Chodan Kahani जवानी की तपिश
06-04-2019, 12:02 PM,
#1
Thumbs Up  Chodan Kahani जवानी की तपिश
जवानी की तपिश

फ्रेंड्स एक कहानी शुरू कर रहा हूँ ऑर आपका सपोर्ट भी चाहता हूँ जिससे कहानी में निरंतरता बनी रहे
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06-04-2019, 12:02 PM,
#2
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
कमरा रजनी की सिसकियों से गूँज रहा था। उसकी मजे में डूबी आवाज मेरे कानों में रस घोल रही थी उसका बार-बार दोहराया हुआ जुमला मेरे मजे में इजाफा कर रहा था-“खा जाओ मुझे राज… खा जाओ… मैं तुम्हारी हूँ… आज निचोड़कर रख दो मुझे… मेरा अंग-अंग तोड़ दो राज…”

उसके इस जुमले ने मेरे कानों की लोलकी गरम करनी शुरू कर दी और मेरा हाथ तेजी से उसके पेट पर से होता हुआ उसकी पैंटी की तरफ बढ़ने लगा, और उसके 36” साइज़ के मम्मे अपने गुलाबी निपल्स के साथ मेरे होंठों और जबान के जुल्म-ओ-सितम सह रहे थे। मैं उसका निपल अपने होंठों में दबाये उसको चूस रहा था और मेरा हाथ उसकी काले रंग की पैंटी में दाखिल हो चुका था।

हाथ के अंदर जाते ही मुझे महसूस हुआ कि मैंने शायद अपने हाथ को गलती से किसी तंदूर के ऊपर रख दिया है, मगर इस तंदूर की तपिश मुझे मजा दे रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने सख़्त सर्दी में अपने ठंड से ठिठुरते हाथों को गरम करने के लिए आग के करीब कर दिया है, जिससे गर्मी मेरे हाथों से होती हुई मेरे पूरे जिश्म को गरम कर रही थी।

मेरा हाथ उसकी पैंटी में दाखिल होते ही रजनी ने एक तेज सिस्कारी भरी और एक लम्हे के लिए वो मचल सी गई। उसके दोनों हाथ मेरे सिर के बालों में उंगलियाँ फ़िराने लगे, वो अब पूरी मस्ती में डूबी हुई थी। मैं पिछले आधे घंटे से उसका साथ फोर-प्ले कर रहा था। मेरी किसिंग और चूची चुसाइ ने उसकी हालत खराब कर दी थी। किंग साइज़ के बेड पर उसके कपड़े बिखरे हुए थे। मेरा ऊपरी जिश्म शर्ट की कैद से आजाद था। रजनी के जिश्म पर भी अब सिर्फ़ पैंटी रह गई थी, जिसे मैंने अब उतारने का सोच लिया था। अब मुझसे भी कंट्रोल नहीं हो रहा था।

और अब मैं रजनी की चूत देखना चाहता था जिसके लिए इतना कत्ले-आम हुआ था। इस चूत को हासिल करने के लिए मेरे और मेरे कारिंदों के हाथों लगभग दो दर्जन लोग कत्ल हो चुके थे।

आज मैं रजनी की चूत मारकर उससे अपनी एक-एक पल की तड़प का बदला लेना चाहता था। जितने दिन उसने मुझसे दूरी रखी थी उसका हिसाब सॉफ करना चाहता था। मेरे हाथ की बीच वाली उँगली धीरे-धीरे रजनी की चूत के लबों को चीरती हुई उसके दाने के साथ छेड़-छाड़ में मसरूफ़ थी।

उसके दाने पर उँगली के छूते ही रजनी एक बार फ़िर उछल पड़ी उसने अपना सिर उठा-उठाकर बेड पर मारना शुरू कर दिया, उसके अल्फाज में तेजी आ गई-“राज, अब कर दो जो करना है, कर दो… मुझसे अब बर्दास्त नहीं होता… प्लीज राज चीर दो फाड़ दो… अब मैं तुम्हारी हूँ, मेरी हर चीज पर तुम्हारा हक है चीर दो मुझे राज… चीर दो…”
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06-04-2019, 12:02 PM,
#3
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
मैंने उसके मम्मों से अपना सिर उठाकर उसे देखा और मेरे लबों में एक मुश्कुराहट दौड़ गई। एक लम्हे के लिए मेरे दिमाग़ में रजनी को देखकर खयाल आया कि क्या यह वही रजनी है जो खुद पर मक्खी भी नहीं बैठने देती थी? मर्द तो बहुत दूर की बात हैं, इसके रौब और दबदबे से मर्द हजरत काँप जाते थे, जिसका नाम अपने लोगों के लिए एक दहशत था आज वो किस तरह मेरे नीचे तड़प रही है।

मेरे इस तरह अचानक रुकने पर उसने भी मुझे देखा और शायद उसने मेरी आँखों में सब कुछ पढ़ लिया, और मुझे देखते हुए उसने कहा-“तुमने मेरा गुरूर तोड़ दिया, मेरा सब कुछ बर्बाद कर दिया। राज, मैं कहीं की नहीं रही…” उसकी आँखों में दर्द था।

फ़िर एक गहरी साँस लेते हुए उसने हल्के से मुश्कुराकर कहा-“लेकिन मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं, मैं हारी भी तो एक असली मर्द से, जो हर तरह से मुझसे बढ़कर ही था। आज मैं सोच रही हूँ कि शायद मैंने तुम्हारे करीब आने में देर कर दी। मुझे यह सब कुछ पहले ही कर लेना चाहिए था, तो शायद आज मैं बर्बाद ना होती और ना ही मेरा गुरूर टूटता। मैं तुम्हें मुहब्बत से हासिल करती। लेकिन मैं अपनी फ़ितरत से मजबूर थी। जब तक तुम मुझे हराते नहीं मैं कभी तुम्हारे करीब भी नहीं आती…” यह कहते हुये उसकी आँखों से दो कतरे आँसू के बहकर तकिये में जज़्ब हो गये।

