने बाहर निकल कर आफिस की दाईं ओर इशारा करके दिखाया- वो देख मेरा आफिस! हम दोनों के आफिस का टाइम लगभग सेम है, मेरी शिफ्ट टाइम 09.45 से 04.30 है और तुम्हारे ऑफिस का 10 से 5 लेकिन अगर अभी तुम्हें नाइट सिफ्ट भी कहें तो मना मत करना, हम बाद में सैटिंग कर लेंगे।
फिर वो चली गई, मैं अंदर आ गया।
अमित नाम के एक लड़के ने मुझे काम समझाया, वो सेम पोस्ट में था।
शाम को किमी मेरे आफिस में आ गई और हम वापसी के लिए स्कूटी में निकल गये। किमी ने रास्ते में एक चौपाटी में गाड़ी रोक दी और फिर हम चौपाटी से गपशप करते हुए एक घंटे लेट घर पहुँचे।
अब हम बहुत अच्छे दोस्त की तरह रहने लगे थे, तो मैंने एक दिन चाय पीते-पीते किमी से उसके आत्महत्या के प्रयासों का कारण पूछ लिया। किमी ने चाय का कप टेबल पर रख कर एक लंबी गहरी सांस भरी, उसके आँखों में आंसू भर आए… और उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसका सच्चा दोस्त हूँ तो ये सवाल फिर कभी ना करूँ। 
मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाकर तुरंत दूसरी बात छेड़ दी ताकि किमी का मन हल्का हो सके। 
अब ऐसे ही कुछ दिन बीत गए.. सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, मेरे मन में किमी के लिए कोई गलत बात नहीं थी, फिर भी था तो मैं जवान लड़का ही।
ऐसे ही एक दिन रात को किमी अपने कमरे में जल्दी सोने चली गई और मैंने अपने मोबाइल पर अन्तर्वासना की कहानी पढ़नी शुरू कर दी। कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरा हथियार फुंफकारने लगा, मैं इस वक्त हॉल में ही बैठा था, मैं अपने निक्कर के ऊपर से ही उसे सहलाने लगा।
मेरी उत्तेजना बढ़ती गई और मैं लंड को निक्कर से बाहर निकाल कर मसलने लगा और जोर-जोर से हिलाने लगा, मैं झड़ने ही वाला था कि किमी अचानक हॉल में आ गई, मैं कुछ ना कर सका। किमी ने नजरें चौड़ी करके सलामी देते और हाँफते हुए मेरे नन्हे शहजादे को देखा।
आप सभी को झड़ने के वक्त क्या बेचैनी रहती है.. इसका पता ही होगा, शायद मैं भी उस सुखद एहसास के चक्कर में सब कुछ भूल गया था और मैंने उसके सामने ही चार-पांच झटके और लगा दिए। फिर मेरा सैलाब फूट पड़ा.. कुछ बूँदें छिटक कर किमी के चेहरे पर तक चली गईं। ये सब महज चंद सेकंड में हुआ। 
फिर किमी ने ‘सॉरी..’ कहा और कमरे में वापस चली गई। 
मुझे रात भर नींद नहीं आई, मेरी गलती पर भी किमी ने खुद ‘सॉरी’ कहा, यह सोचकर मुझे खुद पर बहुत शर्म आ रही थी, सुबह उठ कर मैं किमी से नजर नहीं मिला पा रहा था। 
किमी मेरे से बड़ी थी इसलिए वो मेरी हालत समझ गई, उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा- संदीप.. रात की बात मैं भूल चुकी हूँ, तुम भी भूल जाओ, जवानी में ऐसी हरकतें अपने आप ही हो जाती हैं। मेरे लिए तुम कल जितने अच्छे थे.. आज भी उतने ही अच्छे हो। 
उसके मुंह से इतनी बातें सुनकर मेरे मन का बोझ हल्का हुआ, फिर मैंने मौका अच्छा जानकर किमी से कह दिया- बूढ़ी तो तुम भी नहीं हुई हो.. तो क्या तुम्हारे लिए भी ये आम बात है?
किमी मेरे सवाल से चौंक गई और उसने मुझे घूर कर देखा, मैं डरने लगा कि मैंने फिर गलत तार तो नहीं छेड़ दिया।
उसने सोफे पर बैठते हुए मुझसे पूछा- आज कौन सा दिन है?
मैंने कहा- आज तो सन्डे है, पर पूछ क्यूं रही हो? 
तो उसने कहा- क्योंकि आज मैं तुम्हें अपनी सारी कहानी बताती हूँ, कहानी लंबी है इसलिए छुट्टी की पूछ रही थी। उस दिन भी तुमने मेरे आत्महत्या के प्रयासों के बारे में पूछा था ना? असल में यही सबसे बड़ा कारण है।
मैंने कहा- मैं समझा नहीं!
उसने कहा- तुम ऐसे समझोगे भी नहीं.. पूरी कहानी सुनोगे, तब ही समझ पाओगे। 
उसने बोलना शुरू किया.. उसने जो कुछ भी बोला, वो एकदम साफ़ शब्दों में कहा था.. हालांकि ये कुछ ज्यादा ही खुल कर कहा था, पर जैसा उसने बताया मैं वैसा ही आपके सामने रख रहा हूँ।
किमी ने कहना शुरू किया- तुम तो जानते ही हो कि मैं शुरू से ही मोटी, सांवली सी दिखने वाली लड़की हूँ। इसलिए कालेज लाइफ में किसी ने मुझ पर चांस नहीं मारा और मेरा मन भी खुद से भी इन चीजों में नहीं गया, बस पढ़ाई करने में ही मैंने जिन्दगी गुजार दी। फिर घर में मेरी शादी की बातें होने लगीं, लेकिन हर बार मेरे भद्देपन के कारण लड़के मुझे रिजेक्ट कर देते थे।
दोस्तों.. मेरे दोस्त की बहन किमी ने मुझे अपनी जिन्दगी के पहलुओं से परिचित कराना शुरू कर दिया था।
उसका ये खुलासा उसकी ही जुबानी काफी दुःखद था इसको पूरे विस्तार से समझने के बाद ही आपको इस कहानी का अर्थ समझ आ सकेगा।
किमी ने आगे बोलना शुरू किया- मेरे रिश्ते को लेकर घर वालों का तनाव भी बढ़ने लगा और नतीजा ये हुआ कि वो सब मुझे भी भला बुरा सुनाने लगे। मुझे खुद से घिन आने लगी, मेरा आत्मविश्वास भी गिरने लगा। ऐसे में पापा ने कहीं से एक लड़का ढूंढ निकाला.. मैं बहुत खुश हो गई, लड़का सामान्य था.. पर मेरी तुलना में बहुत अच्छा था। 
बड़े धूमधाम से हमारी शादी हुई, सुहागरात के बारे में मैंने सुना तो था कि पति-पत्नी के शारीरिक सम्बन्ध बनते हैं पर मुझे इसका कोई अनुभव नहीं था। मैं बिस्तर में बैठी डर रही थी कि आज रात क्या होगा, मन में भय था पर खुशी भी थी… क्योंकि आज मेरे जीवन की शुरूआत होनी थी।
कहते हैं न.. किसी भी लड़की का दो बार जन्म होता है, एक जब वो पैदा होती है और दूसरी बार जब शादी होकर अपने पति के पास आती है और पति उसे स्वीकार लेता है। सुहागरात बड़ी ही अनोखी रस्म होती है, इसके मायने मैं अब समझ पाई हूँ। 
खैर.. अब रात गहराती गई और वो अब तक कमरे में नहीं आए थे, मुझे नींद सताने लगी थी.. तभी मुझे अपने कंधे पर किसी के छूने का अहसास हुआ, मैं चौंक कर पलटी तो देखा कि कोई और नहीं.. वो मेरे पति सुधीर थे, मैं बिस्तर पर बैठ गई और सर पर पल्लू डाल लिया।
वो मेरे पास आकर बैठ गए और अपना कान पकड़ते हुए मुझसे कहा कि सुहागरात के दिन आपको इस तरह इंतजार कराने के लिए माफी चाहता हूँ, आप जो सजा देना चाहो, मुझे कुबूल है! 
उस वक्त मैं नजरें झुकाए बैठी थी, मैंने पलकों को थोड़ा उठाया और मुस्कुरा कर कहा- अब आगे से आप हमें कभी इंतजार ना करवाइएगा.. आपके लिए इतनी ही सजा काफी है।
उन्होंने ‘सजा मंजूर है..’ कहते हुए मुझे बांहों में भर लिया और मेरे गहने बड़ी नजाकत से उतारने लगे।
पहले तो मैं शर्म से दोहरी हो गई, किसी पुरुष का ऐसा आलिंगन पहली बार था, हालांकि मैं पापा या भाई से कई बार लिपटी थी, पर मन के भाव से लिपटने का एहसास भी बदल जाता है और ऐसा ही हुआ। मेरे शरीर में कंपकपी सी हुई.. पर मैं जल्द ही संयत होकर उनका साथ देने लगी। 
गहनों के बाद उन्होंने मेरी दुल्हन चुनरी भी उतार दी, मेरे दिल की धड़कनें और तेज होने लगीं, वो मेरे और करीब आ गए और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए.. हाय राम.. ये तो मैंने अभी सोचा भी नहीं था। मेरे ‘वो’ तो बहुत तेज निकले, मैं घबराहट, शर्म और खुशी से लबरेज होने लगी।
मैंने तुरंत ही अपना चेहरा घुमा लिया.. पर उन्होंने अपने हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया और अपनी ओर करते हुए कहा कि जानेमन शर्म औरत का सबसे मंहगा गहना होता है, लेकिन सुहागरात में ये गहना भी उतारना पड़ता है.. तभी तो पूर्ण मिलन संभव हो पाएगा। 
मैं मुस्कुरा कर रह गई, मैं और कहती भी क्या.. लेकिन मेरी शर्म अब और बढ़ गई, तभी उन्होंने मेरे कंधे पर चुम्बन अंकित कर दिया और मैंने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढक लिया। उन्होंने अपने एक हाथ से मेरी पीठ सहलाई और दूसरे हाथ को मेरे लंहगे के अन्दर डाल कर मेरी जांघों को सहलाने लगे।
उहहहह मईया रे.. इतना उतावला पन.. हाय.. मैं खुश होऊं कि भयभीत.. मेरी समझ से परे था। 
उन्होंने मेरे जननांग को छूना चाहा और उनके छूने के पहले ही उसमें सरसराहट होने लगी, मेरे सीने के पर्वत कठोरतम होने लगे, मैं शर्म से लाल होकर चौंकने की मुद्रा में लंहगे में घुसे हाथ को पकड़ कर निकालने लगी। 
उन्होंने हाथ वहाँ से निकाल तो दिया, पर तुरंत ही दूसरा पैंतरा आजमाते हुए, मेरे उरोजों को थाम लिया। 
मैं अब समझ चुकी थी कि आज मेरी जिन्दगी की सबसे हसीन रात की शुरूआत हो चुकी है, पर मुझ पर शर्म हावी थी, तो उन्होंने कहा- जान अब शरमाना छोड़ कर थोड़ा साथ दो ना..! 
तो मैंने आँखें खोल कर उनकी आँखों में देखा और झिझक से थोड़ा बाहर आते हुए मस्ती से उनकी गर्दन में अपनी बांहों का हार डालकर उन्हें अपनी ओर खींचा और उनके कानों में कहा कि जनाब सल्तनत तो आपको जीतनी है, हम तो मैदान में डटे रहकर अपनी सल्तनत का बचाव करेंगें। अब आप ये कैसे करते हैं आप ही जानिए। 
इतना सुनते ही उनके अन्दर अलग ही जोश आ गया.. उन्होंने मेरे ब्लाउज का हुक खोला नहीं.. बल्कि सीधे खींच कर तोड़ दिया और मिनटों में ही अपने कपड़ों को भी निकाल फेंका।
अब वो केवल अंतर्वस्त्र में रह गए थे। उन्होंने अगले ही पल मेरा लंहगा भी खींच दिया, मैंने हल्का प्रतिरोध जताया, लेकिन मैं खुद भी इस कामक्रीड़ा में डूब जाना चाहती थी। अब वो मेरे ऊपर छा गए और मेरे सीने पर उभरी दोनों पर्वत चोटियों को एक करने की चेष्टा करने लगे। अनायास ही मेरे मुंह से सिसकारी निकलने लगी, तभी उन्होंने मेरे सीने की घाटी पर जीभ फिरा दी। 
हायय… अब तो मेरा खुद पर संयम रखना नामुमकिन था। उधर नीचे उनका सख्त हो चुका वो बेलन.. मुझे चुभ रहा था, मैं अनुमान लगा सकती थी कि मेरे नन्हे जनाब की कद काठी कम से कम आठ इंच तो होगी ही!
मुझे खून खराबे का डर तो था, लेकिन यह भी पता था कि आज नहीं तो कल ये तो होना ही है, इसलिए मैं आँखें मूँदे ही आने वाले पलों का आनन्द लेने लगी, मेरा प्रतिरोध भी अब सहयोग में बदलने लगा था। 
वो अब मेरे अंतर्वस्त्रों को भी फाड़ने की कोशिश करने लगे, उनके इस प्रयास से मुझे तकलीफ होने लगी.. तो मैंने खुद ही उन्हें निकालने में उनकी मदद कर दी। तभी उन्होंने एक झटके में अपने बचे कपड़े भी निकाल फेंके। 
अब हम दोनों मादरजात नग्न अवस्था में पड़े थे। उन्होंने पहली बार मेरी योनि में हाथ फिराया और खुश होकर बोले- क्या कयामत की बनावट है यार, इतनी मखमली, रोयें तक नहीं हैं..! अय हय.. मेरी तो किस्मत खुल गई! 
