Antarvasna kahani नजर का खोट
04-27-2019, 11:30 AM,
#1
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नजर का खोट 


“तुझे ना देखू तो चैन मुझे आता नहीं , इक तेरे सिवा कोई और मुझे भाता नहीं कही मुझे प्यार हुआ तो नहीं कही मुझे प्यार हुआ तो नहीं .......... नाआअन ऩा ऩा ना नना ”

कमरे की खिड़की से बाहर होती बरसात को देखते हुए मैं ये गाना सुन रहा था धीमी आवाज में बजते इस गाने को सुनते हुए बाहर बरसात को देखते हुए पता नहीं मैं क्या सोच रहा था शायद ये उस हवा का असर था जो हौले हौले से मेरे गालो को चूम कर जा रही थी या फिर उस अल्हड जवानी का नूर था जो अब दस्तक दे रही थी

पता नहीं कब मेरे होंठ उस गाने के अल्फाजो को गुनगुनाने लगे थे चेहरे पर एक मुस्कान थी जिसका कारण मैं नहीं जानता था पर कुछ तो था इन फिज़ाओ में कोई तो बात थी इन हवाओ में जो सबकुछ अच्छा अच्छा सा लग रहा था पहले का तो पता नहीं पर अब दिल ये जरुर कहता था की कोई तो हो , मतलब..............

“क्या बात है आज तो साहब का मूड अलग अलग सा लग रहा है ये बरसात की बुँदे ये चेहरे पर हसी और रोमांटिक गाने आज तो बदले बदले लग रहे हो ”

“आप कब आई भाभी , ” मैंने पीछे मुड कर कहा

“क्या फरक पड़ता है देवर जी, अब आपको हमारा होश कहा आजकल भाभी आपको दिखाई कहा देती है वैसे भी ”

“क्या भाभी आपको तो बस मौका चाहिए टांग खीचने का ”

“अच्छा, बच्चू , और जो मेरा गला बैठ गया कितनी देर से चिल्ला रही हु मैं की स्पीकर की आवाज कम कर लो कम कर लो निचे से मुम्मी जी गुस्सा कर रही है ”

“मैं कम ही तो है भाभी ”

“मम्मी जी को पसंद नहीं घर में डेक बजाना पर आप मानते नहीं हो ”

“भाभी इसके सहारे ही तो थोडा टाइम पास हो जाता है ”

“मुझे नहीं पता मैं बस बोलने आई थी अच्छा, मौसम थोडा मस्ताना है तो ऐसे में एक एक कप चाय हो जाये ”

“मैं भी आपको ये ही कहने वाला था भाभी ”

“बनाती हु रसोई में आ जाना जल्दी ही ”

“आता हु ”

मैंने एक गहरी साँस ली और डेक को बंद किया और सीढिया उतरते हुए निचे आने लगा तभी मम्मी से मुलाकात हो गयी

“ओये, कितनी बार तुझे कहा की बरसात में आँगन में पानी इकठ्ठा हो जाता है फिर नाली जाम हो जानी है तो साफ कर दिया कर पर तूने तो कसम खा ली है की मम्मी का कहा नहीं करना ”

“मैं , अभी कर दूंगा मुम्मी जी ”

“ये तो तू कब से बोल रहा है कुछ दिन पहले जब बरसात आई थी तब भी ऐसे ही बोल रहा था नालायक कुछ जिम्मदार बन तू कब तक मुझसे बाते सुनता रहेगा ”

“मैं करता हु ”

मुझे बरसात में भीगना बहुत बुरा लगता था पर क्या करू आँगन में पानी इकठ्ठा हो जाता तो भी दिक्कत तो मैंने कपडे उतारे और कच्छे बनियान में ही लग गया पानी बाहर निकालने को, पर बरसात को भी पता नहीं क्या दुश्मनी थी अपने से वो भी तेज होने लगी

बदन में हल्ल्की हलकी सी कम्पन होने लगी बरसात की ठंडी बुँदे मेरे वजूद को भिगोने लगी बनियान मेरे जिस्म से चिपकने लगी तो एक कोफ़्त सी होने लगी मैं तेजी से झाड़ू को बुहारते हुए पानी को इधर उधर कर रहा था पर मरजानी बारिश भी आज अपनी मूड में थी

तभी मैंने देखा की भाभी एक बाल्टी और डिब्बा लिए मेरी ही और आ रही है

“आप क्यों भीगते हो भाभी मैं कर तो रहा हु ”

“तुझे तो पता है मुझे बारिश में भीगना कितना अच्छा लगता है और इसी बहाने तेरी मदद भी हो जाएगी वर्ना शाम हो जानी पर तूने न ख़तम करना ये काम ”

वो बाल्टी में पानी इकट्ठा कर के फेकने लगी और मैं नाली को साफ़ करने लगा तभी मेरी नजर भाभी पर पड़ी और मेरी नजर रुक सी गयी , देखा तो मैंने उसे कितनी बार था पर इस पल मेरी नजरो ने वो देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था या यु कहू की कभी महसूस नहीं किया था

काली साड़ी में वो बारिश में भीगती, उसने जो साड़ी के पल्लू को अपनी कमर में लगाया हुआ था तो उसके पेट पर पड़ती वो बारिश की बुँदे जैसे चूम रही हो उसकी नरम खाल को, उसने जो धीरे से अपने चेहरे पर आ गयी जुल्फों की उन गीली लटो को अहिस्ता से कान के पीछे किया तो मैंने जाना की नजाकत होती क्या है

पता नहीं ये मेरी नजर का खोट था या कोई और दौर था पर कुछ भी था आज पहली बार महसूस हुआ था उसके हाथो में पड़ी वो चूडिया जो खनक पर बरसात के शोर के साथ अपना संगीत बाँट रही थी या फिर उसके होंठो पर वो लाल लिपिस्टक जिसे बुँदे अपने साथ हलके हलके से बहा रही थी

भीगी साड़ी जो उनके बदन से इस तरह चिपकी हुई थी पता नहीं क्यों मुझे जलन सी हुई वो खूबसूरत सा चेहरा, पतली कमर वो सलीका साड़ी बंधने का वो बड़ी बड़ी आँखे एक मस्ताना पण सा था उनमे, तभी मर ध्यान टुटा मैंने नजर नीची कर ली और नाली साफ़ करने लगा पर दिल ये क्या सोचने लगा था ये मैं नहीं जानता था

करीब आधे घंटे तक हम पानी साफ करते रहे बरसात भी अब मंद हो चली थी भाभी मेरी और आ ही रही थी की तभी उनका शायद पैर फिसला और गिरने से बचने के लिए उसने अपना हाथ मेर कंधे पर रखा मैं एक दम से हडबडा गया पर किस तरह से थाम ही लिया

पर मेरा हाथ भाभी के कुलहो पर आ गया , वो अधलेटी सी मेरी बाहों में थी आँखे बंद हो गयी उनके आज पहली बार उनको मैंने यु छुआ था मेरी नजरे भाभी के ब्लाउज से दिखती उनकी चूची की उस घाटी पर जो लगी तो हट ना पाई

“अब छोड़ो भी , ”उन्होंने कहा तो मुझे होश आया

मैंने देखा मेरा हाथ भाभी के कुलहो पर था तो मुझे शर्म सी आई और मैंने अपना हाथ हटा लिया भाभी ने कुछ नहीं बोला बस अंदर चली गयी मैं बाल्टी उठाने को हुआ तो मैंने देखा मेरे कच्छे में तनाव था , ओह कही भाभी ने देखा तो नहीं

अगर देख लिया तो क्या सोचेगी वो कही मेरे बारे में कुछ गलत तो नहीं सोचेंगे मैं शर्म से पानी पानी हो गया पर पता नहीं क्यों अच्छा भी लगा पता नहीं ये उफनती हुई सांसो में जो एक खलबली सी मची थी या फिर ऊपर आसमान में उमड़ते हुए उन बादलो का जोश था जो अभी अभी ठन्डे हुए थे पर फिर से बरसने को मचल रहे थे

उस एक पल में भाभी का वो रूप किसी हीरोइन से कम ना लगा कुछ देर बाद काम समेट कर मैं अन्दर गया भीगा हुआ तो था ही बस अब नाहा कर कपडे बदलने थे मैं बाथरूम में गया पर दरवाजा बंद था मैंने हलके से खटखटाया

“मैं हु अन्दर ” भाभी की आवाज आई

“भाभी ”

“मुझे थोडा टाइम लगेगा तुम बाहर नलके पे नाहा लो ”

“मैं पर भाभी ”

“पर वर क्या अब चैन से नहाने भी ना दोगे क्या वैसे तो रोज क्या नलके पे नहीं नहाते हो ”

“भाभी वो दरअसल मेरा कच्छा बाथरूम में है ”

“तू भी ना , अच्छा रुक एक मिनट जरा ”

तभी सिटकनी खुलने की आवाज आई और फिर भाभी का हाथ बाहर आया कच्छा पकड़ते हुए जो उनकी गीली उंगलिया मेरी हथेली से छू गयी कसम से पुरे बदन में करंट सा दौड़ गया कंपकंपाहट लगने लगी

“अब छोड़ भी मेरा हाथ या ऐसे ही खड़ा रहेगा ”

“सॉरी भाभी ” मैंने जल्दी से हाथ हटाया और दौड़ पड़ा नलके की और

नलके पे नहाते हुए पानी मुझे भिगो तो रहा था पर मेरे अन्दर एक आग सी लग गयी थी एक खलबली सी मच गयी थी उनकी उंगलियों ने जो छुआ था वैसे तो कई बार उन्होंने मुझे छुआ था पर ऐसा कभी महसूस नहीं किया था मैंने जैसे तैसे मैं नहाया उसके बाद मैं अपना कच्छा सुखाने बाथरूम में गया तब तक भाभी निकल चुकी थी

पर उनके गीले कपडे वही थे , मैंने एक बार इधर उधर देखा और फिर अपने कापते हुए हाथो से उसकी ब्रा को उठाया ओफफ्फ्फ्फ़ ऐसा लगा की भाभी की चूची को ही हाथ में ले लिया हो मैंने धड़कने बढ़ सी गयी पास ही उसकी कच्छी पड़ी थी एक बार उसको भी देखने की आस थी पर बाहर किसी के कदमो की आहात आई तो फिर मैं वहा से निकल गया

बस कपडे पहन कर तैयार ही हुआ था की भाभी की आवाज आई “चाय पी लो ” तो मैं निचे रसोई में आया भाभी ने गिलास मुझे पकडाया और उसकी उंगलिया एक बार फिर से मेरी उंगलियों से टकरा गयी भाभी ने सूट-सलवार पहना हुआ था जो उनके बदन पर खूब जंच रहा था

“क्या हुआ देवर जी ऐसे क्या ताक रहे हो मुझे ”

“नहीं तो भाभी , ऐसा कहा ”

“वैसे आजकल कुछ खोये खोये से लगते हो क्या माजरा है ”

“ऐसा तो कुछ नहीं भाभी ”

“कुछ तो है देवर जी वैसे आजकल मुझसे बाते छुपाने लग गए हो ”

भाभी, कुछ होता तो आपको ना बताता ”

“चलो कोई बात ना, मैं कह रही थी की बारिश भी रुक गयी है तो याद से बनिए की दुकान से घर का राशन ले आना मम्मी जी को मालूम हुआ तो फिर गुस्सा करेगी ”

“मैं ठीक है पर हमेशा मैं ही क्यों कामो में पिलता हु ”

“क्योंकि घर में आप ही तो हो आपके भाई और तो साल में दो तीन बार ही आते और पिताजी तो बस सरपंची के कामो में ही ब्यस्त रेहते तो बाकि टाइम आपको ही सब संभालना होगा ”

मैं- ठीक है भाभी ले आऊंगा और कोई फरमाइश

वो बस मुस्कुरा दी और मैं अपनी साइकिल उठा के घर से निकल गया बरसात से रस्ते में कीचड सा हो रहा था तो मैं थोडा संभल के चल रहा था पर वो कहते हैं ना की बस हो ही जाता है तो पता नहीं कहा से एक चुनरिया उडती हुई आई और मेरे चेहरे पर आ गिरी

उसमे मैं ऐसा उलझा की सीधा कीचड में जा गिरा कपडे ही क्या मैं मेरा चेहरा सब सन गया आसपास के लोग हसने लगे मुझे गुस्सा भी आया पर उठा साइकिल को भी उठाया और देखने लगा की चुन्नी आई कहा से तो देखा की साइड वाले घर की छत पर एक लड़की खड़ी है
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04-27-2019, 11:31 AM,
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RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
बिना दुपट्टे के गुस्से से उसको कुछ कहने ही वाला था की नजरो ने धोखा दे दिया एक बार नजर जो उस पर रुकी तो बस बगावत ही हो गयी समझो सफ़ेद सूट में खुल्ल्ले बाल उसके गोरा रंग लम्बी सी गरदान और उसकी वो नीली आँखे बस फिर कुछ कह ही ना पाए

जैसे ही उसने मुझे देखा एक बार तो उसकी भी हंसी छुट गयी पर फिर उसने धीरे से कान पकड़ते हुए जो सॉरी कहा कसम से हम तो पिघल ही गयी बस हस दिए कीचड में सने अपने दांत दिखा के , अब कैसा जाना था बनिए के पास तो हुए वापिस घर को

और जैसे ही रखा कदम मम्मी ने बारिश करदी हमारे ऊपर जली- कटी बातो की

“अब कहा लोट आया तू , एक काम ठीक से ना होता पता नहीं क्या होगा इस लड़के का हमेशा उल जलूल हरकते करनी है इसको जा मर जा बाथरूम में और जल्दी से नहा ले राणा जी आते ही होंगे तुझे ऐसे देखंगे तो गुस्सा करेंगे ”

कभी कभी इतना गुस्सा आता था की घर का छोटा बेटा न बनाये भगवन किसी को मेरा भाई फ़ौज में था साल में दो तीन बार आता तो सब उसके आगे पीछे ही फिरते पर उसके जाने के बाद मैं थक सा गया था ये सब काम संभालते हुए पिताजी बहुत कम जा ते थे खेतो पर ज्यादातर वो अपनी सरपंची में भी रहते मैं पढाई करता और दोपहर बाद खेत संभालता ऊपर से घरवालो की बाते भी सुनाता 

अब मैं ना जाऊंगा बनिए की दुकान पर चाहे कुछ भी हो ”

“तो फिर खाना तू रोटी आज मैं भी देखती हु , तेरे नखरे कुछ ज्यादा होने लगे है आजकल मैं बता रही हु तू उल्टा जवाब ना दिया कर वर्ना फिर् मेरा हाथ उठ जाना है ”

गुस्से में भरा हुआ मैं अपने कमरे में आया और पलंग पर बैठ गया पर निचे से मम्मी की जली कटी बाते सुनता रहा तो और दिमाग ख़राब होने लगा मैं घर से बाहर निकल पड़ा खेतो की तरफ शाम होने लगी थी चूँकि बरसात हुई थी तो अँधेरा थोडा सा जल्दी होने लगा था मैं खेतो के पास पुम्प्सेट पर बैठा सोच रहा था कुछ

जब मैंने भाभी को थामा था अपनी बाँहों में तो कैसे उसके चूतडो पर मेरा हाथ कस गया था कितने मुलायम लगे थे वो और भाभी की चुचियो की घाटी मेरा मन डोलने लगा अजीब से ख्याल मेर मन में आने लगे भाभी के बारे में और मेरा लंड टाइट होने लगा उसमे तनाव आने लगा मुझे बुरा भी लग रहा था की भाभी के बारे में सोच के मेरा लंड तन रहा है और अच्छा भी लग रहा था

मेरी कनपटिया इतनी ज्यादा गरम होगयी थी की मैं क्या बताऊ , मैंने अपना हाथ पायजामे में डाला और अपने लंड को सहलाया पर वो और ज्यादा खड़ा हो गया , वैसे मौसम भी था अब अपने को चूत कहा मिलनी थी तो सोचा की हिला ही लेता हु आज मैने उसको बाहर निकाला और सहला ही रहा था की.........