मैंने फौरन ही उसकी आँखों को चूम लिया और कहा-“नहीं रजनी, तुम्हें रोने की जरूरत नहीं… तुम मेरी जान हो, मैंने तुम्हें अपनी ज़िद से हासिल किया इसका मुझे अफ़सोस है। मैं तो तुमको मुहब्बत से हासिल करना चाहता था। तुम्हें नहीं पता कि मैं तुमसे कितनी मुहब्बत करता हूँ? तुम आज भी रानी हो मेरी रानी राज की रानी। मैं तुम्हारा गुरूर टूटने नहीं दूँगा, तुम्हें कभी बर्बाद होने नहीं दूँगा, मैं तुम्हें इतना मजबूत कर दूँगा कि दुनियाँ तुम्हारे नाम से खौफ खाएगी। रजनी, मुझे माफ कर दो। बस मेरी नेचर ऐसी है, मैं बचपन से बहुत तरसा हूँ, अब किसी चीज के लिए नहीं तरस सकता। जो मुझे अच्छा लगता हैं उसे मैं किसी भी कीमत पर हासिल कर लेता हूँ। यह मेरी मुहब्बत की इंतिहा है कि मैंने तुम्हें हासिल करने के लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा दी। मैं तुम्हें कभी रोने नहीं दूँगा। बस इस सबके बदले में तुमसे सिर्फ़ और सिर्फ़ मुहब्बत माँगता हूँ। मुझे अपनी तमाम मुहब्बत दे दो…”
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06-04-2019, 12:03 PM,
#4
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
मेरी बातें सुनकर रजनी की आँखों में चमक आ गई, मगर उसके साथ ही दो आँसू फ़िर उसकी आँखों से टपक कर गिरने के लिए बेचैन हो गये।

तो मैंने फौरन ही उनको अपने होंठों पर ले लिया, और जल्दी से कहा-“अब मत रोना, मुझसे बर्दास्त नहीं होगा…”

रजनी ने मुश्कुराते हुए कहा-“अरे यह तो खुशी के आँसू हैं। एक दुनियाँ जो राज के नाम से खौफ खाती है। राज… जिसका नाम दहशत का दूसरा नाम है, वो मुझसे मुहब्बत करता है। मैं तो अपनी खुशकिस्मती पर नाज करती हूँ। अब तो मुझे लग रहा है कि शायद मैं हारकर भी जीत गई हूँ…” इसी के साथ ही उसने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़कर अपने करीब कर लिया और उसने अपने गर्म-गर्म होंठ मेरे होंठों पर रख दिए, और उनको चूमने लगी।

मैं भी उसका साथ देने लगा। वो शोले जो कुछ देर की बातचीत से ठंडे होने लगे थे एक बार फ़िर तेज साँसों की गर्मी से भड़कने लगे। उसने अपनी जबान मेरे मुँह में दाखिल कर दी और मैं उसको चूसने लगा। मेरा एक हाथ

उसके मम्मों पर हरकत कर रहा था। कुछ देर की लिप किसिंग के बाद मैंने उसके होंठों को छोड़कर अपनी जबान को उसके कानों की लोलकी तक ले गया और उनको अपनी जबान से छेड़कर होंठों से चूसने लगा।

रजनी की आँखें बंद हो गई थीं। मैं उसके कानों की लोलकी से होता हुआ उसकी गर्दन पर आ गया और फ़िर वहाँ पर उसको किसिंग करने लगा। रजनी अब नीचे तड़प रही थी, शायद उसकी सुराही जैसी लंबी गर्दन ही उसका टर्निंग पॉइंट था जो उसको फौरन ही सेक्स की इंतिहा पर पहुँचा देता था। दो मिनट की किसिंग ने मुझे महसूस करवा दिया था कि रजनी का सेक्स प्रेशर अब कहाँ तक पहुँच चुका है।

रजनी तड़प रही थी। मैंने धीरे-धीरे एक हाथ उसके मम्मे से हटाकर उसकी पैंटी की तरफ बढ़ा दिया और उसकी पैंटी की बगल में लगी डोरी की गाँठ को खोल दिया, जिससे उसकी पैंटी एक साइड से खुल गई और मेरा हाथ उसे वहाँ से हटाने की कोशिस करने लगा। मगर एक साइड उसकी दूसरी जाँघ और उसके चूतड़ों के नीचे फँसा हुआ था।

रजनी ने महसूस कर लिया कि पैंटी उसके नीचे फँसी होने के कारण उतर नहीं रही है तो उसने अपने पैरों की मदद से खुद को थोड़ा ऊपर किया, जिसकी वजह से पैंटी उसके नीचे से आसानी से निकल गई। अब रजनी मेरे सामने पूरी नंगी पड़ी थी। राज-साइज़ के बेड पर लगी लाइट में ग्रीन सिल्क की चादर पर उसका गुलाबी जिश्म एक नाजुक कली का मंज़र पेश कर रहा था, जो अब फूल की तरह खिलने को बेचैन था। मैंने एक नजर भरकर उसे देखा और एक बार फ़िर उसकी गर्दन पर झुक गया। मगर उसके साथ ही मैंने एक साइड करवट ले ली। मेरा बायाँ बाजू रजनी की एक साइड पर बँधा हुआ था।

मैंने अपना पूरा वजन अपनी कोहनी पर करते हुए, दायें बाजू की मदद से अपनी पैंट का बेल्ट खोला और खुद को पैरों और बायें बाजू की कोहनी पर उठाते हुए पैंट को अंडरवेर के साथ ही कमर के नीचे से निकाल दिया, और फ़िर पैरों में फँसी हुई पैंट को अपने पैरों की ही मदद से खींचकर उतार दिया। अब मैं भी रजनी के दायें तरफ, यानी दायें साइड पर लेटा हुआ था और मेरे होंठ अभी तक रजनी की गर्दन पर हरकत कर रहे थे। रजनी के मुँह से मजे के कारण सिसकियाँ निकल रही थीं।
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06-04-2019, 12:03 PM,
#5
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
मैं उसकी गर्दन को अपनी जबान से चाटता हुआ धीरे-धीरे उसके चुचों तक आ गया और उसकी भरी-भरी खूबसूरत चुचियों को बारी-बारी चूमने और उसके ऊपर पिंक निपल्स को चूसने लगा। रजनी ने मेरे सिर को अपनी चुचियों पर दबाना शुरू कर दिया। मेरी चुचियाँ चुसाइ में अब स्पीड आ गई थी। अब मैंने अपनी एक टाँग उठाकर रजनी के ऊपर कर दी और दायां हाथ उसके ऊपर से गुजारकर उसकी दाई साइड की चूची अपने हाथ में पकड़ लिया और बहुत ही प्यार से उसे अपने हाथ में लेकर मिलने लगा। कभी-कभी अपने अंगूठे और एक उँगली में उसका निपल पकड़कर उसको रगड़ देता, जिसके कारण रजनी के सेक्स में तेजी आती गई।

अब रजनी ने मुझे अपनी बाहों में पकड़कर खुद को मेरे साथ रगड़ना शुरू कर दिया, और अब उसके मुँह से बहुत आवाजें निकल रही थीं। उसने सरगोशी में कहा-“अब बर्दास्त नहीं होता जो करना है करो। बस अब कर दो…”