ऐसा कहते हुए उन्होंने मेरी पहले से गीली हो चुकी योनि में अपनी एक उंगली डाल दी। 
मैं इस हमले के लिए तैयार नहीं थी, मैं चिहुंक उठी, लेकिन फिर अगले हमले का इंतजार करने लगी। कुछ देर पहले सल्तनत की रक्षा करने वाली.. अब खुद ही पूरी सल्तनत लुटाने को तैयार बैठी थी। 
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06-10-2017, 10:01 AM,
#3
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
अब तो मेरा भी हाथ उनके सख्त मूसल से लिंग को सहलाने लगा था, साथ ही मेरे जिस्म का हर अंग उनके चुम्बन से सराबोर हो रहा था। मेरी योनि तो कब से उसके लिंग के लिए मरी जा रही थी और अब अपनी सल्तनत लुटाने का वक्त भी आ ही गया।
सुधीर मेरे पैरों की तरफ घुटनों के बल बैठ गए और उन्होंने मेरे दोनों पैरों को फैला कर मेरी योनि को बड़े प्यार से सहलाया.. मैं तड़प उठी। 
फिर उन्होंने मेरी योनि पर एक चुम्बन अंकित किया, मेरे शरीर के रोयें खड़े हो गए और फिर वे अपने लिंग महाराज को मेरी योनि के मुहाने पर टिका कर मुझ पर झुक गए।
उन्होंने थोड़ी ताकत लगाई और अपना लगभग आधा लिंग मेरी योनि की दीवारों से रगड़ते हुए, मेरी झिल्ली को फाड़ते हुए अन्दर पेवस्त करा दिया। 
मैं दर्द के मारे बिलबिला उठी और छूटने की नाकाम कोशिश करने लगी। पर वो तो मुझ पर किसी शेर की तरह झपट्टा मारने लगे, उन्होंने मेरे उरोजों को दबाते हुए एक और जोर का झटका दिया और अपने लिंग को जड़ तक मेरी योनि में बिठा दिया। 
मैं रो पड़ी पर उसे कहाँ कोई फर्क पड़ना था, उन्होंने हंसते हुए कहा- क्यों जानेमन.. अब हुई ना सल्तनत फतह?
मैंने मरी सी आवाज में कहा- हाँ हो तो गई.. पर जंग में तो मेरा ही खून बहा है ना, आपको क्या फर्क पड़ना है। 
उनका जवाब था कि जंग में तो खून-खराबा आम बात है.. अब सिर्फ लड़ाई का मजा लो!
यह कहते हुए उन्होंने फिर एक बार अपना पूरा लिंग ‘पक्क.. की आवाज के साथ बाहर खींच लिया। किसी बड़े मशरूम की तरह दिखने वाला लिंग का अग्र भाग मेरी योनि से बाहर आ गया.. मुझे बड़ा मजा आया।
फिर उन्होंने मेरी योनि को अपने लिंग के अग्र भाग से सहलाया और एक ही बार में अपना तना हुआ लिंग मेरी योनि की जड़ तक बिठा दिया। इस अप्रत्याशित प्रहार से मैं लगभग बेहोश सी हो गई, पर कमरा ‘आहह ऊहह..’ की आवाजों से गूंज उठा। 
जब मैं थोड़ी संयत हुई.. तब एक लम्बे दौर की घमासान पलंगतोड़ कामक्रीड़ा के बाद हम दोनों एक साथ झड़ गए और एक दूसरे से चिपक कर यूं ही लेटे-लेटे कब नींद आ गई.. पता नहीं चला।
किमी ने आगे बताना शुरू किया- मैं रात भर की कामक्रीड़ा के बाद ऐसे ही सो गई थी और जब सुबह ‘खट’ की आवाज के साथ दरवाजा खुला, उसी के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई। 
मैंने देखा सामने सुधीर खड़े थे, मैं चौंक गई क्योंकि सुधीर तो मेरे साथ थे, पर वो दरवाजे से कैसे आ रहे हैं। 
उहहह.. मुझे अब होश आया कि बीती रात मेरे साथ कुछ भी नहीं हुआ, असल में मैंने रात भर अपने सुहागरात के सपने देखे हैं। वास्तव में मेरी सुहागरात तो कोरी ही रह गई।
मैंने अकचका कर सुधीर से पूछा- आप रात भर नहीं आए..! और मैं भी आपका इंतजार करते करते सो गई थी।
उनका मुंह खुलते ही दारू की बदबू आई, उन्होंने कहा- वो दोस्तों के साथ कब रात बीत गई.. पता ही नहीं चला!
मैंने ‘कोई बात नहीं..’ कहते हुए उन्हें बिस्तर में लिटाया और सुला कर घर के काम-काज में लग गई। 
इसी तरह की दिनचर्या चलने लगी थी, मैंने समझदारी से कुछ दिनों में अपने पति को छोड़कर घर के सभी सदस्यों को खुश कर लिया, सुधीर कभी रात को घर आते थे और कभी नहीं भी आते थे और तीन महीने बाद भी मेरी असली सुहागरात का वक्त नहीं आया था। 
एक दिन काम करते करते जेठानी ने मजाक किया- क्यों देवरानी, फूल कब खिला रही हो?
मैंने भी गुस्से में कह दिया- गमले में आज तक पानी की बूंद नहीं पड़ी और आप फूल की बात करती हो?
जेठानी मेरी बात को झट से समझ गई, उसने कहा- फिर तो गमला प्यासा होगा, तू कहे तो मैं कुछ मदद करूं?
मैंने कहा- आप मेरी मदद कैसे करोगी?
उसने कहा- गाजर, मूली, बेलन ये सब कब काम आएंगे, तू कहे तो हम दोनों मजे ले सकते हैं। 
मैं पढ़ी-लिखी लड़की थी.. मुझे ये सब बातें बकवास लगीं.. मैं भड़क उठी, तो जेठानी ने झेंप कर कहा- मैंने कोई जबरदस्ती तो नहीं की है, जब तुम्हारा मन हो मुझे बता देना!
मैं वहाँ से उठ गई और आगे इस बारे में हमारी बात भी नहीं हुई।
अब रोज रात मुझे रतिक्रिया के सपने आने लगे, मैं भले ही पढ़ी-लिखी लड़की थी, पर तन की जरूरतों के आगे किसका बस चलता है!
मेरी भी हालत ऐसी ही होने लगी।
एक रात को सपने देखते-देखते मैं अपनी योनि को सहलाने लगी और थोड़ी ही देर में मेरी योनि भट्टी की तरह गर्म हो गई। मैंने क्रमशः एक, फिर दूसरी उंगली योनि में डाल ली, पर मेरी वासना शांत होने के बजाए और भड़क उठी। अब मुझे जेठानी की बातें याद आने लगीं, फिर मैं चुपके से रसोई में जाकर एक गाजर उठा आई, पहले तो गाजर को थूक से गीला किया और योनि के ऊपर रगड़ने लगी। इसी के साथ मैं अपने दूसरे हाथ से अपने उरोज को सहला रही थी।
अब मेरी योनि लिंग मांग रही थी, तो मैंने गाजर के मोटे भाग को योनि के अन्दर प्रवेश कराना चाहा, जो तीन इंच मोटा होगा, उसकी लंबाई भी बहुत थी.. पर पतली होने के क्रम में थी।
गाजर को योनि में डालते हुए दर्द के मारे मेरी जान निकल रही थी.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… पर गाजर अन्दर नहीं गई, तो मैंने दर्द को सहने के लिए अपने दांतों को जकड़ लिया और एक जोर का धक्का दे दिया। इससे गाजर मेरी योनि में तीन इंच अन्दर तक घुस गई और योनि से खून की धार बह निकली।
मेरी आँखों में आँसू आ गए, मैं डर गई.. मैंने अपनी सील खुद ही तोड़ी थी, पर अभी मेरा इम्तिहान बाकी था।
अब मेरे सर से सेक्स का भूत उतर गया था, मैंने गाजर को निकालने के लिए उसे वापस खींची.. लेकिन गाजर टस से मस नहीं हुई।
फिर मैंने सोचा थोड़ा हिला डुला कर खींचती हूँ। मैंने इतनी तकलीफ के बावजूद गाजर को हिलाने के लिए उसे और अन्दर धकेली और फिर बाहर खींचने लगी, मेरी तो जान ही निकल गई, फिर भी गाजर को निकालना तो जरूरी था।
मेरे जोर लगाने से गाजर बीच से टूट गई… हाय राम.. ये क्या हो गया.. अब मैं क्या करूँ! गाजर का बहुत छोटा सा भाग लगभग डेढ़ इंच ही बाहर दिख रहा था। अब मुझसे गाजर निकालते भी नहीं बन रही थी और दर्द के मारे मेरी हालत और खराब हो रही थी। 
अब मुझे बदनामी से लेकर दर्द खून और सभी चीजों की चिन्ता सताने लगी।
ऐसी हालत में अब मेरे पास जेठानी के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसे भी मैंने पूरे कपड़े तो उतारे नहीं थे सिर्फ पेंटी उतारी थी और साड़ी ऊपर करके मजे लेने में लगी थी, सो मैंने तुरंत साड़ी को नीचे किया और लंगड़ा कर चलती हुई जेठानी के कमरे के बाहर जाकर उसे आवाज लगाई। 
फिर उसे बुला कर अपने कमरे में लाई और झिझकते हुए उसे अपनी साड़ी उठा कर अपनी योनि दिखाई और पूरी कहानी बताई। 
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06-10-2017, 10:01 AM,
#4
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
मेरी जेठानी बहुत कमीनी थी, उसने सबसे पहले मेरे उस दिन के व्यवहार के लिए खरी खोटी सुनाई और कहा- तू तो बहुत अकड़ती थी ना, ले अब कुत्ते के लंड जैसा अटक गया ना तेरी चुत में.. और चुत फट गई.. सो अलग, देख तो तेरी चुत की कैसे धज्जियाँ उड़ गई हैं!
वो मुझे और ज्यादा डरा रही थी।
मैं उसके पैरों में गिर गई- दीदी मुझे बचा लो.. एक बार ये गाजर निकाल दो फिर आप जो कहोगी मैं करूँगी।
उसने कहा- सोच ले.. जो कहूँगी, वो करना पड़ेगा!
मैंने कहा- सोच लिया दीदी.. आप जो कहोगी, मैं वो करने को तैयार हूँ।
तो वो बोली- फिर ठीक है अब तू फिकर मत कर.. जा बिस्तर में लेट जा, मैं अभी गाजर निकालने का सामान लेकर आती हूँ।
मैं बिस्तर में लेट कर इंतजार करने लगी, जेठानी करीब दस मिनट बाद आई। उसके हाथ में नारियल तेल का डिब्बा और गाड़ी में रहने वाला पेंचकस आदि टूल थे। उसने उसे मेरे पैरों के पास रखा और थोड़ा ऊपर आकर मेरे दोनों कंधों को जकड़ लिया, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि जेठानी क्या कर रही है। 
उसने मुझे जकड़ने के बाद आवाज लगाई- आ जाओ जी.. मछली जाल में कैद है..!
सामने से जेठ जी अन्दर आ गए।
‘हाय राम.. दीदी आपने जेठ जी को क्यों बताया? अब वो क्या सोचेंगे.. मैं तो कहीं की नहीं रही!’

मैं योनि खोले टांगें फैलाए लेटी थी, मैंने हड़बड़ाने की कोशिश की, पर जेठानी ने मुझे जकड़ रखा था।
जेठ जी सामने आकर बोले- साली गाजर योनि में डालते समय लाज नहीं आई.. और अब नखरे दिखा रही है, शांति से पड़ी रह, इसी में सबकी भलाई है। देख.. केवल आधा इंच गाजर ही बाहर दिख रही है, ज्यादा हिलोगी तो वो भी अन्दर घुस जाएगी, फिर आपरेशन के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा।
मुझे उनकी बात सही लगी.. मैंने जेठानी से कहा- हाँ, अब मैं नहीं हिलूँगी, मुझे छोड़ दो। 
जेठानी के छोड़ते ही मैंने नजर योनि में डाली.. सही में डेढ़ इंच गाजर में से एक इंच और अन्दर घुस गई थी और योनि तो ऐसी लाल दिख रही थी मानो पान खाकर 50-100 लोगों ने एक साथ थूक दिया हो। 
मैंने जेठ जी से कहा- अब आप ही कुछ कीजिए जेठ जी?
उन्होंने कहा- करूँगा तो मैं बहुत कुछ.. पर अभी सिर्फ ये गाजर निकाल देता हूँ। 
मैं उनका इशारा समझ चुकी थी, पर अभी मेरे लिए गाजर निकलवाना ही सबसे ज्यादा जरूरी था। 
जेठ जी ने तेल के डिब्बे को खोलकर मेरी योनि में तेल की धार पिचकाई और बहुत सारा तेल अन्दर तक डालने की कोशिश की, फिर जेठानी से कहा- तुम इसके दोनों पैर फैला के रखो, ध्यान रहे गाजर खींचते वक्त कहीं ये पैर सिकोड़े ना, क्योंकि दर्द बहुत ज्यादा होगा। 
जेठानी ने मेरे दोनों पैर फैलाए और कहा- चुप रहना कुतिया.. अपनी ही करनी भोग रही है, ज्यादा चिल्लाना मत और अपना वादा याद रखना। 
अब जेठ जी ने बड़ी सफाई से पेंचकस में गाजर को फंसाया और जोर लगा कर बाहर खींचने लगे। 
दर्द के कारण मैं बेहोशी की स्थित में आ गई, अगर तेल ना डाला होता तो मैं सच में मर ही जाती।
उई माँ.. मैं तो मर गई रे.. कहते हुए मैं अचेत हो गई। 
जब मुझे होश आया तो जेठानी मेरे सर के पास बैठी थी और सुबह होने वाली थी। 
जेठानी ने कहा- चल अब तू आराम कर, रात की बात भूल जाना, ज्यादा सोचना मत.. हाँ लेकिन वादा याद रखना, मैं उसे जब चाहूं मांग सकती हूँ।
मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाया और अनमने मन से ‘धन्यवाद दीदी’ कहा।
सुबह उठ कर मुझे चलने में तकलीफ हो रही थी, मैं जब अपने कमरे से बाहर निकली तो मैं जेठ जेठानी से नजरें नहीं मिला पा रही थी।
जेठानी ने पास आकर कहा- जो हुआ उसके लिए ज्यादा मत सोच और आज रात अपना वादा पूरा करने के लिए तैयार रहना।
मैंने तुरंत ही जेठानी से गिड़गिड़ाते हुए कहा- दीदी आप क्या चाहती हो, पहले वो खुल कर बताओ!
तो उसने कहा- अरे तुम इतनी भी तो भोली नहीं हो.. तेरे जेठ तेरे तुझे चखना चाहते हैं। 
मैंने कहा- इसमें आपको क्या मिलेगा दीदी?