मैंने पायजामे को थोडा सा निचे सरकाया और अपने लंड को कस लिया मुठी में उसको दबाने लगा जैसे बिजली की सी तरंगे दौड़ने लगी थी मेरे तन बदन में लिंग आज हद से ज्यादा कठोर हो गया था उसकी वो हलकी नीली सी नसे फूल गयी थी जिन्हें मेरी हथेली साफ़ महसूस कर रही थी मैंने धीरे से अपने सुपाडे को पीछे की तरफ किया और उस पर अपनी उंगलिया फेरी 
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04-27-2019, 11:31 AM,
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RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
सुपाडे की संवेदन शील चमड़ी से जैसे ही मेरी सख्त हथेली रगड़ खायी, बदन में कंपकंपी सी मच गयी “आह ” धीमे से एक आह मेरे होंठो से फुट पड़ी पता नहीं ये भाभी के ख्यालो का असर था या बरसात के बाद की चलती ठंडी हवा का जोर था हाथो में उत्तेजित लिंग लिए मैं पंप हाउस के पास खड़ा मैं मुठी मारने का सुख प्राप्त कर रहा था 



धीमी धीमी आहे भरते हुए मैं भाभी के बारे में सोचते हुए अपने लंड को मुठिया रहा था आज से पहले मैंने भाभी के बारे में ना कभी ऐसा महसूस किया था और ना ही कभी ऐसे हालात हुए थे जब कच्छा पकड़ाते हुए उनकी वो नरम उंगलिया मेरे हाथ से उलझ गयी थी या जब मेरे कठोर हाथो ने भाभी के नितम्बो को सहलाया था उफ्फ्फ मेरा लंड कितने झटके मार रहा था 



रगों में खौलता गरम खून वीर्य बन कर बह जाना चाहता था पल पल मेरी मुठी लंड पर कसती जा रही थी बस दो चार लम्हों की बात और खेल ख़तम हो जाना था दिल में बस भाभी समा गयी थी उस पल में ऐसी कल्पना करते हुए की मैं भाभी ही चोद रहा हु मैं अपनी वासना के चरम पर बस किसी भी पल पहुच ही जाने वाला था मेरा बदन अकड़ने लगा था पर तभी 



पर तभी एक स्वर मेरे कानो में गूंजा “ये क्या कर रहे हो तुम ”


और झट से मेरी आँखे खुल गयी और मैंने देखा की हमारी पड़ोसन चंदा चाची मेरे बिलकुल सामने खड़ी है मेरी आँखे जो कुछ पल पहले मस्ती में डूबी हुई थी अब वो हैरत और डर से फटी हुई थी 
“चाची......... aaappppppppppp यहाह्ह्हह्ह ” मैं बस इतना ही बोल पाया और अगले ही पल मेरे लंड से वीर्य की पिचकारिया निकल कर सीधा चाची के पेट पर गिरने लगी हालत बिलकुल अजीब थी चाची उस छोटे से पल में अपनी आँखे फाडे मेरी तरफ देख रही थी और मैं चाहते हुए भी कुछ नहीं पा रहा था बल्कि वीर्य छुटने से जो मजा मिल रहा था उसके साथ ही सामने खड़ी चाची को देख कर दिल में दो तरह की भावनाए उमड़ आई थी 



हम दोनों बस एक दुसरे को देख रहे मेरा झटके खाता हुआ लंड चाची के पेट और साडी को पर अपनी धार मार रहा था चाची कुछ कदम पीछे को हुई और तभी मेरी अंतिम धार ठीक उसकी नाभि पर पड़ी स्खलित होते ही डर चढ़ गया मैंने तुरंत अपने पायजामे को ऊपर किया चाची की आँखे तब तक गुस्से से दहक उठी थी 



“मरजाने ये क्या कर दिया ” चिल्लाते हुए वो मेरा वीर्य साफ़ करते हुए बोली 



“माफ़ कर दो चाची वो , वो बस ........ ”


“शर्म नहीं आती तुझे, कैसे गंदे काम कर रहा है नालायक और मुझे भी गन्दी कर दिया तू आज घर चल तेरी मम्मी को बताती हु तेरी करतुते मैं तो कितना भोला समझती थी पर देखो खुले में ही कैसे......... तू आज आ घर ”


“चाची, चाची जैसा आप समझ रही है वैसा कुछ नहीं है ” मैंने नजर झुकाए हुए कहा 



“पूरी को चिचिपी कर दिया और कहता है ऐसा कुछ नहीं है ”


“चाची, गलती हो गयी माफ़ी दे दो आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा वो बस ........ ”


“बस क्या ......................... ”


“चंदा कितनी देर लगाएगी अँधेरा हो रहा है देर हो रही जल्दी आ ” मैंने देखा थोड़ी दूर से ही एक औरत चाची को पुकार रही थी तो चाची ने एक बार मुझे देखा और फिर बोली “आ रही हु ”


थोड़ी दूर जाने पर वो पलटी और बोली “तेरी मम्मी को बताउंगी ” और फिर चल दी 



मैं घबरा गया बुरी तरह से क्योंकि घर में वैसे ही डांट पड़ती रहती थी और अब ये चंदा चाची ने भी मुठी मारते हुए पकड़ लिया था अब वो घर पे कह देगी तो मुसीबत हो ही जानी थी कुछ देरवही बैठा बैठा मैं सोचता रहा पप्र घर तो जना ही था वहा नहीं जाऊ तो कहा जाऊ 



जब कुछ नहीं सुझा तो धीमे कदमो से चलते हुए मैं घर पंहुचा तो देखा की राणाजी आँगन में बैठे हुक्का पी रहे थे मुझे देख कर बोले “आ गया, मैं तेरी ही राह देख रहा था ”


और उसी पल मेरी गांड फट गयी मैं जान गया की चंदा चाची शिकायत कर गयी है और अब सुताई होगी तगड़े वाली

“यो कोई टेम है तेरा घर लौट के आने का कितनी बार कहा है की फालतू में चक्कर ना काटा कर ”
“बापू, सा वो खेतो पर गया था आने में देर हो गई ”
“देर तो चोखी पर के बात है आजकल नवाब साहब की कुछ ज्यादा ही शिकायते मेरे कानो में आ रही है आज थारा मास्टर जी मिले थे बता रहे थे की पढाई में ध्यान कम ही है तुम्हारा ”
“बापू सा वो थोडा अंग्रेजी में हाथ तंग है बाकि सब ठीक है ”
“देख छोरे, मन्ने तेरे बहाने न सुन ने, पढाई करनी है तो ठीक से कर नहीं तो अपना काम संभाल इतने लोगो में उस मास्टर ने बेइज्जती सी कर दी यो बोलके की राणाजी थारा छोरा ठीक न है पढाई में, और तन्ने तो पता है राणा हुकम सिंह जिंदगी में की चीज़ से प्यार करे है तो वो है उसकी शान से तो कान खोल के सुन ले पढाई बस की ना है तो बोल दे ”
“बापू सा मैं कोशिश कर रहा हु सुधार की ”
“कैसे , पढाई थारे से हो ना रही , घर का काम करना नहीं थारी मम्मी बता रही थी की बनिए की दूकान से राशन जैसे छोटे मोटे काम भी ना करते बस गाने सुनते हो ”
“जी, वो कभी कभी बस ऐसे ही ”
“मेरे घर में ऐसे ही ना चलेगी, या तो कायदे से रहो काम करो ”
“ जी वो मैं कचड़ में गिर गया था और इसलिए ना जा पाया ”
“बहाने नहीं छोरे , काम न होता तो कोई बात ना पर बहाने ना बना ”
“जी मैं क्या नहीं करता पढाई से आते ही सीधा खेतो में जाता हु और मजदूरो जितना ही काम करता हु फलो के बाग़ देखता हु और आपके हर हुकम को पूरा करता हु अब राशन के दिन लेट आ जायेगा तो कौन सी आफत आ गयी , आपके पास इतने नौकर है पर घर में एक भी नहीं बस मुझे ही ......... “
“आवाज नीची रख छोरे ” मम्मी ने बोला 
“ न, ना रखु आवाज निचे , आखिर क्यों सुनु मैं जब इस घर के लिए मैं इतना काम करता हु इर भी जली कटी बाते सुन ने को मिलती है ये मत करो वो मत करो इस घर में कैदी जैसा महसूस करता हु मैं सच तो ये है रोटी भी गिन के खाऊ सु , ”
तड़क तड़क बात ख़तम होने से पहले ही मम्मी का हाथ मेरे गाल पर था , “कहा, न आवाज नीची रख और के गलत कह रहे है राणाजी, थारे भला ही चाहते है वो इतना कुछ किया है तुम्हारे लिए वो त्र भाई तो फौज में जाके बैठ गया और तू नालायक कभी सोचा कैसे सब हो रहा है ”
“तो मैं भी तो अपनी तारफ से पूरी कोशिश करता हु ” रोते हुए बोला मैं 
“छोरे, सुधर जा, इसे मेरी अंतिम बात समझियो जा अब अन्दर जा ”
“जस्सी, आज इसे खाना ना दिए, मरने दे भूखा, तब जाके होश ठिकाने आयेंगे नवाबजादे के ” मम्मी चिल्लाई 
अपने दर्द को दिल में छुपाये मैं अपने कमरे में आ गया गाल अभी भी दर्द कर रहा था , काफी देर खिड़की के पास खड़ा मैं सोचता रहा अपने बारे में घर वालो के बारे में राणाजी का नालायक बेटा बस इस से ज्यादा मेरी कोई हसियत नहीं थी और नालायक इसलिए था क्यंकि पिता जैसा नहीं बन न चाहता था 
राणा हुकम सिंह, गाँव के सरपंच पर विधायक की हसियत रखते थे बाहुबली जो थे, कट्टर इन्सान पर वचन के पक्के इनके हुकम को टाल दे किसी की हिम्मत नहीं और मैं जैसे कैद में कोई परिंदा, नफरत करता था मैं उनके इस अनुशाशन से जीना चाहता था अपनी शर्तो पे दुनिया देखना चाहता था 
काली रात में टिमटिमाते तारो को देखते हुए मैं सोच रहा था की तभी कमरे में किसी की आहाट हुई खट्ट की आवाज हुई और बल्ब जल गया सामने भाभी खड़ी थी हाथो में खाने की थाली लिए 
“आपको नहीं आना चाहिए था भाभी, मम्मी को पता चलेगा तो आपको भी डांट पड़ेगी ”
“सब सो रहे है और वैसे भी जब तुम भूखे हो तो मुझे नींद नहीं आएगी ” 
“भूख ना है भाभी ”
“ऐसे कैसे भूख नहीं है देख मैंने भी अभी तक खाना नहीं खाया है तू नहीं खायेगा तो मैं भी भूखी ही सो जाउंगी सोच ले ”
अब भाभी के सामने क्या बोलता , बैठ गया उनके पास भाभी ने निवाला तोडा और मुझे खिलाने लगी मेरी आँख से दर्द की एक बूंद गालो को चुमते हुए निचे गर गयी 
इस घर में अगर कोई था जो मुझे समझती थी तो वो जस्सी भाभी थी कितनी फ़िक्र करती थी मेरी भाभी के जाने के बाद मैं अपराध बोध से भर गया की भाभी मेरे लिए इतना करती है और मैं उसके बारे सोच के 
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04-27-2019, 11:31 AM,
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RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
सुबह सावन की रिमझिम ने अपनी बाहे फैला कर मेरा इस्तकबाल किया खाकी पेंट और नीली शर्ट पहन कर मैंने बालो में कंघी मारी और साइकिल पे कपडा मार के साफ किया और पैडल मारते हुए निकल गया घर से हवा में जो हलकी हलकी बुँदे थी अच्छी लग रही थी चेहरे से टकराते हुए 
मोहल्ले को पार करते हुए ठीक उसी जगह पहुच गए जहा कल गिर गए थे तो जान के साइकिल रोक ली एक नजर छज्जे पर डाली पर वहा कोई नहीं था तो बढ़ गए आगे पर दिल ने पता नहीं क्यों कहा की आस थी किसी के दीदार की थोडा समय तो ठीक गया पर फिर पता नहीं क्यों बेचैनी सी हो गयी दिल में कुछ घरवालो की कडवी बाते याद आ गयी कुछ अपनी तन्हाई


तो फिर निकल गए अपने खेतो पर जो करीब डेढ़- दो किलोमीटर दूर पड़ते थे बारिश पिछली रात जोर की हुई थी तो जगह जगह पानी जमा था, वहा जाकर देखा की चंदा चाची पहले से ही मौजूद थी तो दिल में थोड़ी सी कायली आ गयी पर अब जाये भी तो कहा जाए , पंप को चालू किया और बैठ गए वही पर कुछ देर में चंदा चाची आई 



और बिना मेरी तरफ देखे अपने पैर धोने लगी जो कीचड़ में सने हुए थे उन्होंने अपने घाघरे को घुटनों तक ऊँचा कर लिया जबकि उसकी कोई जरुरत नहीं थी ,मैंने देखा उनके पैरो को गोरे छरहरे पैरो में चांदी की पायल पड़ी थी वो भी शायद कुछ ज्यादा समय ले रही थी उसके बाद उन्होंने अपने चेहरे पर पानी उडेलना शुरू किया मुह धो रही थी इसी कोशिश में आँचल सरक गया और ब्लाउज से बाहर को झांकते 



उनके उभार मेरी नजर में आ गए, जो की उस गहरे गले वाले ब्लाउज की कैद में छटपटा रहे थे ऊपर से पानी गिरने से ब्लाउज कुछ गेला सा हो गया था तो और नजरे तड़पने सी लगी थी पता नहीं क्यों मेरे लंड मी मुझे हलचल सी महसूस हुई तो मैं उठ के पास बने कमरे में चला गया पर उत्सुकता , दहलीज से फिर जो देखा चाची मेरी तरफ ही आ रही थी 



“लगता है बारिश पड़ेगी ”


“सावन है तो बारिश ही आएगी चाची ”

