Desi Kahani Jaal -जाल
12-19-2017, 10:30 PM,
#21
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--21

गतान्क से आगे.

समीर उसकी गंद को चूमते हुए उसकी पीठ पे आ गया था & अब उसके पूरे नंगे जिस्म पे हाथ फिराता हुआ चूम रहा था.समीर ने उसके कंधे को पकड़ उसे पलटा & बाहो मे भर उसे चूमने लगा.मदहोश रंभा पति का पूरा साथ दे रही थी.उसकी चूत मे अब बहुत कासक हो रही थी.समीर ने उसे चूमते हुए उसकी चूत मे दाए हाथ की उंगली घुसा दी & रगड़ने लगा.कुच्छ देर बाद वो अपनी उंगली उसके दाने पे गोल-2 घुमाने लगा.रंभा कमर हिलती बेसब्री से आहे भरती उसकी पकड़ मे छट-पटा रही थी.समीर ने चूत से हाथ खींचा & अपना मुँह वाहा ले गया.उसकी मस्त जाँघो को फैला वो चूत से बह आए रस को चाटने लगा.रंभा मस्ती मे बेचैन हो कमर उचकाने लगी.उसने दाई तरफ सर घुमाया तो उसकी नज़रे समीर के पास लटकते तने लंड से टकरा गयी.काली,चमकती झांतो से घिरा लंड 6 इंच लंबा था.उसका दिल तो किया उसे हाथ मे जाकड़ मुँह मे भर ले मगर अभी ऐसा करना उसे ठीक नही लगा.उस मदहोशी के आलम मे भी उसका दिमाग़ तेज़ी से काम कर रहा था.उसने तय किया कि कुच्छ दिन बाद जब दोनो पूरी तरह 1 दूसरे से खुल जाएँगे तब वो अपने पति के लंड को जी भर के चुसेगी.अभी के लिए उसने अपने दिल पे पत्थर रख अपनी हसरत को दबा लिया.

समीर तब तक उसकी चूत चाटता रहा जब तक रंभा ने उसके सर को जाँघो के बीच भींच,चूत पे दबा,कमर उचकाती झाड़ ना गयी.समीर उसकी चूत से उठा & उसकी जाँघो को फैला उसके उपर लेट गया.उसका लंड रंभा की चूत पे दबा & उसका दिल किया कि अपने हाथो से खुद वो उसे अपनी तड़पति चूत का रास्ता दिखा दे लेकिन वो मजबूर थी.समीर भी अब चुदाई के लिए उतावला था.उसने जल्दी से 1 हाथ नीचे कर लंड को चूत मे घुसाया & उसकी कसावट से हैरत मे पड़ गया.उसे लगा की रंभा बिल्कुल कुँवारी है & उसका कुँवारापन दूर करने की ख़ुशनसीबी उसी के लंड को मिली है.इस बात से वो और जोश मे आ गया & 1 ज़ोर का धक्का दिया.रंभा धक्के की तेज़ी से कराही & समीर को लगा कि उसकी दुल्हन कुँवारी चूत मे पहली बार मर्दाने अंग के घुसने से दर्द महसूस कर रही है.

उसने रंभा के खूबसूरत चेहरे को हाथो मे भर के चूमते हुए उसे दिलासा दिया कि दर्द अभी ख़त्म हो जाएगा & रंभा उस से लिपटी मन ही मन हँसने लगी..इस से बड़े लंड वो अपनी चूत & गंद मे ले चुकी थी.उसे अब बस इस लंड से झड़ना ही था.उसने समीर की पीठ पे प्यार से हाथ फेरे & अपनी कमर उचकाई.उसका इशारा समझ समीर ने धक्के लगाने शुरू कर दिए.रंभा का सर बिस्तर के किनारे पे था & उसके बाल नीचे लटक रहे थे.उसने मस्ती मे सर को पीछे करते हुए अपनी टाँगे अपने पति की कमर पे कसी & उसकी पीठ मे नाख़ून धंसा दिए & नीचे से कमर उचकाने लगी.समीर भी उसकी कसी चूत मे लंड धंसाए ज़ोर-2 से धक्के लगा रहा था.

रंभा की चूत की कसक अब अपनी चरम पे थी.अपने पति को आगोश मे कसे वो आहे भरते हुए ज़ोर से चीखी & अपना सर बिस्तर से नीचे लटका दिया & झाड़ गयी.उस वक़्त उसकी चूत ने अपनी सिकुड़ने-फैलने की मस्तानी हरकत शुरू कर दी & समीर उस अंजाने,अनोखे एहसास से पागल हो उठा.उसके लंड पे चूत की पकड़ इतनी बढ़ गयी थी कि पूछो मत!वो रंभा के सीने से सर उपर उठाके ज़ोर से चीखा & उसका बदन झटके खाने लगा.उसका लंड अपना गाढ़ा,गर्म वीर्य अपनी दुल्हन की चूत मे छ्चोड़ रहा था.वो हानफते हुए उसकी मोटी चूचियो पे गिरा तो सुकून से भरी रंभा ने उसके सर को बाहो मे भर सीने पे और दबा दिया.ऐसे कोमल,खूबसूरत तकिये पे भला किसे नींद नही आएगी!समीर भी कुच्छ पॅलो मे वैसे ही अपनी बीवी की कसी चूचियो पे सर रखे नींद की गोद मे चला गया & उसके साथ-2 अपने आने वाली ज़िंदगी की खुशली के सपने देखती रंभा भी.

रंभा & समीर की शादी को 1 महीना बीत गया & इस महीने मे 2 & नये रिश्ते जुड़े & 2 पहले से ही जुड़े रिश्ते & मज़बूत हुए.पहला रिश्ता जुड़ा विजयंत मेहरा & उसकी सेक्रेटरी या फिर यू कहे उसकी कंपनी मे ब्रिज कोठारी की जासूस सोनम रौत का.सोनम आने अपनी सहेली से जो बात मज़ाक मे कही थी,उसपे अमल किया & 1 दिन अपने बॉस को कमीज़ के 2 बटन्स खोल,कुच्छ ज़्यादा झुकते हुए कॉफी पेश कर दी.

ह्सीन सोनम के साँवले अंगो की गोलाई देख विजयंत के अंदर उसे पाने की ललक जाग उठी & अब वो अपनी सेक्रेटरी के करीब आने की कोशिश करने लगा.सोनम तो यही चाहती ही थी & 1 दिन जब उसने देर तक काम करने के बाद थोड़ी थकान मेशसूस करते विजयंत को अपनी गर्दन सहलाते देखा तो वो उसके कंधे दबाने के बहाने उसके पीछे आ गयी & अपने कोमल हाथो से उसका दर्द दूर करने की कोशिश करने लगी.

उसके हाथो की च्छुअन ने विजयंत की वासना को जगा दिया & उसने उसका हाथ पकड़ के आगे खींचा तो वो लड़खड़ाती उसकी गोद मे गिर गयी.उसका बॉस इस तरह अचानक हमला करेगा ये सोनम ने सोचा भी नही था & उसकी निगाहें शर्म से झुक गयी.अपनी गंद के नीचे वो पल-2 कड़े होते विजयंत के लंड की हरकतें महसूस कर रही थी & उसका जिस्म भी गर्म होने लगा था.

वो थोड़ा सकूचाई,थोड़ी झिझकी लेकिन फिर उसने विजयंत के इसरार पे अपनी झिझक छ्चोड़ दी & उसकी बाहो मे समा गयी.उसके मज़बूत हाथ उसकी नंगी टाँगो से होते हुए उसकी स्कर्ट मे घुसने की कोशिश करने लगे तो उसके दिल मे मस्ती & खुशी की लहरें उठने लगी.विजयंत इस खेल का माहिर खिलाड़ी था & जब तक सोनम के कपड़े उतरे तब तक वो 1 बार झाड़ चुकी थी & बहुत मस्ती मे थी.

विजयंत के इशारे पे उसने अपने हाथो से अपने बॉस को नंगा किया & उसके तगड़े लंड को देखते ही उसपे टूट पड़ी.वो ज़मीन पे बैठ गयी & कुर्सी पे बैठे विजयंत के लंड को चूसने लगी.विजयंत उसके बँधे बालो को खोल उनमे उंगलिया फिराने लगा & मज़े मे आँखे बंद कर ली & आँखे बंद करते ही उसके ज़हन मे रंभा का हसीन चेहरा कौंध उठा & उसके दिल मे फिर से उसे पाने की हसरत जोकि अब कभी पूरी नही हो सकती थी,फिर से उठने लगी.

उसने कुच्छ गुस्से,कुच्छ बेबसी & कुच्छ जिस्म मे उठती मज़े की लहरो से आहत हो अपनी सेक्रेटरी का सर अपने लंड पे & झुका दिया.सोनम का पूरा मुँह लंड से भर गया & उसे सांस लेने मे तकलीफ़ होने लगी.उसने च्चटपटाए हुए अपना सर पीछे खींचा.विजयंत अब तक खुद पे काबू पा चुका था.

"सॉरी.तुम्हारे चूसने ने मुझे जोश से पागल कर दिया था.",सफाई से झूठ बोलते हुए उसने उसे अपने डेस्क पे बिठा दिया & अपनी कुर्सी आगे खींची & उसकी चूत पे अपनी ज़ुबान फिराने लगा.सोनम कभी पीछे अपने डेस्क को पकड़ती तो कभी अपने बॉस के बालो & कंधो को.किसी मर्द ने कभी इस तरह से उसकी चूत नही चॅटी थी,ब्रिज ने भी नही.विजयंत की ज़ुबान उसकी चूत से जैसे सारा रस पी लेना चाहती थी.सोनम को होश नही रहा की वो कितनी बार झड़ी,जब होश आया तो उसने खुद को डेस्क पे लेटे पाया.उसे पता नही था मगर झड़ने से निढाल हो वो खुद ही डेस्क पे लेट गयी थी.