मैंने सिर उठाकर एक बार फ़िर रजनी को मुश्कुराकर देखा। मेरी फ़ितरत मुझे मजबूर कर रही थी कि मैं अभी उसको और तडपाऊ। इतनी जल्दी तो मैंने कभी सेक्स नहीं किया था। अभी तो बहुत वक्त था। रजनी अपनी एक जाँघ को नीचे मेरे लण्ड के साथ रगड़ रही थी। मैं धीरे-धीरे उसके पेट को चूमने लगा और फ़िर उसको चूमते-चूमते ही उसकी चूत की तरफ बढ़ने लगा।


मैं उसकी दोनों टाँगों के बीच बैठा, मेरे दोनों हाथ उसके पूरे जिश्म पर गर्दिश कर रहे थे। उसने अपने हाथों से सिर के नीचे रखे तकिए को पकड़ रखा था, वो बैचेनी से अपने सिर को बायाँ दायां कर रही थी। मैंने नीचे झुक कर उसकी रानी को चूम लिया। रजनी ने अपनी दोनों टांगे खोली हुई थी। उसकी रानी से बहुत ही सौंधी सौंधी सी खुश्बू आ रही थी और यही कुँवारी चूत की खुश्बू मुझे बेचैन कर देती थी। मुझसे खुद पर काबू ना रहा। मैं उसकी रानी पर अपने होंठों से अपनी मुहब्बत की मुहरें लगाने लगा।

मेरे इस तरह चूमने से उसका खुद पर कंट्रोल ना रहा, और वो अपनी चूत को उठा-उठाकर मेरे मुँह पर मारने लगी। मैंने घुटनों को मोड़कर बैठते हुए अपने दोनों हाथों से उसकी टाँगों को दोनों पकड़कर ऊपर उसके पेट की तरफ कर दिया, जिसके कारण उसकी गोल-गोल रानी अपनी तमाम खूबसूरती के साथ खुलकर सामने आ गई। उसका दाना उस रानी से उभरा हुआ सॉफ नजर आ रहा था। उसकी रानी को इस हालत में देखकर मेरे राजा ने अपनी रानी से मिलने के लिए बेचैनी दिखाना शुरू कर दिया और बड़े जोर-जोर से नीचे से झटके मारने लगा।

जैसी रजनी थी वैसी ही उसकी रानी (चूत)। मैं आज तक बहुत सी चूतें चोद चुका हूँ। मगर रजनी की चूत अपनी मिशाल आप थी, गोल-गोल उभरी हुई। उसकी चूत का दाना कुछ ऊपर की तरफ उठा हुआ था और उसके लब आपस में इस तरह मिले हुए थे कि जैसे आने वाले वक्त का अहसास होते ही उन्होंने चूत के सुराख को आपस में छुपा लिया हो।

मैं एक हाथ रजनी की टाँग से हटाकर अपने नाग को सहलाने लगा और समझाने लगा कि कुछ देर और रुक जाओ। पहले इस राजा को तो अपनी रानी को जी भरकर प्यार कर लेने दो। मेरे टाँग पर से हाथ हटाने के बाद भी रजनी ने अपनी टाँग को नीचे नहीं किया था। मैं उसकी रानी पर झुक गया और उसके दाने को अपने दोनों होंठों में भर लिया। और एक लंबी साँस लेकर उसकी खुश्बू को सूंघकर उसकी खुश्बू को अपने अंदर जज़्ब करने लगा और उसके साथ ही होंठों को सिकोड़कर दाने को अपने होंठों में चूसने लगा।

इसके साथ ही रजनी के मुँह से एक चीख निकल गई और उसने अपने चूतड़ों को एक झटके से ऊपर उठा दिया। जिसके कारण उसका दाना मेरे होंठों से आजाद हो गया। मैंने फ़िर से उसकी रानी को अपने होंठों में जकड़ लिया अब मेरे होंठों के साथ-साथ मेरी जबान उसकी रानी पर फ़िर रही थी। रजनी ने मेरे सिर को अपने दोनों हाथों में पकड़कर नीचे दबा लिया। मैं अपनी जबान को उसकी रानी के लबों के बीच में रखकर चाट रहा था, उसके दाने पर अपनी जबान से रगड़-रगड़ कर उसको गर्मी पहुँचा रहा था।
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06-04-2019, 12:04 PM,
#6
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
5 मिनट में ही रजनी का जिश्म अकड़ने लगा और जोर-जोर के झटके खाने लगा। उसके साथ ही उसका पानी मेरे होंठों पर महसूस होने लगा। मैंने सिर उठाकर रजनी की तरफ देखा तो उसने दोनों हाथों से अपनी ही चुचियों को जोर से पकड़ रखा था, और अपनी आँखें बंद की हुई थी। मैं उठकर उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों को एक बार फ़िर चूमने लगा।
उसने आँखें खोलकर मुझे देखा और हल्के से मुश्कुराई। उसके मुश्कुराते होंठों को अपने होंठों में जकड़कर किस करने लगा। मेरे होंठों पे लगा उसके कुंवारेपन का पानी जब उसे महसूस हुआ तो उसने अपना चेहरा पीछे करके मेरे होंठों को देखा और फ़िर अजीब सी नजरों से मुझे देखने लगी, मगर उसने कुछ कहा नहीं। चन्द लम्हे मुझे देखने के बाद उसने अपनी जबान बाहर निकाली और मेरे होंठों पे लगी अपने पानी के चन्द कतरों को अपनी जबान की नोक से सॉफ करने लगी।

मेरे होंठों पे लगे पानी के कतरे उसकी जबान की नोक पर जा हो चुके थे। मैंने फौरन ही उसकी जबान को अपने होंठों में ले लिया, और उसे चूसने लगा। वो भी भरपूर तरीके से मेरे होंठों को चूस रही थी। मैं अब फ़िर चाह रहा था कि वो जल्द से जल्द गरम हो जाए ताकी मैं अपने काम को आगे बढ़ा सकूँ, और उसके लिए जरूरी था कि मैं अब फ़िर से रजनी की गर्दन पर आ जाऊूँ। मैंने उसकी गर्दन पर अपनी जबान को रगड़ना शुरू कर दिया।

वो फ़िर से मेरे नीचे मचलने लगी। उसने अपनी बाहों का घेरा मेरे ऊपर सख़्त कर दिया। मेरी कुछ देर की मेहनत से अब रजनी एक बार फ़िर पीक पॉइंट पर पहुँच चुकी थी। मैं अब रजनी की टाँगों के बीच आ गया और अपने नाग को उसकी रानी पर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। मेरे इस तरह रगड़ने से रजनी की बेचैनी बढ़ने लगी। उसने मुझे रहम तलब नजरों से देखकर, अपनी रानी को मेरे नाग पर मारने लगी।