“तुझे बड़ा पता है सावन का ”थोडा हस्ते हुए सी बोली वो 

मैं झेंप गया चाची पास पड़ी चारपाई पर बैठ गयी मैं खड़ा ही रहा , कल जिस तरह से उसने मुझे देख लिया था तो अब नजरे मिलाने में कतरा रहा था मैं ,तभी बूंदा- बांदी शुरू हो गयी जो जल्दी ही तेज हो गयी चाची बाहर को भागी और थोड़ी दुरी पर रखी घास की पोटली को लेकर अन्दर आई तब तक वो आधे से ज्यादा भीग गयी थी 



चाची ने अपनी चुनरिया चारपाई पर रख दी और बदन को पौंचने लगी उसकी पीठ मेरी तरफ थी और जैसे ही वो थोड़ी सी झुकी उसके गोल मटौल चुतड पीछे को उभर आये उफफ्फ्फ्फ़ हालांकि मैंने उसे भी कभी ऐसे नहीं देखा था पर अब आँख थोड़ी न मूँद सकता था कुछ देर वो ऐसे ही रही फिर उसने अपना मुह मेरी और किया और लगभग अंगड़ाई सी ली 



जिस से दो पल के लिए उसकी चुचिया हवा में तन सी गयी पर फिर उसने चुनरिया ओढ़ ली और बद्बदाने लगी “कम्बक्त, बरसात को भी अभी आना था अब घर कैसे पहुचुंगी , थोड़ी देर में अँधेरा सा हो जायेगा और लगता नहीं बरसात जल्दी रुकेगी ”


“अब बरसात पे आपका जोर थोड़ी न है चाची ” चाची ने घुर के देखा मुझे और फिर चारपाई पर बैठ गयी मैं दरवाजे पे खड़े खड़े बरसात देखता रहा करीब घंटा भर हो गया था पर बारिश घनी ही होती जा रही थी और चंदा चाची की बेचैनी बढती जा रही थी थोड़ी ठण्ड सी लगने लगी थी अँधेरा भी हो गया था तो मैंने चिमनी जलाई थोड़ी रौशनी हो गयी 



“कब तक खड़ा रहेगा बैठ जा ”


तो मैं चाची के पास बैठ गया पर साय साय हवा अन्दर आ रही थी तो चाची उठी और दरवाजे को बंद कर दिया बस कुण्डी न लगाई पर हमारे बीच कोई बात चित नहीं हो रही थी थोड़ी देर और ऐसे ही बीत गयी 



“ऐसे गर्दन निचे करके क्यों बैठा है ”


“बस ऐसे ही चाची ”


“ऐसे ही क्या ”


“वो, दरअसल .......... कल ” मैं चुप हो गया 



“ओह, शर्मिंदा हो रहा है हिलाने से पहले नहीं सोचा अब देखो छोरे को ” वो लगभग हस्ते हुए बोली “कोई ना बेटा हर पत्ते को हवा लगती है ”


तभी पता नहीं कही से एक चूहा चाची के पैर पर से भाग गया तो वो जोर से चिल्लाते हुए मेरी तरफ हो गयी मतलब मुझे कस के पकड़ लिया और उनकी चुचिया मेरे सीने से टकरा गयी और गालो से गाल चाची के बदन की खुशबु मुझमे समा गयी पलभर में ही लंड तन गया 



पर तभी चाची अलग हो गयी और चूहे को गालिया देने लगी , मैंने चाची पर अब गौर किया 1 बच्चे की माँ उम्र कोई ३३-३४ से ज्यादा नहीं होगी छरहरा बदन पर सुंदर लगती थी करीब दो घंटे तक घनघोर बरसने के बाद मेह रुका तो हम बाहर आये 



“मेरी पोटली उठवा जरा वैसे ही देर हो गयी है क्या पता कितनी देर रुका है अभी निकल लेती हु ”
“साइकिल पे बैठ जाओ, मैं भी तो घर ही जा रहा हु जल्दी पहुच जायेंगे ”


“घास भी तो है लाल मेरे ”


“चाची घास पीछे रखो और आप आगे बैठ जाना ”


“आगे डंडे पे, ना मैं डंडे पे नहीं बैठूंगी ”


“आपकी मर्ज़ी है ”


तभी बादलो ने तेजी से गर्जना चालू किया तो चाची बोल पड़ी “ठीक है ”


मैंने घास की पोटली को पीछे लादा और फिर चाची को आगे डंडे पे आने को कहा अपने घाघरे को घुटनों तक करते हुए वो बैठ गयी और हम चल पड़े गाँव की और, पर पैडल मारते हुए मेरे घुटने चाची के चूतडो पर टकरा रहे थे और कुछ मेरा बोझ भी उसकी पीठ पर पड़ रहा था 



उसके बदन से रगड़ खाते हुए लंड तन ने लगा था जो शायद वो भी महसूस करने लगी थी अब मैंने हैंडल सँभालने की वजह से अपने हाथो को चंदा चाची के दोनों हाथो से रगड़ना शुरू किया बड़ा मजा आ रहा था ऐसे ही हम जा रहे थे गाँव की और की तभी एक मोड़ आया और ..............

तभी साइकिल का बैलेंस बिगड़ा और हम धडाम से रस्ते में जमा पानी में गिर गए मिटटी की वजह से चोट तो नहीं लगी पर कपड़ो का सत्यानाश अवश्य हो गया था ऊपर से चाची और मैं इस अवस्था में थे की फंस से गए थे 
“कमबख्त मैंने पहले ही कहा था की साइकिल ध्यान से चलाना पर कर दिया बेडा गर्क तूने ”चाची कसमसाते हुए बोली
“जानबूझ के थोड़ी न गिराया है रुको उठने दो जरा ”
परन्तु, हालात बड़े अजीब से थे साइकिल गिरी पड़ी थी पीछे घास की पोटली थी और आगे हम दोनों फसे हुए ऊपर से मेरा क पाँव भी दबा हुआ था जिसमे दर्द हो रहा था और ऊपर चाची पड़ी थी मैंने अपनी हाथ ओ थोडा हिलाया उसी कोशीश में मेरा हाथ चाची की चिकनी जांघो पर लग गया जो की घाघरा ऊपर होने की वजह से काफ्फी हद तक दिख रही थी 
जैसे ही उनकी मक्खन जैसी टांगो से मेरा हाथ टकराया मेरे बदन के तार हिल गए पर और अपने आप ही मेरे हाथ चाची की जांघो को सहलाने लगे 
“क्या कर रहा है तू ” वो थोड़े गुस्से से बोली तो मैंने हाथ हटा लिया और उठने की कोशिश करने लगा जैसे तैसे मैं निकला और फिर चाची को भी निकाला 
“नास कर दिया मेरे कपड़ो का ” पर किस्मत से बूंदा बांदी तेज होने लगी तो वो ज्यादा नहीं बोली मैंने साइकिल को साफ्फ़ किया और फिर से उसको बिठा कर गाँव की तरफ चल पड़ा पुरे रस्ते वो बडबडाती रही पर मेरा दिमाग तो उसके जिस्म ने पागल कर दिया था जो बार बार मुझसे टकरा रहा था घर पहुचने तक हम लगभग भीग ही गए थे 
मैंने चाची को उतारा उसके बाद मैं सीधा बाथरूम में घुस गया नहाने के लिये दिमाग विसे भी घुमा हुआ था चंदा चाची का वो स्पर्श पागल सा कर रहा था मुझे मेरे लंड में सख्ती बढ़ने लगी थी और तभी मेरी नजर खूंटी पर टंगी भाभी की कच्छी और ब्रा पर पड़ी पता नहीं क्यों मैंने कच्छी को उठा लिया और सूंघने लगा 
एक मदमस्त सी खुशबु मेरे जिस्म में उतरने लगी मेरे लंड की नसे फूलने लगी मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे की मैं भाभी की चूत को सूंघ रहा हु मेरी कल्पनाये फिर से मुझ पर हावी होने लगी थी मैंने कच्छी को अपने लंड पर लपेट लिया और हथेली को उपर निचे करने लगा 
पर मुठी नहीं मार पाया बाहर से मम्मी की आवाज आई , अब चैन से नहाने भी नहीं देंगे ये 
“आयजी, चिलाया मैं ” और जल्दी से तौलिया लपेट कर बाहर आया तो देखा की चंदा चाची मम्मी के साथ बरामदे में खड़ी थी 
“तेरी चाची कह रही है बिजली नहीं आ रही इनके जरा देख आ एक बार ”
“जी अभी कपडे पहन कर जाता हु ”
“अभी फिर भीगेगा , ऐसे ही चला जा और तारो को आराम से देखना ”
चाची का घर कोई दूर तो था नहीं बस हमारे से अगला ही था चाची ने मुझे छतरी में लिया और हु उनके घर आ गये 
“पता नहीं क्या हो गया , सारे मोहल्ले में तो बिजली आ रही है ”
“बेत्तेरी , है तो लाओ जरा ”
चाची से बेट्री ली और मैं तारो को देखने लगा ये सोचते हुए की हमारी जान की किसी को कोई फिक्र है ही नहीं बिजली का काम भी भरी बरसात में ही करवाएंगे , एक हाथ से छतरी और दुसरे से बेट्री को संभाले मैंने तार को देखा एक दम ओके था तो बिजली क्यों नहीं आ रही 
“क्या हुआ ”
“तार तो सही है चाची निचे देखता हु ”
मैंने निचे आके देखा तो फ्यूज उडा हुआ था उसको बंधा तो बिजली आ गयी मैंने देखा की चाची ने कपडे बदल लिए थे और अब उसने एक नीली साडी पहनी हुई थी मेरी नजर उसकी नाभि पर पड़ी चाची ने नाभि से थोडा निचे साड़ी बाँधी हुई थी चाची अपने गीले बाल सुखा रही थी 
मेरा लंड तन ने लगा और तभी चाची ने मेरी देखते हुए पूछा चाय पिएगा क्या और मैं कुछ बोलता उस से पहले ही मेरा तौलिया खुल गया और मैं बिलकुल नंगा चाची के सामने खड़ा था और मेरा लुंड हवा में झूल रहा था चाची की आँखे उसी तरह हो गयी जैसा उस दिन उन्होंने मुझे मुठी मारते हुए देखा था 
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04-27-2019, 11:31 AM,
#5
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
मैंने तुरंत अपना तौलिया लपेटा और भाग लिया घर की तरफ और सीधा अपने कमरे में आकर ही रुका तब जाके चैन की साँस आई , कपडे पहन कर मैं रसोई में गया और खाना खाया राणाजी का हुक्का भरा और फिर अपने कमरे में आ गया धीमी आवाज में डेक चलाया और सो गया 
अगले दिन जब मेरी आंख खुली तो मुझ से उठा ही नहीं गया पूरा बदन दर्द कर रहा था बुखार सा हो गया था पर अपनी कौन परवाह करता था जैसे तैसे उठा और निकल गया रास्ते में ठीक उसी जगह साइकिल रोकी और छज्जे की तरफ देखा और जैसे दिल खुश सा हो गया उसी लड़की के दीदार जो हुये थे 
आँखे आँखों से मिली , उसने धीरे से अपने कानो ओ फिर से हाथ लगा कर इशारे से माफ़ी मांगी तो मैं भी हौले से मुस्कुरा दिया और वो तुरंत अन्दर भाग गयी मैंने अपने सर को झटका और बढ़ गया आगे को कुछ गुनगुनाते हुए पुरे दिन फिर मेरा कही भी मन नहीं लगा सिवाय उस छज्जे वाली के 
दोपहर बाद मैं घर आया और थाली में खाना डाला ही था की भाभी ने बताया की राणाजी ने खेतो पर बुलवाया है तो मैंने खाना खाया और फिर चल पड़ा सीधा वहा पर जाकर देखा तो काफी लोग जमा थे मम्मी भी थी मैं भी जाकर खड़ा हो गया 
तो पता चला की कल रात जंगली जानवरों के झुण्ड ने काफी उत्पात मचाया था चंदा चाची की पूरी सब्जियों को रौंद डाला था और हमारे भी एक खेत का ऐसा ही हाल था फसल की बर्बादी को देख कर राणाजी भी चिंतित थे प् दिक्कत ये थी की पास ही जंगल था उअर ये खेती वाला इलाका खुला था तो बाड वाली बात बन नहीं सकती थी तो सबने तय किया की सब अपने अपने खेत की हिफाज़त करेंगे 
राणाजी ने मुझे कहा की अपने खेतो पर वो नौकर छोड़ देंगे पर चूँकि चंदा चाची अकेली है तो मैं उनकी मदद करूँगा बस अब ये ही रह गया था जिंदगी में पर राणाजी ये नहीं जानते थे की ऐसा कहकर वो मुझे वो मौका दे रहे है जिसकी मुझे शायद जरुरत भी थी

चंदा चाची के पति यानि सुधीर चाचा बापू सा के बहुत ही अच्छे मित्र थे और अरब देश में कमाते थे तो दो साल में दो-तीन बार ही आते थे एक लड़की थी जो मुझे कुछ महीने ही बड़ी थी और डोक्टोरनी की पढाई करती थी जोधपुर में , बाकि समय चाची अकेले ही घर-बार संभालती थी चूँकि बापूसा के मित्र की बात थी तो हम सब भी उनका बहुत ही मान रखते थे और परिवार का सदस्य ही समझते थे 

अब बापूसा के आदेश को ना माने इतनी मेरी हिम्मत थी नहीं तो बस मन ही मन कोस लिया खुद को हमेशा की तरफ और कर भी क्या सकते थे इसके सिवा, मैं चाहता था थोडा समय भाभी के साथ बिताने का पर पिछले कुछ दिनों से बस कामो में ऐसा उलझा हुआ था की घर में ही अजनबी से हो गए थे खैर, मैंने राणाजी के साथ खेतो का दूर तक चक्कर लगाया 



उनकी बाते गौर से सुनी उसके बाद मैं घर आ गया और भाभी को बताई पर वो कुछ नहीं बोली शाम की चाय मैंने गाने सुनते हुए पी करने को कुछ खास था नहीं पर तभी भाभी आ गयी बाते शुरू हो गयी 



“कल डाक खाने से चिट्ठी ले आना ”


“क्या करोगे भाभी ”


“तुम्हारे भैया को लिखनी है ”


“याद आ रही है क्या ,”


“धत्त, बदमाश, काफी दिन हो गए उनकी चिट्ठी तो आई नहीं मैंने सोचा की मैं ही पूछ लेती हु ”


“ले आऊंगा भाभी, वैसे भैया नहीं तो क्या हुआ मैं तो हु आपका ख्याल रखने के लिए ”


“वो तो है , पर फिर भी ...... ”भाभी ने जानबूझ करबात को अधुरा छोड़ दिया फिर बोली “सोच रही हु कुछ दिन मायके हो आऊ ”


“फिर मेरा जी कैसे लगेगा भाभी ”


“तो तुम भी चलो इसी बहाने घूम आना ”


“मांजी, से करती हु बात फिर देखो मंजूरी मिलती है या नहीं ”


भाभी ने कुछ देर और बाते की फिर उन्होंने फिर से चिट्ठी का याद दिलाया और निचे चली गयी मैंने अपना सामान रखा जो चाहिए था उसके बाद मैं खाना खाकर चंदा चाची के पास चला गया चाची ने मुझे बैठने को कहा और करीब दस मिनट में ही वो भी तैयार थी 