चूत मे दर्द सा महसूस हुआ तो उसने आँखे खोली,विजयंत अपना मोटा,लंबा,तगड़ा लंड उसकी चूत मे घुसा रहा था.ऐसे लंड से चुदवाना तो दूर सोनम ने ऐसा लंड देखा भी नही था.उसने डेस्क के किनारे पकड़ लिए & च्चटपटाने लगी.लंड उसकी चूत को फैला रहा था,उसे दर्द हो रहा था लेकिन उसे ये लंड अपने अंदर चाहिए ही था!

विजयंत ने बहुत आराम से धीरे-2 लंड उसकी चूत मे घुसाया लेकिन पूरा नही.लंड का कुच्छ हिस्सा जान-बुझ के उसने बाहर छ्चोड़ रखा था क्यूकी उसे पता था कि पूरा लंड अंदर गया तो फिर चुदाई मे वक़्त ज़्यादा लगेगा.जब चुदाई शुरू हुई तो सोनम तो हवा मे उड़ने लगी.उसके जिस्म मे मस्ती & दिल मे खुशी इतनी भर गयी थी कि पूछो मत!

विजयंत खड़ा हो उसकी छातियो मसलता उसकी चुदाई कर रहा था लेकिन उसकी आँखो के सामने रंभा का ही चेहरा घूम रहा था.उसके धक्के तेज़ होते गये & सोनम की आहे भी & कुच्छ ही पॅलो बाद वो 1 आख़िरी बार झड़ी & अपनी चूत मे उसने अपने बॉस का गर्म वीर्य च्छूटता महसूस किया.सोनम को तो सुकून मिल गया था लेकिन विजयंत को सुकून नही था,उसके दिल मे आग भड़क रही थी जोकि केवल उसकी बहू के हुस्न की बारिश से ही शांत हो सकती थी.

ये थी शुरुआत इस रिश्ते की.इसके बाद जब भी मौका मिलता विजयंत उसे दफ़्तर मे या अपने होटेल सूयीट मे चोद देता था.

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दूसरा रिश्ता जो जुड़ा वो था ब्रिज & कामया का.जब ब्रिज ने ये सुना कि विजयंत मानपुर मे फिल्म सिटी बनाने वाला है उसके ज़हन मे भी इस धंधे मे उतरने की बात घूमने लगी थी.मन ही मन वो ये जानता था की विजयंत 1 बहुत समझदार & शातिर कारोबारी था & घाटे के सौदे मे हाथ नही डालता था.इतने दिनो से फिल्म प्रोड्यूस करने से उसे तजुर्बा हो गया था & फिल्म सिटी बनाने के बाद वो तो इस धंधे का बेताज बादशाह बन जाता!

तभी उसने सोचा कि वो भी फ़िल्मे बनाना शुरू कर दे ताकि जब मानपुर वाली ज़मीन उसके हाथो मे आए तो वाहा अपनी फिल्म सिटी बनाके वो विजयंत को 1 करारी हार दे.

फिल्म प्रोडक्षन शुरू करने से पहले उसने मंत्री से 1 बहुत ज़रूरी मुलाकात की,"नमस्कार,मंत्री जी!"

"नमस्कार कोठारी साहब.आइए बैठिए.",मंत्री के दफ़्तर मे दोनो सोफे पे बैठ गये तो ब्रिज ने पहले उनका हाल-चल पुचछा & फिर अपने साथ आए अपने 1 आदमी को सिहरा किया तो उसने 1 लिफ़ाफ़ा उसे थमाया.

"मंत्री जी,आपके इंजिनियरिंग कॉलेज के लिए 1 छ्होटी सी भेंट है.",मंत्री जी के होंठो पे चेक पे लिखी रकम लालच पूरा होने की खुशी से पैदा हुई मुस्कान चमक उठी.मंत्री जानता था का ये सब मानपुर का टेंडर पाने के लिए दिया जा रहा था पर उसे क्या तकलीफ़ होनी थी इस बात से!उसका तो फ़ायदा ही फ़ायदा था.ब्रिज ने बड़ी सफाई से मंत्री जी के इलाक़े,उनके कॉलेज से बात मानपुर की ओर घुमा दी,"..अब मंत्री जी,हमसे बेहतर काम कौन कर सकता है वाहा!..& फिर आप तो जानते ही हैं की आपके साथ मिलके काम करने को मैं कितना उतावला रहता हू."

"हां,कोठारी साहब..लेकिन अब सरकारी काम मे दखल तो मैं दूँगा नही..& पहले सरकार को टेंडर निकालने तो दीजिए..फिर रकमे भरी जाएँगी..उसके बाद..-"

"-..मंत्री जी,हम तो बस आपको जानते हैं..चलिए..अब चलता हू..अपनी बात तो मैने कह दी..आगे आप मालिक हैं.",ब्रिज ने उठके हाथ जोड़ दिए तो मंत्री भी उठ खड़ा हुआ & उसे कॅबिन के दरवाज़े तक छ्चोड़ने आया,उसके साथ आया आदमी बाहर निकला & मंत्री का पीए भी तो ब्रिज रुका & घूम के फिर से मंत्री से मुखातिब हुआ,"..मैने सुना है कि आप अपने कॉलेज के साथ 1 एमबीए का कॉलेज भी खोलना चाहते हैं..मंत्री जी..आगे बढ़ें & खोल दें..हम तो हैं ही आपकी सेवा मे खड़े हुए..अच्छा.नमस्कार!"

"सर,मेहरा & कोठारी..",मंत्री का पा ब्रिज को उसकी गाड़ी तक छ्चोड़ने के बाद वापस अपने बॉस के पास आ गया था,"..दोनो लगे हैं इस टेंडर के पीछे.वैसे 1 बात पुछु?",उसने अपनी जेब से पान निकाल उन्हे पान पेश किया.

"हूँ.",मंत्री जी ने उसके हाथो से गिलोरी ले मुँह मे डाली.

"आप किसपे मेहेरबान होंगे?",पीए च्छिच्चोरे ढंग से वैसी ह्नसी हंसा जैसे सिर्फ़ चम्चे हंस सकते हैं.

"अरे भाई..",मंत्री जी ने पान के रस का स्वाद लिया,"..जो ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाएगा,प्रसाद तो उसी को देंगे ना!अब देखो कौन ज़्यादा दिलदार है!",& कॅबिन मे ठहाके गूँज उठे.

ब्रिज ने इसके बाद कुच्छ तजुर्बेकार लोगो को अपने साथ मिला के अपनी फिल्म कंपनी खोल ली & 1 बहुत माशूर डाइरेक्टर को साइन कर लिया.इस डाइरेक्टर की पिच्छली फिल्म को ना केवल जानकरो की वाह-वाही मिली थी बल्कि बॉक्स-ऑफीस पे भी इसने खूब धमाल मचाया था.इस वक़्त उसके पास 1 बहुत ज़ोरदार कहानी थी & 1 बहुत बड़ा सूपरस्टार उसके साथ अपनी आधी फीस पे काम करने को तैय्यार था.डाइरेक्टर हेरोयिन के लिए कामया को चाहता था & इसी सिलसिले मे ब्रिज & कामया की पहली मुलाकात हुई.कामया का दिल तो किया की फ़ौरन फिल्म साइन कर ले लेकिन उसे पता था कि उसके गॉडफादर & उसके आशिक़ विजयंत को उसका ब्रिज के साथ काम करना बिल्कुल पसन्द नही आएगा मगर यू इस तरह वो ऐसी बड़ी & शर्तिया हिट फिल्म को ठुकरा भी नही सकती थी.

"कोठारी साहब.."

"ब्रिज सिर्फ़ ब्रिज."

"ओके..ब्रिज..",वो शरमाते हुए हँसी.कामया तो मर्दो की फ़ितरत पे कितना लिख सकती थी & उसे उनकी ऐसी हर्कतो से कोई फ़र्क भी नही पड़ता था,उसे बस अपने फ़ायडे से मतलब था,"..मुझे बस 2 दिन का वक़्त दीजिए.अभी जो फिल्म मैं कर रही हू,उसमने थोड़ा वक़्त भी लग सकता है..बस मैं ये देख लू क़ी कितना वक़्त & लगेगा फिर मैं आपकी फिल्म साइन कर लूँगी."

"लगता है आप झिझक रही हैं,कामया जी?",ब्रिज मुस्कुराया.

"नही ब्रिज बिल्कुल नही & ये क्या मुझे मना किया & खुद मुझे कामया जी कह रहे हैं!",कामया ने इतराते हुए कहा.

"ओके..कामया तो फिर फ़ौरन साइन करने मे क्या परेशानी है तुम्हे?",ब्रिज के होटेल मे ये मीटिंग हो रही थी.दोनो बार के सामने स्टूल्स पे बैठे थे .बार खुलने का वक़्त अभी हुआ नही था & इसलिए उन दोनो के अलावा वाहा बस उनकी ड्रिंक्स बनाता 1 बारटेंडर ही था.ब्रिज ने बारटेंडर से लेके 1 मोकक्थाइल का ग्लास कामया को थमाया & खुद स्कॉच का 1 पेग उठाया,"तो योउ.",उसने उसके नाम का जाम उठाया.

"मैने जो कहा बस वही परेशानी है,ब्रिज मेरा भरोसा करो."

"ओके..मैं 2 दिन नही 4 दिन इंतेज़ार करूँगा मगर मुझे तुम्हारी हां सुननी है."

"ओके..बाबा!",कामया हँसी & बार पे रखे उसके हाथ पे अपना हाथ रख 1 घूँट भरा & पीते हुए ग्लास के उपर से 1 शोख निगाह ब्रिज पे डाली.ब्रिज ने भी उस से नज़र मिलाई & अपनी कोट की जेब मे हाथ डाला.

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:30 PM,
#22
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जाल पार्ट--22

गतान्क से आगे.