मैंने उसकी दिली ख्वाहिश को पूरा करने का सोचा और अपने नाग को उसकी रानी के मुँह पर सेट किया। मुझे अंदाज़ा था कि यह रजनी का पहली बार है, और मैं रजनी को तकलीफ नहीं देना चाहता था, और वैसे भी मैं प्यार का कायल था।

रजनी की रानी अपने ही आँसू से भीगी हुई थी, जिसके कारण मेरे थोड़े से जोर देने से ही मेरे लण्ड का कैप अंदर दाखिल हो गया। रजनी ने एक झटका खाया और उसका मुँह थोड़ा सा खुल गया। मेरा 9…” लबाई और 3…” की मोटाई का लण्ड इस तरह आसानी से लेना रजनी के बस की बात नहीं थी। उसकी उभरी हुई गुलाबी चूत मेरे लण्ड को बर्दास्त करने की हिम्मत नहीं रखती थी। लेकिन मुझे इस बात का भी अंदाज़ा था कि रजनी की बर्दास्त की क्षमता में कोई कमी नहीं। वो लड़ाई की कला में माहिर थी, और कितनी ही बार मैंने उसे ना काबिल बर्दास्त चोटों का सामना करते हुए देखा था।

मैं इसी असमंजस में था कि रजनी ने मुझे देखकर कहा-“क्या सोच रहे हो राज?”

मैंने मुश्कुराकर उसको देखा और कहा-“तुम्हें बहुत तकलीफ होगी…”

रजनी ने मुश्कुराते हुए कहा-“मैं बर्दास्त कर लूँगी। तुम मुझे कमजोर समझते हो क्या? तुम अपना काम जारी रखो, मजा खराब हो रहा है…”

रजनी की बात सुनकर मैं उसपर झुक गया, उसके होंठ अपने होंठों में भर लिए, और उनको चूमने लगा। लिप किसिंग से मैं इस बात का भी फायदा उठना चाह रहा था कि रजनी की किसी तेज चीख को कंट्रोल कर सकूँ, ताकी रजनी की चीख कहीं रूम से बाहर ना जाए, और बाहर खड़े गार्ड तक रजनी की आवाज ना पहुँचे। दो मिनट तक मैं रजनी को किस करता रहा। जब मैंने महसूस किया कि रजनी की ध्यान मेरी लिप-किस की तरफ हो रही है तो मैंने अचानक से एक झटका मारा, जिसके कारण मेरा लण्ड 3…” तक रजनी के अंदर चला गया।

रजनी एक लम्हे के लिए तड़प गई, और उसकी घुटी-घुटी सी चीख मेरे लबों में ही दब गई। मैंने उसके होंठों से अपने होंठ हटाये तो रजनी गहरी-गहरी साँस लेने लगी।
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06-04-2019, 12:06 PM,
#7
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
मैं उसकी बेतरतीब बातें सुनकर मुश्कुरा रहा था।

यह अल्फाज मेरे लिए नये नहीं थे, जो-जो औरत मेरे नीचे आई थी वो ऐसे ही अल्फाज अदा करती थी।

रजनी-“आह्ह… ओह्ह… फक मी हार्ड… अह्ह… राज और जोर से… और जोर से… आई एम कमिंग अह्ह फक मी हार्ड…” और एक बार फ़िर रजनी का जिश्म अकड़ने लगा, और वो तीसरी बार फारिग हो चुकी थी।
मेरा दिल कर रहा था कि मैं उसकी पोजीशन चेंज करूँ, मगर मुझे पता था कि पोजीशन चेंज करने के बाद रजनी को एक बार फ़िर दर्द के माहौल से गुजरना पड़ेगा, तो मैंने सोचा कि आज उसे इसी पोजीशन में करूँगा। और मैंने अपने झटकों में तेजी कर दी। अब मैं भी करीब-करीब था। जैसे-जैसे मैं करीब होता जा रहा था मेरी वहशत बढ़ती जा रही थी। अब मुझे कुछ भी नहीं समझ में आ रहा था। मैंने रजनी की पतली कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और खींच- खींच कर अपने लण्ड पर मारने लगा।

रजनी भी मेरी वहशत देखकर घबरा गई थी। उसे मजा तो आ रहा था। मगर लाल-लाल आँखें देखकर और मेरी ऐसी वहशत देखकर वो मुझे आवाजें देने लगी-“राज… राज मुझे दर्द हो रहा है राज…”

मुझ तक उसकी कोई आवाज नहीं पहुँच रही थी। मैं रिलेक्स होते हुए अक्सर ऐसे ही वहशत अंगेज हो जाता था। मेरे मुँह से अजीब-अजीब आवाजें निकल रही थी और मैं वहशतनाक आवाज के साथ ही फारिग हो गया। मेरा लण्ड अपना पानी छोड़ दिया, मेरा गाढ़ा-गाढ़ा और गरम पानी रजनी ने अपने अंदर महसूस करके एक बार फ़िर ‘अह्ह्ह’ की आवाजों के साथ अपना पानी भी छोड़ दिया। मैं अब बेसूध सा होकर रजनी के ऊपर गिर गया और रजनी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया। और मेरे चेहरे को चूमने लगी और बड़े प्यार से मेरे सिर में उंगलियाँ फेरने लगी।

मैं धीरे धीरे रिलेक्स होने लगा। अब मैं गहरी-गहरी साँसें ले रहा था। रजनी बड़े प्यार से मुझे देख रही थी। मैं एक करवट लेकर रजनी के ऊपर से हट गया और खुद को बेड पर गिरा लिया।

रजनी ने करवट बदलकर मुझे देखा, और मुश्कुराते हुए कहा-“बड़े जालिम हो। क्या हो गया था तुम्हें आखीर में?”