मैंने सामान लादा साइकिल पर और चाची को आगे बैठने को कहा पर चाची बोली, “पैदल ही चलते है ”


“अब इतनी दूर कौन जायेगा पैदल चाची और वैसे भी आज नहीं गिराऊंगा आपको ”


“वो बात नहीं है खैर, थोडा आगे तक पैदल चलते है फिर बैठ जाउंगी ”


हम चल रहे थे की तभी मुझे वो ही छज्जे वाली दो और लडकियों के साथ आते हुए दिखी मुझे देख का उसने सलीके से अपने दुपट्टे को सर पर ले लिया हमारी आँखे एक बार फिर से आपस में टकराई और पता नहीं क्यों हम दोनों के चेहरे पर ही एक मुस्कान सी आ गयी , बस कुछ सेकंड की वो छोटी सी मुलाकात जो बस ऐसे ही राह में हम मिल गए थे 



मैंने हलके से सर को झटकते हुए उसे नमस्ते कहा , उसने भी सर हिलाकर जवाब दिया और बड़े ही कायदे से आगे को बढ़ गयी जैसे की कुछ हुआ ही नहीं हो मैंने धीरे से अपने बालो में हाथ मारा और बस बढ़ गए आगे को मुस्कुराते हुए 



“क्या हुआ छोरे, ”


“कुछ ना चाची ”


“तो के अब पैदल ही चलेगा ”


“ना, आओ ”


चाची अपने गांड को मेरी टांगो से रगड़ते हुए चढ़ गयी साइकिल के डंडे पर और मैं बार बार अपने पैरो से उनके चूतडो को रगड़ते हुए चल पड़ा खेतो की ओर मोसम मस्त था एक दम चाची थोड़ी सी पीछे सरक गयी जिस से और मजा आने लगा था मजे मजे में पता नहीं कब खेतो पर पहुच गए हम दोनों साइकिल खड़ी की और चाची ने कमरा खोला 



“काफी कबाड़ जमा कर रखा है चाची, ”


“तेरा चाचा आएगा तो करवाउंगी सफाई मेरे बस का नहीं है ”


“सोऊंगा कहा ”


“यहाँ और कहा ” उन्होंने उस कोने की और इशारा करते हुए कहा 



“ना, निचे नहीं सोऊंगा ”


“अब इतनी दूर कौन पलंग लायेगा तेरे लिए ”


“मैं अपने कुवे से चारपाई लाता हु ”


मैं कुवे पर गया तो वहा प् तीन लोग पहले से ही तो मैं बस थोड़ी बात चित करके ही वापिस आ गया जबतक आया तो चाची ने बिस्तर सा बिछा दिया था और तभी बिजली चली गयी चिमनी जलाई और लेट गए इस से पहले की नींद आती बरसात की टिप टिप ने ध्यान खींच लिया मैंने अपनी चादर ओढ़ ली और सोने की कोशिश करने लगा चाची मेरे से कुछ दूर ही लेटी हुई थी 



चिमनी की रौशनी में मैंने देखा चाची की पीठ मेरी तरफ थी और मेरी निगाह उसकी गांड पर गयी मैंने हलके से अपने लंड को खुजाया और आंख मूंद ली पता नहीं कब नींद आई शायद कुछ ही देर सोया होऊंगा की तभी चाची ने मुझे जगाया और बोली “नीलगायो का झुण्ड है ”


“मैंने पास पड़ा लट्ठ उठाया और उन्निन्दा ही भागा बाहर की और दिमाग से ये बात निकल ही गयी थी की बाहर तो मेह पड़ रहा है पर अब क्या फायदा अब तो भीग गया , मैं लट्ठ लिए भागा और नीलगायो को खदेड़ कर ही दम लिया मैंने देखा की हमारे कुवे पर कोई हलचल नहीं थी साले सब सोये पड़े थे ”


जब तक मैं आया हद से जायदा भीग चूका था अन्दर आते ही मैंने कपडे उतारे और जल्दी ही मैं बस गीले कच्छे में खड़ा था .................... एक तो बुखार से परेशां और अब भीगा हुआ क्या करू .....

लगभग कांपते हुए मैं बिस्तर के पास खड़ा था अब समस्या ये थी की कपडे और थे नहीं मेरे पास और कच्छा उतराना भी जरुरी था चंदा चाची उठी और मेरे कपड़ो को निचोड़ कर सुखाया और बोली “चादर लपेट ले जल्दी से”
मैंने चिमनी को फुक मारी और फिर कच्छे को उतार दिया और चादर लपेट ली और बिस्तर पर बैठ गया पर अभी समस्या कहा सुलझी थी बल्कि बढ़ गयी थी क्योंकि चादर तो मैंने लपेट ली पर अब ओढूंगा क्या ठण्ड तो लग ही रही थी पर कुछ देर मैं ऐसे ही लेता रहा 
“क्या हुआ नींद नहीं आ रही क्या ”
“ठण्ड लग रही है चाची ”
“एक काम कर मेरी चादर में आ जा ” जैसे ही चाची नी ये शब्द बोले मैं तुरंत चाची की चादर में सरक गया मेरा हाथ जैसे ही चाची के हाथ से टकराया “तुझे तो बुखार है छोरे ”
“हां, कल से है थोडा ”
चाची ने मेरा हाथ अपने पेट पर रख लिया और थोड सा मुझ से सत गयी “सो जा ” जल्दी ही चाची के बदन की गर्मी मुझे मिलने लगी तो आराम मिला करीब आधे घंटे बाद मैंने पाया की मैं चाची के पीछे एक दम चिपका हुआ हु और में चादर खुली हुई थी मतलब मैं पूरा नंगा चाची के बदन से चिपका हुआ था और मेरा लंड जो की ताना हुआ था चाची की चूतडो से लगा हुआ था 
मेरा हाथ चाची के सुकोमल पेट पर था मैंने हलके से अपने हाथ को पेट पर घुमाया तो मेरी उंगलिया चाची की नाभि से टकरा गयी मैंने हौले से नाभि को कुरेदा तो मेरे लंड में उत्तेजना और बढ़ने लगी मैं थोडा सा और चिपक गया चाची से चाची की गरम सांसे चादर के वातावरण को और गर्मी दे रही थी मै जैसे बहता जा रहा था किसी ने सिखाया नहीं था पर जैसे मुझे पता था की अब क्या होगा क्या करना है
मुझे खुद पता नहीं चला बेखुदी में कब मेरा हाथ चाची की चूची पहुच गया मैंने हलके से चाची की चूची को दबाया तो मेरे बदन में झटके लगने लगे और उत्तेजना वश मैंने थोडा जोर से दबा दिया तो चाची ने झुरझुरी सी लगी मैंने देखा जाग तो नहीं गयी परन्तु वो सो रही थी तो मैं धीरे धीरे चुचियो को दबाता रहा इधर मेरे लंड का हाल बहुत बुरा हो रहा था 
मेरी हिमत कुछ बढ़ सी गयी थी मैंने हौले से चाची के गाल को चूमा उफ्फ्फ कितना नरम गाल था वो और तभी चाची ने करवट ली और अपना मुह मेरी तरफ कर लिया तो मैं भी सीधा होकर लेट गया कुछ मिनट ऐसे ही गुजरे फिर चाची मुझसे चिअक गयी और सो गयी , उत्तेजना भरे माहौल में कब मेरी आँख लग गयी मुझे फिर पता नहीं चला 
सुबह जाग हुई तो देखा की मैं अकेलाही हु मैंने चादर लपेटी और बाहर आया तो चाची ने आग जला रखी थी और बोली “ले कपडे पहन ले ज्यादा तो नहीं सूखे पर पहन लेगा ” मैंने अन्दर आके कपडे पहने और आंच के पास बैठ गया बाहर सब कुछ खिला खिला सा लगता था दिन बस निकला ही था 
“डॉक्टर, को दिखा आइयो ”
“जी ”
चाची वही रुक गयी मैं सीधा डॉक्टर के घर गया और दवाई ली फिर अपने घर गया फिर अपने घर गया तैयार हुआ और नाहा धोकर निकल गया पढने के लिए रस्ते में छजे पर नजर मारी पर कोई नहीं था तो आगे हो लिए अपन भी दोपहर में कुछ ही देर थी मैं मास्टर जी से पानी पीने की आज्ञा लेकर बाहर आया तो देखा की वो छज्जे वाली लड़की टंकी के पास ही खड़ी थी 
मैं लगभग दौड़ते हुए वहा गया एक नजर आसपास डाली और फिर हमने एक दुसरे को देखा “आप यहाँ पढ़ती है ”
“जी ”उसने नजरे झुकाए हुए कहा उफ़ ये नजाकत मियन तो मर ही मिटा 
“कब से ”मैंने अपनी मुर्खता दिखाई 
“हमेशा से ” वो बोली 
“पर मैंने आपको कभी नहीं देखा ”
“आप पढाई करने आते है या हमें देखने ”
इस से पहले मैं कुछ बोलता वो मुड़ी और चल अपनी कक्षा की और मैं देखता रहा की किस कक्षा में जाएगी लड़की विज्ञानं संकाय में थी आज पहली बार खुद को कोसा की काश पढाई पे ध्यान दिया होता तो हम आज कला में ना होते पर दुःख इस बात का था की वो भी हामरे साथ ही थी फिर नजर क्यों ना पड़ी पर कर क्या सकते थे सिवाय अपनी मुर्खता के आलावा 
लौट ते समय डाक खाने का चक्कर लगाया और फिर घर आके सो गया सोया ऐसा की फिर भाभी ने ही उठाया “उठो, अभी इतना सो लोगे तो रात को क्या करोगे ”
“मैं उठा भाभी ने मुझे चाय दी और मेरे पास बैठ गयी , मैंने चाय की चुस्की ली और बोला “आज आप बहुत खुबसूरत लग रही है ” भाभी हल्का सा शर्मा गयी 
“आजकल कुछ ज्यादा ही तारीफे हो रही है भाभी की ”
“आप हो ही इतनी प्यारी की बस तारीफ करने को ही जी चाहता है ”
“चलो अब उठो मैं कमरे में झाड़ू निकाल देती हु ”
भाभी सफाई करने लगी और मैंने पास पड़े रेडियो को चालू किया “ये आकशवाणी का जोधपुर केंद्र है और आप सुन रहे है श्रोताओ की फरमाइश दोस्तों इस प्रोग्राम में हम अपने उन श्रोताओ की पसंद के गीत बजाते है जो दूर दराज से हमे पत्रों के माध्यम से अपनी फरमयिशे भेजते है तो आज का पहला गाना फिलम विजयपथ का राहो में उनसे मुलाकात हो गयी जिसकी फरमाईश की है आयत ने जो गाँव ............... से है ”
एक पल के लिए मैं और भाभी दोनों ही चौंक गए क्योंकि हमारे गाँव का नाम था और गाना चलने लगा 
“अपने गाँव का नाम लिया न ”
“हाँ, भाभी ”
“तू जानता है आयत को ”
“”नहीं भाभी “
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04-27-2019, 11:31 AM,
#6
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
भाभी बाहर चली गयी मैं कुर्सी पर बैठे वो गाना सुनने लगा , अपनी बस यही दुनिया थी ये चौबारा एक पलंग एक अलमारी कुछ किताबे एक टेबल और कुर्सी और साइड में रखा डेक जो आजकल बंद ही पड़ा रहता था मौज मस्ती के नाम पर बस इतना ही था बैठे बैठे मैं सोच रहा था कौन होगी ये आयत वैसे नाम तो अच्छा था 

कुछ देर बाद मैं आया निचे कोई दिखा नहीं तो फिर मैं घुमने चला गया अब हुई रात और वापिस आ गए खेत पर , मैंने सोचा तो था की चाची से फिर से कुछ करूँगा पर पता नहीं कैसी नींद आई की सब अरमान सपनो की भेंट चढ़ गए शायद दवाइयों के असर से नींद आ गयी थी 

खैर, हर दिन अपने साथ कुछ नया लेकर आता है हमने चक्कर लगा दिया विज्ञानं संकाय का तो देखा उसे दुपट्टे को बड़े सलीके से ओढ़े हुए वो बैठी थी बस दरवाजे से ही देख लिया उसको पर हिम्मत नहीं हुई उसके आगे पर हाय ये दुस्ताख दिल अब ये किसकी मानता है पर करे भी तो क्या करे बात करे तो कैसे करे कल कोशिश तो की थी पर क्या हुआ 

तभी उसकी नजर पड़ी हमारी तरफ और हम खिसक लिए वहा से धड़कने बढ़ सी गयी थी पर दिल कह रहा था हार मत मानिये जनाब बार बार मेरी निगाह पानी की टंकी पर ही जा रही थी की अब वो आये अब आये पर इन्तहा हो गयी इंतजार की वो आई ही नहीं उसी कशमकश में छुट्टी हो गयी और मैं दौड़ा उसकी कक्षा की तरफ एक एक कर के सब लो निकल रहे थे और सबस आखिर में निकली और और चौंक गयी मुझेदेख कर वो 

“आप ” बस इतना ही कह सकी वो 

“मुझे कुछ .................... ”

“ऐसे राहो में रोकना किसी को अच्छी बात नहीं होती ”

“मेरा वो मतलब नहीं था जी ”उसने अपनी मोटी मोटी आँखों से मेरी तारा देखा और बोली “हटिये हमे देर हो रही है ” दो कदम बढ़ गयी वो आगे मैं रह गया खड़ा ये सोचते हुए की इसने तो बात सुनी ही नहीं पर जाते जाते पलती और बोली “मैं जुम्मे को पीर साहब की मजार पे जाती हु ”

एक पल समाझ नहीं आया की क्या कहके गयी पर जब समझे तो दिल झूम सा गया छोरी इशारा कर गयी थी और हम भोंदू के भोंदू पर दिल को एक तरंग सी मिल गयी थी मारा बालो पर हाथ और चल दिए घर की और अपनी खुमारी में पर देखा की चौपाल पर भीड़ जमा है तो हमने भी साइकिल रोकी अपनी और देखने लगे तो पता चला की पंचायत हो रही है 

मैं भी सुन ने लगा , मामला कुछ यु था की जुम्मन सिंह ने जमींदार रघुवीर से कुछ कर्जा लिया था जो वो समय से चूका न पाया था और अब रघुवीर ने उसकी जमीन कब्ज़ा ली थी मेरी नजर राणाजी पर पड़ी सफ़ेद धोती कुरते में कंधे पर गमछा, कड़क मूंछे चेहरे पर रौब, 

अब जुम्मन बहुत घबराया हुआ था थोड़ी सी जमीं थी उसकी और ऊपर से उसपे रघुबीर ने कब्ज़ा कर लिया था ऊपर से उसके पास कागज भी था जिसपे जुम्मन ने अंगुठा दिया हुआ था तो राणाजी भी क्या कहते उन्होंने रघुबीर से बात की पर पंचायत गंभीर हो चली थी , पंचो ने प्रस्ताव रखा की जुम्मन को कुछ समय और दे पर बात बनी नहीं क्योंकि गाँवो में तो जमींदारी व्यवस्था ही होती है 