"ये हमारी दोस्ती के नाम.",उसने हीरो का ब्रेस्लेट निकाल के उसकी बाई,गोरी कलाई पे बाँध दिया.

"वाउ!..कितना खूबसूरत है..!",कामया की आँखो मे 1 पल को लालच की चमक आ गयी थी,"..लेकिन ये बहुत कीमती होगा..मैं कैसे ले सकती हू..प्लीज़ ब्रिज इसे वापस ले लो!",उसने उतारने का नाटक किया तो ब्रिज ने उसका हाथ थाम लिया.

"प्लीज़..कामया इसे मत ठुकराव..मेरे लिए रख लो.",ब्रिज ने उसके हाथो पे पकड़ मज़बूत कर दी तो उसने ऐसी सूरत बनाई कि ना चाहते हुए भी वो उस तोहफे को कबूल रही है.

अगली मुलाकात मे कामया ने उसकी फिल्म साइन कर ली & उस खुशी मे ब्रिज ने उसे 1 हीरो का हार दिया.कामया ने उसे ये हार खुद पहनाने को कहा& उसकी ओर पीठ कर अपने खुले बाल बाए कंधे के उपर से आगे कर लिए.उसकी ड्रेस का बॅक बहुत गहरा था बल्कि उसकी कमर तक उसकी पीठ नंगी ही थी.ब्रिज उसके संगमरमरी बदन को देख जोश से भर उठा.कामया ने भी उसके दिए ब्रेस्लेट से अंदाज़ा लगा लिया था कि ब्रिज के साथ काम करने मे उसे बहुत फ़ायदा था & आज वो पूरी तैइय्यारी के साथ आई थी.

ब्रिज ने उसके गले मे हार पहनाया & उसकी पीठ पे हाथ फिराने लगा.

"इरादे ठीक नही लगते तुम्हारे!",कामया मुस्कुराइ लेकिन उस से दूर नही हुई.

"तुम्हे देख के इरादे अपनेआप बुरे हो जाते हैं.",ब्रिज की गर्म साँसे उसके दाए कंधे पे पड़ी तो वो हंस दी & सर पीछे झटका.ऐसा करने से उसकी लंबी गर्दन जिसमे ब्रिज का दिया हार चमक रहा था ब्रिज की निगाहो के सामने आई & ब्रिज उसे चूमने से खुद को रोक नही पाया.कामया उस से दूर छितकी,उसकी आँखो मे उसे दूर रहने का हुक्म था मगर साथ ही पास बुलाने की सोची भी थी.ब्रिज ऐसे खेलो का पुराना खिलाड़ी था.वो आगे बढ़ा & उसने इस बार सीधा कामया को बाहो मे भर लिया.वो कसमसाई & बस उसे मना करने के नाटक करती रही लेकिन थोड़ी ही देर बाद वो ब्रिज के साथ उसकी बाहो मे बिल्कुल नंगी बिस्तर पे पड़ी थी & खुद उसके मुँह मे अपनी ज़ुबान घुसा के उसकी किस का जवाब दे रही थी.उस शाम के ख़त्म होने तक कामया 1 कीमती हार,1 बड़ी फिल्म & 1 नये आशिक़ को हासिल कर चुकी थी.

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वो दो रिश्ते जो मज़बूत हुए उनमे पहला था सोनिया मेहरा & विजयंत का.सोनिया अब इस सच्चाई को मान चुकी थी कि वो ब्रिज & विजयंत,दोनो के बिना नही रह सकती थी & अगर उसे कभी भी इन दोनो मर्दो मे से किसी 1 को चुनने को कहा जाय तो वो ऐसा करने से मर जाना ज़्यादा पसंद करेगी.डेवाले मे दोनो को बहुत संभाल के मिलना पड़ता था.सोनिया विजयंत के किसी होटेल मे तो जा सकती नही थी इसलिए दोनो फोन पे बात करके पहले किसी पब्लिक प्लेस,जैसे कि माल या रेस्टोरेंट मे मिलना तय करे & वाहा से विजयंत उसे किसी जगह ले जाता जहा सोनिया उसके जिस्म को खुद मे उतारने लगती.

समीर के अपने परिवार से अलग होने के 2 दिन बाद ही ब्रिज मंत्री से मिलने गया था & उसकी गैरमौजूदगी का फ़ायदा उठाने के लिए सोनिया ने अपने आशिक़ को फोन किया & शहर के ट्रेंड्ज़ माल मे मिलना तय किया.सोनिया अपने ड्राइवर के साथ माल पहुँची & उसे कार पार्किंग मे ये कहते हुए इंतेज़ार करने को बोला कि उसे 2-3 घंटे लग सकते हैं शॉपिंग मे.उसके बाद वो माल मे घुसी & उसके दूसरे दरवाज़े से माल के पीछे की तरफ की एग्ज़िट से बाहर निकली जहा 1 मर्सिडीस उसका इंतेज़ार कर रही थी.वो सीधा उस कार की आगे की सीट पे बैठ गयी & अंदर बैठे विजयंत ने उसे बाहो मे भर के चूम लिया.पूरे रास्ते वो उस से चिपकी बैठी रही & उसकी शर्ट के अंदर अपने बेसब्र हाथ फिराती रही.

सोनिया ने घुटनो तक की स्कर्ट & आधे बाज़ू का गहरा नीला टॉप पहना था.जब भी कार रोकनी पड़ती विजयंत उसके कपड़ो मे हाथ डाल उसके नाज़ुक अंगो को छेड़ देता.ऐसा करने से मंज़िल तक पहुचते-2 सोनिया की स्कर्ट उसकी कमर तक उठ गयी थी & उसका टॉप तो पूरा उठा चुका था & उसका ब्रा भी & उसकी दोनो छातियाँ नंगी हो चुकी थी.गौर से देखने पे विजयंत की ज़ुबान का रस उसके कड़े निपल्स पे देखा जा सकता था.विजयंत कार 1 ऐसी इमारत मे ले गया जोकि उसी की कंपनी की थी लेकिन फिलहाल किन्ही कारण से बिल्कुल खाली पड़ी थी.दरबान ने उसकी गाड़ी देख सलाम ठोंका,उस बेचारे को क्या पता था कि काले शीशो के पीछे बैठे उसके मालिक ने उसे देखा भी नही था क्यूकी उसका ध्यान तो कार घुसते हुए अपनी महबूबा के नर्म होंठो पे था.

विजयंत कार को सीधा बिल्डिंग के दरवाज़े तक ले गया & नीचे उतरा.दरबान ने गेट बंद कर दिया था & अपने कॅबिन मे बैठ गया था.विजयंत ने सोनिया का दरवाज़ा खोला तो वो अपने कपड़े ठीक करती उतरी.विजयंत ने उसके कंधो को दाई बाँह मे घेरा & बिल्डिंग के अंदर दाखिल हो गया.उसने लिफ्ट का बटन दबाया & दरवाज़ा खुलते ही सोनिया को अंदर खींचा.सोनिया भी तेज़ी से उसकी बाहो मे आई & उचक के उसे चूमने लगी.विजयंत के हाथ उसकी जाँघो से आ लगे & वो उच्छल के उसकी गोद मे चढ़ गयी.विजयंत उसे लिफ्ट की दीवार से सटा के चूमते हुए उसकी पॅंटी के उपर से अपने लंड को दबाने लगा.सोनिया मस्ती मे आहे भरने लगी.उसे इस तरह से पकड़े जाने का ख़तरा उठा के चुदाई करने मे आने वाला रोमांच उसे बहुत भाने लगा था.

"तुम बहुत परेशान रहे ना इधर डार्लिंग?..उउम्म्म्म..!",उसकी गर्दन थामे उसकी गोद मे चढ़ि वो लिफ्ट से बाहर आई & विजयंत उसे 1 कमरे मे ले गया जहा 1 छ्होटा सा बेड लगा था & कुच्छ नही.वो उसे लिए-दिए उस बेड पे लेट गया & उसकी छातियाँ उसके टॉप के उपर से दबाते हुए छूता रहा.

"हां,परेशान तो था.",उसने उसकी पॅंटी को खींचा.सोनिया की चूत बहुत गीली थी & उसने टाँगे फैला दी थी.

"मेरा दिल कर रहा था कि उड़ के तुम्हारे पास आ जाऊं & तुम्हे बाहो मे भर लू..",सोनिया उठ बैठी थी,उसके चेहरे पे बस मस्ती & अपने आशिक़ के लिए प्यार था,"..& तुम्हारी सारी परेशानी दूर कर दू!",उसने विजयंत की कमीज़ उतार दी & उसके बालो भरे सीने को शिद्दत से चूमने लगी.विजयंत ने उसका टॉप उसके सर के उपर से निकाला तो सोनिया ने खुद हाथ पीछे ले जाके अपने काले ब्रा को उतार अपनी चूचियो को आज़ाद कर दिया.विजयंत ने उसकी चूचियो को हाथ मे भर के उसे फिर से लिटा दिया & फिर उसकी चूचियाँ चूसने लगा.सोनिया उसके बालो से खेलती आहें भरने लगी,"..विजयंत..तुम माने क्यू नही समीर की शादी के लिए?..सोचो,कितना प्यार करता है वो उस लड़की से कि सब कुच्छ छ्चोड़ दिया..उउन्न्ह..!",विजयंत उसकी स्कर्ट उठा के उसकी गीली चूत को चाट रहा था.

सोनिया की बात से उसे रंभा की याद आ गयी & उसे फिर से वही बेबसी महसूस हुई.वो अपनी हर ख्वाहिश पूरी करने का आदि था & इसीलिए रंभा के च्चीं जाने से वो बहुत बौखला गया था.उसकी सारी बौखलाहट इस वक़्त उसकी ज़ुबान के ज़रिए सोनिया की चूत पे निकल रही थी.सोनिया का तो मस्ती से बुरा हाल था.वो खुद ही अपनी चूचियाँ दबाते हुए अपनी कमर उचका रही थी.