उसने कहा- हमारी शादी को हुए आठ साल हो गए और अभी तक बच्चा नहीं हुआ है.. इसलिए मैंने इक्कीस गुरुवार का व्रत रखा है, ताकि मैं ठाकुर जी को प्रसन्न कर सकूँ और इस बीच मैं अपने पति से संबंध नहीं बना सकती हूँ। लेकिन तेरे जेठ पर ये बंदिश लागू नहीं है, वो किसी दूसरे से संबंध बना सकते हैं। अगर मैं उन्हें ऐसा करने से रोकूँगी तो वो मेरा व्रत पूरा नहीं होने देंगे। वो तो रोज ही सेक्स करने वाले व्यक्ति हैं, वो इतने दिन नहीं रुक पायेंगे और फिर उनकी हालत मैं समझ सकती हूँ।
मैंने कहा- पर दीदी, आज तक मैंने किसी के साथ संबंध ही नहीं बनाए हैं और इसी कारण से सबसे पहले मैं अपने पति से संबंध बनाना चाहती हूँ, बस मुझे पति के साथ सेक्स संबंध बनाने तक की मोहलत दे दो.. प्लीज दीदी… फिर मैं अपना वादा पूरा करने के लिए तैयार हूँ।
जेठानी भी एक स्त्री ही थी, सो उसने मेरी व्यथा समझ कर ‘हाँ कह दी.. और कहा- अब तेरे खसम को जल्दी ही तेरे ऊपर चढ़वाती हूँ। 
जेठानी ने मेरी मजबूरी समझी, इसलिए अब वो मुझे थोड़ी अच्छी लगने लगी।
जेठानी की कही हुई बात सच निकली, एक हफ्ते के भीतर ही मेरे पति ने एक रात मुझसे संभोग करने की इच्छा जताई, अनायास ही मेरी आँखों में आंसू आ गए। हालांकि वह नशे की हालत में सेक्स करना चाहते थे, मैं फिर भी तैयार थी, मेरे मन में बस यही तसल्ली थी कि कम से कम मैं शादीशुदा होने का अर्थ पूर्ण कर पाऊंगी।
लेकिन जैसा मैंने सोचा था, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, सुधीर नशे की हालत में आए और उन्होंने मुझे बिस्तर पर लेटने और कपड़े उतारने को कहा, मैंने वैसा ही किया और हब्शी की तरह मुझे नोंचने लगे।
उनका लिंग भी मेरे सपने के जैसा नहीं था.. मैंने तो सपने में लगभग आठ इंच के लिंग की कल्पना की थी, पर वास्तविकता में वह महज छ: इंच का लग रहा था। मेरे पति का लिंग बहुत सख्त भी नहीं था, वह कभी मेरे उरोजों को दबाते, कभी होंठों को चूसते। 
मुझे उनकी ये हरकत कामोत्तेजित करने के बजाए घृणित काम करने जैसी लग रही थी क्योंकि दारू की तेज गंध मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। 
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06-10-2017, 10:01 AM,
#5
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
फिर भी प्रथम सहवास की खुशी से ही मेरी योनि गीली हो चुकी थी। सम्भोग की स्थिति बनने की ख़ुशी को अभी मैं महसूस ही कर रही थी कि तभी अचानक उन्होंने मेरे पैर फैलाए और अपना लिंग मेरी योनि में बेदर्दी से ठूंस दिया, मुझे बहुत दर्द हुआ.. पर झिल्ली फटने का दर्द जितना नहीं हुआ क्योंकि मैंने तो अपनी झिल्ली गाजर से ही फाड़ ली थी।
फिर भी मैंने दर्द का और रोने का नाटक किया, उन्हें तो किसी बात से मतलब तो था नहीं.. और वो लिंग को लगातार अन्दर बाहर करने लगे।
अब मैंने भी उसका साथ देना शुरू कर दिया था.. तीन से चार मिनट के अन्दर मैं स्खलित हो गई और पांच मिनट के अन्दर वो भी झड़ गए और उठ कर एक किनारे सो गए।
क्या सेक्स ऐसे ही होता है, फिर लोग जो सेक्स के बारे में इतनी इंस्ट्रेस्टिंग बातें कहते हैं.. वो क्या है? मैं इसी सोच में रात भर जागती रही। 
अब ना ही मेरे अन्दर सेक्स की कोई ललक बची थी और ना ही उसके अन्दर ऐसी कोई बात थी कि उसके साथ सेक्स करने की चाहत मेरे अन्दर कोई भाव पैदा कर सके। मैं तो पहली बार में ही सेक्स से विमुख होने लगी थी। फिर सोचा पहली बार के कारण ऐसा हुआ हो। मुझे सेक्स का कोई अनुभव भी नहीं था, इसलिए मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकती थी। मैंने सोचा हो सकता है कि आगे कोई बात बने। 
उस महीने पांच-छह बार पति के साथ संबंध बने, पर सभी अनुभव ऐसे ही नीरस ही रहे। सेक्स के दौरान हम दोनों ही उत्तेजित नहीं हो पाते थे।
फिर एक दिन जेठानी ने कहा- चल अब तुझे अपने पति से रगड़वाते एक महीना हो गया.. अब अपना वादा पूरा कर, तेरे जेठ को मैंने कब से रोक रखा है, अब और नहीं रोक सकती। 
मैं चाहती तो जेठानी को सीधे मना कर सकती थी और वो मेरा कुछ भी नहीं कर सकती थी। पर मैं खुद सेक्स को जानना चाहती थी, एहसास करना चाहती थी। इसलिए मैंने ‘हाँ’ कह दिया। हालांकि मेरे अन्दर सेक्स उत्तेजना धीरे-धीरे घट रही थी, फिर भी मुझे सारी बातों का हल जेठानी की बातों को मान लेने में ही दिखा। 
जेठानी ने कहा कि आज देवर जी बाहर जा रहे हैं.. वो रात को नहीं आएंगे, उनके भैया ने उसे दूसरे शहर भेजा है, आज रात को तुम तैयार रहना।
मैंने मजबूरी और मर्जी के मिले-जुले भाव में ‘हाँ’ में सर हिला दिया।
रात को खाना खाकर मैं जेठ-जेठानी का इंतजार करने लगी, मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, बहुत डर भी लग रहा था। मैं भगवान को कोस रही थी कि ये गलत काम वो मुझसे क्यों करा रहा है। फिर सोचने लगी कि जो होता है, अच्छा ही होता है।
मेरा अनुमान था कि जेठानी आज मुझे जेठ के सामने परोस कर ही रहेगी, पर क्या वो खुद भी सामने रहेगी? अकेले में तो मैं एक बार जेठ के साथ कर भी लेती पर जेठानी के सामने ये सब! 
तभी दरवाजे के खुलने की आवाज आई.. सामने जेठ-जेठानी आ खड़े हुए, जेठानी ने पास आकर सीधे मेरे भारी उरोजों को मसल दिया और कहा- क्यों अभी भी तैयार नहीं है?
मैंने कहा- और कैसे तैयार होते हैं?
उसने कहा- ना लिपिस्टिक, ना सेक्सी गाऊन, ना बेड में नया चादर, ना चेहरे पे खुशी.. ऐसे भी कोई सेक्स के लिए तैयार होता है क्या? पुरानी सी साड़ी ब्लाउज पहन कर मुंह लटकाए बैठी हो..! ऐसे में तो खड़ा लिंग भी सो जाएगा! 
मैं प्रतिक्रिया में बिस्तर से उतर कर उनके सामने खड़ी हो गई और उसने ‘जरा देखूँ तो.. कुतिया ने अन्दर क्या तैयारी की है..’ कहते हुए एक झटके में साड़ी खींच दी और ब्लाउज भी फाड़ दिया।
अन्दर मैंने पिंक कलर की ब्रा-पेंटी का सैट पहना था, तो उसने हँस कर कहा- अय.. हय.. अन्दर से तो सेक्स के पूरे इंतजाम किए बैठी है। 
अब जेठ जी ने बिना कुछ कहे मुस्कान बिखेरी और वे अपने कपड़े उतारने लगे। मैंने अनजान बनते हुए कहा- दीदी आप मेरे साथ क्या करने वाली हो?
तो जेठानी ने कहा- दिखता नहीं, तेरे ऊपर अपने खसम को चढ़वाने आई हूँ, तुझे अपनी योनि पर बहुत घमंड था ना? आज देख तेरी योनि की कैसे चटनी बनवाती हूँ।
मैं डर गई, या कहिए कि डरने का नाटक करने लगी।
तब तक जेठ जी अपने कपड़े उतार चुके थे.. उन्होंने पास आकर प्यार से मेरे बालों पर हाथ फेरा और कहा- डरो मत बहू रानी, तुम्हारी योनि में मैं बहुत आराम से लिंग डालूंगा, मैं बहुत दिनों से किसी मोटी औरत से संभोग करने के सपने देखता था, मैंने बहुतों से सेक्स किया.. पर किसी मोटी औरत की योनि में लिंग प्रवेश नहीं करा पाया। ऐसे भी तुम या मैं बाहर मुंह मारेंगे तो बदनामी तो घर की ही होगी, इसलिए जो हो रहा है, घर पर ही हो जाए तो अच्छा रहेगा। इसलिए अब तुम बिना कुछ सोचे इस संभोग का आनन्द लो। 
फिर मैंने कहा- लेकिन दीदी के सामने..!
तो जेठ ने जेठानी को जाने का इशारा किया, तो जेठानी ‘ठीक है कुतिया जाती हूँ..’ कहते हुए जाने लगी.. और जाते-जाते कह गई- सुनो जी.. जल्दी आकर मेरे खेत में भी जल छिड़कना है, पूरा हैंडपंप यहीं सुखा के मत आ जाना!
उसके जाते ही जेठ जी ने मुझे आगोश में ले लिया और चुम्मा-चाटी करने लगे, वो पिये हुए थे, लेकिन तब भी मुझे उनका छूना बहुत बुरा तो नहीं लग रहा था, पर अच्छा भी नहीं लग रहा था। वो जैसा कहते रहे.. मैं करती रही, मैंने अपने मन से कुछ भी अतिरिक्त करने का प्रयास ही नहीं किया। 
फिर उन्होंने अपने अंतर्वस्त्र भी निकाल फेंके, उनका लिंग 7 इंच का सीधा लंबा काला और मोटा था। लिंग में तनाव भी साफ नजर आ रहा था। 
वो मुझे बिस्तर में लेट कर पैर को फैलाने बोले, मैं यंत्रवत उनकी आज्ञा का पालन करती रही। फिर वो मेरे ऊपर चढ़ कर मेरे पर्वतों को दबाने लगे, घाटियों को टटोलने लगे और अपने लिंग को मेरी योनि में लगा दिया। उसके बाद उन्होंने झटका जोर से लगा कर एक ही बार में अपना लिंग मेरी योनि की जड़ तक पहुँचा दिया। उम्म्ह… अहह… हय… याह… मुझे थोड़ा दर्द हुआ, पर मैं आराम से सह गई। 
मैं कुछ देर में ही झड़ गई और वो मेरे ऊपर कूदते रहे। फिर करीब बीस मिनट बाद वो भी झड़ गए और अपने कपड़े पहन कर चले गए। मैं ऐसी ही लेटी रही, कुछ सोचते हुए.. थोड़ा रोते हुए, नींद भी आ गई।
अब दिन ऐसे ही कटते रहे.. कभी पति रौंद जाते, तो कभी जेठ बिस्तर पर पटक जाते थे, पर मैंने एक बात पर गौर किया कि पहले वो लोग मुझे हफ्ते में एक-दो बार रगड़ ही देते थे और फिर महीने में एक बार हुआ.. फिर अब तो तीन-चार महीनों में कभी-कभी भगवान की कृपा से मेरे सूखे खेत को पानी की बूंद नसीब हो जाती थी। सबसे खास बात ये थी कि मुझे खुद भी इस बीच सेक्स के लिए बहुत ज्यादा ललक नहीं रहती या और शारीरिक क्रियाओं का मन नहीं करता।
अब शादी के डेढ़ साल बीत गए और बच्चे का कोई पता नहीं था.. लोगों के कटीले ताने शुरू हो गए और साथ ही पति और घर वाले दहेज के लिए सुनाने लगे। पति तो बीच-बीच में मायके से पैसे लाने को कहने लगे, मैं पढ़ी-लिखी होकर भी सब चुप-चाप झेल रही थी क्योंकि मेरे मायके वाले हमेशा मुझे चुप रहकर समझौता करने की ही बात करते थे। 
इसी बीच मैंने अपनी उदासी दूर करने के लिए अपनी बहन स्वाति को कुछ दिनों के लिए बुला लिया। उसकी छुट्टियाँ चल रही थीं, तो वह मेरे एक बुलावे पर आ गई। उसके आने से अब मुझे अच्छा लगने लगा।
स्वाति ने अभी-अभी जवानी में कदम रखा था, वो खूबसूरत चंचल लड़की जल्दी ही मेरे ससुराल वालों के साथ घुल-मिल गई। 
पर स्वाति के आने से शायद मेरे पति को अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए उनके कहने पर मैंने स्वाति को अलग कमरे में सोने को कहा। 
हमेशा की तरह एक रात मेरे पति घर नहीं आए थे, मैं अकेले ही सोई हुई थी और रात को अचानक किसी सपने या आवाज की वजह से मेरी नींद खुली और उठकर इधर-उधर देखने पर भी कुछ समझ ना आया तो फिर मैं बाथरूम चली गई।
फिर मैं जैसे ही वापस आने के लिए मुड़ी तो मुझे स्वाति के कमरे से कुछ आवाजें सुनाई दीं। मेरे कदम ठिठके और उस ओर बढ़ गए। मैं उसके कमरे के सामने पहुँच गई और जैसे ही मैंने दरवाजा खोला… मेरे पांव तले जमीन ही खिसक गई, जिसे मैं बच्ची समझ रही थी मेरी वही बहन, जिसने जवानी की दहलीज पर ठीक से कदम भी नहीं रखा था.. अपने ही जीजा जी के साथ निर्वस्त्र होकर रंगरेलियाँ मना रही है।

मेरी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली, मैं पहले के गमों से ही पीछा नहीं छुड़ा पाई थी और अब स्वाति की इस हरकत ने मुझे अन्दर तक हिला दिया। 
मुझे सामने पाते ही स्वाति ने खुद को ढकना चाहा, वहाँ से हटना चाहा.. पर मेरे पति को कोई फर्क ही नहीं पड़ा। जिनका लिंग मेरे लिए हमेशा मुरझाया हुआ रहता था.. आज उसमें जान आ गई थी।
मैं समझ गई थी कि ये सब मेरे भद्देपन के कारण ही हुआ है।
मैं बिना कुछ बोले अपने कमरे में वापस आ गई। 
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06-10-2017, 10:02 AM,
#6
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
सुबह भी मैंने किसी से कुछ नहीं कहा, बस स्वाति का सामान बांध कर वापस भेज दिया। स्वाति अपनी सफाई देना चाहती थी, पर अब सफाई सुनने का कोई फायदा नहीं था और मेरे पति ने तो सफाई देना तो दूर, उनके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं आई थी। मैं भी अन्दर ही अन्दर घुट के रह गई।
ऐसे ही दिन बीतने लगे, मुझे खुद से घिन आने लगी.. अपनी जिन्दगी से घिन आने लगी, मेरी जेठानी ने भी मेरे मोटापे और भद्देपन का खूब मजाक उड़ाया, उसने तो यहाँ तक कह दिया कि मेरे भद्देपन के कारण मर्द मेरे से दूर भागते हैं और अब मुझे सेक्स, आकर्षक या उत्तेजना जैसे शब्दों से चिढ़ हो गई। 
पर हद तो तब हो गई.. जब मेरे हाथ घर की सफाई करते हुए पुराने कागज लगे। उसमें एक फोटो और एक सर्टिफिकेट था। वो सर्टिफिकेट मेरे पति की पहली शादी के थे। मैं दंग रह गई कि मेरे साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है। 
फोटो में भी मेरे पति किसी और महिला के साथ नजर आ रहे थे। मैं फूट पड़ी… क्या मेरी शादी एक पहले से शादीशुदा इंसान से कर दी गई है?? 