मैंने मुश्कुराकर उसे देखा और कहा-“जब मैं रिलेक्स होने वाला होता हूँ तो मेरा खुद पर से कंट्रोल खतम हो जाता है। तुम्हें बहुत तकलीफ हुई…”

रजनी मुश्कुराकर मुझे देख रही थी-“नहीं बेदर्दी, तुमने तो मुझे वो दर्द दिया है जिस दर्द में सकून है, मजा है, और उस दर्द से मैं आज तक अंजान थी…” और उसने आगे बढ़कर मुझे एक बार फ़िर से चूम लिया, और फ़िर मेरी तरफ देखकर बोला-“मैंने तुम्हें बहुत तड़पाया है राज, अब मैं तुम्हें वो सकून दूँगी जो तुम्हें कभी ना मिला होगा। मैं तुमको दिल-ओ-जान से चाहने लगी हूँ, और अब तुम्हारे बगैर मेरा जीना मुश्किल होगा। मुझे खुद से दूर ना करना राज…”


मैंने भी उसे छूते हुए कहा-“रजनी, तुम मेरी जान हो। मैं तुम्हें खुद से कभी दूर नहीं करूँगा…” हम कुछ देर ऐसे ही बातें करते रहे।

फ़िर मैंने थोड़ा सा उठकर बेड के सिरहने से टेक लगा ली और और साइड पर पड़े अपने कपड़ों में से सिगरेट और लाइटर निकलकर एक सिगरेट जलाया और गहरा कश लेकर धुआँ छोड़ते हुए एक नजर कमरे में चारों तरफ घुमाई। पूरा कमरा मैदान-ए-जंग का मंज़र पेश कर रहा था। चारों तरफ लाशें बिखरी हुई थी।

मुझे इस तरह देखते हुये रजनी ने भी थोड़ा सा ऊपर उठकर अपना सिर मेरे सीने से लगाते हुए, हल्की से हँसी के साथ कहा-“मुझ जैसी औरत की सुहागरात ऐसी ही जगह होनी चाहिए थी। लाशों की सेज पर। तुमने मुझे फतेह किया है। अपनी ताकत के बल पर, जोर-ए-बाजू से। मैं आज से तुम्हारी गुलाम हूँ, राज तुम्हारी अदना कनीज…”

मैंने उसे अपने सीने से लगाते हुए कहा-“नहीं रजनी, तुम इस राज की रानी हो। मेरे दिल की मलिका हो। आई लव यू रजनी, आई लव यू…”

रजनी-“आई लव यू टू राज …” और वो मेरे सीने के साथ जोर से लग गई। देर तक तो मेरे सीने को छूती रही और फ़िर बहुत ही सकून से मेरी अगोश में समा गई। शायद वो थक कर सो चुकी थी।

मैंने उसे सोता महसूस करके बेड के सिरहने से टेक लगा दी, और अपनी आँखें बंद कर ली। मेरी आँखों के पीछे बीते वक्त की यादों की फ़िल्म चलने लगी।

मैं किंग था। अब अंडरवल्डट की दुनियाँ का किंग । एक दुनियाँ जिसके नाम से काँपती थी। अंडरवल्डट का डान, पूरे एशिया में होने वाला कोई भी क्राइम, उसके पीछे किसी ना किसी तरह मेरा ही हाथ होता था। मेरे हाथों कितने लोग मौत के घाट उतर चुके थे, मुझे उस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था। मैं एक सीधा-सादा सिंध की सोहनी धरती का रहने वाला, डान कैसे बना? वो पल आज तक मुझे ख्वाबों में तड़पाते रहते थे। आज मेरे अपनों में से कोई मेरे साथ नहीं था। मैं आज एक बेरहम कातिल था। यहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे कितनी कठिन मंज़िलो से गुजरना पड़ा था, वो एक-एक पल मुझे याद है। मैं चाहूं भी तो उसे भूल नहीं सकता। क्योंकी अब मैं हूँ ‘किंग डान’

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06-04-2019, 12:06 PM,
#8
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
सिंध की सोहनी धरती के दूसरे बड़े शहर हैदराबाद के एक बहुत बड़े प्राइवेट हॉस्पीटल में मेरी पैदाइश हुई। मैं अपने मुँह में सोने का निवाला लेकर पैदा हुआ था। मेरे वालिद अपने इलाके के बहुत बड़े ज़मींदार थे। हजारों एकड़ जमीन के मालिक। हमारा ताल्लुक सिंध के एक नामी गिरामी खानदान से था, पीरों की गढ़ी थी। मेरे वालिद भी अपने वालिदान की एक ही औलाद थे, और मैं भी उनकी एक ही एकलौती औलाद था। लेकिन अपनी माँ से (बाकी दूसरी बीवी से दो बेटियाँ थी) गाँव में हमारी बहुत बड़ी हवेली थी, मगर मेरे वालिद ने अपनी मर्जी से शहर की लड़की से शादी की थी। जिसके कारण हम लोग शहर में ही रहते थे।

दादा की मौत एक एक्सीडेंट में जवानी में ही हो गई थी। जिसके बाद मेरी दादी ने तमाम इंतज़ाम अपने हाथ में संभाला और मेरे वालिद की परवरिश की। उन्होंने मेरे वालिद को आला तालीम दिलाई। मेरे अब्बू और अम्मी की दोस्ती यूनिवर्सिटी में हो गई थी, और दोनों ने तमाम जिंदगी एक दूसरे के साथ गुजारने का इरादा कर लिया था। मगर इन तमाम मामलात में सबसे बड़ी रुकावट मेरी दादी थी, जो अपने बेटे की शादी अपने ही खानदान में अपनी बहन की बेटी से करवाना चाहती थी। जो कि अब्बू से 5 साल उमर में भी बड़ी थी।

इन तमाम मामलात पर खानदान में बहुत से सवाल उठे क्योंकी मेरी अम्मी का ताल्लुक एक गरीब खानदान से था। लेकिन बाबा ने अपनी मुहब्बत की खातिर सबसे झगड़ा किया, और एक शर्त पर बाबा को इजाजत मिली कि अम्मी से शादी के बाद वो अपने खानदान में भी शादी करेंगे और अम्मी कभी इस हवेली में कदम भी नहीं रखेंगी। इस पर भी मेरी दादी पहले तो नहीं मान रही थी। मगर अब्बू ने जब जान देने की धमकी दी तो वो मान गई। लेकिन उन्होंने मेरी अम्मी को कभी भी कबूल नहीं किया, और नहीं उन्हें कभी भी अपनी हवेली में कदम रखने दिया।

मेरे दूसरी माँ से अब्बू को दो बेटियाँ हुईं। मगर कोई हवेली का वारिस ना हो सका, और दूसरी तरफ मेरे बाद अम्मी को दो बेटे और भी हुए, लेकिन वो छोटी उमर में ही चल बसे । मैं अपने अब्बू और अम्मी का लाड़ला था। हमारी जिंदगी बहुत सकून से गुजर रही थी। मैं शहर के बहुत बड़े स्कूल में तालीम हासिल कर रहा था। जब मैं मेट्रिक में था तो एक दैवी आफत हमारे घर पर टूट पड़ी। मेरे अब्बू और अम्मी को गाड़ी में जाते हुए कुछ अपराधियों ने गोलियाँ मारकर हलाक कर दिया। कोई कहता था कि दहशत गर्दि का वाकिया है, तो कोई कहता था कि खानदानी दुश्मनी है।