तो जाहिर सी बात है की रघुबीर का पक्ष मजबूत था राणाजी कुछ बोल नहीं रहे थे और सबको इंतजार था फैसले का मैं भी चुपचाप खड़ा था और फिर आई घडी फैसले की चूँकि कागज़ पर अंगूठा भी था जुम्मन का तो फैसला रघुबीर के हक़ में आया जुम्मन न्याय की दुहाई देने लगा पर पंचायत न जो कह दिया वो कह दिया मुझे पहली बार लगा की राणाजी ने गलत फैसला दिया है 

और मेरे मुह से निकल गया “ये फैसला गलत है जुम्मन चाचा इस फैसले को नहीं मानेंगे ” और पंचायत में हर मोजूद हर एक शक्श की नजरे मुझ पर टिक गयी खुद ठाकुर हुकुम सिंह की भी मैंने उनकी आँखों में असीम क्रोध देखा सबकी आँखों में हैरत थी क्योंकि राणाजी का फैसला पत्थर की लकीर होता था और जिसे काटा भी तो किसने उनके अपने बेटे ने 

राणाजी ने खुद को संयंत किया और बोले “ फैसला हो चूका है छोरे और वैसे भी पंचायत में बालको का काम नहीं ”

“कैसा फैसला राणाजी, ” ये जिंदगी में पहली बार था जब मैंने बापूसा के आलावा उनको राणाजी कहा था 

“ये कैसा फैसला हुआ, सबको मालूम है सदियों से जमींदार गरीबो की जमीने ऐसे ही ह्द्पते आये है, इस अनपढ़ को तो पता भी नहीं होगा की जिस कागज़ पे अंगूठा लगवाया है उसपे लिखा क्या गया होगा और कैसा कर्जा , जो जुम्मन के बाप ने लिया था , बहुत खूब पीढ़ी दर पीढ़ी से यही चला आ रहा है बाप का कर्जा बेटा चुकाएगा पर क्यों ”

“यही नियम है समाज का ”

“तो तोड़ दीजिये ये नियम जुम्मन अपने बाप के कर्जे को चुकाने के लिए कर्जा लेगा फिर इसका बेटा इसके कर्जे को चुकाने के लिए कर्जा लेगा ये पिसते जायेंगे कर्जे में और ये जमींदार फूलते जायेंगे ये कहा का इन्सान हुआ मैं नहीं मानता इस फैसले को ”

मैंने पिता की आँखों में एक आग देखि जिसने मुझे भान करवा दिया था की ठाकुर हुकुम सिंह बहुत क्रोध में है और वो दहाड़ते हुए बोले “छोरे, एक बार बोल दिया ना फैसला हो गया है बात ख़तम ये पंचायत ख़तम हो गयी कानूनन अब जमीन रागुबिर की है ”

“;लानत है ऐसे कानूनों पर जिनका जोर खाली कमजोरो पर चलता है गरीबो का खून चूसते है ये कानून और अगर ये कानून सिर्फ जमींदारो के लिए है तो तोड़ दीजिये इन कानूनों को आखिर कब तक हम ढोते रहेंगे परम्परा के इस ढकोसले को ”

“मैं नहीं मानता उस कानून को जो गरीब से उसकी जमीन छीन लेता है वो किसान जो जमीन को अपनी माँ समझता है कोई कैसे हड़प लेगा वो जमीन उस से ”

“जमीन हमेशा जमींदार की ही होती है ”

“नहीं जमीन उस किसान की होती है जो अपनी मेहनत से अपने पसीने से सींचता है उसको जो अपने बच्चो की तरह पालता है फसल को जमीन उस किसान की होती है ”

“मत भूलो तुम ठाकुर हुकम सिंह से के सामने खड़े हो लड़के ”

“और आपके सामने ठाकुर कुंदन सिंह खड़ा है जो ये अन्याय नहीं होने देगा जमीन तो जुम्मन की ही रहेगी ”

“तडक तदाक ” मेरी बात पूरी होने से से पहले ही बापूसा का थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ चूका था और फिर शुरू हुआ सिलसिला मार का राणाजी की बेंत और मेरा शारीर आखिर ठाकुर साहब कैसे बर्दाश्त करते की उनके सामने कोई बोल जाए

सडाक सडाक राणाजी की बेंत मेरी पीठ पर अपना पराक्रम दिखाती रही जी तो बहुत किया की प्रतिकार कर दू पर ठाकुर कुंदन सिंह कमजोर पड़ गया एक पुत्र के आगे वो पुत्र जिसे कुछ देर पहले ही हिमाकत की थी अपने पिता के फैसले को भरी पंचायत में चुनौती देने की बुर्ष्ट कब की तार-तार हो चुकी थी पीठ से मांस उधड़ने लगा था पर हमने भी दर्द को होंठो से बाहर निकलने नहीं दिया 



और ना ही राणाजी का हाथ रुका जब बेंत टूट गयी तो थप्पड़ लाते चल पड़ी पर हमने भी जिद कर ही ली थी की जमीन थो उसी की रहेगी जो उसे जोत ता है , पर पता नहीं कब प्रतिकार हार गया दर्द के आगे जब आँखे खुली तो दर्द ने बाहे फैला कर स्वागत किया 



अधखुली आँखे फैला कर देखा तो खुद को चौपाल के उसी बूढ़े बरगद के निचे पाया बरसात हो रही थी और आसपास कुछ था तो बस काला स्याह अँधेरा “आह, आई ”कराहते हुए मैंने खुद को उठाने की जदोजहद की मांसपेशिया जैसे ही फद्फदायी दर्द की एक टीस ने जान ही निकाल दी 



पथ पर हल्का सा हाथ फेरा तो अहसास हुआ की कुंदन खून अभी भी गरम है आँखों में आंसू एक बार फिर से आ गए और दर्द का सिलसिला साथ हो लिया जिस्म पर पड़ती बरसात की बूंद ऐसे लग रही थी जैसे गोलिया चल रही हो अपने लड़खड़ाते हुए कदमो से जूझते हुए मैं चल पड़ा उस जगह के लिए जिसे घर कहते थे 



पर दर्द इतना था की आँखों क आगे अँधेरा छाने लगा और पैर डगमगाने लगे फिर कुछ याद नहीं रहा क्या हुआ क्या नहीं पर जब होश आया तो मैंने खुद को अपने कमरे में पाया , धीरे से मैंने अपनी आँखों को खोला और देखा की राणाजी मेरे पास पलंग पर ही बैठे है मैंने वापिस अपनी आँखों को डर के मारे बंद कर लिया और तभी मुझे एक हाथ मेरे जख्मो पर महसूस हुआ 



राणाजी मेरे ज़ख्मो पर लेप लगा रहे थे “आह जलन के मारे मैं तड़प उटाह आःह्ह ” पर वो लेप लगाते रहे मैंने अपने हाथ पर कुछ गीला सा महसूस किया आँखों की झिर्री से देखा वो आंसू था बापूसा की आँखों में आंसू थे जो शायद मैंने अपने जीवन में पहली बार देखे थे लेप लगाने के कुछ देर तक वो मेरे पास ही बैठे रहे और फिर चले गए 
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04-27-2019, 11:31 AM,
#7
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
दर्द से जूझते हुए मैं उठा और खिड़की की और देखा शाम हलके हलके ढल रही थी मैंने पास रखे रेडियो को चलाया 



“ये आकाशवाणी का जोधपुर केंद्र है और आप सुन रहे है पाठको की फरमाईश और एक बार फिर से हमारे पास है हमारे खास श्रोता की फरमाईश जी हां, वो और कोई नहीं आयत है एक बार फिर से तो श्रोताओ उनकी विशेष फरमाईश पर मैं बजाने जा रहा हु फिल्म गुलामी का जिहाले मुस्किन मुकम्ब रंजिश बहाले हिज्र बेचारा दिल है ”


और गाना बजने लगा और मेरे होंठो आर बस एक ही नाम था आयत जिसकी हर फरमाईश इस कदर खूब सूरत थी की मुझे भी यकीन था की वो भी उतनी ही खुबसूरत होगी मैंने अपनी आँखों को बंद कर लिया और उस गीत को सुनने लगा दर्द मुझ में फ़ना होने लगा कुछ डर के लिए मन ही मन मैंने सोचा की पता करना होगा की गाँव की कौन लड़की है ये 



“लो, हल्दी वाला दूध लायी हु ” भाभी की इस आवाज के साथ ही मैं वापिस धरातल पर आया 
मैं थोडा सा बैठा हुआ और भाभी के हाथ से गिलास लिया “क्या जरुरत थी तुम्हे राणाजी के सामने भरी पंचायत में जुबान खोलने की मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी की तुम ऐसी गुस्ताखी करोगे ”


“भाबी, और जो वहा हो रहा था वो क्या सही था ”


“सही गलत समझने वाले हम नहीं है कुंदन , सोचो जरा राणाजी के रुतबे पर क्या असर पड़ेगा जब उनका बेटा ही उनकी बात काट रहा है पंचायत में ”


“भाबी, बात हक़ की है कबतक किसान पे जुल्म होता रहेगा किसी ना किसी को तो आवाज उठानी पड़ेगी ना ”
“तो वो किसान आवाज उठाये जिसको दिक्कत है ”


“उसको तो खामोश कर दिया गया भाभी इस गाँव में चाहे अब कुछ भी हो पर अब कोई भी नजायज कर्ज का बोझ नहीं उठाएगा समाज सबका है तो किसी का हक़ नहीं मारा जायेगा पंचायत गलत है तो उसे अपनी गलती स्वीकार करनी होगी भाभी ”


“कुंदन, मैं बस इतना चाहती हु की तुम आगे से बस अपनी पढाई और घर के कामो में ही ध्यान दोगे ”


“पर भाभी , ”


“पर वर नहीं कुंदन, ठाकुरों को अगर कुछ प्यारा होता है तो बस अपना अहंकार , उसके आगे कुछ नहीं होता चलो अब दूध पियो और गिलास खाली करो , जिंदगी हर पल एक जंग होती है और हमारा पथ अग्निपथ होता है पर साथ ही हर कदम पर पथिक हारता है और समजौते करने पड़ते है राणाजी दुनिया को तुमसे ज्यादा समझते है उनको उनका काम करने दो ”


भाभी चली गयी थी अपर मेरे दिल में कुछ था तो वो बोल “सुनाई देती है जो धड़कन तुम्हारा दिल है या हमारा दिल है ” मैं उठा तो दर्द हुआ पर मैं छत से बाहर देखने को लगा पहली बार शाम कुछ हसीं सी लगी पर हम भी थोड़े से जरा कम थे हमारी रगों में भी जवान खून जोर मार रहा था और गुस्ताखियों के लिए खुला आसमान पड़ा था 



अपने दर्द को मरहम पट्टी के तले दबाये उस छज्जे वाली की झलक पाने को हम फिर से खड़े थे पानी की टंकी के पास पता नहीं प्यास ज्यादा लगने लगी थी या उसको बस एक नजर देखने की हसरत थी पर जो भी था इतना जरुर था की कुछ था जो अब हमारा नहीं था और फिर नजर आयी वो अपनी सहेलियों से घिरी हुई होंठो पर ये कैसी मुस्कान थी जो अब अक्सर ही आने लगी थी 



नजरो ने फिर से नजरो का दीदार किया पर आज उसके होंठो पर वो हंसी नहीं थी एक बार फिर से पानी की टंकी पर वो थी मैं था और थी वो दीवार जिसे अब देखो कौन पहले तोड़ेगा पर चाह कर कुछ कह भी तो ना पाए एका एक पता नहीं क्या हुआ, आँखों के आगे जैसे अँधेरा सा छा गया और फिर कुछ याद नहीं रहा