मैंने तुरंत ही रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया, तब मेरे पति ने मुझसे साफ-साफ कह दिया कि मैंने तो तुमसे सिर्फ दहेज के लिए शादी की थी। वर्ना तुम जैसी भद्दी लड़की के साथ तो कुत्ता भी ना रहे। 
अब मेरे सब्र का बांध टूट चुका था, मैंने घर फोन लगाकर पापा से बात की, तो पापा ने कहा- हमें सुधीर की पहली शादी के बारे में पता था, पर हम लोगों ने पता किया था, अब सुधीर उसके साथ नहीं रहता इसलिए हमने तुम्हारी शादी उससे कर दी। 
मैंने फोन काट दिया, अब मुझे मेरे साथ ससुराल में हो रहे सारे बर्ताव समझ आ गए कि मेरे पति अकसर कहाँ जाया करते थे, लेकिन जब मेरे ही माँ-बाप ने मुझे धोखा दिया तो मैं क्या करती। 
मैंने तुरंत खेत में डालने वाली एक कीटनाशक दवाई की शीशी खोली और खा ली। 
मैं जीना ही नहीं चाहती थी, पर उन लोगों ने समय पर अस्पताल पहुँचा कर बचा लिया। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और तलाक ले लिया।
अब तक किमी अपनी शादी, सेक्स लाईफ और अपने साथ हुए धोखे को बता रही थी और मैं सारी बातें चुपचाप सुन रहा था।
मैंने किमी से कहा- और दूसरी बार तुमने आत्महत्या का प्रयास क्यों किया?
किमी ने मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा- अकेलेपन का दर्द तुम नहीं समझ सकते संदीप..! 
किमी अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए बाहर चली गई। उसके अकेलेपन का दर्द मैं समझूँ या ना समझूं, पर मैं उसकी भरी हुई आवाज, उदास चेहरे को जरूर समझ रहा था क्योंकि उसके इस एक वाक्य ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया था।
उसके बाहर चले जाने के बाद मैं अकेला बैठकर बहुत कुछ सोचता रहा, उसकी मन:स्थिति को समझने का प्रयास करता रहा, पर सब कुछ मेरे मस्तिष्क की सीमाओं से परे था और जो कुछ समझ आया, वह यह था कि सेक्स की सही समझ, फोरप्ले और शारीरिक क्षमताओं के साथ ही सही पार्टनर भी मनुष्य के जीवन में बहुत अहमियत रखते हैं। 
अब मैं इस बात से भी इंकार नहीं कर सकता कि किमी की कामक्रीड़ा की कहानी सुन कर मेरे लिंग में तनाव आया और प्रीकम की बूँदें भी चमक उठीं।
किमी के लिए मेरा नजरिया बदल गया, लेकिन मैंने जल्दबाजी के बजाए समझदारी से काम लिया।
मैंने किमी की परेशानी का हल और अपनी अन्तर्वासना पूर्ति के लिए एक अनोखा उपाय किया, जिससे सांप भी मर गई और लाठी भी नहीं टूटे।
लेकिन मैं जो चाहता था.. अब उसके लिए मुझे लंबा परिश्रम करना और करवाना था। मैं किमी का खोया हुआ आत्मविश्वास लौटाना चाहता था, उसे हॉट और खूबसूरत बनाना चाहता था, सेक्स के प्रति उसकी रुचि फिर से जागृत करना चाहता था।
अंत में उसके साथ कामक्रीड़ा की पराकाष्ठा को पार करना चाहता था.. और इस सबके लिए मुझे बहुत सी प्लानिंग करनी थी। 
पहले तो मैं कुछ दिन सोचता ही रहा कि मुझे क्या-क्या करना है। मैं किमी को सारी चीजें सीधे-सीधे बता भी नहीं सकता था क्योंकि फिर वो मेरा साथ नहीं देती, या यूं कहो कि मेरी तरकीबों का असर नहीं होता।
सबसे पहले मैं खुद सुबह जौगिंग के लिए जाने लगा, तीन दिन बाद किमी को भी चलने को कहा, उसने मना किया तो मैंने दोस्ती का वास्ता दे दिया।
किमी की जिन्दगी में अरसे बाद कोई अपना लगने वाला सच्चा दोस्त मिला था, इसलिए वो मुझे कभी भी नाराज नहीं करना चाहती थी और अभी तो मैंने उसे दोस्ती का वास्ता दे दिया तो ‘नहीं’ कहने का तो सवाल ही नहीं था। 
अब वो मेरे साथ सुबह सैर पर जाने लगी और मैं उसे खूब दौड़ाने लगा। 
मेरा मानना है कि सांवली लड़कियां भी अगर फिट हों.. तो खूबसूरत लगती हैं। अगर किसी के चेहरे पर अन्दर से की खुशी नजर आने लगे.. तो फिर बदसूरती कोसों दूर भाग जाती है। मैं सबसे पहले किमी के अन्दर यही चीजें लाना चाहता था।
हम पहले हफ्ते लगभग आधा कि.मी. फिर एक कि.मी. फिर दो कि.मी. दौड़ लगते रहे। ऐसे करते-करते एक महीने में हम दोनों धीरे धीरे चार कि.मी. तक की दौड़ लगाने लगे, इससे ज्यादा ना ही वो दौड़ सकती थी और ना ही मैं उसे दौड़ाना चाहता था।
हम दौड़ने के बाद एक जिम स्टाइल गार्डन में जाते थे, जहाँ थोड़ी देर आराम करने के बाद बहुत सी आधुनिक झूले टाईप के व्यायाम मशीनों में कसरत किया करते थे।
इन सबमें मेरा जिम का पुराना अनुभव काम आ रहा था, मेरा पूरा फोकस किमी को सुडौल बनाने का था। 
आप सोच रहे होंगे डॉक्टरी ट्रीटमेंट, या दवाई का भी सहारा तो लिया जा सकता था, तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि पहली बात तो ऐसी सारी चीजें या तो असर नहीं करतीं, यदि करती भी हैं तो साईड इफेक्ट भी हो सकते हैं।
थोड़ी बहुत डॉक्टरी ट्रीटमेंट के लिए तो मैं खुद ही कहता हूँ, पर किमी को तो मुझे पूरा का पूरा बदलना था और सबसे बड़ी बात, इससे किमी का आत्मविश्वास नहीं लौटता। इसलिए मैं उसको नेचुरल तरीके से ही ट्रीट कर रहा था।
किमी हार्ड वर्क करके बहुत ज्यादा थक जाती थी, तो मैं घर आने पर उसके हाथ पैर दबा दिया करता था, हालांकि उसने शुरू शुरू में मुझे मना किया, पर अब हम इतने करीब आ चुके थे कि उसकी ना-नुकुर मेरी जिद के सामने फीकी पड़ गई।
मैंने इन सब चीजों के साथ ही उसके शरीर के रंग को भी ठीक करने के लिए घरेलू नुस्खे अपनाने को कहा। वो खुद से तो कुछ करने से रही.. तो मुझे ही मुलतानी मिट्टी, ऐलोवेरा लाना पड़ता था और आटा, बेसन, गुलाबजल, हल्दी को मिक्स करके एक लेप बनाना पड़ता था।
आप भी ट्राई कीजिएगा..
पहले तो मैं ये लेप उसके चेहरे और हाथों में लगवाता था और कुछ देर रखने के बाद नहाने को कहता, ये सब उसने कुछ दिन ही किए होंगे और असर दिखने लगा।
किमी भी अब पहले की तुलना में खुश रहने लगी, पर असली परिश्रम अभी बाकी था, क्योंकि थोड़े से बदलाव से काम नहीं चलना था और अभी तो उसे सेक्सी डॉल, अप्सरा, मॉडल बनाना था। उसे नार्मल लड़कियों से भी ज्यादा खूबसूरत और हॉट बनाना था।
इन सबके लिए मैंने उसे स्वीमिंग, साईकिलिंग और डांसिंग करवाने की सोची। पर इनमें टाइम भी बहुत लगता था, इसलिए मैंने ऑफिस से तीन महीने की छुट्टी ले ली और किमी से भी छुट्टी के लिए लेने को कहा।
किमी बड़ी मुश्किल से तैयार हुई, क्योंकि अब वो भी जान गई थी कि उसके ना कहने से मैं मानने वाला तो हूँ नहीं.. और हम दोनों को ‘नो वर्क.. नो पेमेंट’ पर और ऑफिस के हेड से किमी की जान-पहचान की वजह से छुट्टी मिल गई।
अब किमी यंत्रवत मेरी बात मानने लगी क्योंकि वो भी समझती थी कि ये सारे उपक्रम उसी के लिए ही हैं। मैं उसे डांस क्लास अकेले जाने को कहता और साईकिलिंग और स्वीमिंग के वक्त साथ जाता।
किमी को शार्ट ड्रेस में स्वीमिंग करते हुए देख कर मेरा तो लिंग अकड़ जाता था, क्योंकि किमी का शरीर अब सुडौल हो रहा था।
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06-11-2017, 09:53 AM,
#7
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
मैं कभी कंट्रोल कर लेता था और कभी घर आकर हाथों से ही हल्का हो जाता था।
लेकिन किमी के शरीर का रंग अभी भी ज्यादा नहीं बदला था, इसलिए अब मैंने उसे पूरी बाडी पर लेप लगाने को कहा। जाहिर सी बात है.. उससे खुद लगाते तो बनता नहीं और थकान की वजह से उसे रोज-रोज खुद से लगाने का मन भी नहीं करता, इसलिए उसने मुझे लगाने को कहा।
मैंने तभी कहा- सोच लो मेरे सामने पूरे कपड़े उतारने पड़ेंगे.. तभी लगाते बनेगा!
वो सोच में पड़ गई.. और चुप ही रही।
फिर मैंने बात को संवारते हुए कहा- अब मुझसे शर्माने झिझकने की जरूरत नहीं है.. और मुझे अपनी हद का पता है, तुम निश्चिंत होकर कपड़े उतारो और लेट जाओ।
मैंने लेप और मालिश के लिए एक अच्छा सा टेबल लगा रखा था, जिसमें अभी तक किमी लेट कर मुझसे पैर, सर और हाथों की मालिश करवाया करती थी।
उस टेबल पर आज पहली बार वो सिर्फ अंतर्वस्त्र में लेटी हुई थी। उसने कपड़े बहुत संकोच करते हुए उतारे थे, इसलिए मेरा एकदम खुला व्यवहार किमी को नाराज कर सकता था।
उसे बिना कपड़ों के या कम कपड़ों में मैंने स्वीमिंग के वक्त ही देखा था, उस वक्त भी पहली बार मेरा रोम-रोम झंकरित हो उठा था। अब इतने करीब से ऐसी हालत में किमी को देखना मेरे सब्र का इम्तिहान था। 
फिर भी मैंने मन ही मन भगवान से प्राथना की कि हे प्रभु मुझे खुद पर काबू पाने की शक्ति दें। क्योंकि जवान लड़का निर्वस्त्र लड़की को देख कर खुद को कैसे संभालेगा.. आप सोच सकते हैं।
अब सबसे पहले मैंने उसे उल्टा लेटने को कहा और लेप उसके पैरों से होते हुए जांघों तक और गर्दन से होते हुए कमर तक लगाया। इस बीच ब्रा की परेशानी तो आई, पर अभी उसे उतारने को कहना उचित नहीं था।
मैंने अब किमी को सीधा किया और उसके पेट, चेहरे, कंधे में अच्छी तरह से लेप लगाया। शायद किमी के शरीर में झुरझुरी सी हुई होगी, क्योंकि ऐसा करते हुए मेरे रोंये तो खड़े हो गए थे.. लिंग भी अकड़ गया था।
मैंने लेप के सूखने तक उसे ऐसे ही लेटे रहने को कहा और मैं बाथरूम में जाकर फिर हल्का हो आया।
यह सिलसिला तीन-चार दिन ही चला था कि अब मैंने किमी को ब्रा उतारने को भी कह दिया। वो मुझे चौंक कर देखने लगी.. पर उसने मना नहीं किया, लेकिन उतारी भी नहीं। 
मैं समझ गया कि मुझे ही कुछ करना होगा, मैंने आज लेप लगाते वक्त ब्रा का हुक खोल दिया।
किमी- संदीप नहीं.. रुक जाओ..