"बात बहुत रोमानी लगती है ना..!",उसने अपनी पतलून उतारी तो सोनिया उठी & वो अंडरवेर पैरो से निकाल ही रहा था कि उसने उसका लंड मुँह मे भर लिया,"..मगर क्या केवल इश्क़ से ज़िंदगी चलती है,सोनिया?",उसने उसके बालो मे हाथ फेरा.

"तो और क्या चाहिए जीने को विजयंत?",सोनिया ने लंड को मुँह से निकाला & अपने दोनो गाल उसपे रगडे & उपर देखा.उसकी आँखो मे बस प्यार & मस्ती भरी थी.

"वो बच्चा है सोनिया!..वो लड़की उस से सच मे प्यार करती भी है या नही..पता नही..देखना,1 दिन धोखा देगी उसे..!",विजयंत बे सोनिया के बाल पकड़ अपनी बौखलाहट च्छूपाते हुए अपनी कमर हिला उसके मुँह को चोदा.

"देखो जान..",सोनिया ने उसके हाथ अपने सर से हटाते हुए उसे धकेल के बिस्तर पे गिराया & अपनी स्कर्ट उठाए हुए उसके लंड पे बैठ गयी,"..उउम्म्म्मम..उउफफफफ्फ़..!",उसके होंठो पे खुशी से भरी मुस्कान खेल रही थी & आँखे मस्ती मे बंद थी,"..उसने कमर हिलाके चुदाई शुरू की & कुच्छ देर तक विजयंत के सीने पे हाथ जमाए बस उसके लंड का लुत्फ़ उठाती रही,फिर उसने बात आगे बढ़ाई,"..पहले तो तुम्हे ऐसे नही बोलना चाहिए..ऊउउईईईईईई..!",विजयंत उसकी गंद की फांको को अपने मज़बूत हाथो से मसल रहा था,"..वो तुम्हारा बेटा है आख़िर!..& मान लो तुम उस लड़की के बारे मे सही भी हो..उउन्न्ञणणन्..",विजयंत ने उसकी कमर थाम उसे नीचे अपने उपर गिरा लिया था & अब कमर को जाकड़ नीचे से कमर उचका के उसकी चुदाई कर रहा था,"..ओह..तो भी डार्लिंग..समीर को खुद ग़लती कर उनसे सबक लेने का हक़ है...आननह..हाआंन्‍ननणणन्....क्या तुमने हमेशा सही फ़ैसले ही लिया हैं..कभी कोई ग़लती ही नही की..?..उन्हे वापस बुला लो & और किसी का नही तो कम से कम रीता का सोचो..वो माँ है..ऊव्ववववववववववव.......!",वो झाड़ गयी थी & उसके झाड़ते ही विजयंत ने उसे पलट के अपने नीचे कर लिया था & उसकी टाँगे कंधे पे चढ़ा ली थी.

इस पोज़िशन मे सोनिया की गंद हवा मे उठ गयी थी & लंड बिल्कुल उसकी कोख पे चोट कर रहा था.वो मस्ती मे चीखे जा रही थी.विजयंत ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया था..समीर को माफ़ करने के मतलब था उसकी वापसी & उसकी वापसी का मतलब था..रंभा का समीर के बंगल मे रहना & हर वक़्त उसकी आँखो के सामने रहना.रोज़ उसे सामने देख तड़पना क्या वो बर्दाश्त कर सकता था..नही..!,"..ओईईईईईईईईईईई..विजयंत..डार्लिंग....है...हाआआअ..चोदो मुझे जान...ऊव्वववववववव..!",सोनिया मदहोशी मे चीख रही थी..नही..रंभा की नज़दीकी & उसकी बेबसी 1 ऐसा संगम थे जो उसे बर्बाद कर देते..नही..समीर वही ठीक था पंचमहल मे..उसकी नज़ोर से दूर..अब वो तभी लौटेगा जब उसकी ये ना पूरी होने वाली हसरत अपनेआप उसके दिल मे मर जाए,"..हाईईईईईईई..वीज़ा......यॅंट.....!",सोनिया उसकी बाहो मे नाख़ून धंसाए,सर पीछे फेंक,आँखे बंद किए कमर उचकाती झाड़ रही थी & रंभा का खूबसूरत चेहरा आँखो के सामने नाचते ही विजयंत के लंड से भी वीर्य छूट गया था & सोनिया की चूत मे भरने लगा था.

30 मिनिट्स बाद सोनिया अपने प्रेमी से विदा ले माल के पीछे की तरफ के दरवाज़े से अंदर दाखिल हुई & चंद समान खरीदे & वापस पार्किंग मे आ अपनी कार मे बैठ वापस अपने घर चली गयी.

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"हां..अच्छा..ठीक है..हां..तुम बस मुझे ऐसे ही वीक्ली रिपोर्ट्स देती रहो...अरे..क्या कर रही हो!",समीर बिस्तर पे लेटी रंभा की चूत मे लंड डाले उसकी चुदाई कर रहा था जब उसका मोबाइल बजा था & उसने उसे उठाया था.बात पूरी होते ही रंभा ने उसके हाथ से मोबाइल ले बिस्तर पे दूसरी तरफ फेंका & उसे अपने उपर खींच उसकी कमर पे टाँगे लपेट दी थी.

"1 तो सुबह-2 जगा देते हो..आहह..",समीर ने फिर से चुदाई शुरू कर दी थी.रंभा ने उसके बालो मे हाथ फिराते हुए दीवार घड़ी की ओर इशारा किया जिसमे 6 बज रहे थे,"..फिर आग लगा देते हो & जब बेचैन हो जाती हूँ..आननह..",वो उसकी चूचियाँ चूस रहा था,"..तो पता नही किस कामिनी के फोन के लिए मुझसे बेरूख़् हो जाते हो..हाईईईईईई..!",समीर हंसा & अपनी बीवी की ज़ुबान से ज़ुबान लड़ाने लगा.

"अरे जान,वीक्ली रिपोर्ट दे रही थी & फिर अभी मैं निकल जाउन्गा फिर कैसे ले पाता रिपोर्ट.",उसने उसकी भारी-भरकम चूचिया हाथो मे भर मसल दी,"..पता तो है कि अभी इस बिज़्नेस की नब्ज़ पकड़ी ही है तो हर बात का ख़याल रखना पड़ता है."

"हूँ..",रंभा अब कमर हिलाए जा रही थी & सर बिस्तर से उठा अपने पति को शिद्दत से चूम रही थी,"..समीर डार्लिंग..आज 1 महीना हो गया हमारी शादी को..आज तो रुक जाते..उउन्न्ञन्..!",समीर ने फिर से उसके गुलाबी होंठो का रस पीना चालू कर दिया था.

"मेरा भी दिल करता है जान कि तुमसे कभी दूर ना जाऊं..बस यू ही तुम्हारी नाज़ुक बाहो मे तुम्हारे हुस्न को पीता रहू..",उसने उसके गाल को चूमा,"..पर क्या करू जान ये काम भी तो ज़रूरी है..जब वापस आऊंगा तो जम के सेलेब्रेट करेंगे.अभी तक अपनी बीवी को हनिमून पे भी नही ले गया हू..आऊंगा तो बाहर चलेंगे."

"सच?कहा?..आननह..समीर...हाईईईईई.......नाआअहह.....!",रंभा झाड़ गयी & उसके साथ-2 समीर भी.

"वो तुम सोच के रखो..",समीर हाँफ रहा था,"..जब लौटूँगा तो जहा कहोगी वही चलेंगे."

"ओह!समीर..आइ लव यू,जान!",रंभा ने पति को चूम लिया.

"आइ लव यू टू,डार्लिंग!",समीर उसके उपर से उठा,"..अब जाने की तैय्यरी करू.",वो बाथरूम मे नहाने चला गे & रंभा बिस्तर पे नंगी लेटी उसे देखती रही..समीर जैसा पति किस्मतवलीयो को मिलता है..ये उसे यकीन हो गया था..वो हर वक़्त उसके आराम की फिल्र करता रहता था.इस घर मे भी किसी चीज़ की कमी नही होने दी थी उसने.बिज़्नेस को पूरी तरह से संभालने मे उसे काफ़ी मेहनत करनी पड़ रही थी लेकिन उसने इसके चलते 1 बार भी रंभा की अनदेखी नही की थी.रंभा भी उसकी इस बात की शुक्रगुज़ार थी & यू तो समीर ने हर काम के लिए नौकर रख छ्चोड़े थे लेकिन उसका हर काम वो खुद अपने हाथो से करती थी.वो बिस्तर से उठी & अलमारी से उसके कपड़े निकालने लगी.बहुत खुश थी वो मगर कुच्छ कमी भी थी-वो कमी थी बिस्तर मे.मसरूफ़ियत या थकान के बहाने से समीर ने कभी उसकी चुदाई ना की हो ऐसा कभी नही हुआ था.चुदाई मे वो उसके झड़ने,उसकी खुशी का पूरा ख़याल करता था लेकिन 1 तो वो उतनी चुदाई करता नही था जितनी रंभा चाहती थी.

वो 1 बार चोद के शांत हो जाता था जबकि रंभा चाहती थी कि वो उसे थोड़ी देर और प्यार करे & कम से कम 2 बार तो ज़रूर ही चोदे.उसने अभी तक समीर से इस बात का ज़िक्र नही किया था लेकिन उसने सोच लिया था कि अब जब वो हनिमून पे जाएँगे तो वो उसे बिस्तर से निकलने ही नाहिदे गी!..इस ख़याल से मुस्कुराते हुए उसने समीर का सूट निकाल बिस्तर पे रखा लेकिन क्या यही 1 परेशानी थी..नही..सबसे बड़ी कमी जो थी वो ये की समीर उसे अपना लंड छुने ही नही देता था.उसका दिल तड़प जाता था उसके लंड को हिलाने,उसे चूमने,उसे चूस-2 के उसका रस निकाल के पी लेने को लेकिन समीर तो लंड पे उंगली तक नही रखने देता था..वो उसकी चूत भी उतनी नही चाटता था जितना वो चाहती थी.चूत का ना चाटना उसे समझ मे आता था लेकिन लंड को ना पकड़ने देना..ये उसकी समझ मे नही आया था.जहा तक उसे पता था,मर्द तो मरते थे ऐसी औरत पे जो खुद अपनी मर्ज़ी से लंड से खेले.खैर जो हो..ये सारे मसले अपने हनिमून पे वो सुलझा के ही मानेगी.वो मुस्कुराइ & गाउन पहन समीर के नाश्ते की तैय्यरी करने रसोई मे चली गयी.