लेकिन मेरी तो हँसती खेलती दुनियाँ ही उजड़ गई। मेरा तो कोई भी नहीं था। ननिहाल की तरफ से एक मामू और एक खाला थी, जो अपने-अपने घरों में मसरूफ़ थे। मेरी दादी ने मेरी माँ को मरने के बाद भी माफ ना किया, और उनके जनाजे को मामू वगैरह के हवाले कर दिया और उनकी तदफीन हैदराबाद के ही कबिस्तान में हुई। मैं मामू के साथ पहली बार अपने खानदानी गाँव बाबा की तदफीन के वक्त पर गया। जहाँ मुझे बहुत से चेहरे नजर आए जिनकी आँखों में मेरे लिए नफरत और चन्द लोगों की आँखों में मेरे लिए मुहब्बत भी थी, जिनमें सलामू सर-ए-फेहररिस्त था।

सलामू बाबा का ख़ास आदमी था, और अक्सर बाबा के साथ शहर वाले घर पर भी आता था। वो मुसलसल मेरे साथ ही लगा रहा, और चुपके-चुपके मेरे तमाम खानदान के लोगों के बारे में मुझे बताता रहता। मामू तो उसी दिन वापिस चले गये, मगर मैं वहाँ अब्बू के सोयम पर रुक गया। मैंने वहाँ पर अपने अब्बू के कितने ही कजिन्स और अपने कजिन्स को देखा, जो मुझसे बात करने को भी तैयार नहीं थे। लेकिन हवेली का नौकर और गाँव के लोग मेरा बहुत खयाल रख रहे थे। ऐसा लगता था कि मैं उनके लिए सब कुछ हूँ।

मेरे वालिद ने मेरा नाम प्यार से बादशाह अली शाह रखा लेकिन सब लोग मुझे “साइन…” के नाम से पुकारते थे, क्योंकी यह नाम मेरे मरहूम दादा का था और उनका नाम कोई नहीं पुकारता था। मुझे देखकर वहाँ के लोग दबी-दबी फुसफुसाहटों में कुछ कह रहे थे जिनमें से कुछ बातें मेरे कानों तक भी पहुँची, और यही बात मेरे वालिद भी किया करते थे कि मेरी शकल-सूरत और कद-काठी बिल्कुल अपने दादा जैसा है।

16 साल की उमर में भी मेरी हाइट 6 फीट तक हो चुकी थी और बचपन से ही मुझे स्पोर्ट में कराटे और बाडी बिल्डिंग बहुत पसंद थी कराटे तो मैं अपनी 7 साल की उमर से कर रहा था और उसमें ब्लैकबेल्ट हासिल कर चुका था। मगर बाडी बिल्डिंग स्टार्ट किए हुए मुझे अभी एक साल ही हुआ था। मगर कुछ खाते पीते घराने से ताल्लुक होने और खानदानी विरासत में मिली हुई वजाहत की वजह से मैं एक मजबूत और चौड़े जिश्म का नौजवान था। घूंघराले बाल और सब्ज़ आँखों के साथ मेरी गोरी रंगत सबको मुझे बार-बार देखने पर मजबूर कर देती है। ऊँचे लंबे कद के कारण मैं सब में अलग ही नजर आता था। सारा दिन अब्बू की ताजियत के लिए आने वालों का ताँतां बँधा रहा।

शाम के वक्त कुछ भीड़ कम हुई तो सलामू मेरे पास आया-“छोटे साइन…”

मैं उस वक्त अब्बू और अम्मी की खयालात में गुम था। उनकी छोटी-छोटी बातें मुझे याद आ रही थीं। सलामू के इस तरह बुलाने से में चौंक गया और सलामू को अपने सामने देखकर पूछा-“क्या बात है सलामू?”

सलामू ने मुझे देखते हुए कहा-“साइन, आपको बड़ी साईएन ने हवेली बुलाया है…”

अब्बू की ताजियत के लिए आने वाले लोगों के लिए जो हिस्सा मुक़र्रर किया गया था वो हवेली से थोड़ा दूर हटकर एकांत में था। हवेली यहाँ से कुछ दूर थी। मैंने हैरत से सलामू की तरफ देखकर कहा-“किसने बुलाया है?”

तो सलामू ने मेरे करीब बैठते हुए आराम से कहा-“आपकी दादी हुजूर ने बुलाया है…”

मैं सलामू की बात सुनकर थोड़ा हैरान हुआ और एक दर्द भरी मुश्कुराहट से सलामू की तरफ देखते हुए कहा-“उनको मुझसे क्या काम है और क्यों बुलाया है मुझे?”

सलामू-वो आपसे मिलना चाहती हैं।

मैं-जब वो आज तक मुझसे नहीं मिली, तो अब क्यों मिलना चाहती हैं?

सलामू-छोटे साइन वो दादी हैं आपकी, और तुम उनके एकलौते बेटे की निशानी हो और इस तमाम जागीर का वारिस भी।

मेरे लबों पर एक जहरीली मुश्कुराहट आ गई-“बड़ी जल्दी अपने पोते का खयाल आ गया उनको? 16 साल मैंने आज तक अपने बाप के इलावा अपनी ददियाल के किसी रिश्तेदार को नहीं देखा और ना ही मुझे पता है कि उनमें कौन-कौन है? और यह जागीर?”

मैं एक बार फ़िर हँस पड़ा-“मेरी जागीर तो मेरे अब्बू और अम्मी थे, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। मेरी जागीर तो लुट चुकी है। मैं किसी जागीर का वारिस नहीं। जाकर उनको कह दो कि मैं सिर्फ़ अपने बाप के सोयम तक यहाँ हूँ। उसके बाद यहाँ से चला जाउन्गा। उनका सिर्फ़ बेटा ही था। पोता कोई नहीं है…” यह सब कहते हुए मेरी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थीं, और आँसू से भर चुकी थीं, जिनको मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

सलामू-पर छोटे साइन?