अभी उसने इतना ही कहा, पर उसके कहने से पहले हुक खुल चुका था। अभी उसके शरीर में पेंटी बाक़ी थी, लेकिन उसके लिए जल्दबाजी करना उचित नहीं था।
मैंने बैक साईड पर लेप लगाया, आज उसकी चिकनी आजाद पीठ पर लेप लगाने का अलग ही आनन्द आ रहा था।
फिर मैंने किमी को सीधा किया, अब जैसे ही मैंने ब्रा को शरीर से अलग करने की कोशिश की, किमी ने मेरा हाथ झट से पकड़ लिया। 
मैंने किमी की आँखों में.. और किमी ने मेरी आँखों में देखा.. हम दोनों ने आँखों ही आँखों में बातें की, उसने अपना सर ‘नहीं’ में हिलाया और मैंने ‘हाँ’ में, फिर मैंने थोड़ा जोर लगा कर ब्रा हटा दी। 
उस वक्त उसने भी अपने हाथों की पकड़ ढीली कर दी, पर आँखें बहुत जोर से बंद कर लीं। इस वक्त उसकी धड़कनें बहुत तेज हो गई थीं, क्योंकि पर्वत मालाओं में भूकंप जैसा कंपन साफ नजर आ रहा था। 
फिर मैंने लेप को उसके पेट और गले के अलावा उसके उरोजों पर लगाना शुरू किया। 
किमी के मम्में भारी तो पहले से ही थे और अब इतने दिनों की मेहनत से वो बहुत सुडौल भी हो गए थे, शायद अब किमी की मरी हुई सेक्स भावना भी जागने लगी थी। 
मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उसके चूचुक कड़क होकर आसमान की ओर उठ गए थे, छूने पर सख्ती का भी एहसास हो रहा था। 
मैंने पहले किमी के मम्मों के चारों ओर लेप को लगाते हुए हाथों को चूचुक की ओर आहिस्ते से बढ़ाया और ऐसी ही प्रक्रिया हर दिशा से की, शायद उसे सहलाने वाला एहसास हुआ हो। 
क्योंकि मैं चाहता भी यही था, इसलिए जानबूझ कर मैं अपने तजुर्बे का इस्तेमाल कर रहा था। 
फिर मैंने बहुत ही तन्मयता से उसके पूरे शरीर में लेप लगाया, लेकिन आज मेरा लिंग ज्यादा ही अकड़ने लगा और उम्म्ह… अहह… हय… याह… एक बार तो उसे बिना छुए ही मेरी निक्कर चिपचिपे द्रव्य से भीग गई। 
इतने के बाद भी कुछ ही पलों में मेरा लिंग पुनः फुंफकारने लगा था। मैं नहीं चाहता था कि किमी को मेरी हालत का पता चले और मुझे यकीन था कि किमी ने भी अपने आपको बड़ी मुश्किल से ही संभाला होगा। 
फिर मैंने एक जुगत लगाई ताकि बाथरूम में जाकर हल्का होने की जरूरत ना पड़े। 
अब तक किमी बहुत सुडौल और आकर्षक हो चुकी है, लेकिन मैं किमी को जिस रूप में देखना चाहता हूँ, वो अभी बाक़ी है। इसलिए सारे उपक्रम निरंतर जारी थे। वैसे भी हेल्थ के संबंध में कहा जाता है कि व्यायाम और शरीर को लेकर सारी जागरूकता उम्र के हर पड़ाव में निरंतर रहनी चाहिए। 
आप सब तो जानते ही हैं कि किमी के शरीर में लेप लगाते हुए मेरी हालत कैसी हो जाती थी और मुझे बाथरूम जाकर स्खलित होना पड़ता था। इसलिए मैंने एक प्लान किया और मैंने किमी के शरीर में लेप के साथ-साथ आँखों पर भी आलू और खीरे की गोल टुकड़े रख दिए, इससे आँखों के पास के डार्क सर्कल मिटते हैं और इससे मेरा फायदा ये था कि अब किमी मुझे देख नहीं सकती थी। जबकि मैं उसके निर्वस्त्र शरीर को देखते हुए उसके सामने ही अपने लिंग का घर्षण कर सकता था। 
अब मैं रोज ही किमी के शरीर पर लेप लगाने के बाद उसके आँखों पर खीरा-आलू के टुकड़े रख देता और नस फाड़ने को आतुर हो चुके लिंग को किमी के सामने ही निक्कर से से निकाल कर रगड़ने लगता था। किमी को इस बात का पता चलता था या नहीं.. मैं नहीं जानता और ना ही जानना चाहता था, क्योंकि उस वक्त मैं कामांध हो चुका होता था। 
फिर भी मेरी शराफत यही थी कि मैंने किमी को हवस का शिकार नहीं बनाया। कई बार स्खलन के दौरान मेरे मुँह से हल्की आवाजें निकल जाती थीं और मेरे लिंगामृत की बूँदें भी किमी के ऊपर ही छिटक जाती थीं।
यह सिलसिला लगभग पंद्रह दिनों तक चला। 
अब तक हमारी छुट्टी के तीन महीने भी बीत गए, अब हमें सारी चीजों के साथ साथ ऑफिस के लिए भी वक्त निकालना था और जिन्दगी बहुत ज्यादा वयस्त होने लगी।
इन 15 दिनों में किमी के व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया था, आता भी क्यों नहीं.. क्योंकि अब वो सुंदर सी.. स्फूर्ति भरी, सबकी नजरों को भाने वाली लड़की जो बन चुकी थी।
उसके ऑफिस में तो कई लोगों ने उसके शारीरिक परिवर्तन और रंग में बदलाव की वजह से उसे पहचाना भी नहीं।
एक रविवार को जब मैं लेप लगा रहा था, किमी ने मुझसे कहा- संदीप मेरे शरीर का एक हिस्सा अभी भी लेप और खूबसूरती से वंचित है, उसे कब खूबसूरत बनाओगे? 
इतना कहते ही वो खुद शरमा भी गई। मैं समझ गया कि ये पेंटी वाले हिस्से को लेकर कह रही है, क्योंकि उसके शरीर में लेप के दौरान एक मात्र वही कपड़ा शेष रह जाता था। उसे उतारना तो मैं भी चाहता था.. लेकिन जल्दबाजी नहीं कर रहा था।
आज मेरे से पहले ही किमी का धैर्य टूट गया, मैं बहुत खुश था और हतप्रभ भी।
मैंने कहा- हाँ किमी.. आज से वहाँ भी लेप लगा दूंगा।
वो कुछ न बोली, वो हमेशा की तरह अपने बाक़ी कपड़ों को उतार कर लेट गई। 
अब मैंने पहले उसकी पीठ की ओर से लेप लगाना शुरू किया, पहले कंधों पर मालिश करते हुए चिकनी पीठ और सुडौल हो चुकी कमर पर लेप लगाया। उसके शरीर में कंपन हो रही थी और मेरे रोंये भी खड़े हो जाते थे। हालांकि उत्तेजना रोज ही होती थी, पर आज पेंटी भी उतरने वाली है.. यही सोच कर शायद हम दोनों ही नर्वस हो रहे थे, या कहो कि अतिउत्तेजित हो रहे थे। 
मैंने किमी की जांघों पिंडलियों और पंजों पर लेप लगाया, फिर किमी को सीधा लेटाया और उसके चेहरे से होते हुए तने हुए उरोजों पर लेप लगाया। आज मैंने लेप लगाते हुए उसके उरोजों को दबा भी दिया, इस पर वो थोड़ा कसमसाई तो.. पर उसने कुछ कहा नहीं। 
इस तरह मेरी हिम्मत बढ़ रही थी, मैंने अब उसके सपाट पेट पर लेप लगाया और उसकी नाभि में उंगली रख कर घुमा दी तो वो फिर कसमसा के रह गई। 
अब मैं उसके पैरों की तरफ खड़ा होकर उसके पंजों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए लेप लगाने लगा और उसकी जांघों सहलाते, दबाते हुए उसकी पेंटी के नीचे वाली इलास्टिक तक अपने हाथों के अंगूठे को ले जाने लगा। मुझे पेंटी में चिपकी उसकी योनि रोज नजर आती थी, पर आज वहाँ मुझे गीलेपन का एहसास हो रहा था, इसका मतलब आज किमी की योनि अतिप्रसन्नता में रस बहाने लगी थी। 
अब मैंने अपने दोनों हाथ किमी के पेट पर रखे और नीचे की ओर सरकाते हुए, कमर को सहलाते, दबाते हुए, पेंटी में अपनी उंगलियाँ फंसाई और गोल लपेटने जैसा करते हुए, पेंटी को फोल्ड किया। जैसे ही दो-तीन इंच पेंटी फोल्ड हुई किमी की क्लीन सेव योनि के ऊपर का हिस्सा दिखने लगा। 
मैं पेंटी को फोल्ड करना रोक कर.. उस जगह को आहिस्ते से ऐसे छूने लगा, जैसे मैं किसी नवजात शिशु को सहला रहा होऊँ। 
अब पहली बार किमी के मुंह से ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ की आवाज निकली और मेरी बेचैनी बढ़ गई। मैंने पेंटी को और फोल्ड किया.. अब लगभग पूरी पेंटी फोल्ड हो गई और मुझे किमी की कयामत भरी योनि के प्रथम दर्शन मिल गए। पर उसकी जांघें अभी भी आपस में चिपकी हुई थीं, इसलिए योनि की सिर्फ दरार नजर आ रही थी। 
किमी की थोड़ी सांवली पर बालों रहित मखमली योनि बहुत ही उत्तेजक लग रही थी। पेंटी से ढकी उस जगह की चमक और आभा का वर्णन मेरे बस का नहीं, इसलिए वह कल्पना आप ही कीजिए।
आप बस इतना जान लीजिए कि बिना कुछ किए ही मैं स्खलित हो गया पर लिंग राज ने स्खलन के बावजूद तनाव नहीं छोड़ा था। 
अब मैंने योनि की दरार के नीचे अपनी उंगली लगाई और जिस तरह हम दो लकड़ी के ज्वांइट को भरने फेविकोल लगाते हैं.. वैसे ही उसके कामरस की एक बूंद को उसकी योनि के ऊपर तक आहिस्ते से फिरा दिया। 
मेरा इतना करना था कि किमी कसमसा उठी और वो ‘ओह… संदीप.. बस..’ इतना ही कह पाई।
अब मैंने उसकी पेंटी में फिर से उंगली फंसाई और किमी की मदद से पेंटी को अलग कर दिया और बड़े गौर से उस हसीन जगह का मुआयना करने लगा। मैं उस पल को वहीं ठहरा देना चाहता था, जिसकी चाहत में मैं ये सारे उपक्रम कर रहा था। हालांकि मैं सारी चीजें किमी के लिए कर रहा था, पर मेरा भी स्वार्थ था, यह भी सच है। 
अब मैंने दोनों हाथों की उंगलियों को उसकी योनि के दोनों ओर ले जाकर योनि को दबाया और योनि के लबों के जोड़ को आपस में रगड़ा। मैं यह सब इतने प्यार से कर रहा था कि किमी की सिसकारियाँ निकलने लगीं। 
फिर मैंने उसके पैरों को मोड़ कर फैला दिया, उसकी गुलाब की पंखुड़ियों जैसी फांकों को देख कर मन मचल उठा, पर मैंने खुद पर काबू किया और लेप को पेंटी से ढके भागों पर बड़े इत्मिनान से लगाने लगा। 
किमी ने अपने ऊपर काबू पाने के लिए टेबल को कस के जकड़ लिया था। मैंने किमी शरीर के हर हिस्से में लेप लगाया फिर आलू-खीरा काट लाया और जब मैं उसे किमी की आँखों में रखने वाला था, तब किमी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। 
उसने कहा- संदीप तुम मेरी आँखों में ये लगाकर क्या करते हो.. मैं सब जानती हूँ!
मैं स्तब्ध था, मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
तब उसी ने फिर कहा- ऐसी परिस्थितियों में तुम्हारा ऐसा करना स्वाभाविक ही है। तुम अच्छे इंसान हो.. इसलिए अब तक मुझसे दूर रहे, कोई और होता तो सबसे पहले मेरे शरीर से खेलने की ही बात सोचता और शायद ऐसे ही लोगों की वजह से सेक्स के प्रति मेरी रुचि खत्म हो गई थी। हम दोनों जानते हैं कि सेक्स दो शरीर का मिलन नहीं होता, ये तो आत्माओं, विचारों, भावनाओं का, मिलन होता है। मेरे अन्दर सेक्स की भावना को तुमने जागृत किया है, मेरे खोये हुए आत्मविश्वास को तुमने जगाया है, मेरी तन्हाई को दूर किया है, जीवन में आनन्द लेकर जीना सिखाया है, मेरे शरीर का रोम-रोम और आत्मा का सूक्ष्म अंश भी तुम्हारा ऋणी है। मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ संदीप.. तुम जो चाहो कर सकते हो। 
ऐसा कहते हुए उसकी आँखों से अश्रुधार बह निकली। 
मैंने उसे संभाला और कहा- मैं तो सिर्फ तुम्हारे चेहरे पर खुशी देखना चाहता हूँ, अन्दर की खुशी..! बस और कुछ नहीं, सिर्फ उतना ही मेरा लक्ष्य है।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा- थैंक्स संदीप तुम बहुत अच्छे हो! 
वो मुझसे लिपट गई। हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे और बहुत देर बाद उसने अपना सर उठाया और मेरी आँखों में देखते हुए कहा- संदीप एक बात कहूं..?
मैंने ‘हाँ’ में अपना सर हिलाया.. तो उसने कहा- मुझे बचा हुआ अंतिम सुख भी दे दो।
मैंने कहा- मैं कुछ समझा नहीं..! 
उसने कहा- समझ तो तुम गए हो.. पर स्पष्ट सुनना चाहते हो.. तो सुनो, मैं तुम्हारे साथ संभोग करना चाहती हूँ, ऐसी कामक्रीड़ा करना चाहती हूँ.. जैसा कामदेव और रति ने भी न किया हो। 
मैं मुस्कुरा उठा.. मैंने कहा- देखो किमी हम दोनों ही पहले भी सेक्स कर चुके हैं और मैंने किमी से यह भी कहा कि मैं तुम्हारे साथ कामक्रीड़ा के चरम तक पहुँचना चाहता हूँ और वो तभी हो सकता है, जब हमारे मन में एक दूसरे के अतीत को जानने के बाद भी कोई गिला शिकवा न हो।
तो किमी ने कहा- संदीप तुमने मेरे लिए जो किया, उसके बाद तो तुम मेरे सब कुछ हो गए हो। अगर तुम चाहते ही हो कि मैं तुम्हारा अतीत जानूं, तो तुम मुझे वो बातें फिर कभी बता देना, पर अभी नहीं..! अभी तो बस मुझे इस लम्हे को जी लेने दो और तुम मेरा यकीन करो मुझे तुम्हारे किसी अतीत से कोई परेशानी नहीं है।
ये बातें हम मालिश टेबल पर ही कर रहे थे, यहाँ से किमी को नहाने जाना था। 
अब मैं खुशी से झूम उठा और मैंने किमी को अपनी गोद में उठा लिया। पहले यह संभव नहीं था.. पर अब किमी का बीस किलो वजन कम हुआ है और अब वह 56 किलो की 5.3 इंच हाईट वाली गहरे पेट, पिछाड़ी निकली हुई, सीना उभरा हुआ और शक्ल तीखी, आँखें नशीली, निप्पल काले.. परंतु घेराव कम वाली माल बन चुकी थी। कुल मिला कर अब किमी आकर्षक सुंदरी बन चुकी थी और किसी सुंदरी का भार.. किसी भी नौजवान को भारी नहीं लगता, तो मैंने भी किमी को गोद में उठा लिया।
किमी ने भी अपनी बांहों का हार मेरे गले में डाल लिया और कहा- अब क्या इरादा है जनाब..?