जब होश आया तो खुद को गाँव के दवाखाने में पाया , उठने की कोशिश की तो भाभी ने मना किया मैंने देखा माँ पास में ही थी चेहरे पर थोड़ी चिंता थी उनके 
“जब हालत ठीक नहीं तो किसने कहा था घर से बाहर निकालने को पर इस लड़के ने ना जाने कौन सी कसम खा रखी है की घरवालो की बात तो जैसे सुननी ही नहीं है ” माँ थोड़े गुस्से से बोली 
“कमजोरी से चक्कर आ गया था तुम्हे ” भाभी बोली 
“मैं, ठीक हु अब ”
“वो तो दिख रहा है ” भाभी ने कहा “आराम करो अभी चुपचाप ”
तभी मेरी नजर बाहर दरवाजे पर पड़ी वो छुप कर देख रही थी जैसे ही नजरे मिली वो दरवाजे से हट गयी और मैं मुस्कुरा पड़ा 
“देखो इस नालायक को , हमे परेशां करके कैसे हस रहा है ” माँ बोली 
मैंने अपनी आँखे बंद करली माँ बद्बदाती रही , डॉक्टर ने कुछ ग्लूकोज़ की बोतले चढ़ाई कुछ दवाई दी और रात होते होते मैं वापिस घर पर आ गया भाभी ने मेरे चौबारे में ही अपनी चारपाई बिछा ली थी धीमी आवाज में हम बाते करते रहे अच्छा लग रहा था तभी भाभी ने बातो का रुख इस तरह मोड़ दिया जो मैंने सोचा नहीं था 
“वो लड़की कौन थी ”
“कौन भाभी ”
“अच्छा जी कौन भाभी, अरे वही जिसे तुम्हारी बड़ी फिकर थी जो दवाखाने तक आई थी तुम्हे देखने और तुम्हारे होश में आने क बाद ही गयी थी ”
“पता नहीं भाभी आप किसके बारे में बात कर रही है ” मेरा दिल तो खुश हो गया था पर भाभी क सामने अभी थोडा पर्दा रखना था क्योंकि अभी तो बस सिवाय दुआ-सलाम के कुछ भी नहीं था 
“मत बताओ पर छुप्पा भी नहीं पाओगे मेरे भोले भंडारी ” वो हस्ते हुए बोली 
“क्या भाभी आप भी कुछ भी बोलती हो, ”
“चल अब सो जा रात बहुत हुई ”
अगले कुछ दिन बस ऐसे ही गुजरे पड़े पड़े जख्मो को भरने में समय तो लग्न ही था पर दस-बारह दिनों बाद मैं ठीक महसूस कर रहा था अपने कमरे में मन नहीं लग रहा था तो मैं भाभी के कमरे में चला गया पर कदम दरवाजे पर ही ठिटक गए मैंने देखा भाभी कपडे बदल रही थी 
भाभी बस कच्छी में थी , उफ्फ्फ कसम से दिल चीख कर बोला की अभी पकड़ ले और चोद दे, भाभी का ध्यान मेरी तरफ था उनकी मस्त टांगो को देख कर मेरा बुरा हाल होने लगा और गजब हो गया जब उन्होंने सलवार पहनने के लिए अपनी टांग को थोडा सा ऊपर किया उफ्फ्फ 
सलवार पहनने के बाद भाभी ने पास पड़ी ब्रा को लिया और उसे पहनने लगी मैं उनकी माध्यम आकार की चुचियो को साफ देख रहा था पर फिर मैं वहा से हट गया और घर से बाहर चला गया देखा तो चंदा चाची खुद के घर के बाहर ही खड़ी थी तो मैं उनके पास चला गया 
सफ़ेद ब्लाउज और गहरे नीले घाघरे में एक दम पटाखा लग रही थी चंदा चाची मुझे देख कर वो खुस हो गयी मेरी नजर चाची के मदमस्त उभारो पर पड़ी तो दिल का हाल और बुरा होने लगा हम घर के अंदर आ गए 
“अब कैसा है ”
“ठीक हु चाची आप बताओ ”
“मैं भी ठीक हु बस जी रहे हु अकेले अकेले ”
“अकेले कहा हो मैं हु न आपके पास ”
“तू तो है पर तू क्या समझेगा बावले एक अकेली औरत की कई परेशानिया होती है ” बात करते करते चाची ने अपनी चुनरिया को थोडा सा सरका लिया जिस से उसके गहरे गले वाले ब्लाउज से दिखती चुचियो की घाटी मुझ पर अपना जादू चलाने लगी चाची ने अपनी टांग पर टांग रखी जिस से घाघरा थोडा सा ऊपर को हो गया और उनकी जांघ का निचला हिस्सा मुझे दिखने लगा 
एक तो घर से भाभी को कपडे बदलते हुए देखके आया था ऊपर से अब चाची भी बिजलिया गिरा रही थी 
“क्या परेशानी है चाची मुझे बताओ जरा क्या पता मैं दूर कर दू ”
“कुछ नहीं तू बता क्या पिएगा चाय बना दू “
मैं थोडा और चाची के पास सरका और उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर बोला “बताओगी नहीं तो कैसे होगा, मैं तो आपके लिए ही हु आप बताओ क्या बात है आपकी सेवा के लिए मैं हमेशा तैयार हु ” मैंने चाची की चुचियो की गहरी घाटी को देखते हुए कहा और धीरे से अपना हाथ चाची की जांघ पर रख दिया 
मेरी निगाह अभी भी चाची की चुचियो पर ही थी और चाची भी ये बात समझ रही थी गहरी लाल लिपस्टिक लगे उसके होंठो को चूमने का दिल कर रहा था मेरा 
“बताउंगी तुझे ही बताउंगी पर पहे तेरे लिए चाय बनाती हु ”
“मैं दूध पियूँगा चाची ”
“दूध भी पिला दूंगी” उसने हस्ते हुए कहा और अपनी गांड को मटकाते हुए रसोई में चली गयी उसके जाते ही मैंने जल्दी से अपने लंड को सही किया जो तड़प रहा था इतनी देर से “ओह चाची तू ही दे दे ” मैं अपने लंड को सहलाते हुए बोला 
और तभी रसोई से एक तेज बर्तन गिरने की आवाज आई और साथ ही चाची की आह तो मैं दौड़ते हुए रसोई की तरफ भागा तो देखा की चाची निचे गिरी हुई है और पूरा दूध उसके कपड़ो पर गिरा पड़ा था 
“आह, कुंदन मैं तो मरी रे ”
“”मैं, उठाता हु चाची पर आप गिरे कैसे “
“पैर फिसल गया चिकने फर्श पर आह ” मैंने चाची को पकड़ा और उठाया चाची ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा सहारे के लिए और उसकी छातिया मेरे जिस्म से रगड़ खाने लगी 
“आह , लगता है चल नहीं पाऊँगी ”
“एक मिनट रुको ” मैंने चाची की कमर में हाथ डाला और उसको अपनी गोद में उठा लिया और उसको कमरे में ले आया 
“ज्यादा लगी तो डॉक्टर को बुलवा लाऊ ”
“नहीं रे उस अलमारी में बाम की डिब्बी है थोड़ी मालिश कर दे ”
मैंने डिब्बी निकाली और चाची की तारफ देखा , चाची ने अपने घाघरे को घुटनों तक सरकाया और बोली यहाँ लगी है मैं बैठ गया और उसके पांव को अपनी गोद में रखा तो पाँव थोडा सा उठ गया और मुझे घाघरे के अन्दर का नजारा दिखने लगा चाची ने कच्छी पहनी थी तो चूत तो नहीं दिखी पर जो भी दिख रहा था मस्त था 
मैंने अपनी ऊँगलीयो पर दवाई लगायी और चाची के घुटनों पर अपना हाथ रखा तो उसने घाघरी को थोडा सा और ऊपर सरका लिया और बोली “थोडा सा ऊपर बेटे ”
जैसे ही मैं चाची की जांघो के निचले हिस्से को सहलाया फ़ो सिसक पड़ी “आह ”

मैंने अपनी ऊँगलीयो पर दवाई लगायी और चाची के घुटनों पर अपना हाथ रखा तो उसने घाघरी को थोडा सा और ऊपर सरका लिया और बोली “थोडा सा ऊपर बेटे ”
जैसे ही मैं चाची की जांघो के निचले हिस्से को सहलाया फ़ो सिसक पड़ी “आह ”
“थोडा और ऊपर बेटे थोडा और ऊपर ” चाची ने अपनी आँखों को बंद कर लिया और धीरे धीरे अपने होंठो को दांतों से काटनी लगी मेरी हाथ उसकी चिकनी जांघ पर घुमने लगी चाची का घाघरा अब बहुत ऊपर हो गया था पर किसे परवाह थी उत्तेजना में मैंने जांघ को थोडा कस कर दबाया तो चाची सिसक पड़ी 
मैंने देखा ऊपर दूध गिरने से चाची के पेट पर नाभि के पास अभी भी कुछ बुँदे लगी थी 
“चाची, आप पर तो दूध लगा है ”
“तुझे पीना था ना पि ले , aaahhhhh ”
मैंने अपने चेहरे को चाची के पेट पर घुमाया और उसकी नाभि के पास पड़ी कुछ बूंदों को अपने होंठो परसे चाट लिया 
“ओह कुंदन,,,,,, aaahhhhhhh ”
चाची की जांघ को सहलाते हुए मेरे हाथ निरंतर और ऊपर को बढ़ रहे थे और मेरी जीभ उसकी नाभि में घुस चुकी थी मैं उसके पेट को चूमने लगा “अब भी हो रहा है दर्द चाची ”
“अब आराम है बेटे, ” तभी चाची थोड़ी सी टेढ़ी हो गयी जिस से उसके चुतड मेरे सामने हो गए घाघरा तो अब पूरी तरह से ऊपर हो चूका था तो चाची की कच्छी में कैद उसके गोल चुतड देख कर मेरा दिल मचल गया मैंने आहिस्ता से अपना हाथ वहा पर रखा और दबाने लगा 
“आह, कुंदन क्या कर रहा है बेटे ”
“देख रहा हु चाह्ची कहा कहा चोट लगी है ”
चाची के बदन की भीनी खुशबु मुझे पागल कर रही थी 
“चाची दूध पीना है मुझे ”
“दूध को गिर गया बेटे ”
“पर मुझे पीना है चाची ”कहकर मैंने चाची की चूची पर हाथ रख दिया और दबाने लगा चाची मस्ती में भर गयी और सिस्कारिया लेने लगी 
“चंदा, ओ चंदा ”तभी बाहर से किसी के आवाज आई और हम दोनों होश में आ गए चाची और मैंने अपने आप को ठीक किया 
“आई अभी ”बोलकर चाची बाहर जाने लगी 
“चाची, मेरा दूध, ”
“पिला दूंगी ”उसने जाते जाते कहा 
मैंने देखा मोहल्ले की एक औरत आ गयी थी तो मैं वहा से निकल कर घर आ गया चाय पि और फिर गाँव में घुमने चला गया चलते चलते मैं सरकारी स्कूल के पास जो दुकाने बनी हुई थी उनमे एक दुकान गानों की थी मतलब वो कैसेट भरता था तो मैं उसके पास चला गया 
“और भाई नए गाने आये क्या ”
“गाने तो आते रहते भाई पर आप नहीं आते कितने दिन हुए आप आये नहीं कैसेट भरवाने ”
“आज तो आया ना भाई भर दो फिर ”
उसने मुझे पेन कॉपी दी और बोला “भाई अपनी पसंद के लिख दो वैसे भी आपकी पसंद सबसे अलग है ”
मैंने कुछ गाने लिखे और कुछ उसको बोला की अपने आप भर दे उसके बाद वो भरने लगा मैं दूकान में लगी कैसेट देखने लगा 
“भाई वो मत देख, वो लोगो की भरवाई वाली रखी है ””
मैं फिर से वो कॉपी लेकर बैठ गया ऐसे ही पन्ने पलटने लगा तो एक पन्ने पर कुछ गाने लिखे थे और नाम था आयत ... आयत.... मुझ जिज्ञासा हुई 
“भाई ये किसने भरवाया ”
“तुम्हे क्या भाई की भरवाए ”
“वो तो ठीक है भाई पर गानों की पसंद अच्छी है ”
“तुम्हारी ही तरह है ना ” वो मुस्कुराया 
“भाई एक काम कर ये के ये गाने भर दे ”
“क्या हुआ ”
“कुछ नहीं गाने अच्छे है तो भर दे वैसे ये ले गयी क्या अपनी कैसेट ”
“हां, थोड़ी देर पहले ही आई थी एक बात कहू वैसे ”
“बोल भाई मेरे ना करने से कौन सा रुक जायेगा ”
“ये भी कई बार वो ही गाने ले जाती है जो तुम कापी में लिखके जाते हो क्या बात है ”
“बात क्या होगी यार बस अच्छे लगे तो पूछ लिया तुमसे तुम गाने भरो यार वैसे बताओ ना कौन है ”
“यार मैं नाम से ही जानता हु इसी स्कूल में तो पढ़ती है 
“बहुत स्टूडेंट यही आते है कैसेट भरवाने अब मैं कैसे पहचानूँगा ””
“उसमे की है करवा देंगे जान पहचान अबकी बार आएगी तो ”
“”कब आयेगी 
“अब मुझे क्या पता पर महीने में दो बार तो आती ही है ”
“चल कोई ना भाई तक़दीर में होगा तो मिल लेंगे ”
करीब डेढ़ घंटा वहा बिताने के बाद मैं वापिस हुआ घर के लिए राणाजी बैठक में थे और साथ ही गाँव के कुछ और लोग
“इधर आ छोरे ”
“”जी राणाजी “
“हम सब ने मिलके एक फैसला लिया है की जो उस दिन पंचायत में तू बोली से बड़ी बड़ी बाते बोल रहा था ना तो हमने सोचा है की देखे कितनी किसानी कर सके है तू तुझे एक जमीन का टुकड़ा दिया जायेगा तू उगा फसल और अगर तेरी फसल अच्छी हुई तो हम जुम्मन का सारा कर्जा माफ़ करेंगे और साथ ही उसकी जमीन भी उसकी ही रहेगी और अगर तू नाकाम रहा तो जुम्मन की तो जमीन जाएगी पर 6 महीने के लिए तेरा हुक्का-पानी बंद ”
“राणाजी भी ना अब क्या जरुरत थी इसकी पर खैर ”
“जैसा आदेश हुकुम ” मैंने हाथ जोड़ कर कहा 
“कल लालाजी के साथ जाके जमीन देख लेना और तयारी करो गेहू की बुवाई में टाइम है काफी अब पंचायत गेहू की कटाई पे देखेगी तुम्हे ”
मैंने हिसाब लगाया तीन साढ़े तीन महीने पहले जमीन दी गयी पक्का कुछ तो गड़बड़ होगी पर अब जो भी कल ही देखना था घर में गया तो भाभी मिली 
“चिट्ठी पोस्ट करदी अपने भैया को ”
“ओह तेरी!भूल गया भाभी अभी ढोल में डालके आता हु ”
“रहने दो अब कल कर देना ” भाभी मेरा कान मरोड़ते हुए बोली 
“तुम्हारे मनपसंद खाना बनाया है खा लो ”
“भाभी जल्दी परोसो मुझे फिर खेत में जाना है ”
“पर क्यों अभी तुम ठीक नहीं हो इन सब कामो के लिए ”
“भाभी चंदा, चाची को परेशानी होती है उनका वैसे ही कितना नुकसान हो गया है ऊपर से राणाजी ने भी बोला है तो ”
“ठीक है पर ध्यान रखना खुद का और कल याद से चिट्ठी पोस्ट कर देना ”
“जी भाभी ”
मैंने जल्दी से खाना खाया और फिर चंदा चाची के घर की तरफ दौड़ पड़ा ताकि...
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04-27-2019, 11:32 AM,
#8
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
साँसे कुछ बागी सी थी कुछ मौसम मनचला था और हम तो थे ही आवारा मदमस्त मलंग मैं घर के बाहर बने उस चबुतरे पर बैठ गया और बस उसके बारे में ही सोचने लगा उसका भोला सा चेहरा मेरी आँखों के सामने आ रहा था दिल कह रहा था की काश वो मेरी आँखों के सामने आ जाये तो कुछ चैन मिल जाये 



मैं सोच रहा था की अबकी बार जब भी उस से मिलूँगा तो पक्का बात करनी है चाहे कुछ भी जुगाड़ करना पड़े हलकी सी हवा च रही थी तो मैंने चादर को कस कर ओढ़ लिया और बैठा रहा जो भी थी वो मुझे बहुत अच्छी लगती थी सादगी उसकी मुझे मार ही गयी थी कानो में छोटे से झुमके हलके गुलाबी होंठ और ठोड़ी पर काला तिल अगर मैं कोई कवी होता तो उसके ऊपर पूरा काव्य लिख डालता पर यहाँ तो मैंने इतना कुछ सोच लिया था और असल में ठीक से बात भी नहीं हो पाई थी पर उसने जिस अंदाज में कहा था की वो जुम्मे को पीर साहब की अंजर पर जाती है तो कही ना कही लग रहा था की उसके मन में भी कुछ तो है 



“ला ला लालाल्ल्ल लाला ला ला लाला ” बस ऐसे हु गुनगुनाते हुए मैंने दिल को थोड़ी तस्सल्ली दी और रुख किया चंदा चाची के घर की तरफ 



“तू, यहाँ ”


“खेत पर नहीं चलना क्या चाची ”


“जाउंगी अभी थोड़ी देर में पर ”


“चलने को आया हु ” 



“पर तेरी हालत ”


“अब मैं ठीक हु चाची ”


“थोड़ी देर रुक बस ”


करीब पंद्रह मिनट बाद हम दोनों हाथो में लाठी और लालटेन लेकर पैदल ही चल दिए जल्दी ही गाँव पीछे रह गया और कचचा रास्ता शुरू हो गया चाची मुझसे थोडा सा आगे चल रही थी मेरी निगाह चाची की बलखाती कमर और मतवाली गांड पर थी जी कर रहा था छु लू उसके चूतडो को पर अभी शायद और कुछ देर लगनी थी 



रास्ता करीब आधा रह गया था तभी चाची बोली “तू चल आगे मैं आती हु ”


क्या हुआ चाची ”


“कहा ना तू चल ”