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:31 PM,
#23
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--23

गतान्क से आगे.

समीर के दादा का शुरू किया अग्री-बिज़्नेस ट्रस्ट ग्रूप के मुक़ाबले था तो बहुत छ्होटा लेकिन उसमे मुनाफ़ा बहुत होता था.पंचमहल से लेके आवंतिपुर & फिर आवंतिपुर जिन पहड़ियो के नीचे बसा था उन पहड़ियो के उपर बसे क्लेवर्त तक 5 बहुत बड़े फार्म्स थे.जब समीर के दादा ने ये बिज़्नेस शुरू किया था उस वक़्त तो वो बस किसानो से उनकी उपज खरीद आगे मंडी मे बेच देते थे लेकिन धीरे-2 पहले उन्होने ज़मीने खरीदी फिर उन ज़मीनो पे फार्म्स बनाए & फिर उनकी पैदावार को मंडी मे बेचने लगे.

विजयंत मेहरा को इस धंधे मे बहुत दिलचस्पी नही थी लेकिन उसने कभी इस धंधे से बेरूख़ी भी नही दिखाई.उसने 1 आदमी को इस बिज़्नेस का सीओ बनाके छ्चोड़ा हुआ था जो उसे हर महीने रिपोर्ट & हर 4 महीने पे हुए मुनाफ़े की रकम की जानकारी देता था.विजयंत के कहे मुताबिक Cएओ ने अपनी उपज अब मंडी से ज़्यादा सीधा बड़े-2 होटेल्स को बेचना शुरू कर दिया था.साथ-2 अब 3 फार्म्स पे सब्ज़ियो & फलो के अलावा मुर्गिया भी पाली जाने लगी थी & इसके साथ अण्दो & चिकन का धंधा भी शुरू हो गया था.

समीर ने पंचमहल आते ही सभी फार्म्स का दौरा किया था & अपने सभी बड़े क्लाइंट्स से मिल लिया था.उसे 1 फार्म का मॅनेजर ठीक नही लगा तो उसने उसे बदल दिया था,नही तो बिज़्नेस ठीक चल रहा था.समीर ने फ़ैसला किया था कि वो हर महीने 1 बार सारे फार्म्स का दौरा ज़रूर करेगा.दरअसल,उसका इरादा फार्म्स की तादाद बढ़ा बिज़्नेस को फैलाने का था & इस लिए वो पहले ये समझना चाहता था कि कौन सी सब्ज़ी या फल ज़्यादा मुनाफ़ा देगा & नये फार्म्स के लिए कौन सी जगह ठीक रहेगी.

आज सुबह भी समीर इसी काम के लिए निकला था.वो सवेरे 9 बजे घर से निकला & उसका इरादा था कि देर शाम 8 बजे तक वो क्लेवर्त वाले फार्म पे पहुँच जाए.रात वाहा बिता के सवेरे उसे वाहा से वापस लौट आना था.

रंभा भी साथ जाना चाहती थी मगर समीर ने उसे ये कह के मना कर दिया कि वो तो हर फार्म पे काम करेगा,वो बोर होती रहेगी.रंभा पंचमहल से 50 किमी दूरी पे बने सबसे नज़दीकी फार्म पे 1 बार पति के साथ गयी थी & वो जगह उसे बहुत अच्छी लगी थी.ताज़ी हवा & हरियाली ने उसका मन मोह लिया था.हर फार्म पे 1 गेस्ट कॉटेज हुआ करती थी.समीर के साथ उसने 1 दोपहर वाहा गुज़ारी थी & ठंडी हवा के झोंको के साथ चिड़ियो की चाहचाहट के बीच पति के साथ चुदाई करने मे उसे 1 अलग ही मज़ा आया था.

उस दोपहर को याद करते ही उसकी चूत गीली हो गयी.वैसे भी आज की रात उसे सूना बिस्तर कुच्छ ज़्यादा ही खल रहा था.उसने करवट ले 1 तकिये पे अपना नंगा जिस्म दबाया & पति को याद कर अपनी चूचियाँ उसपे दबाने लगी.सवेरे सोची बात उसने दिल मे पक्की कर ली की इस बार छुट्टी पे वो समीर से बिस्तर मे जिन बातो से वो झिझकता था,उनका कारण निकलवा के रहेगी अगर वो उसके बाद उसकी हसरातो को पूरा करने को तैय्यार था तो ठीक था वरना वो कोई आशिक़ ढूंड लेगी जो उसे अपने लंड से खेलने दे & उसकी चूत को जी भर के चाते.

ऐसा नही था कि वो समीर के साथ अपनी शादी की उसे परवाह नही थी बल्कि उसे तो इस बात की फ़िक्र थी कि उसकी शादी पे किसी भी तरह की कोई आँच ना पड़े लेकिन हसरातो को कुचल खास कर के जिस्मानी हसरातो को,जीना उसे मंज़ूर नही था.चुदाई उसकी ज़रूरत ही नही उसका शौक भी थी & उसमे उसे पूरी बेबाकी पसंद थी,किसी भी तरह की झिझक उसे बर्दाश्त नही थी.अपनी शादी को वो 1 ही सूरत मे ख़त्म कर सकती थी & वो ये थी कि उसे समीर से भी ज़्यादा अमीर,चाहनेवाला & जोशीला मर्द मिल जाए.

उसकी उंगलिया उसकी चूत को समझा रही थी की आज रात उसे उनसे ही काम चलाना पड़ेगा क्यूकी आज कोई लंड उसकी प्यास बुझाने को मौजूद नही था.अपने ख़यालो मे गुम जिस्म से खेलते कब उसे नींद आ गयी उसे पता ही ना चला.

रात 1 बजे उसकी नींद टूटी तो वो उठ बैठी.समीर ने सोने से पहले ज़रूर उसे फोन किया होगा,उसने अपना मोबाइल उठाके देखा मगर कोई मिस्ड कॉल नही थी.उसे ताज्जुब हुआ कि ऐसा कैसे हो गया.समीर तो उसे पल-2 की खबर देता था.वो दफ़्तर जाता तो पहुँचते ही फोन करता.उसे लौटने मे बहुत देर होती थी लेकिन फिर भी लंच मे & शाम को अपना निकलने का वक़्त बताने के लिए फोन करना वो नही भूलता था.

आज भी वो हर फार्म पे पहुँच के उसे फोन करता रहा था & जहा नेटवर्क नही मिलता था तो नेटवर्क मिलते ही फोन किया था.क्लेवर्त पहुँचने के पहले उसका फोन आया था लेकिन रात को सोने के पहले उसने फोन नही किये था..बिना ड्राइवर के चला गया है..थक गया होगा..कहा था कि ड्राइवर के साथ जाओ..लेकिन नही..ड्राइव करने मे मज़ा जो आता है!..उसने साइड-टेबल पे रखी बॉटल उठाके पानी पिया.उसका दिल किया कि 1 बार समीर को फोन लगाए लेकिन फिर उसकी नींद खराब होने के डर से उसने ऐसा किया नही & सवेरे फोन करने का फ़ैसला कर सो गयी.

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रंभा अब केवल परेशान नही थी बल्कि बहुत घबरा भी रही थी.सवेरे 7 बजे से वो समीर का फोन ट्राइ कर रही थी लेकिन फोन मिल नही रहा था.समीर ने भी कोई फोन नही किया था.उसने उसके ऑफीस मे फोन कर बात बताई तो वो लोग भी हर फार्म पे फोन से पुच्छ रहे थे लेकिन समीर कही नही था.क्लेवर्त फार्म के मॅनेजर ने कहा कि समीर ने उसके साथ ही रात का खाना खाया था लेकिन सवेरे वो उस से मिले बिना चला गया था.उसे फार्म के मेन गेट के गार्ड ने बताया था की उसने सवेरे 5 बजे ही समीर की गाड़ी को बाहर जाने देने के लिए गेट खोला था.अब दोपहर के 2 बज रहे थे लेकिन समीर का कोई पता नही था.

उसके दफ़्तर के लोगो की राई थी की पोलीस को खबर कर देनी चाहिए.रंभा के बंगल के ड्रॉयिंग हॉल मे सभी बैठे रंभा कि ओर देख रहे थे कि वो क्या फ़ैसला लेती है.रंभा बहुत हिम्मती थी लेकिन इस वक़्त उसकी समझ मे भी नही आ रहा था कि क्या करे.उसने सबसे बैठने को कहा & अपने कमरे मे आ गयी.वाहा उसने 1 आख़िरी बार समीर का फोन ट्राइ किया.फोन अभी भी नही लगा.वो कुच्छ पल खड़ी रही & फिर उसने 1 नंबर मिलाया.

"हेलो."

"हेलो,सोनम.कैसी है?मैं रंभा बोल रही हू."

"रंभा!कैसी है तुम यार?..& कितने दिनो बाद फोन किया तूने?..क्या बात है जानेमन..तेरे बॉस तुझे बहुत बिज़ी रखते हैं क्या?",उसने सहेली को छेड़ा.उसकी बात से रंभा का गला 1 पल को भर आया & वो खामोश हो गयी,"क्या बात है रंभा?सब ठीक है ना?"

"सोनम..सोनम..समीर लापता है."

"क्या?!"