मैंने भी कहा- बस देखते जाओ जानेमन.. थोड़ी देर में सब पता चल जाएगा। 
मैंने उसे कुर्सी पर बिठा दिया और आँखों पर आलू-खीरा रख कर उसे बैठे रहने को कहा। 
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06-11-2017, 09:54 AM,
#8
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
अब मैं दूसरी तैयारी करने लगा.. वास्तव में मैं इस पल को और हसीन बनाना चाहता था, चूंकि अभी किमी को नहाना ही था तो मैंने अपना रोमांस बाथरूम में ही करने का प्लान बनाया। 
मैं किमी को पहले शाही स्नान कराने के बाद ही उससे सेक्स करना चाहता था। इसलिए मैं दूध, गुलाब जल और गुलाब की पंखुड़ियों को तलाशने लगा। हम लोग दूध के पैकेट घर में हफ्ते में दो बार लाते थे.. एक बार में सात पैकेट लाने से सुबह शाम के हिसाब से तीन चार दिन चल जाता था और मैं आज ही दूध के पैकेट लेकर आया था।
अब मैंने सारे पैकेट फ्रिज से निकाले और एक बाल्टी में तीन पैकेट फाड़ कर डाल लिए और बाकी के पांच पैकेट बिना फाड़े ही बाथरूम में रख आया। बाल्टी को मैंने पानी से भर दिया और किमी के कमरे में रखी गुलाब जल की बोतल को भी बाल्टी में उड़ेल दिया। 
अब गुलाब कहाँ से लाता.. क्योंकि जो चाहो वो हो जाए.. ऐसा संभंव नहीं है, तो मैंने बालकनी में खिले गेंदे के कुछ फूल को ही बिखरा कर पानी में डाल दिया। 
अब पानी शाही स्नान के लिए तैयार था। शाही स्नान में और भी चीजें होती होंगी, पर मैं उस समय जितना कर सकता था किया।
इसके बाद मैंने पहले अपने पूरे कपड़े उतारे और किमी को फिर से गोद में उठा लिया, उसने मेरी आँखों में आँखें डालकर अपने होंठों में मुस्कुराहट बिखेरी। किमी के खुले शरीर से मेरा खुले शरीर का स्पर्श पहली बार हुआ था, इसलिए दोनों के शरीर में झुरझुरी सी हुई।
मैंने उसे बाथरूम में ले जाकर एक पीढ़े पर बिठाया, बाथरूम बड़ा था.. इसलिए हमें कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।
चूंकि हम लोगों के अलावा वहाँ और कोई नहीं था, इसलिए दरवाजा भी खुला ही था। 
किमी ने मेरी तैयारी देखी और खुश हो गई- संदीप तुम बहुत अच्छे हो यार, सच में तुम बहुत अच्छे हो..
पता नहीं उसने ऐसा कितनी बार कहा होगा, क्योंकि मैं ये शब्द पांच मिनट तक लगातार सुनते रहा। फिर मैंने ही उसके मुंह पर हाथ रख कर उसे चुप कराया। 
तभी उसकी नजर बाल्टी में गेंदे के फूल की पत्तियों के ऊपर पड़ी तो उसे हंसी आ गई।
मैंने तुरंत कहा- गुलाब के फूल नहीं मिले.. तो इसे डाल दिया!
उसने ‘कोई बात नहीं..’ कहते हुए कहा कि जाओ मेरे अलमारी को देख आओ शायद तुम्हें कुछ मिल जाए।
मैंने कहा- बाद में देख लूँगा यार!
उसने कहा- नहीं अभी जाओ! 
मुझे उसकी जिद माननी पड़ी, मैंने उसकी अलमारी खोली.. उसके कपड़ों के ऊपर जो रखा था, उसे देख कर मैं पागल सा हो गया.. उसे लेकर मैं किमी की ओर दौड़ पड़ा और किमी के सामने पहुँच कर ‘आई लव यू टू किमी..’ कहते हुए उसे अपनी बांहों में भर लिया। 
दरअसल उस अलमारी में किमी ने मेरे लिए गुलाब का बंच, चॉकलेट, घड़ी, पर्स और एक सफेद कागज रखा था, जिसमें उसने लिपिस्टिक लगा कर किस का निशान बनाया था और ‘आई लव यू संदीप..’ लिखा था।
मैं खुश इसलिए था क्योंकि मैंने किमी से इतने प्यार की उम्मीद नहीं की थी।
खैर.. हमने अपनी भावनाओं पर काबू किया। 
किमी ने कहा- लो अब गुलाब की पत्तियां मिल गईं ना.. अब डाल दो इसे पानी में!
मैंने वैसा ही किया, दो-तीन गुलाब बचा कर बाक़ी तोड़ कर उनकी पत्तियां पानी में डाल दीं। 
अब मैंने दूध के पांच पैकेटों में से एक पैकेट किमी के सर के ऊपर रख कर फाड़ा और उसके शरीर के सूख चुके लेप को दूध से भिगो भिगो कर रगड़ना शुरू किया। किमी आनन्द के सागर में डूबी जा रही थी, उसकी नजरें कभी मेरी नजरों से मिलतीं, तो शरमा उठती और कभी वो मेरे फनफनाते लिंग को चोर नजरों से निहारती जा रही थी।
मैंने दूध से उसकी मालिश का सिलसिला जारी रखा, अब मैंने बारी-बारी सारे दूध के पैकेटों को किमी के ऊपर उड़ेलते हुए, किमी के हर अंग की मालिश की। पहले उसके उरोजों को सहलाया, मसला, पुचकारा, पीठ पर उंगलियाँ घुमाईं और अब बारी थी योनि की, मैंने उसके लिए किमी को खड़ा किया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया और उसकी कमर को जकड़ कर मालिश करने लगा।
मेरी नजर उसकी योनि पर टिकी थी।
मैंने योनि को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे सहलाना शुरू किया.. तभी किमी ने मेरे बाल पकड़ के खींचे, मैं समझ गया कि अब खुद पर काबू करना इसके बस का नहीं.. पर मैं अपने कार्य में लीन था।
हालांकि मेरा लिंग भी महाकाय हो चुका था, पर लेप लगाते वक्त वीर्यपात हो जाने से अभी दुबारा फव्वारे पर नियंत्रण था। मैंने योनि की दूध से मालिश करते वक्त अपनी एक उंगली योनि में डाल कर मालिश कर दी, दो चार बार ही उंगली को आगे पीछे किया होगा कि मुझे अन्दर से गर्म लावे का एहसास होने लगा। उसकी योनि रो पड़ी.. रस की नदी जांघों पर बह आई, दूध और उसका रंग एक ही था इसलिए कितना बहा.. ये कहना मुश्किल है। पर बहती धार देख कर मेरे मुँह में पानी आ गया, लेकिन अभी सब मैला-कुचैला होने की वजह से मैं अपने आपे में ही रहा।
अब किमी की हालत खड़े रहने की नहीं थी और मुझे भी उसे बैठाना ही था क्योंकि अभी उसका स्नान बाकी था। 
मैंने उसे पीढ़े पर बिठाया और उसके ऊपर पानी डालने लगा। मैं किमी के सामने खड़ा था और वो मेरे सामने बैठी थी, मतलब मेरा लिंग ठीक उसकी नजरों के सामने था, जब किमी के सर से पानी नीचे की ओर बहता था.. तब दूध और पानी उसके बालों, गालों से होते हुए सीने की घाटियों पर.. और वहाँ से नीचे आकर अथाह समुद्र में खो जाती थी।
उस वक्त एक अलग ही नजारा था, ये देख कर मेरा लिंग झटके मारने लगा। 
किमी ने मेरी बेचैनी समझ कर पहली बार मेरा लिंग अपने हाथों में लिया, शायद वो खुद भी बहुत बेचैन थी इसीलिए वो मेरे लिंग को बहुत जोरों से दबा रही थी और आगे-पीछे कर रही थी।
इधर किमी के चिकने शरीर का स्पर्श मुझे पागल कर रहा था। किमी की पकड़ मेरे लिंग पर और मजबूत हुई और रगड़ की वजह से मैं पांच मिनट में फूट पड़ा। मेरे लिंग से निकला बहुत सारा वीर्य किमी के चेहरे पर गया.. वो थू-थू करने लगी।
मैंने कहा- इतना क्यों घिना रही हो.. लोग तो इसे पी भी जाते हैं।
तो उसने कहा- वो सब फिल्मों में होता है.. हकीकत में ये सारी चीजें घिनौनी ही लगती हैं।
‘नहीं किमी.. ऐसा नहीं है, ये भी कामक्रीड़ा का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है, ये बात मैं तुम्हें प्रेक्टिकल करके बताऊंगा।’ 
किमी ने दिखावे में मुंह बनाया और मैंने उसे जल्दी से नहलाया। उसी वक्त उसने मेरे ऊपर भी पानी डाल दिया तो अब हम दोनों ही शाही स्नान का मजा लेने लगे।
हम जल्द ही नहा कर एक-दूसरे को तौलिया से पोंछने लगे, अभी शरीर पूरा नहीं सूखा था.. फिर भी मैंने किमी को फिर से गोद में उठाया और हॉल वाले बेड पर ले आया।
यहाँ रोशनदान से और खिड़की से खूब प्रकाश आ रहा था, रूम के बाहर फुलवारी और उसके बाद बड़ा गेट जो हमेशा बंद रहता था, इसलिए खिड़की बंद करने की आवश्यकता नहीं थी।
किमी को मैंने बिना कपड़ों के कई बार देखा था.. पर आज वो दूध से नहा कर निकली थी। उसके बाल भीगे हुए थे और चेहरे पर शर्म उसकी खूबसूरती पर चार चांद लगा रहे थे। मुझे वो रति, मेनका, रंभा जैसी अप्सरा नजर आ रही थी और मैं खुद के भीतर कामदेव को महसूस कर रहा था।
किमी ने अपने एक हाथ से बाल का पानी झड़ाना शुरू किया.. अय..हय.. उसके उरोजों का हिलना देख कर मैंने अपना धैर्य खो दिया और मैंने बेड पर चढ़कर उसे गले लगा लिया।
किमी का हर अंग फूलों सा नाजुक और मुलायम लग रहा था। मैंने किमी के हर एक अंग को चूमना चाटना चाहा, किमी ने भी अपनी बांहों में मुझे लपेट लिया और मेरे बराबर ही प्रतिउत्तर देने लगी, हमारी आवाजें, सिसकारियों में बदल गईं।
अब मैंने किमी को खुद से अलग किया और उसे बेड पर सीधा लेटा दिया।
मैंने किमी को खुद से अलग किया और बेड पर सीधा लेटाकर मैं खुद उसके पैरों की ओर आकर घुटनों पर बैठ गया। 
मैंने किमी को नीचे से ऊपर तक निहारा किमी का रंग काले से गेहुँआ हो गया था.. उसका पेट अन्दर की ओर हो गया था, गला सुराहीदार, होंठ कंपकंपाते हुए उसको बेहद हसीन बना रहे थे।
मैंने इस नजारे को अपनी आँखों में हमेशा के लिए कैद करने की नाकाम कोशिश की। उसकी त्वचा इतनी मुलायम लग रही थी कि मेरा उसकी शरीर के हर हिस्से को चाटने का मन हुआ.. और आज मैंने अपने मन की बात सुनी।
सबसे पहले मैंने किमी के पैरों के अंगूठे को जीभ से सहलाया और धीरे-धीरे पूरा अंगूठा मुंह में भर के चूसने लगा। किमी के लिए यह सब नया था.. वो हड़बड़ा कर उठ गई, पर उसे आनन्द भी आ रहा था, उसकी सिसकारियों और शरीर की कंपन साफ पता चल रही थी। 
मैंने उसके दोनों पैर के अंगूठे बड़े मजे से चूसे.. फिर उसकी दोनों टांगों पर बारी-बारी जीभ फिराने लगा। मैं अपनी जीभ उसके पंजों से शुरू करके उसकी जांघों तक फिराता था, जिससे वो एकदम से सिहर रही थी। 
फिर मैं खिसक कर ऊपर आ गया और उसके पेट और नाभि में जीभ घुमाने लगा, किमी पागल हुए जा रही थी। 
मैंने जीभ को ऊपर की ओर बढ़ाते हुए उसके उरोज और निप्पल तक पहुँचाई। जब जीभ निप्पल तक पहुँचती थी, तब मैं अचानक ही उसके पूरे उरोज को खाने जैसा प्रयास करता था।
किमी ने आँखें बंद कर ली थीं और ‘आई लव यू संदीप..’ की रट लगाने लगी, मैं अपने ही काम में व्यस्त रहा। 
जब मैंने उसके कंधों, कान और गाल को चूमा तो वो सिहर उठी। उसने मुझे जकड़ना चाहा और तभी मैंने उसके मुंह में जीभ डाल दी। मैं उसे उत्तेजक चुंबन देना चाह रहा था और वो मेरे हर हमले का जबाव मुझसे बढ़ कर दे रही थी। 
उसने मेरे कानों में कहा- संदीप अब देर किस बात की..! 
मैंने उसकी आँखों को देखा.. उसमें वासना ही वासना भरी थी, पर मैं अभी कुछ और चाहता था, इसलिए मैंने उठ कर अपनी दिशा बदली। अब मैंने उसके चेहरे की ओर अपनी कमर और उसकी कमर की ओर अपना चेहरा रखा। इस दौरान मैंने किमी को खुद के उभारों को दबाते देखा।
मैंने फिर नाभि से जीभ फिराना चालू किया और इस बार मेरे जीभ का अंतिम पड़ाव किमी की योनि का ऊपरी सिरा था। किमी ने मेरा सर पकड़ लिया और कराहने लगी, मैंने भी अपना जौहर दिखाते हुए योनि के चारों ओर जीभ घुमाई और योनि की दरारों में जीभ फेरने लगा। 
किमी के शरीर की झुरझुरी साफ महसूस हो रही थी, किमी ने मेरे बाल और जोर से खींचे.. शायद कुछ बाल उखड़ भी गए हों। 
तभी मैंने कुछ देर रुककर किमी से कहा- किमी लिंगराज के लिए अपने मुंह का द्वार खोल दो..!
किमी ने कहा- क्या संदीप.. और क्या-क्या कराओगे मुझसे!