मैं कुछ कदम आगे बढ़ गया वो दो पल खड़ी रही फिर चाची ने अपने घाघरे को ऊपर कमर तक उठाया लालटेन की रौशनी में मैंने उसकी चिकनी जांघो को चमकते हुए देखा उसने अपनी उंगलिया कच्छी में फंसाई और धीरे से उसको घुटनों तक किया खेतो के बीच कच्चे रस्ते पर ऐसा हाहाकारी नजारा उफ्फ्फ्फ़


इर अहिस्ता से वो निचे बैठ गयी, surrrrrrrrrrrrrr सुर्र्र्रर्र्र्र पेशाब की तेज आवाज जैसे मेरे कानो को बेध गयी थी उसके गोरे चूतडो को मैं नजरे टेढ़ी किये देखता रहा वो मूतती रही मैं हद से ज्यादा उत्तेजित हो गया था उस पल मेरा लंड उस पल कुछ चाहता था तो बूस इतना की चाची की चूत में घुसना 
पर उसने भी आज ठेका ही ले लिया था मुझे तडपाने का और वो कामयाब भी हो गयी थी अपने काम में 



“मैंने कहा था ना की आगे चल पर तू कभी बात नहीं मानता है ना ”


“चाची, आगे कैसे चलू आपके बिना अब तो आपका साथ ही करना पड़ेगा ”


“कैसा लगा ”


“क्या ”


“वो ही जो तू देख रहा था ”


“मैं कुछ नहीं देख रहा था ”


“अब मुझसे झूठ मत बोल तू चल बता ”


“अच्छा लगा, आप बहुत सुन्दर हो चाची ”


“झूठी तारीफे कर रहा है चाची की ”


“मैं तो जो महसूस किया वो बोल दिया चाची अब चाहे आप मानो या न मानो सची में आपसे सुन्दर कोई नहीं है ”


“अब ऐसा क्या देख लिया तूने मुझमे ये तो तू ही जाने पर आजकल तेरा ये बहुत खड़ा रहता है मैं देख रही हु ” चाची ने मेरे लंड की तरफ इशारा करते हुए कहा 



“क्या करू चाची मैं खुद परेशान हु इस से पर पता नहीं कैसे दूर होगी ये परेशानी ”


“हम्म परेशानी तो दूर करनी पड़ेगी 

पर पहले जरा एक चक्कर लगा के देख की कोई जानवर आस पास तो नहीं ” 

बातो बातो में हम कब खेतो पर आ गए थे पता नहीं नहीं चला था , चाची ने एक गहरी मुस्कान दी मुझे और मैं अपनी लाठी लिए खेतो की दूसरी और चल पड़ा ये सोचते हुए की आज कुछ भी करके चाची को चोद ही दूंगा मैंने एक नजर अपने कुवे पर डाली पर सब शांत था या तो राणाजी के आदमी अभी आये नहीं थे या सो गए थे 



परली पार मुझे जंगली जानवरों का झुन्ड दिखा तो मैं उस और हो लिया उनको हांकते हुए उनका पीछा करते हुए मैं थोड़ी आगे तक आ गया जो हमारा इलाका नहीं था नदी के उस पार के खेत खलिहान किसी और के थे और फिर आगे शुरू हो जाता था रेत वाला इलाका बीच में कोई एक आधा पेड़ दिख जाये तो अलग नहीं तो बस रेत के टिब्बे कितनी अजीब बात थी ना की पास नदी होने के बावजूद ये इलाका नहीं पनप पाया था 



खैर इन सब में करीब आधा घंटा ख़राब हो गया मैं आया तो देखा की बिजली गुल थी कमरे में रौशनी थी लालटेन की चाची बोली “कहा रह गया था मुझे चिंता हो रही थी ”


“परली पार तक हांक आया हु, अब पूरी रात इधर ना फटकेंगे ”


“अच्छा किया ”


मैंने दरवाजे को अन्दर से कुण्डी मारी और चाची के पास लेट गया कुछ देर हम लेटे रहे फिर मैंने धीरे से अपना हाथ चाची के पेट पर रख दिया और सहलाने लगा उसकी नाभि में ऊँगली करने लगा चाची कसमसाने लगी मैं उसके और करीब हो गया 



“क्या कर रहा है नींद नहीं आ रही क्या ”


“नींद कैसे आएगी चाची भूख जो लगी है ”


“खाना खाके नहीं आया क्या अभी यहाँ कुछ नहीं है खाने पिने का ”


“खाने का नहीं पर पिने का तो है चाची ”


“क्या मतलब ”


“मतलब ये की मुझे दूध पीना है वो ही दूध जो दिन में मैं नहीं पी पाया था ” कह कर मैंने अपना हाथ चाची की चूची पर रख दिया और हल्का सा मसल दिया

“तू मेरी जिंदगी है तू ही मेरी पहली खवाहिश तू ही आखिरी है तू....... मेरी जिंदगी है हम्म्म्म हुम्मुम्म्म्मु ” बेहद धीमी आवाज में उस कमरे में संगीत बज रहा था आवाज बस इतनी की महसूस भर ही कर पाए सामने वाली खिड़की जो खुली हुई थी उसमे से बहती हुई ठंडी हवा उसके खुले बालो से छेड़खानी कर रही थी 



वो कमरे के बीचो बीच रखी टेबल-कुर्सी पर बैठी थी हाथो में पेन था और पास एक कॉपी थी अपने चेहरे पर बार बार आ रही बालो की उस लट को उसने फिर से एक बार पीछे किया और सोचने लगी उन सब हालात के बारे में जो पिछले कुछ दिनों में उसके साथ हुए थे अचानक वो उठी और खिड़की के पास जाके खड़ी हो गयी पता नहीं उसके होंठो पर एक मुस्कान सी थी अपनी ही बेखुदी में खोयी थी वो 



पर कौन था वो जिसके खयालो में वो थी कौन सी बात थी की उसके होंठो से वो मुस्कराहट हट ही नहीं रही थी जबकि कुछ देर पहले ही वो गुस्सा थी उसे वो छोटी छोटी बाते याद आ रही थी जो उन दोनों के बीच हुई थी कैसे जब पानी की टंकी पर उसने धीरे से उसकी उंगलियों को छू भर दिया था कैसे कांप गयी थी वो ऊपर से निचे तक जैसे किसी ने ठंडी बर्फ उड़ेल दी हो उस पर 



शाम को कितनी बार ही वो जाके छज्जे पर जाकर गली में देखती थी बार बार वो उस दुपट्टे को देखती थी उसे अपने सीने से लगाती थी उसे पता नहीं क्या हो रहा था सच तो तह की वो अब अपनी रही ही कहा थी उसकी धडकनों की तेजी कुछ जोर से बढ़ गयी थी बार बार एक ही चेहरा उसकी आँखों के सामने आता था और बस वो तड़प सी जाती थी 



जब रहा नहीं गया तो बिस्तर पर लेट गयी पर उफ्फ्फ ये करवटे बदले भी तो कितनी बदले आँखों से नींद ने जैसे बगावत सी कर दी थी उसने थोडा पानी पिया कुछ बुँदे बस उसके होंठो पर ही रह गयी जैसे चूम लेना चाहती हो जब रहा नहीं गया तो अपने हर उस ख्याल को उस कॉपी में लिखने लगी न जाने कितनी रात तक वो जागती रही बल्कि उसके लिए तो अब जैसे ये नियम सा बन गया था 
“मुझे दूध पीना है चाची ” मैंने उसके उभारो को दबाते हुए कहा 



“उम्म्म, ये दूध बड़ा महंगा है कुंदन , कीमत चूका पायेगा ”


“कितनी भी कीमत हो चाची पर आज ये दूध मुझे पीना ही है ” मैंने धीरे से चाची को अपनी बाहों में ले लिया उसके जिस्म से आती खुशबु मुझे पागल करने लगी मेरे रोम रोम में उत्तेजना भरने लगी मैं हहलके हलके कांप रहा था चाची भी मुझसे चिपकने लगी 



उसके गरम सांसे मेरे सीने पर लग रही थी हलकी सी ठण्ड में जबरदस्त गर्मी का अहसास मेरे चारो ओर था मैं धीरे धीरे चाची की चुचियो को दबा रहा था मेरा हाथ उसकी चुचियो की घाटी तक जा रहा था मेरा घुटना चाची की टांगो के बीच दवाब डाले हुए थे चाची ने उत्त्जेना वश मेरा मुह अपनी छातियो पर रख दिया और उसे दबाने लगी 



मेरे होंठो ने उसकी खाल को छुआ तो पुरे बदन में करंट दौड़ सा गया “पुच ” मैं अहिस्ता से उसके सीने के ऊपर वाले हिस्से कर छुआ मैं पिघलने लगा मैंने चाची के ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किय और जल्दी ही उसकी ब्रा के अन्दर कैद चुचिया मेरी आँखों के सामने थी मैंने ब्रा के ऊपर से से ही चुचियो को मसल दिया 



“”आह चाची ने धीरे से एक आह भरी और मुझे अपनी बाँहों में भर लिया हम दोनों एक दुसरे से चिपक गए थे मैंने धीरे से अपने होंठ खोले और चाची के गाल को अपने मुह में भर लिया हलके से काटा उसे दांतों से तो वो मुझ से और लिपट गयी 



पर तभी बाहर से अचानक सियारों के रोने की बहुत तेज आवाज आने लगी, तो झटके से मैं और चाची एक दुसरे से अलग हो गए 



“सियारों का रोना है ” चाची ने कहा 



“सियार पर अपनी तरफ सियार है ही कहा, ”


“जंगल है पास तो आ सकते है वैसे मैंने भी काफी टाइम से अपनी तरफ सियार देखे नहीं ”


“मैं देखता हु जरा ” मैंने लालटेन ली और बाहर आया मेरे पीछे चाची आई 



“ये तो पूरा झुण्ड है , अभी भगाता हु उनको ”


“नहीं, पूरा झुण्ड है कही पलट गए तो तुम्हे घायल ना कर दे ”


“अभी देखता हु उनको ”


हाथ में लालटेन और दुसरे में लाठी लिए मैं सियारों की तरफ बढ़ने लगा चाँद की रौशनी में चमकती उनकी आँखे मुझे डरा रही थी मैंने मजबूती से पकड़ा अपनी लाठी को पर जैसे जैसे मैं झुण्ड के करीब जा रहा था वो पीछे होने लगे और भागे जंगल की और मैं उनके पीछे दौड़ा 



जैसे मेरे पैर अपने आप मुझे खीच रहे हो उस तरफ जबकि कायदे से मुझे एक दुरी के बाद रुक जाना चाहिए था जब मैं रुका तो मैंने देखा की खारी बावड़ी के पास खड़ा हु जंगल के किनारे पर ये बावड़ी बनी हुई थी किसी ज़माने में आबाद रही होगी पर कई सालो से ऐसे ही पड़ी थी वीरान सी होती होगी कभी रौनक पर मैंने नहीं देखि थी 



दिन के उजाले में मैं कई बार आया था इस तरफ पर रात को कभी नहीं और पता नहीं क्यों थोडा डर सा लगने लगा ऊपर से रात का टाइम वो सियारों का झुण्ड ना जाने कहा गुम हो गया था पता नहीं क्या हवा थोड़ी तेज सी हो गयी थी पर पास वो बेरी का पेड़ थोडा सा हिलने सा लगा था 



मुझे सच में बहुत डर सा लगने लगा था हमारे खेत वहा से काफी दूर थे मैंने एक गहरी साँस ली और वापिस मुड़ा वहा से मैं लगभग दौड़ सा ही पड़ा था और तभी मेरी लालटेन बुझ गयी मेरे चारो तरफ घुप्प अँधेरा सा हो गया मेरी धड़कन इतनी बढ़ गयी की साँस अपने आप फुल गयी 



क्या ये किसी चीज़ का असर था या बस रात के अँधेरे और सुनसान इलाके का खौफ मैंने मेरी कनपटी पर बहती पसीने को महसूस किया मेरा गला ऐसे खुश्क हो गया जैसे की मैं बरसो से प्यासा हु मेरी प्यास बहुत बढ़ गयी मैंने हिम्मत बटोरी और मैं दौड़ने लगा अपने इलाके की ओर
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04-27-2019, 11:32 AM,
#9
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
झट से उसकी आँख खुल गयी उसने खुद पर गौर किया उसकी सांसे फूली हुई थी जैसे मिलो दौड़ लगायी हो उसने पूरा बदन पसीना पसीना हुआ पड़ा था जबकि कमरे में पंखा पूरी रफ़्तार से चल रहा था तो फिर ये पसीना कैसे उसकी आँखों के सामने अभी तक वो मंजर घूम रहा था जो शायद उसने सपने में ही देखा था 

पता नहीं ये क्या बचैनी थी ये कैसा अहसास था जो उसकी नींद को उड़ा ले गया था उसने फिर से सोने की कोशिश की पर नींद आ नहीं रही थी किसी अनजाने डर का अंदेशा सा हो रहा था 

अपने डर से झुझते हुए मैं धीर धीरे आ रहा था आस पास अगर भी कुछ तेज होती तो मैं कांप जाता था कुछ और आगे आया तो मैंने देखा की कच्ची सड़क जो जंगल की तरफ जाती थी उस तरफ ऊंट गाडियों का काफिला जा रहा था तो मैं चौंक सा गया क्योंकि जंगल काफी दूर तक फैला हुआ था और उसकी दूसरी तरफ सरहद थी जिसके बारे में मैंने बस सुना ही था 

मैं उन गाडियो की तरफ देखते हुए बेध्यानी में चले जा रहा था तभी मुझे ठोकर लगी और मैं गिर गया और साथ ही लालटेन का शीशा भी टूट गया बेडागर्क, मैंने खुद को कोसा पता नहीं कब मैं अपना रास्ता छोड़ कर उ रास्त पर हो लिया जहा वो ऊंट गाडिया जा रही थी 

मैं बस चले जा रहा था पर आगे जाने पर मैंने देखा की ऊंट गाड़िया पता नहीं किस तरफ निकल गयी थी और कोई आवाज भी नहीं आ रही थी मैंने खुद को ऐसी जगह पर पाया जहा मैं पहले कभी नहीं आया था आस पास घने पेड़ तो नहीं थे पर फिर था तो जंगल ही डर फिर से मुझ पर हावी होने लगा मैंने वापिस जाना ही मुनासिब समझा पर मुताई सी लग आई थी तो मुतने लगा और तभी मेरी नजर एक हलकी सी रौशनी पर पड़ी , इस जंगल में रौशनी जैसे कोई दिया टिमटिमा रहा हो मैंने टाइम का अनुमान लगाया करीब साढ़े दस –ग्यारह तो होगा या ऊपर भी हो सकता है पर इतनी रात में कौन हो सकता है देखू के नहीं .......... नहीं जाने दे क्या पता क्या बवाल हो 

फिर ध्यान में आया की किस्से- कहानियो में सुना था की जंगल में भुत-प्रेत भी होते है तो अब जी घबराने लगा कुछ छलावो के बारे में भी सुना था की वो तरह तरह की माया दिखा कर ओगो को अपनी तरफ खींचते है तो दिल घबराने लगा तभी कुछ आवाज सी आई तो मैं और घबरा गया पर उत्सुकता होने लगी तो कुछ सोचा और जी को मजबूत करके मैं उस तरफ चला