मैंने सलामू की बात फौरन काटते हुए कहा-“बस जाओ। मैं और कुछ नहीं सुनना चाहता…”
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06-04-2019, 12:06 PM,
#9
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
मैं एक बार फ़िर हँस पड़ा-“मेरी जागीर तो मेरे अब्बू और अम्मी थे, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। मेरी जागीर तो लुट चुकी है। मैं किसी जागीर का वारिस नहीं। जाकर उनको कह दो कि मैं सिर्फ़ अपने बाप के सोयम तक यहाँ हूँ। उसके बाद यहाँ से चला जाउन्गा। उनका सिर्फ़ बेटा ही था। पोता कोई नहीं है…” यह सब कहते हुए मेरी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थीं, और आँसू से भर चुकी थीं, जिनको मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

सलामू-पर छोटे साइन?

मैंने सलामू की बात फौरन काटते हुए कहा-“बस जाओ। मैं और कुछ नहीं सुनना चाहता…”


सलामू मेरा लहजा और मेरे चेहरे के भाव देखकर फौरन वहाँ से उठ गया और जल्दी-जल्दी औतक से निकल गया। मैंने एक बार फ़िर अपने पीछे रखी सिरहने को कमर से लगाते हुए दीवार से अपना सिर लगा दिया। और एक बार फ़िर माँजी की यादों ने मुझ पर हल्ला बोल दिया।

और माँजी की एक याद मेरी आँखों में भर आई। जब मेरा मेट्रिक का रजल्ट आया था और मैंने अपने डिस्ट्रिक्ट में टाप किया था। तब अम्मी और बाबा कितने खुश हुए थे। यह बात उनके साथ होने वाले हादसे से एक हफ़्ता पहले की है।

बाबा मेरे सामने सोफे पर बैठे थे और मेरा रिजल्ट देखकर उनके मुँह से जो पहला जुमला निकला-“वो मारा। अब मैं दिखाऊूँगा तुम्हारी दादी को कि तुम्हारी माँ ने हवेली से दूर होते हुए भी तुम्हारी कितनी अच्छी तालीम की है। अच्छी तालीम सिर्फ़ इन बड़ी-बड़ी हवेलीयों में रहने से ही नहीं मिलती। तुम्हारी माँ गरीब परिवार से थी तो क्या हुआ? लेकिन मेरी पसंद सही थी। वो इस लायक थी कि उसी पीरों की गढ़ी के वारिस की सही तालीम कर सके…”

बाबा की बातें सुनकर अम्मी के होंठ खुशी के मारे थरथराने लगे, और जो पहला जुमला उनके लबों पर आया उसमें बड़ी हिरत भरी हुई थी-“तो क्या अब अम्मा मुझे अपनी बहू की सूरत में कबूल कर लेंगी?”

अम्मा की बात सुनकर बाबा ने मुश्कुराते हुए अम्मा की तरफ देखा, और कहा-“जमीला, कैसी बातें करती हो? बहू तो तुम उस खानदान और हवेली की हो। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। झगड़ा इस बात का है कि क्या तुम में वो सब खूबियाँ हैं जो उस खानदान की बहू में होनी चाहिए?”

बाबा की बात सुनकर मैं बीच में बोल पड़ा-“बाबा क्या जरूरत हैं इन तमाम बातों की? और यह प्रमाखणत करने की कि मेरी माँ इस काबिल है या नहीं? मुझे पता है, आपको पता है कि मेरी माँ लाखों में एक है। दादी चाहे जो भी समझती रहें…”

मेरी बात सुनकर बाबा के चेहरे पर संजीदगी आ गई, और उन्होंने कहा-“नहीं बेटा, यह बहुत जरूरी है। मैं हमेशा अम्मी साईएन के आगे सुरखरू रहा हूँ। हर फ़ैसले में जो मैंने आज तक लिए हैं। और यह तो मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था। तुम चाहते हो कि मैं अम्मा साईएन की नजरों में अपने इस फ़ैसले पर हमेशा नादान रहूँ?”

मैं बाबा की यह बात सुनकर फौरन ही बाबा के कदमों में बैठ गया और जल्दी से बोला-“नहीं बाबा, मैं आपके और अम्मी के इस फ़ैसले को कभी कमजोर नहीं होने दूँगा। मैं ऐसा कुछ करूँगा कि दादी मेरी माँ पर फख्र करेंगी और आपके इस फ़ैसले को आपकी जिंदगी का सबसे दुरुस्त फैसला मानेंगी। यह मेरा आपसे वादा है…”

मेरी बात सुनकर बाबा ने मुझे दोनों बाजुओं से पकड़कर खड़ा कर दिया और खुद भी उसके साथ ही खड़े हो गये, और मुश्कुराती हुई नजरों से मेरे चेहरे को देखते हुए कहते लगे-“मेरा शेर बेटा…”

यह सब सोचते-सोचते कब मेरी आँख लग गई, मुझे पता ही ना चला। कोई मुझे जोर-जोर से हिलाकर उठा रहा था, और आवाजें दे रहा था। मैंने हल्के से अपनी आँखें खोलकर देखा तो सामने सलामू खड़ा हुआ था। मैंने हैरतजदा आँखों से सलामू की तरफ देखा।

तो सलामू ने कहा-“छोटे साईएन। ठंड बढ़ने लगी है और रात होने वाली है…”

मैं सलामू की बात सुनकर थोड़ा सीधा होकर बैठ गया और एक नजर चारों तरफ घुमाई तो हाल कमरा तकरीबन खाली हो चुका था, और खालू जी भी अपनी गाड़ी पर नजर नहीं आ रहे थे। खालू बाबा के बाद अब इस खानदान के बड़े थे। खालू से मतलब मेरी उस दूसरी माँ के बहनोई, जो बाबा की खानदानी बीवी थी। उसके इलावा वो मेरे दादा के छोटे भाई के बड़े बेटे भी थे।

इसी दौरान सलामू ने मुझे देखते बोला-“छोटे साईन। आप अंदर हवेली में चलें और वहाँ अपने कमरे में चलकर आराम करें। फ़िर सुबह यहाँ आ जाईएगा…”

मैं हवेली का नाम सुनकर चौंक गया। और जो पहला खयाल मेरे दिल में आया कि शायद दादी मुझे इस बहाने अपने पास बुलाना चाहती हैं। मैंने सलामू को देखकर कहा-“मैं यहाँ ठीक हूँ…”

सलामू-“साईन यहाँ मुनासिब नहीं है। आप अगर अपनी दादी से नहीं मिलना चाहते तो ना मिलें वो जनानखाने की तरफ हैं। मैं आपका इंतज़ाम मर्दानखाने की तरफ करवा देता हूँ, जहाँ खानदान के दूसरे मर्द हजरत आकर रुकते हैं…”