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रंभा ने पोलीस मे रिपोर्ट लिखवा दी थी.1 घंटे तक पोलीस वाले उस से समीर के बारे मे हर बात पुछ्ते रहे & वो जवाब देती रही.पोलीस ने क्लेवर्त तक के सारे इलाक़े मे वाइर्ले से खबर भिजवा के समीर की खोज शुरू कर दी थी.पोलीस को शक़ था कि ये किडनॅपिंग का केस भी हो सकता है तो उन्होने ये बात मीडीया से छिपा ली थी & मेहरा आग्रिकल्चरल फार्म्स के सभी आदमियो को भी ये बात बाहर ना बताने की सख़्त ताकीद की थी लेकिन पोलीस वाले जानते थे कि ये बात छुपना मुमकिन नही है.इसके लिए खुद पंचमहल के पोलीस कमिशनर ने शहर के सभी अख़बारो & टीवी चॅनेल्स के एडिटर्स को खुद फोन कर उनसे इस खबर को दबाए रखने की गुज़ारिश की जिसे की सभी ने मान लिया.आख़िर 1 इंसान की जान का सवाल था.

समीर की खोज उस दिन 3 बजे रिपोर्ट लिखवाने के बाद से शुरू हो गयी थी लेकिन देर रात तक कोई नतीजा नही आया था.पोलिसेवालो को पक्का यकीन था कि उसे अगवा किया गया है क्यूकी उस रोज़ उस इलाक़े मे जितने भी आक्सिडेंट्स हुए थे उनमे से कोई भी कार समीर की सिल्वर ग्रे स्कोडा लॉरा नही थी ना ही उसके हुलिए का कोई शख्स उन आक्सिडेंट्स मे था.

रंभा ने कंपनी के लोगो को उनके घर जाने को कहा.वो सवेरे से अपनी मालकिन के साथ बैठे थे.2-3 लड़कियो ने रुकने की बात की लेकिन रंभा ने उन्हे वापस भेज दिया.वो जानती थी कि उसका पति बहुत बड़ी मुसीबत मे है & अब उसे अकेले ही उसे किसी तरह इस समस्या से निबटना है.किसी भी काम के लिए सहारा लेना उसे कमज़ोर बना सकता था & ये उसे गवारा नही था.

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जब रंभा का फोन आया था उस वक़्त विजयंत किसी लनचन मीटिंग पे गया था.सोनम ने सोचा कि पहले ये खबर ब्रिज को दे लेकिन उसे ये ठीक नही लगा कि बाप से भी पहले ये खबर ब्रिज को दी जाए.वो सोच ही रही थी कि उसे विजयंत ने बाहो मे भर लिया.वो ख़यालो मे ऐसी डूबी थी की दरवाज़ा खुलने & उसके दाखिल होने की उसे आहट ही नही हुई.

"किस ख़याल मे खोई हो?",विजयंत उसके पेट को उसकी शर्ट के उपर से सहलाते हुए उसके दाए कान मे ज़ुबान फिरा रहा था.

"सर..",वो उसके आगोश से नीली & उसकी ओर घूमी,"..1 प्राब्लम खड़ी हो गयी है."

"क्या?",विजयंत 1 पल मे संजीदा हो गया था.

"समीर सर लापता हैं."

"क्या?",जवाब मे सोनम ने उसे रंभा से फोन पे हुई सारी बात बता दी.विजयंत खामोश हो गया & अपनी कुर्सी पे बैठ गया & फोन उठा लिया.अगले 1 घंटे तक वो पंचमहल पोलीस & मेहरा फार्म्स के लोगो से बात करता रहा.इसी दौरान सोनिया के मोबाइल से 1 मसेज हुआ जोकि ब्रिज को मिला.ब्रिज उस वक़्त 1 बहुत ज़रूरी मीटिंग मे बड़े ही संगीन मसले पे अपने 2 आदमियो की दलीलें सुन रहा था.सोनम के मेसेज पढ़ उसके होंठो पे मुस्कान फैल गयी जिसका मतलब उसके आदमी समझ नही पाए.

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अगली सुबह जब रंभा उठी तो उसे कोई घबराहट नही थी.1 मसला था & अब उसे सुलझाना था-बस यही ख़याल था उसके दिल मे.समीर के लापता होने का उसे अफ़सोस था मगर ऐसा दुख नही कि वो बहाल हो जाए.उसे फ़िक्र इस बात की थी कि उसकी आरामदेह ज़िंदगी कही शुरू होने से पहले ही ख़त्म ना हो जाए.समीर के अपने परिवार से संबंध टूट गये थे & उसके लापता होने की सूरत मे उसे तो वो दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंक सकते थे & उसे इस से बचना था.इसके लिए बहुत ज़रूरी था कि समीर सही-सलामत मिल जाए लेकिन अगर रंभा की किस्मत ही फूटी है & वो नही मिलता है तो उस सूरत मे उसके परिवार वालो से वो अपनी शर्तो पे अलग होगी ना कि उनकी.

सवेरे तैय्यार होने के बाद उसने अपना पर्स चेक किया तो उसके पास ज़्यादा कॅश नही था.1 सफेद,कसी पतलून & आधे बाज़ू की गुलाबी कमीज़ पहनी,आँखो पे ओवरसाइज़ धूप का चश्मा लगाया & अपना बॅग उठा एटीएम के लिए निकल पड़ी.एटीम पहुँच उसने 1 डेबिट कार्ड उसमे डाला.

इन्वलिड कार्ड

मेसेज देख उसे लगा कि कार्ड ठीक सेस्लोट मे डाला नही.उसने दोबारा कोशिश की मगर फिर से वही बात हुई.उसने पर्स से दूसरा कार्ड निकाल के डाला मगर फिर वही बात.उसका माथा ठनका.उसने अपने दोनो क्रेडिट कार्ड्स डाल के देखा मगर हर बार वो नाकाम रही.वो अपनी कार मे बैठी & अपने बॅंक फोन मिलाया & सारी बात बताई.

"मॅ'म,आप अपना कार्ड नंबर बताइए ताकि मैं स्टेटस चेक कर सकु?",रंभा ने नंबर बताया.

"मॅ'म,आपका अकाउंट ब्लॉक कर दिया गया है.आपका अकाउंट मेहता आग्रिकल्चरल फार्म्स के ज़रिए खुलवाया गया था & हमे वही से ये रिक्वेस्ट आई है कि इस अकाउंट को अभी ब्लॉक कर दिया जाए."

"क्या?!",रंभा बौखला उठी & उस कॉल सेंटर एग्ज़िक्युटिव लड़की से बहस करने लगी.उसने चारो कार्ड्स के बाँक्स मे फोन किया & हर जगह यही जवाब मिला.1 और मुसीबत सामने आ गयी थी.उसका इरादा पैसे निकाल के पोलीस स्टेशन जा उनसे उनकी करवाई के बारे मे पुच्छने का था लेकिन अब उस से पहले उसे अपने कार्ड्स ब्लॉक करवाने वाले शख्स से मिलना था.उसने ड्राइवर को दफ़्तर चलने का हुक्म दिया & उसने गाड़ी उधर ही मोड़ दी.

"मेरे बॅंक अकाउंट्स किसने ब्लॉक किए मिनी?",रंभा दनदनाते हुए समीर के दफ़्तर पहुँची & उसकी सेक्रेटरी से सवाल पुचछा.

"म-मा'म..वो..सर..",उसने समीर के कॅबिन की ओर इशारा किया.

"सर!",रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी & फिर जैसे बड़ी राहत मिली,"समीर आ गया!",वो भागते हुए आगे बढ़ी & कॅबिन का दरवाज़ा खोल अंदर घुस गयी.

"सा..-",सामने बैठे शख्स को देख उसकी खुशी हवा हो गयी & वो जहा की ताहा ठिठक गयी.

"गुड मॉर्निंग,रंभा.",समीर की कुर्सी पे विजयंत मेहरा बैठा था.रंभा को थोड़ा वक़्त लगा मगर उसने खुद को संभाल लिया.

"आप मेरे पति के दफ़्तर मे क्या कर रहे हैं?"

"तुम भूल रही हो कि मैं तुम्हारे पति का बाप & यहा का मालिक हू."

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:31 PM,
#24
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--24

गतान्क से आगे.

"बाप तो हैं पर यहा के मालिक नही & मेरे कार्ड्स ब्लॉक करवाने की बेहूदा हरकत आपने क्यू की?"

"पहले ये पढ़ो,कंपनी के मालिकाना हक़ क्यू काग़ज़ात जिसपे तुम्हारे पति के भी दस्तख़त हैं.",उसने कुच्छ काग़ज़ डेस्क पे आगे सरकाए,"..पेज 4,क्लॉज़ 6..किसी भी एमर्जेन्सी की सूरत मे अगर मिस्टर.समीर मेहरा कंपनी के फ़ैसले लेने मे नाकाम या नाकाबिल हैं तो कंपनी के सारे मालिकाना हक़ अपनेआप ट्रस्ट ग्रूप को चले जाएँगे.",रंभा पे जैसे बिजली गिरी थी.उसे कुच्छ समझ नही आ रहा था.वो धाम से कुर्सी पे बैठ गयी.

"अब इत्तेफ़ाक़ कहो या तुम्हारी बदक़िस्मती की ट्रस्ट का मालिक तो मैं ही हू.",रंभा की ज़िंदगी यू उथल-पुथल हो जाएगी,ऐसा तो उसे अंदेशा ही नही था!

"लेकिन वो पैसे मेरे हैं,आप इस तरह उन्हे मुझसे नही छीन सकते..मेरे पति ने अपनी मर्ज़ी से मुझे वो दिए थे & उनपे केवल मेरा हक़ है.",उसकी हिम्मत ने अभी जवाब नही दिया था.उसने ठान ली की जो हो वो अगर हारती भी है तो बिना पूरी कोशिश किए नही हारेगी.