“आह आई ”मेरे होंठो से आह निकली मैंने देखा पाँव में चप्पल को पार करते हुए काँटा पैर में धंस गया था खून निकलने लगा मिटटी लगा कर थोडा रोका उसको और उस दिशा में बढ़ने लगा तो देखा की एक पीपल का बड़ा सा पेड़ है और उसके चारो तरफ एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ था पेड़ पर खूब सारे धागे बंधे थे और एक दिया उसी चबूतरे पर जल रहा था 

उसके पास ही झोला सा कुछ रखा था पर कोई दिखा नहीं अब इतनी रात में कौन दिया जला गया यहाँ पर वो भी इतनी दूर इस बियाबान में हवा थोड़ी सी तेज तेज चल पड़ी थी तो मैंने अपनी चादर को कस लिया फिर मुझे कुछ सुनाई दिया जैसे की कोई झांझर की आवाज हो मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी मैं जान गया की भुत-प्रेत का ही मामला है ये तो 

गला सुख गया प्यास के मारी थर्र थर्र कांपने लगा मैं पैरो में जैसे जान बाकी ना रही तभी मेरी नजर चबूतरे के निचे गयी एक हांडी सी रखी थी मैंने इधर उधर देखा और चबूतरे के पास गया हांड़ी में पानी था मैं प्यासा मर रहा था मैंने उसे अपने मुह से लगाया और गतागत पीने लगा और तभी कुछ ऐसा हुआ की मेरे हाथो से हांड़ी नीचे गिर गयी और मेरी तो जैसे साँस ही रुक गयी धडकनों ने जैसे दिल का साथ छोड़ दिया 

“भुत भुत ” मैं बहुत जोर से चीखा और निचे गिर गया और गिरता भी क्यों ना एक दम से पीपल के पीछे से वो मेरे सामने जो आ गयी थी बाल इतने घने उसके पुरे चेहरे को ढके हुए ऊपर स काले स्याह कपडे 

“मुझे मत खाना मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हु ” मैं मरी सी आवाज में बोला डर से कांपते हुए 

“नहीं आज तो तुझे खाऊ ही गी बहुत दिन हुए इन्सान का मांस नहीं खाया मैंने और तू तो खुद मेरे पास आया है तेरे गरम खून को पीकर मैं अपनी प्यास बुझाउंगी हां हा हाह ”

उसकी ये बात सुनते ही मैं तो जैसे बेहोश ही होने को हो गया मेरा गला फिर से सुख गया जबकि अभी मैंने पानी पिया था ऐसे लगा की जैसे हाथ पांवो की जान ही निकल गयी हो वो धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी मैं पीछे को सरकने लगा 

“हा हा हा आज तो शिकार करुँगी तेरा तेरे गर्म खून से मेरी प्यास बुझेगी लड़के आ पास आ मेरे आ ” वो पल पल मेरे पास आते जा रही थी और मैं फीका होता जा रहा था क्या यही अंत था मेरा क्या ये भूतनी आज मुझे मार ही देगी मेरे दिमाग में तरह तरह के बिचार आने लगे थे 

और फिर मैंने सोचा भाग यहाँ से कोशिश कर जान बचाने की मरना है तो मर पर कोशिश जरुर कर भागने की मैंने अपनी पूरी शक्ति बटोरी और भागा एक तरफ पर किस्मत खराब कुछ कदम बाद ही मेरा पैर किसी जड़ में फस गया और मैं पास की पथरीली जमीन पर पीठ के बल जा गिरा और मेरे जख्म इस दवाब को झल नहीं पाए 

“aaahhhhhhhh ” मेरी एक दर्दनाक चीख उस ख़ामोशी में गूंजती चली गयी मेरी आँखों से आंसू बहने लगे मैं कराहने लगा दर्द से और तभी मैंने किसी को अपने पास आते महसूस किया मैंने डर से अपनी आँखों को बंद कर लिया मुझे अपने बदन पर दो हाथ महसूस हुए

“भूतनी जी मुझे जाने दो , मुझे मत खाओ ”बस इतना ही बोल पाया मैं
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04-27-2019, 11:32 AM,
#10
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
“नहीं मुझे मत खाओ नहीं मुझे जाने दो “ मैं डरते डरते बोल रहा था उसके हाथ मुझे अपने बदन पर महसूस हो रही थे की उसने मुझे इस तरह सी खींचा की जैसे मुझे उठा रही हो कुछ ही पलो में हम दोनों एक दुसरे के सामने खड़े थे उसके खुले बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे 
मैं कुछ बोलने ही वाला था की वो बोल पड़ी “थम जा क्यों बेफालतू में मरे जा रहा है कोई ना तेरे प्राण हर रहा गौर से देख कोई भूतनी ना हु मैं ”
क्या कहा उसने , अब जाके मैं थोडा शांत हुआ 
“कौन हो फिर तुम और इतनी रात को यहाँ क्या कर रही थी ”
“”बताती हु , आ साथ मेरे कहकर वो आगे को चल पड़ी 
पर मैं वही रुका रहा 
“इब्ब आ भी जा डर मत भूतनी होती तो इब तक निगल गयी होती तुझे आजा ”
मैं उसके पीछे चल पड़ा और हम दोनों वापिस उसी पीपल के पेड़ के पास आ गए वो चबूतरे पर बैठ गयी और अपनी कलाई से रबड़ निकाल कर बालो को बाँधा उसमे तो मेरी नजर दिए की रौशनी में उसके चेहरे पर पड़ा दिखने में तो चोखी लगी 
“बैठ, जा खड़ा क्यों है अब इतना भी ना डर ”
मैं उस से कुछ दूर बैठ गया 
“कौन हो तुम, ” मैंने पूछा 
“पहले तू बता कौन है तू ” उसने उल्टा सवाल किया 
“मैं कुंदन हु वो नदी के साथ वाले इलाके में मेरी जमीन है खीतो में सियारों का टोला घूम रहा था तो भगाते हुए इस तरफ निकल आया और फिर ये दिया देखा ”
“हुमम्म दिलेर लगे है जो इतनी रात को अकेले में जंगल में आ गया ”
“मेरी छोड़ अपनी बता तू के कर रही थी ”
“के करेगा जान के ”
“बस ऐसे ही पूछा ”
“यो देख, ” उसने अपने झोले से एक किताब निकाली और मुझे दिखाई 
“के है ” मैंने पूछा 
“अनपढ़ है के दिख ना रहा जादू की किताब है ”
“जादू ” मैंने हैरत से पूछा 
“हां, जादू , बस करके देख रही थी ”
“इतनी रात को वो भी अकेली ”
“और के सारे गाँव ने साथ ले आती ”
“डर ना लगा इतनी रात को अकेली आ गी ”
“किताब में लिख रखी है अकेले करना सारा काम ”
“कर लिया मेरा मतलब हुआ जादू ”
“ना रे, तू जो आ गया बीच में वैसे बुरा ना मानियो मजा बहुत आया तुझे डरा के और तू क्या बोल रहा था भूतनी जी , भूतो को कोई आदर-सत्कार देता है क्या ” वो हस पड़ी 
“हां, एक पल तो मैंने भी सोचा की भूतनी इतनी खुबसूरत कैसे हो सकती है ”
“अकेली छोरी देख के डोरे डाल रहा है ”
“ना जी, बस जो देखा बोल दिया ”
तभी मैंने एक अंगडाई सी ली और उसी के साथ मेरी पीठ में दर्द हो गया “आई आई ” मैं कराहा 
“क्या हुआ ”
“पीठ में लगी हुई है गिरने से शायद जख्म ताज़ा हो गया ”
“देखू ”
मैंने हां कहा तो वो मेरे पीछे आई “खून आ रहा है इसमें तो एक काम कर कमीज ऊपर कर मैं कुछ करती हु ”
उसने अपने झोले से टोर्च ली और जंगल की तरफ हो ली पर जल्दी ही आ गयी उसके हाथ में कुछ हरे पत्ते से थे “ये लगा देती हु खून बंद हो जायेगा ” उसने पत्तो को पत्थर से पीस कर एक लेप सा बनाया और मेरी पीठ पर लगाया थोड़ी जलन सी हुई पर खून बंद हो गया 
“तू कहा रहती है मैंने पूछा ”
“कोस भर दूर घर है मेरा ”
“पर तू अकेली रात में भटक रही घरवाले कुछ ना कहते ”
“अकेली हु माँ- बाप गुजर गए वैसे तो कुछ लोग है परिवार के पर जबसे होश संभाला है जीना सिख लिया है ”
हमको जो मिटा वो दिन दुखी ही मिलता था अब क्या कहते उसको 
“चल तुझे छोड़ दू तेरे घर ”
“रहने दे चली जाउंगी ”
“बोला ना छोड़ देता हु भरोसा कर सकती है मुझ पर ”
कुछ देर उसने सोचा फिर बोली “ठीक है ”
रस्ते भर हम दोनों चुपचाप चलते रहे करीब आधे घंटे बाद हम एक ऐसी जगह पहुचे जहा मैं तो कभी नहीं आया था आस पास घने पेड़ थे पानी बहने की आवाज आ रही थी मतलब नदी थी पास में ही और फिर मैंने उसका घर देखा उसने उस बड़े से दरवाजे को खोला और अपने कदम अन्दर रखे 
“अच्छा तो मैं चलता हु ”

उसने अपना सर हिलाया और मैं वापिस मुड़ा पर मैंने जोश में बोल तो दिया था की चलता हु पर मेरे खेत यहाँ से काफी दूर थे और अब तो एक से ऊपर का टाइम हो रहा रात का मैं अकेला कैसे जाऊंगा मुझे फिर से डर लगने लगा पर जाना तो था ही बस कुछ कदम ही गया था की पीछे से आवाज आई “कुंदन ”
मैंने मुडके देखा वो आ रही थी पास बोली “रात को अकेले जाना ठीक नहीं एक काम कर मेरे घर आजा सुबह चले जाना ”
“नहीं मैं चला जाऊंगा ”
“अरे चल ना , इतना भी क्या सोचना रात है रास्ता भटक गया तो कहा जायेगा मुझ पर भरोसा कर सकता है तू ” उसने मेरी आँखों में आँखे डालते हुए कहा 
मैं उसके साथ अन्दर आ गया तो देखा की थोड़े पुराने ज़माने का घर था तीन कमरे थे पास ही में एक छप्पर था पर चार दिवारी ऊँची ऊँची थी 
“थोड़ी मरम्मत मांग रहा है न ”
“अच्छा है ” मैंने कहा 
“यही सोच रहा है आ की इस टूटे फूटे घर में .......”
“ना सही है तू तो ऐसे ही बोल रही है ”
“गाँव में हवेली है हमारी पर रिश्तेदारों ने कब्ज़ा ली ले देके एक जमीन का टुकड़ा और कुछ पशु बचे है ”
पता नहीं क्यों मुझे लगा ये भी अपने जैसी ही है 
“नाम क्या है तेरा, ”
“पूजा ”
“अच्छा नाम है जरा अपने घरवालो के बारे में बता कुछ ”
“क्या बताऊ, मैं तेरे सामने हु माँ-बाप रहे नहीं रिश्तेदारों ने ठुकरा दिया इतनी सी बात है ”
“बाबूजी का क्या नाम था ”
“अर्जुन सिंह कभी इलाके में नाम था उनका और आज देखो ” बोलते बोलते वो थोड़ी भावुक सी हो गयी 
“उनक नाम आज भी है तुम जो हो ”
वो बस हलकी सी मुस्कुरा पड़ी
बाते अच्छी करता है तू 
“तुम भी ” 
“तुम्हारी शर्ट पे खून लगा है धो दू मैं ”
“नहीं मैं घर जाके धो लूँगा ”
“आराम कर लो फिर रात बहुत हुई ”
“हम्म्म ” मैंने चादर ओढ़ ली और सोने की कोशिश करने लगा कुछ देर बाद मैंने चादर से मुह बाहर निकाल के देखा वो पास ही चारपाई पर वो सो रही थी तो मैंने भी आँखे बंद कर ली सुबह जब मैं जागा तो वो वहा पर नहीं थी कुछ देर इंतजार किया और फिर मैं अपने रास्ते पर हो लिया घूमते घुमाते मैं खेतो पर आया तो देखा की चंदा चाची वहा नहीं थी ताला लगा था तो मैं भी गाँव की तरफ हो लिया 
घर आके मैं छत पर कुर्सी डाले बैठा था की भाभी भी आ गयी 
“आज पढने नहीं गए तुम ”
“भाभी, वैसे ही नहीं गया ”
“”मैं देख रही हु पिछले कुछ दिनों से अजीब से हो गए हो तुम ऐसा क्यों “
“ऐसा कुछ नहीं भाभी ”
“चलो कोई नहीं कुछ काम निपटाके आती हु फिर बात करते है ” 
मैं भी भाभी के पीछे निचे आया तो मुनीम जी ने कहा की आज दोपहर को तुम्हे मेरे साथ चलना है जमीन देखने तो तैयार रहना मैंने एक नजर मुनीम के चेहरे पर डाली और फिर घर से बाहर निकल गया और पहुच गया चंदा चाची के घर पर दरवाजा खुल्ला था मैंने अन्दर जाते ही उसे बंद किया और चाची को देखने लगा 
वो अपने कमरे में थी “कुंदन, कहा गायब हो गया था कल रात कितनी चिंता हो गयी थी मुझे ”
“चाची वो कल रास्ता भटक के जंगल में चला गया था तो फिर थोड़ी परेशानी हो गयी खैर बताओ क्या कर रहे हो ”
“कुछ नहीं नहाने जा रही थी फिर सोचा की पहले हाथ पैरो को थोडा तेल लगा लू कितने दिन हो गए त्वचा रुखी रुखी सी हो गयी है अब तू आ गया बाद में लगा लुंगी ”
“बाद में क्यों अभी .... कहो तो मैं लगा दू ”
“नहीं रे मैं लगा लुंगी ”
“उस दिन भी तो मैंने आपको दवाई लगाई थी आपको अच्छा नहीं लगा था क्या ”
“दवाई कम लगायी थी तूने बल्लकी मुझे ज्यादा रगडा था तूने ”
“पर आपको अच्छा भी तो लगा था चाची ” चाची ने मेरी तरफ दखा और फिर तेल की शीशी मुझे देते हुए बोली “ले तू कर अपने मन की “ 
मैंने तेल लिया और चाची के हाथो पर मलने लगा चाची के नर्म हाथो को मेरे कठोर हाथ रगड़ने लगे चाची के बदन को छूते ही मेरे लंड में तनाव आने लगा कुछ देर बाद मैं बोला “चाची एक बात कहू ”
“बोल ”
“आप इतनी सुंदर हो फिर भी चाचा आपको छोड़ कर बाहर गए कमाने को ”
“कमाना भी जरुरी है ना और वैसे भी इतने दिन निकल गए थोडा टाइम और निकल जायेगा अगली दीवाली तक वो वापिस आही जायेंगे वैसे आजकल तू मेरी कुछ ज्यादा ही तारीफ करने लगा है ”
“अब आप सुन्दर हो तो आपकी तारीफ होगी ही ”
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