मैं-“क्या मतलब? खानदान के मर्द जनानखाने की तरफ नहीं जाते?” मैंने हैरत से कहा।

सलामू-नहीं छोटे साईन, यह गढ़ी बड़ी है। और जनानखाने में सिर्फ़ मुहरम अफ्राद को जाने की इजाजत है। कोई भी ना मुहरम अफ्राद जनानखाने की तरफ नहीं जा सकता।

मैंने कुछ सोचा और कुछ सोचते हुए उठ गया, कि चलो इसी बहाने हवेली तो देख लूँ, जिसका इतना जिकर सुना है। सलामू मुझे उठता हुआ देखकर खुश हो गया और जल्दी-जल्दी मुझे लेकर बाहर की तरफ चल पड़ा। मैं बाहर निकला तो मैंने दरवाजे के पास अपने रखे हुए जूते को देखा मगर वो मुझे कही नजर नहीं आए।

इसी दौरान सलामू ने एक तरफ देखते हुए आवाज लगाई-“अरे खामिसा, छोरा छोटे साईन के जूते ले आओ…”

इसी दौरान एक शख्स धोती और एक पुराना सा कुर्ता जिस पर उसने बगैर बाजू वाला स्वेटर पहना हुआ था। जो जगह-जगह से फटा हुआ उसकी गरीबी की दास्तान सुना रहा था। अपने दोनों हाथों की हथेलियों पर जूते सजाये जैसे वो कोई बहुत ही मुबारक चीज हो, लाकर मेरे सामने रखे और मैं हैरत से बुत बना उसे देखता रहा। जूते नीचे रखने के बाद वो दोनों हाथों को जोड़कर घूटनों के बल मेरे सामने ही फर्श पर बैठ गया।

मैंने सलामू की तरफ देखा तो सलामू ने कहा-“साइन आपके मुरीद हैं बाबा। आप जूते पहनें और हैरान होना छोड़ दें…”

मैंने सलामू की तरफ देखते हुए थोड़ा गुस्से में कहा-“लेकिन यह तो इंसान की ताजलील है। मुझे यह सब पसंद नहीं…” और मैंने अपना पैर जूते की तरफ बढ़ा दिया, तो इसी वक्त उस खामिसो नामी शख्स ने जो मेरे जूतों के पास ही हाथ बाँधे बैठा था आगे बढ़कर जल्दी से मेरे एक पैर को थाम लिया।

मेरा पैर वैसे ही उठा का उठा रह गया। उसने जल्दी से अपने कंधे पर पड़े एक रूमाल को उतार लिया और फौरन मेरे पैर के नीचे के तलवों को सॉफ करने लगा। मैंने एक झटके से अपना पाँव पीछे कर लिया, और वो बड़ी मासूमियत और हैरत के मिले जुले भाव में मेरे चेहरे को देखने लगा। मेरे चहेरे पर गुस्से के भाव आ गये, और मैंने सलामू की तरफ देखा।

सलामू ने जल्दी से उसे देखते हुए कहा-“बाबा खामिसा तुम जाओ। छोटा साइन को यह सब पसंद नहीं है…”
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06-04-2019, 12:06 PM,
#10
RE: Chodan Kahani जवानी की तपिश
सलामू ने जल्दी से उसे देखते हुए कहा-“बाबा खामिसा तुम जाओ। छोटा साइन को यह सब पसंद नहीं है…”

खामिसा के आँखों में आँसू से आ गये और वो जल्दी से दोनों हाथ बाँधकर काँपती हुई आवाज में बोला-“साइन मुझसे कोई गलती हो गई है क्या? अगर कोई गलती हो गई है तो खाल खींच लो, पर साईन मुझे इससे मना मत करो…”

मैं उसकी हालत देखकर घबरा गया और अपना पाँव पीछे करके जमीन पर रखा और दोनों हाथों से उसे बाजू से पकड़कर खामिसा को ऊपर उठा लिया और बोला-“मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। बाकी मुझे यह सब पसंद नहीं…”

खामिसा दोनों हाथ बाँधे मेरे सामने खड़ा हुआ था और मेरे इस तरह उसको उठाने से वो थरथर काँप रहा था। उसकी आँखें पानी से भर आई थी।

इसी दौरान एक तरफ से आवाज आई-“ओये छोरा। इधर आओ। इस शेरी को क्या पता की पीरों की शान क्या होती है?”

मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो एक लगभग 5’6” कद का खूबसूरत नोजवान दो हथियारबन्दो के साथ खड़ा अपनी बड़ी और घनी मूँछो पर ताओ दे रहा है।

खामिसा अब तक मेरे सामने हाथ बाँधे खड़ा था। मगर अब उसकी हालत और पतली हो चुकी थी। वो बेचैनी का शिकार था कि क्या करे? मेरे पास खड़ा रहे या उधर चला जाए?

मैंने अजनबी नजरों से उसे देखा।

तो सलामू ने मेरे करीब आकर सरगोशी में कहा-“यह पीर जमील शाह हैं। पीर जमाल शाह के बड़े बेटे। (पीर जमाल शाह यानी के बाबा के कजिन)

उसने एक बार फ़िर खामिसा को आवाज लगाई-“छोरा सुना नहीं। इधर आ और असली पीरों की खिदमत कर, ताकी तुझे कुछ हासिल भी तो हो…”

मैंने खामिसा की तरफ देखा और हल्के से कहा-“जाओ…” मेरे बस जाओ कहने की ही देर थी खामिसा ने जमील शाह की तरफ दौड़ लगा दी।

मैंने जल्दी से अपने जूते पहने और सलामू के साथ आगे बढ़ गया। लेकिन पीछे से मुझे जमील शाह की बात करने की आवाज सुनाई दी।

“अरे छोरा वो आधा पीर है। उससे तुझे कुछ नहीं मिलना। हमारी चाकरी कर तेरी दुनियाँ भी बन जाएगी और मरने के बाद भी सुख में होगा…” इसके साथ ही कुछ कहकहों की आवाजें पीछे से सुनाई दी।

मैंने एक बार उनको मुड़कर देखा मगर मैं रुका नहीं। मैं उनकी बातों को कोई अहमियत नहीं देना चाहता था। क्योंकी मुझे ना उनसे कोई ताल्लुक रखना था, और ना ही इस पीरी मुरीदी से। मैं आगे बढ़ता रहा।

मगर सलामू ने भी शायद सब सुन लिया था। उसने बड़े धीरे से चारों तरफ देखते हुये मुझे कहा-“छोटे साईन आप इनकी बातों पर ध्यान ना दें। ऐसे बकवास करना उनकी आदत है। लेकिन यह जमील शाह है बहुत ही जालिम आदमी। सारे हरी इससे घबराते हैं। इसलिए इसको कोई इनकार नहीं करता…”
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