"वो अकाउंट्स समीर ने इस कंपनी के ज़रिए खुलवाए थे & यहा का मालिक होने के नाते मुझे लगा कि उनकी कोई ज़रूरत नही,वो बस कंपनी का खर्चा फालतू मे बढ़ा रहे हैं,इसीलिए मैने उन्हे ब्लॉक करवा दिया."

"आप जो भी दलीलें दें,मुझे वो पैसे चाहिए ही चाहिए..",वो उठ खड़ी हुई,"..मैं पोलीस स्टेशन जा रही हू,अपने पति की गुमशुदगी के बारे मे उनसे पुच्छने.आपको शायद याद नही कि इस कंपनी का मालिकाना हक़ आपको इसलिए मिला है क्यूकी आपका बेटा लापता है.",रंभा ने विजयंत को मज़किया निगाहो से देखा,"..आपको उसकी फ़िक्र नही होगी पर मुझे है.जब मैं पोलीस स्टेशन से लौटू तो मेरे अकाउंट्स फिर से चालू हो जाने चाहिए."

"बैठ जाओ.",विजयंत का चेहरा सख़्त हो चुका था & आँखो मे अजीब सा ठंडापन आ गया था.रंभा को उन नज़रो की ठंडक & भारी आवाज़ का रोब महसूस हुए & वो बैठ गयी.

"मैं कल रात यहा आया था & जिस वक़्त तुम घर मे आराम से सो रही थी मैं पोलीस से सारी जानकारी ले रहा था.मुझे इस छ्होटे से धंधे का लालची बता रही हो

& खुद मुझसे अपने पैसो के लिए लड़ रही हो!",विजयंत उठके उसके सामने आ खड़ा हुआ था & झुक के बात कर रहा था.रंभा के चेहरे से उसका चेहरा बस कुच्छ ही इंच दूर था.रंभा ने महसूस किया कि उसका दिल बहुत ज़ोरो से धड़कने लगा था & 1 अजीब सी घबराहट हो रही थी.

"तुम्हे तुम्हारे पैसे मिल जाएँगे लेकिन तुम्हे मेरी 1 शर्त माननी पड़ेगी."

"कैसी शर्त?",वो धीमी आवाज़ मे बोली.

"तुम्हे मेरे साथ हमबिस्तर होना पड़ेगा.",रंभा को इतनी ज़ोर का झटका लगा की उसकी आवाज़ ही नही निकली.वो बस मुँह खोले विजयंत को देखे जा रही थी.

"क्या कहा आपने?",काफ़ी देर बाद वो वैसे ही हैरत मे डूबी बोली.

"तुम्हे मेरे साथ सोना होगा & फिर तुम्हारे सारे अकाउंट्स चालू कर दिए जाएँगे.",रंभा वैसे ही मूरत की तरह बैठी रही,"..मैं आज रात पंचमहल मे ही रुकुंगा & रात को तुम्हारे घर आऊंगा,अगर तुम्हारा जवाब हां होगा तो ठीक है वरना..",हाथ मे थामे पेन को उसने रंभा के माथे से लेके दाए गाल पे फिराया.

रंभा बुत बनी बैठी रही लेकिन उसके दिल मे ख़यालो का तूफान उमड़ा हुआ था..ये इंसान उसका ससुर था..समीर का बाप..!..& वो उसे चोदने की बात कर रहा था..!..नही वो कैसे मान सकती है ये गलिज़ बात?..लेकिन इसमे हर्ज ही क्या है..क्या उसके दिल मे कभी विजयंत के लिए कोई गुस्ताख ख़याल नही आए थे?..हां..लेकिन वो सब शादी से पहले थे..तो तुम कब से इतनी सती-सावित्री हो गयी..इस रिश्ते से तुम्हारा फ़ायदा ही तो है!

"तुम्हे अभी जवाब देने की ज़रूरत नही है.रात को बता देना.चलो मेरे साथ.",रंभा ने उसे सवालिया नज़रो से देखा,"पोलीस स्टेशन जा रही थी ना,चलो.",रंभा उठी & उसके पीछे चल दी.

पोलीस स्टेशन मे कोई नयी बात नही पता चली थी.पोलीस वाले भी परेशान थे कि आख़िर इस तरह से समीर कार सहित कहा गायब हो गया.पंचमहल से लेके क्लेवर्त तक का सारा इलाक़ा छान मारा था लेकिन कोई सुराग तक नही मिला था.पोलिसेवालो का ये मानना था की उसे अगवा किया गया है लेकिन विजयंत & रंभा का कहना था कि समीर की ना कोई दुश्मनी थी किसी से ना कोई कहा-सुनी हुई थी फिर कौन कर सकता है ये काम!

पोलिसेवाले फिर भी छान-बीन मे लगे हुए थे.अब 1 नयी मुसीबत खड़ी हो गयी थी.लाख कोशिशो के बावजूद इस बात को च्छुपाना तो मुश्किल था.उपर से 300किमी के दायरे मे किसी इंसान की खोज हो बात लीक ना हो ऐसा तो नामुमकिन ही था.मीडीया को भनक लग गयी & ये भी पता चल गया कि इस वक़्त खुद विजयंत मेहरा पोलीस थाने मे बैठा है और उन्होने थाने के बाहर ही अपने तंबू गाढ दिए.

"प्लीज़..शांत हो जाइए..मैं बस 1 स्टेट्मेंट दूँगा..",विजयंत रंभा के साथ थाने के बाहर खड़े रिपोर्टर्स से मुखातिब था जोकि स्कूल के बच्चो से भी ज़्यादा बुरे ढंग से पेश आ रहे थे लेकिन स्टेट्मेंट लफ्ज़ सुनते ही सब कॅमरास & माइक्स तान चुपचाप खड़े हो गये,"..मेरे बेटे की परसो रात से कोई खबर नही है.मेरी बहू..",उसने पास खड़ी आँखो पे चश्मा चढ़ाए रंभा की ओर इशारा किया,"..ने पोलीस मे रिपोर्ट कल दोपहर दर्ज कराई & अब पोलीस उसकी तलाश मे जुटी है..",इसके बाद उसने कुछ सवालो के जवाब दिए & रंभा के साथ वाहा से निकल गया.

रंभा को वो पंचमहल के वाय्लेट होटेल के रेस्टोरेंट मे ले गया.रंभा अनमानी से खाना खा रही थी,"कोई ज़बरदस्ती नही कि तुम मेरी बात मान लो?..चाहो तो इनकार कर दो & अपने रास्ते चली जाओ.",रंभा ने सर उपर किया & आग बरसाती निगाहो से उसे देखा.विजयंत बस मुस्कुराता हुआ खाना ख़ाता रहा.खाना खाने के बाद दोनो नीचे आए & लॉबी के पास बने स्टोर्स के सामने से बाहर जाने लगे कि तभी विजयंत रुक गया,"रंभा.."

"ये सारी देख रही हो..",उसने शो विंडो मे 1 पुतले पे लिपटी सारी देखी,"..अगर तुम्हारा जवाब हां होगा तो रात तुम यही सारी पहनना.",वो मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया.रंभा वही खड़ी उस सारी को घुरती रही.

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रात 9 बजे बंगले के अंदर के दरवाज़े पे दस्तक हुई तो रंभा ने दरवाज़ा खुद खोला.उसने सभी नौकरो को बहुत जल्दी छुट्टी दे दी थी.विजयंत अंदर दाखिल हुआ & रंभा को देखते ही उसके होंठो पे मुस्कान खेलने लगी.रंभा ने वही नारंगी सारी पहनी थी जो उसने उसे होटेल मे दिखाई थी.बॉल जुड़े मे बँधे थे & जब वो घूमी तो उसकी नज़रो के सामने उसकी गोरी पीठ चमक उठी क्यूकी उसने बॅकलेस,हॉल्टर नेक्बलॉवौस पहना था.ब्लाउस की 1 पट्टी किसी माला की तरह उसकी गर्दन मे पड़ी थी & पीछे पीठ पे बस 1 पतली पट्टी हुक्स से जुड़ी उसके सीने को ढँके हुए थी.

विजयंत के हाथ मे 1 पॅकेट था जिसे उसने दरवाज़ा बंद करने के बाद वही हॉल की मेज़ पे रखा.रंभा अपने कमरे मे चली गयी थी.विजयंत ने कोट उतारा & उसके पास पहुँचा & अपना हाथ आगे बढ़ाया.उसके दाए हाथ मे 1 सुर्ख गुलाब था.रंभा ने 1 नज़र गुलाब को देखा & 1 नज़र विजयंत को अपना मुँह घुमा उसकी ओर पीठ कर खड़ी हो गयी.

हुन्न्ञन्..!",वो सिहर उठी थी.वो सुर्ख गुलाब उसके जुड़े के ठीक नीचे उसकी गर्दन के नीचे आ लगा था & बहुत हौले-2 नीचे जा रहा था.गुलाब की कोमल छुअन ने उसके जिस्म को जगा दिया था.गुलाब उसकी कमर के बीचोबीच उसकी सारी तक पहुँचा & फिर डाई तरफ हो उसके दाए हाथ से सॅट गया.उसके नर्म हाथ & पतली कलाई से होता वो उपर उसकी गुदाज़ बाँह की ओर बढ़ा जा रहा था.गुलाब का कोमल एहसास उसे पागल कर रहा था लेकिन वो बस आँखे बंद किए खड़ी थी.

विजयंत उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठा रहा था & आत्म-सम्मान से भरी रंभा को ये बात बिल्कुल नागवार गुज़री थी.ये सच था की विजयंत के साथ सोने मे उसे कोई हिचक,कोई परेशानी नही थी लेकिन वो फ़ैसला उसका खुद की मर्ज़ी से लिया हुआ होना चाहिए था & इसीलिए उसने तय कर लिया था क़ि वो विजयंत को कुच्छ करने से नही रोकेगी लेकिन चुद्ते वक़्त अपनी खुशी,अपनी मस्ती का इज़हार कर वो मज़ा वो अपने ससुर को नही देगी.