इतना ही कह कर वो मेरे लिंग पर जीभ फिराने लगी.. पहले तो उसने खांसने का नाटक किया.. फिर जल्द ही लिंग को मुंह की गहराइयों तक ले जाकर चूसने लगी। 
मन तो किमी का पहले ही उसे चूसने का हो रहा होगा.. पर शायद मेरे कहने का इंतजार कर रही थी। क्योंकि कोई भी इंसान जो सेक्स के लिए तड़प रहा हो उसके सामने सात इंच का तना हुआ गोरा लिंग लहरा रहा हो.. तो मन तो करेगा ही.. और अभी तो मेरे लिंग का आकार उत्तेजना की वजह से और ज्यादा भी हो गया था।
अब हम दोनों 69 की पोजीशन में मुख मैथुन में लगे हुए थे। 
किमी ने एक बार फिर साथ छोड़ दिया और उसी वक्त उसने मेरा लिंग अपने दांतों में जकड़ लिया। मैं चीख पड़ा, किमी कांपते हुए झड़ गई, उसके अमृत की कुछ बूँदें मेरे जीभ में लगीं, पर मैंने सारा रस नहीं पिया क्योंकि मुझे अच्छा नहीं लगता। 
अब किमी ने लिंग से दांतों की पकड़ ढीली की.. तब मैंने अपना लिंग उसके मुंह से निकाल लिया। मेरा लिंग दर्द की वजह से थोड़ा सिकुड़ गया था। वैसे अच्छा ही हुआ.. नहीं तो मेरा भी स्खलन अब तक हो चुका होता। 
फिर दोनों लिपट कर कुछ देर लेट गए, किमी ने मुझे न जाने कितनी बार चूमा और थैंक्स कहा। 
कुछ देर ऐसे ही उसके उरोजों और शरीर से खेलने के बाद मैं एक बार फिर जोश में आ गया था। किमी की भट्ठी भी दुबारा जलने लगी थी। 
इसी बीच किमी बाथरूम से होकर आ गई और अब उसकी योनि भी साफ थी। हम एक बार फिर जल्दी से मुख मैथुन की मुद्रा में आ गए और जैसे ही मुझे अपने लिंग में पूर्ण तनाव महसूस हुआ, मैंने किमी के टांगों को फैलाया और उसकी योनि पर अपना लिंग टिका कर बैठ गया।
मैंने किमी की योनि को अपने लिंग से सहलाया.. किमी ने बिस्तर को जकड़ लिया था, मानो वह हमले के लिए तैयारी कर रही हो। 
उसकी योनि ने मेरा मार्ग आसान करने के लिए चिपचिपा द्रव्य छोड़ दिया था, अब मैंने किमी की आँखों में देखा और अपनी भौंहे उचका कर शरारती इशारा किया तो किमी शरमा गई और ‘धत’ कहते हुए मुंह घुमा लिया। 
अब मैंने लिंग को उसके योनि में प्रवेश करा दिया.. अन्दर के गर्म लावे को मेरा लिंग साफ-साफ महसूस कर सकता था। किमी की आँखें बंद करते हुए एक ‘आह..’ भरी और इसी सिसकारी के साथ किमी ने लिंग को अपने अन्दर ले लिया। हालांकि उसकी सील पहले से टूटी हुई थी.. पर योनि की कसावट अभी भी बरकरार थी। 
मैंने कमर धीरे-धीरे हिलाया और उसे छेड़ा- गाजर इससे भी मोटी थी क्या?
किमी ने ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ के साथ लड़खड़ाते हुए कहा- आह्ह.. बड़ा बेशर्म है रे तू.. बड़ी थी या छोटी.. मैं नहीं जानती.. पर ये जरूर है कि आज जैसा मजा मैंने जिन्दगी के किसी पल में नहीं लिया! 
और इतना कहने के साथ ही उसके मासूम आंसू गालों पर ढलक आए। किमी उस वक्त और भी बला की खूबसूरत लगने लगी, किमी की आँखें वासना से लाल हो गई थीं और उसने मुझसे निवेदन के लहजे में कहा- संदीप अब और बर्दाश्त नहीं होता.. आज मुझे ऐसे रगड़ो कि जिन्दगी भर न भूल पाऊं.. और हाँ संदीप, मैंने आज से अपनी जिन्दगी तुम्हारे नाम कर दी है, अब कभी मुझसे दूर न होना। 
इतना सुनकर मेरे अन्दर का जोश बढ़ गया.. मैंने किमी से कहा- तुम चिंता छोड़ कर सिर्फ आनन्द लो! 
मैं अपना घोड़ा तेज दौड़ाने लगा… कमरा आआआअ… ऊऊऊउउउ की मादक आवाजों से गूँजने लगा। किमी के पूरे शरीर को मैं बार-बार सहला रहा था, किमी ने अपने उरोज खुद थाम रखे थे, अब हम दोनों के बीच शर्म नाम की कोई चीज नहीं थी। 
सम्भोग की गति बढ़ने लगी.. फिर और ज्यादा बढ़ने लगी.. और तब तक बढ़ती रही, जब तक तूफान शांत न हो गया, हम दोनों एक साथ ही स्खलित हुए थे। 
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06-11-2017, 09:54 AM,
#9
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
दोनों ऐसे ही लेटे रहे और आँखें मुंद गईं। जब शाम चार बजे नींद खुली.. तो होश आया कि आज दोपहर हमने खाना ही नहीं खाया है, फिर भी हम दोनों ने बाथरूम से आकर खाना बनाने के पहले एक राऊंड और रतिक्रिया किया और बहुत आनन्द लिया। 
फिर खाना खाने बाहर गए और रात को फिर एक बार ये दौर चला। 
अब हम लगभग रोज ही एक बार सेक्स कर लिया करते थे। एक से ज्यादा भी नहीं करते थे क्योंकि इससे रुचि खत्म हो जाती। 
किमी का व्यायाम, डांसिंग, स्वीमिंग, साइकिलिंग, लेप और सभी उपक्रम अब दिनचर्या में शामिल हो गया था। अब किमी दिनों दिन और खूबसूरत होने लगी थी। हमारा संबंध और गहरा हो गया था।
एक दिन जब हम घर पर बैठे थे, तो किमी को उसके पापा का फोन आया, वो किमी की बहन स्वाति को किमी के पास पी.एस.सी. की तैयारी के लिए भेज रहे थे। 
जब किमी ने मेरे होने का बहाना किया, तब पापा ने ‘तुम तीनों ही रह लेना’ कह दिया। 
मैंने किमी से कहा तो तुम इतना परेशान क्यूं हो रही हो, आने दो ना उसे.!
तो उसने कहा- तुम समझते नहीं संदीप.. वो आ गई तो हमें खुलकर मिलते नहीं बनेगा।
मैंने किमी को समझाते हुए कहा- तुम फिकर मत करो, कोई न कोई रास्ता निकल आएगा, तुम टेंशन में इस पल को बर्बाद मत करो। 
मैं उसे बांहों में लेकर रतिक्रिया में डूब गया।
किमी व्यायाम और आयुर्वेदिक तरीकों की वजह से बहुत निखर गई है, वह अपने उम्र से छोटी और कामुक नजर आने लगी है।
स्वाति और किमी पिछली घटना के कारण अच्छे से बात नहीं करती इसलिए ज्यादातर समय दोनों मुझसे ही बात करती या कोई काम के लिए कहती हैं।
स्वाति के साथ मैं खुल कर ही रहता हूँ पर अपनी हदों का ख्याल हम दोनों ने ही रखा है। हम सब फ्रेंडली ही रहते थे इसलिए एक दूसरे को नाम से ही संबोधित करते हैं।
जब किमी और मुझे सेक्स करने की ज्यादा बेचैनी हो जाती तो हम दोनों किसी भी मौके का फायदा उठा कर रतिक्रिया में लग जाते थे।
एक बार ऐसे ही स्वाति नहाने के लिए बाथरूम में घुसी, उसके जाते ही मैं किमी का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बैडरूम में ले गया और ताबड़तोड़ चुम्बन अंकित करने लगा।
किमी ने भी मुझे जकड़ लिया और ‘माई लव…’ कहते हुए बहुत सारे चुम्बन अंकित कर दिये।
हम थोड़ी देर ही ऐसी अवस्था में रहे लेकिन इस बीच मैंने किमी के उरोजों का खूब मर्दन किया पर किमी ने खुद पर काबू पाते हुए कहा- तुमसे बिना सेक्स किये एक दिन भी रह पाना अब मेरे लिए भी मुश्किल हो गया है, लेकिन तुम तो जानते हो न कि मैं हमारे रिश्ते की सेफ्टी के लिए थोड़ा सोच समझ कर कदम उठाती हूँ, तुम भी बात को समझो और अच्छे मौके का इंतजार करो।
अब दोस्तो, मैं ठहरा अन्रर्वासना का नियमित पाठक, तो मेरे दिमाग में बात आने लगी कि क्यों ना दोनों बहनों के साथ सेक्स का मजा लूं।
लेकिन दूसरे ही पल मुझे किमी की खुदखुशी वाली बात याद आई, किमी ने पहली बार खुदखुशी का प्रयास स्वाति और अपने पति की बेवफाई की वजह से ही किया था। और फिर किमी भी अब बहुत खूबसूरत होने के साथ ही मेरे प्रति पूर्ण समर्पित भी है, तो मैंने किमी के साथ वफादारी से रहने का फैसला किया।
स्वाति मार्केट, कोचिंग या किसी अन्य काम से घर से बाहर जाती तो हम टूट कर सेक्स करते थे।
ऐसा कुछ दिनों तक चलता रहा, फिर पांचवें महीने के अंत में स्वाति ने कोचिंग छोड़ दी और स्वाति घर पर रह कर तैयारी करने लगी।
ऐसे में मुझे और किमी को सेक्स किये हुए लंबा समय गुजर गया, सिर्फ आफिस जाते वक्त हम चिपक कर बैठते और सुनसान रास्तों पर चूमा चाटी कर लेते थे, पर सेक्स नहीं हो पाता था।
इसलिए एक दिन जब स्वाति बाथरूम में घुसी तो मैंने किमी को बैडरूम में ले जाकर पटक दिया, उस वक्त किमी कैपरी और टीशर्ट पहने हुये थी।
स्वाति भी इसी तरह के कपड़े घर पर पहनती थी, मैं लोवर और ढीला टी शर्ट पहने हुआ था, मैंने जानबूझ कर आज चड्डी नहीं पहनी थी, मैंने आज अपने लिंगराज को योनि रानी से मिलाने का वादा कर दिया था।
किमी को गद्दे पर पटकते ही मैं उसके ऊपर कूद गया और टीशर्ट के ऊपर से ही उसके मम्मे दबाने लगा, किमी भी तड़प रही थी फिर भी उसने एक बार मना करने की कोशिश की पर मैं नहीं माना तो उसने बहुत जल्दी खुद को मेरे ऊपर सौंप दिया।
मैंने उसकी सफेद टी शर्ट एक झटके में निकाल फेंकी, उसने टी शर्ट के अंदर काले रंग की ब्रा पहन रखी थी, जो किमी के उभारों को इतना आकर्षक बना रही थी कि मैं उस पल को याद करके अभी लिखना छोड़ कर मुठ मार रहा हूँ… आह… ओह… हो गया..
यार माफी चाहता हूँ पर सच में अभी मुझसे रहा नहीं गया, क्यूंकि जब तक शेर के मुंह में खून ना लगा हो तो चलता है पर एक बार खून मुंह लगने के बाद शेर शिकार किये बिना नहीं रह सकता।
मेरे साथ भी यही हुआ, पन्द्रह दिन के बाद मौका मिला था, और वो भी डर में किया जाने वाला सेक्स… तो फिर कयामत ही होती है। मैंने उसकी ब्रा उतारी नहीं बस ऊपर उठा कर गोरे तने चिकने उरोजों को आजाद किया, और मसलने, चूमने चाटने लगा।
किमी के हाथ यंत्रवत मेरे बालों पर चलने लगे।
तभी मैंने किमी की कैपरी खींच कर निकाल दी, नीचे उसने सफेद कलर की ब्रांडेड पेंटी पहन रखी थी, जो योनि से चिपकी हुई थी और गीला भाग साफ नजर आ रहा था।
मैं झुका और उसकी योनि के ऊपर की गीली पेंटी को लंबी सांसें लेते हुए सूंघा और तुरंत ही पेंटी के ऊपर से ही दांतों से योनि को काट लिया।
किमी मचल उठी- उम्म्ह… अहह… हय… याह… संदीप…!
बस इतना ही कह पाई थी कि मैंने उसे बिस्तर से उठा दिया और खुद खड़े होकर उसे अपने सामने बैठने को कहा, वह वैसा ही करती रही।
फिर मैंने अपना टी शर्ट उतार दिया, तभी किमी ने मेरी लोवर खींच दी, पहले से खड़ा हो चुका मेरा सात इंच का लिंग इलास्टिक में फंस कर स्प्रिंग की तरह झूलने लगा और किमी ने बिना देर किये लिंग को बिना हाथ में लिये सीधा मुँह में डाल लिया।
यहाँ पर लड़कियों के लिए जानकारी है कि लड़कों को बिना हाथ से टच किये सीधे मुंह से लिंग चुसवाने में बहुत अधिक आनन्द आता है, यह बात लिंग चुसवाने वाले लड़के जानते ही होंगे!
मैंने कुछ देर ही लिंग चुसवाया, फिर किमी को लेटा कर उसकी योनि में जीभ फिराने लगा। अब दोनों ही संभोग के लिए तैयार थे तो मैंने बिना देर किये अपना लिंग किमी की योनि में डाल दिया।
हम दोनों का ही ध्यान दरवाजे पर था कि कहीं स्वाति ना आ जाये!
तभी बाथरूम के दरवाजे के बंद होने की जोरदार आवाज आई तो किमी ने मुझे धक्का देकर अलग किया और अपने कपड़े पहन लिये, मैं भी अपने कपड़े पहन कर चुपचाप सोफे पे बैठ गया और किताब पढ़ने लगा।
मेरा लिंग अभी भी तना हुआ था पर कसावट डर में कम हो जाती है।
उधर किमी अनजान बनते हुए अपना काम करने लगी।
स्वाति अपने कपड़े सुखाने के लिए छत जा रही थी, तभी मेरे पास से गुजरते हुए उसने कहा- क्यों संदीप, तुम्हें इतना पसीना क्यों आ रहा है?
मैं थोड़ा हकला कर बोला- आंय… पसीना कहाँ पसीना… किसे आ रहा है पसीना?
फ़िर पसीना पोंछते हुए कहा- अच्छा ये पसीना…! वो क्या है ना मैं तुम्हें बाथरूम की खिड़की से नहाते हुए देख रहा था ना इसलिए पसीना आ गया।
वो मुझे बेशरम कहते हुए मारने लगी, उसके नाजुक हाथों की मार ऐसी लग रही थी मानो कोई फ़ूल बरसा रहा हो।
फिर थोड़ा रुककर उसने कहा- बाथरूम में तो खिड़की ही नहीं है..!
तो मैंने कहा- हाँ नहीं है! और तुम्हें देख भी नहीं रहा था, जाओ अपना काम करो, मुझे परेशान मत करो।
स्वाति तो कपड़े सुखाने चले गई पर मैं और किमी पकड़े जाने से बचने की खुशी में मुस्कुराने लगे। हम दोनों ने अधूरे में सेक्स छोड़ा था और आप सभी अधूरे सेक्स की तड़प समझ रहे होंगे।
हम अगले मौके के इंतजार में थे।
अगले दिन किमी और मैं आफिस जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तभी स्वाति ने किमी से नजर बचा कर मुझसे कहा- आज तुम ऑफिस मत जाना, मुझे तुमसे बहुत जरूरी काम है। मैं सोच में पड़ गया कि इसे मुझसे क्या काम हो सकता है.. और दूसरी तरफ मेरे मन में लड्डू भी फूट रहे थे कि हो ना हो स्वाति भी मुझे भोगने को मिल जाये।
मैंने इसी उहापोह के बीच किमी से तबियत का बहाना किया तो किमी ने भी अपना आफिस जाना कैंसिल कर दिया। फिर मैंने किमी को समझा बुझा कर आफिस भेजा।
किमी के आफिस निकलते ही मैं जल्दी से कपड़े बदल कर आया और सोफे पर बैठ कर लंबी सांस लेते हुए कहा- हाँ भई, कहिये क्या जरूरी काम है तुमको मुझसे?
स्वाति ने मुस्कुरा के कहा- रुको तो सही, बताती हूँ।
तभी बेल बजी, मैंने दरवाजा खोला, सामने किमी थी, उसे देख कर मैं बिना किसी गलती के भी झिझक सा गया, किमी ने हड़बड़ी में अंदर आते हुए कहा- मैं एक फाईल भूल गई थी!
और दो मिनट रुक कर वापस चली गई।
हम उसके जाने के बाद भी कुछ देर तक बात नहीं कर पाये, हमारा ध्यान दरवाजे की तरफ था। फिर मैंने दो बार बाहर तक किमी के जाने की तसल्ली की फिर आकर सोफे पर बैठा, स्वाति सामने बैठ कर मुस्कुरा रही थी।
किमी के आफिस जाने की तसल्ली करके मैं सोफे पर बैठा और स्वाति मेरे सामने बैठ कर मुस्कुरा रही थी।
मैंने कहा- अब बोलो भी, क्या बोलना है?
तो स्वाति ने लंबी सांस लेकर कहा- ये सब क्या चल रहा है?
वैसे तो मैं उसके इस प्रश्न का मतलब जान गया था और थोड़ी खुशी और थोड़ा पकड़े जाने का डर मन में था फिर भी मैंने अनजान बनते हुए कहा- क्या चल रहा है?
तो उसने कहा- ज्यादा भोले मत बनो, कल जब मैं नहाने गई थी, तब तुम और किमी क्या कर रहे थे, मैंने सब अपनी आँखों से देखा है।
मैं हकला गया- ये..ये..ये क्या.. क्या बकवास कर रही हो, बोलना क्या चाहती हो?
तो उसने मुस्कुराते हुए कहा- पहले तो तुम शांत हो जाओ और यह जान लो कि मुझे किसी बात से कोई तकलीफ नहीं है, मैं कल बाथरूम से बाहर आ गई थी और जब तुम लोग सैक्स में इतने मग्न थे कि तुम्हें कुछ होश ही नहीं था तो मैंने वापस जाकर दरवाजे को बजाया ताकि तुम लोग मेरे सामने शर्मिंदा ना हो।
मैंने गहरी सांस ली खुद को संभाला और कहा- ओह.. तो तुमने सब देख लिया था, अगर तुम कल हमें शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी तो आज ये सब पूछ कर शर्मिंदा क्यों कर रही हो?
तो उसने कहा- मैं शर्मिंदा नहीं कर रही हूँ मैं तो तुम्हें धन्यवाद देना चाहती हूँ कि तुमने किमी को जीने की राह दिखाई, सुन्दर सुडौल बनाया, उसका आत्मविश्वास लौटाया और सैक्स के प्रति वापस रुचि जगाई, और आज मैंने तुम्हें रुकने के लिए कहा उसकी एक खास वजह है, मुझे पता है कि जब तुम्हारे और किमी के बीच अब कोई दूरी नहीं है इसका मतलब तुम्हें उसके आत्महत्या के प्रयासों का कारण पता होगा, और तुम्हें यह भी पता होगा कि कहीं ना कहीं किमी मुझे भी दोषी मानती है, चूंकि मैं किमी के सामने अपनी सफाई नहीं दे सकती इसलिए आज तुम्हारे सामने सारी हकीकत बता कर अपने मन का बोझ हल्का करना चाहती हूँ।
यह कहते हुए स्वाति के आँखों में आंसू आ गये, मैंने कहा- स्वाति मैं पूरी बात जानना चाहता हूँ, पूरे विस्तार से खुल कर एक-एक शब्द को बिना छुपाये बताओ?
स्वाति ने कहा- हाँ बताती हूँ, मैं खुद यह बोझ अपने मन से उतारने के लिए व्याकुल हूँ।
-  - 
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06-12-2017, 11:21 AM,
#10
RE: औरत का सबसे मंहगा गहना
मेरे मन से फिलहाल सैक्स का भूत गायब हो चुका था, मैं किसी की जिन्दगी के अनबूझे पहलुओं को समझने की कोशिश करने लगा।
स्वाति ने आंसू पोंछे और बताना शुरू किया, मेरी नजरें स्वाति के मासूम चेहरे के पीछे छुपे राज जानने के लिए बेचैनी से स्वाति को ही घूर रही थी।
‘जब मैं दीदी के घर थी तब मैं मोबाईल में अपने बॉयफ़्रेंड से बात कर रही थी…’
मुझे झटका लगा और मैंने तुरंत स्वाति को रोका- यह बायफ्रैंड कहाँ से आ गया, कब से है बायफ्रैंड? मुझे सब कुछ शुरू से बताओ, और विस्तार से..
स्वाति ने गहरी सांस लेते हुए सोफे पर अपना सर टिकाया और कहा- जब मैं आठवीं कक्षा में थी तब एक वैन में बैठकर स्कूल जाया करती थी, शायद मैं अपनी सभी सहेलियों से ज्यादा खूबसूरत थी तभी तो हमारे वैन का ड्राइवर जिसे हम अंकल कहते थे मुझको बुरी नजर से देखता था, मैं तो छोटी थी उसकी नजरों में शैतान छुपा है इस बात को समझ ना सकी, लेकिन जब वो बहाने करके मुझे छूता था तब बड़ा अजीब लगता था, पर मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा।
उस वक्त मेरे मासिक धर्म आने के शुरूआती दिन थे जिसकी वजह से मैं चिड़चिड़ी सी हो गई थी, मेरी माँ ने मुझे मासिक धर्म के बारे में बताया पर शर्म संकोच की वजह से अधूरी ही जानकारी मिली। फिर हम सहेलियों के बीच झिझक झिझक कर ये बातें होने लगी क्योंकि हम सभी समय की एक ही नाव पर सवार थे तो आपस में थोड़ी बहुत बातचीत करके अपनी जानकारियों का दायरा बढ़ा रही थी।फिर ऐसे ही लोगों के नजरिए और उनकी हरकतों की भी बातें होने लगी।
तब समझ आया कि लोग हमें बचपने से ही कैसी नजरों से देखते रहे हैं। हम सभी जवानी की दहलीज पर थी तो सीने के उभार, योनि में रोयें आना, चलने का तरीका बदलना रंग में चेहरे में परिवर्तन और यौवन के बहुत से लक्षण झलकने लगे थे।
ये सब धीमी गति से होता है।
इन सबके साथ ही मैं बड़ी हो गई, बोर्ड कक्षा होने के कारण सभी के लिए बहुत मायने रखता है इसलिए पापा ने मुझे स्कूल सत्र के शुरुआत से ही ट्यूशन कराने भेजा जहाँ दसवीं, बारहवीं दोनों की चार विषयों की ट्यूशन होती थी।
ट्यूशन क्लास का समय शाम पांच से सात बजे का था और मुझे सुबह के स्कूल वाले वैन से ही ट्यूशन भी जाना होता था, फिर उसी अंकल का चेहरा देखते ही मन डरने लगता था क्योंकि समय के साथ ही उसकी हरकतें भी बढ़ने लगी थी, वह अकसर वापसी के समय अंधेरे का फायदा उठा कर मेरे अर्धविकसित स्तन पर हाथ फेरने की कोशिश करता!
एक दिन तो उसने रास्ते में गाड़ी रोक दी और मुझे बाहों में भर के चूम लिया और मेरे स्तनों को मसल दिया उम्म्ह… अहह… हय… याह… मैं दर्द से कराह उठी। तभी उसने मेरा हथ पकड़ कर अपने पैंट के ऊपर से ही अपने तने हुए लिंग पर रख दिया, मेरे मन में एक गुदगुदी सी हुई उसके बारे में जानने की जिज्ञासा और आनन्द को समझने के चेष्टा ने पहली बार मन में हिलौर लिया, पर मैं भयाक्रांत ज्यादा थी, मैंने खुद को उससे छुड़ाया, उसने भी ज्यादा कुछ नहीं किया कहा- कहाँ जायेगी साली, आज नहीं तो कल तुझे तो चोद के ही रहूँगा!
ऐसे शब्द मैंने पहली बार सुने थे, मैं रो पड़ी पर कुछ नहीं कहा और घर पहुंच कर खुद को कमरे में बंद कर लिया।
मैंने डर के मारे यह बात घर पर नहीं बताई और रात को बिना खाये-पीये ही सो गई।
रात को अजीब अजीब सी बातें मन में आती, अपनी ही सुंदरता दुश्मन लगने लगती थी, तो कभी उसकी छुवन का सुखद अहसास मन को गुदगुदा जाता! फिर उसकी उम्र और अपने दर्द को याद करके रो उठती।
दूसरे दिन मैं फिर उसी वैन से स्कूल के लिए निकली, मेरे चेहरे का रंग डर के मारे उड़ा हुआ था जबकि ओ कमीना मुझे घूर-घूर के मुस्कुरा रहा था।
मेरे स्कूल पहुंचते ही मेरी सबसे करीबी सहेली रेशमा ने मेरे चेहरे को देख कर कहा- बात क्या है स्वाति, तू इतनी परेशान क्यूं है?
तो मैं उसके कंधे पर सर रख कर रो पड़ी और उसे सारी बातें बताई।
रेशमा ने मुझे चुप कराया और अपने भाई के पास ले गई उसके भाई का नाम समीर था सब उसे सैम बुलाते थे वह स्कूल का स्टूडेंट प्रेसिडेंट था, उनके पापा एस पी थे और वह दिखने में भी दबंग था।
रेशमा ने अपने भाई को मेरे साथ घटी सारी घटना बताई, सैम ने मुझसे कहा- ऐ लड़की, रोना बंद कर, हिम्मत से सामना किया कर, ऐसे लोगों को सबक सिखाना सीखो, अगर मैं उसे सबक सिखाऊँ तो तुम गवाही देने के समय पीछे मत हट जाना!
इतने में रेशमा ने कहा- नहीं हटेगी भाई, मैं हूँ ना!
और मैंने आंसू पोंछते हुए हाँ में सर हिलाया।
फिर सैम ने मेरा नाम पूछा और मेरे स्वाति कहते ही मेरा हाथ बड़े अधिकार से पकड़ा और वैन वाले की तरफ तेजी से बढ़ गया।
मैं लगभग दौड़ती खिंचती हुई उसके साथ भाग पाई।
उसने दो अलग वैन वाले को दिखा कर पूछा- यही है क्या?
मैंने ना कहा, उतने में वो वैन वाला भागने लगा तो उसे लड़कों ने घेर लिया और पकड़ कर मेरे सामने ले आये और मुझे मारने कहा। मैंने मना किया तो सबने मुझे ही डाँटना शुरू कर दिया तो मुझे मजबूरन एक झापड़ मारना पड़ा। मेरा झापड़ उस कमीने को कम लगी होगी और मेरे हाथ को ज्यादा दुख रहा था।
अब तक हमारे स्कूल के सारे लड़के-लड़कियाँ इकट्ठे हो चुके थे, बेचारा सैम तो एक बार भी उसे मार नहीं पाया क्योंकि सारे लड़के टूट पड़े थे, कहीं वो मर ना जाये इस डर से उसको छुड़ाना पड़ा।
फिर प्रिंसिपल ने उस वैन में आने वाले बच्चों के पेरेंटस से कहकर उस वैन को बैन कर दिया।
मेरी इमेज अब सीधी सादी लड़की से बदलकर दबंग की हो गई थी, लेकिन साथ ही एक समस्या भी खड़ी हो गई थी कि मैं स्कूल किसमें और कैसे आऊँ।
इस घटना की खबर पापा तक तो पहुँच ही गई थी, और उन्होंने वैन वाले को बिना देखे ही कोसने के साथ ही दो चार बातें मुझे भी सुनाई, और दो चार दिन तो खुद स्कूल छोड़ने चले गये, पर रोजाना आने जाने में समस्या होने लगी क्योंकि भाई, और दीदी दोनों ही कालेज के लिए दूसरे शहर में रहते थे।
इस समस्या के लिए भी रेशमा ने ही मदद की, वो और उसका भाई एक स्कूटी में स्कूल आते थे और उनके घर जाने का एक दूसरा रास्ता हमारे घर को पार करके जाता था तो उसने मुझे कहा कि मैं उन लोगों के साथ आ जा सकती हूँ।
मेरे पापा रेशमा को जानते ही थे और अब तो सैम भी हीरो बन चुका था, उन्होंने उनके साथ आने जाने की अनुमति दे दी।
कुछ ही दिनों में पापा ने मेरे लिए एक स्कूटी खरीद दी, और सैम को मुझे स्कूटी सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी। 
सैम मुझे अच्छा लगने लगा था, उसने मेरे साथ कभी कोई गंदी हरकत या गंदा मजाक नहीं किया, और ना ही मुझे कभी उसकी नजर गंदी लगी। हम बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे।
ऐसे ही समय गुजरा और पेपर के दिन आ गये। सैम हमें पढ़ा दिया करता था तो हमारे पेपर अच्छे गये, लेकिन जब रिजल्ट आया तब मैं और रेशमा तो अच्छे नंबरों से पास हो गये थे पर सैम के बहुत कम अंक आये थे। उसके पापा ने उसे खूब फटकारा और श्रेणी सुधार करने को कहा।
मतलब उसे उसी स्कूल में दुबारा पढ़ना था।
इसी बीच गर्मी की छुट्टियों में मेरे बहुत मनाने पर सैम मुझे स्कूटी सिखाने के लिए राजी हो गया, वो अपनी गाड़ी से हमारे घर तक आता और फिर हम स्कूटी सीखने निकल पड़ते थे। ज्यादातर वह शाम के समय ही आता था, कभी मेरी स्कूटी तो कभी उसकी… हम सीखने जाते थे, रेशमा भी कभी-कभी आती थी, वह थोड़ा बहुत सीख चुकी थी इसलिए उसे विशेष रुचि नहीं थी।
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