गुलाब अब उसके नंगे कंधे पे आ गया था & उपर बढ़ रहा था.विजयंत ने गुलाब को उसके दाए कान पे फिराया & वाहा से वो उसको उसके दाए गाल पे लाते हुए उसके सामने आ खड़ा हुआ.रंभा ने आँखे बंद ही रखी थी लेकिन वो समझ गयी थी की उसका ससुर अब उसके सामने खड़ा है.गुलाब अब उसके हसीन चेहरे पे घूम रहा था.गुलाब ने पहले उसके माथे को चूमा & फिर उसकी नाक को,उसके बाद वो उसके गुलाबी गालो से मिला & फिर उसकी पंखुड़ियो ने अपने ही जैसी उसके होंठो की पंखुड़ियो को छेड़ा.रंभा के जिस्म मे बिजली दौड़ गयी & उसकी चूत मे कसक उठने लगी.उसे बहुत अच्छा लग रहा था यू प्यार करवाना लेकिन उसकी आन उसे इस मज़े के इज़हार से रोक रही थी.

गुलाब उसके बाए कान पे गया & फिर उसकी ठुड्डी से फिसलता उसकी गर्दन पे आया & फिर उसके नीचे.रंभा की धड़कने तेज़ हो गयी.गुलाब उसकी छातियो की ओर बढ़ रहा था.विजयंत की निगाह अपनी बहू के चेहरे से ही चिपकी हुई थी.उसके सुर्ख गाल,बंद पलके उसके जिस्म मे उठ रही तरंगो से पैदा हुई मस्ती दास्तान कह रहे थे.

गुलाब नीचे आया & उसकी बाई छाती के बाहरी हिस्से को ब्लाउस के उपर से च्छुटा हुआ उसकी बाई बाँह से आ लगा फिर वो हौले-2 उसकी मांसल,रेशमी बाँह पे नीचे फिसलने लगा & उसकी कलाई तक जा पहुँचा.उसके बाद ने रंभा को अपनी आह को आवाज़ देने पे मजबूर कर ही दिया.गुलाब कलाई से सीधा उसके नर्म पेट पे आ गया & उसकी नाभि की ओर बढ़ने लगा.रंभा की आह निकल गयी थी & उसे खुद पे गुस्सा आया कि उसने क्यू अपने ससुर को उस आह का मज़ा दिया & उसने गुलाब की डंठल को दाए हाथ से पकड़ वही फर्श पे गिरा दिया.

विजयंत उसके बिल्कुल करीब आ गया,इतना करीब की उसकी गर्म सांसो को रंभा अपने चेहरे पे महसूस करने लगी.उनकी तपिश ने उसकी चूत की कसक & बढ़ा दी.उसके दिल मे अरमान अंगडायाँ ले जागने लगे लेकिन उसने आँखे नही खोली.उसका दिल चीख-2 के कह रहा था कि विजयंत को बाहो मे भर उसके होंठ चूम ले & उन गर्म सांसो की गर्मी अपने पूरे जिस्म पे महसूस करे मगर ऐसा करना उसकी आन के खिलाफ था & उसने अपनी आँखे नही खोली.

उसने महसूस किया कि उसकी साँसे उसकी आँखो के बाद नाक & फिर दोनो गालो के बाद अब वो अपनी गर्दन पे महसूस कर रही थी.विजयंत अपनी खूबसूरत बहू के चेहरे को बहुत करीब से देखने के बाद नीचे झुक रहा था & उसकी गर्दन के बाद वो उसके बहाली की दास्तान कहते उपर-नीचे होते बड़े से सीने पे झुका हुआ था.रंभा के दिल मे तो ये हसरत पैदा हुई कि वो अपना चेहरा डूबा ले उन गोलाईयो के बीच & नही तो वो खुद ही उसका सर भींच दे अपनी छातियो मे लेकिन उसने खुद को रोके रखा.

काफ़ी देर तक उसने उसकी गर्म सांसो को अपने सीने पे महसूस किया लेकिन उसकी हालत तब और बुरी हो गयी जब उन सांसो ने अपना निशाना उसके चिकने पेट को बना लिया.उसकी सारी के बगल से विजयंत उसकी गहरी नाभि को देख रहा था.बस उसके नीचे ही तो उसकी चूत थी जो मस्ती मे पागल हो रही थी.रंभा के लिए बात अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी & वो घूम गयी & अपनी पीठ विजयंत की ओर कर दी लेकिन अभी भी उसे राहत नही मिली.अब विजयंत की साँसे उसकी मांसल कमर को तपा रही थी.

विजयंत ने रंभा के कदमो मे पड़ा फूल उठाया & फिर उसकी पीठ को अपनी गर्म सांसो से आहत करता उपर उठा.उसका चेहरा अब रंभा के दाए कंधे के उपर झुका हुआ था.रंभा ने अपना मुँह बाई ओर फेर लिया तो विजयंत ने अपने बाए हाथ मे पकड़े फूल को उसके बाए गाल से लगा उसे दाई ओर धकेला.उस नाज़ुक से फूल के धकेलने के पीछे विजयंत की हसरत ने उसे चेहरा उसकी ओर करने पे मजबूर किया मगर ज्यो ही वो उसके दाए कंधे के उपर से उसके चेहरे की ओर झुका वो घूमी & लड़खड़ाते कदमो से उस से दूर जाने लगी.

विजयंत ने दाया हाथ बढ़ा के जाती हुई रंभा की दाई कलाई थाम ली.रंभा थोड़ा आगे जा चुकी थी & अब उसकी बाँह पूरा पीछे की ओर खींची हुई थी.वो रुकी लेकिन घूमी नही & 1 बार फिर उसके होंठो मे क़ैद 1 आह बरबस आज़ाद हो गयी.विजयंत के तपते होंठ उसके दाए हाथ की उंगलियो से आ लगे थे & उन्हे चूस रहे थे.विजयंत ने उसकी नर्म गुलाबी हथेली पे अपने आतुर होंठो से चूमा & फिर वो होंठ उसकी कलाई से होते हुए उसकी बाँह की ओर बढ़ने लगे.

उसकी हर किस पे वो सिहर उठती थी.वो बाँह छुड़ाने की बहुत मामूली सी कोशिश कर रही थी.सच तो ये था कि उसका जिस्म इस खेल मे बहुत गर्मजोशी के साथ शरीक था & उसका दिल भी लेकिन उसकी आन ही थी जिसने उसे इस बात को मानने से रोका हुआ था.विजयंत उसकी बाँह को दाई तरफ फैलाए चूमते हुए उसके कंधे तक आ पहुँचा.बहाल रंभा ने फिर से छूटने की कोशिश की तो विजयंत ने वैसे ही उसकी कलाई पकड़े हुए उसका बाया कंधा थामा & घूमके 1 दीवार से सटा दिया.

अब वो उसके & दीवार के बीच क़ैद थी.विजयंत ने उसके दोनो हाथ उपर दीवार से लगा दिए & उसके दाए कंधे से चूमते हुए उसकी गर्दन के पिच्छले हिस्से पे आया.रंभा के जिस्म की मादक खुश्बू उसे दीवाना कर रही थी.वो उसकी रीढ़ पे चूमता हुआ नीचे गया & फिर उसकी संगमरमरी पीठ को उसने अपने होंठो से तब तक भिगोया जब तक रंभा की सारी की सारी आहें आज़ाद ना हो गयी.

वो उसकी मांसल कमर को जिभर के चूमने के बाद उपर आने लगा & उसके होंठ रंभा के बाए कंधे पे आके रुक गये. & फिर आगे का सफ़र का रुख़ बाई बाँह की ओर किया.ये सफ़र उसके बाए हाथ की उंगलियो पे रुका जहा की उसके होंठो ने उन्हे बारी-2 से अंदर खींच के खूब चूसा.रंभा का जिस्म दीवार से लगा रोमांच से थरथरा रहा था.उसने महसूस किया कि विजयंत के होंठ अब वापस उसकी उपरी बाँह की ओर बढ़ रहे थे.

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क्रमशः.......
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Reply
12-19-2017, 10:31 PM,
#25
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--25

गतान्क से आगे.

विजयंत उसकी गोरी बाँह से होता हुआ उसकी गर्दन तक पहुँचा & 1 बार फिर दाए कंधे के उपर से उसने अपनी बहू के रसीले होंठो को चूमने की ख्वाहिश जताई लेकिन इस बार भी उसने उसे धकेल के खुद से अलग किया & उस से दूर लड़खड़ाते भागी.

विजयंत ने हाथ बढ़ाया & इस बार उसके हाथ मे उसला लहराता आँचल आ गया.रंभा झटके से घूमी & वो नज़ारा देख विजयंत का हलाक सूख गया.आँचल हटने से उसकी तेज़ धड़कनो की कहानी कहता नारंगी ब्लाउस के गले मे से झँकता क्लीवेज & गोल नाभि से सज़ा उसका चिकना पेट.विजयंत उसके हुस्न को आँखो से पीते हुए उसका पल्लू पकड़े उसके गिर्द घूमने लगा.रंभा को उसकी निगाहें भी अपने जिस्म को जलती लग रही थी.वो बस आँखे बंद किए अपनी मुत्ठिया भिंचे चुपचाप खड़ी थी.कोई & मौका होता तो वो अपने आशिक़ के साथ नज़रे मिलाके उसे खुद को निहारते देखती लेकिन आज नही,आज उसे विजयंत को ये सुख नही देना था.

विजयंत घूम रहा था & लिपटी सारी खुल रही थी लेकिन पूरी तरह से नही क्यूकी वो उसकी बहू की कमर मे अटकी जो थी.रंभा ने अपनी पलके आधी खोली,उसे देखने से लग रहा था कि वो नशे मे है.विजयंत उसके करीब आया & फजूल जिसे उसने रंभा की पीठ पे होंठ फिराते वक़्त पॅंट की जेब मे रख लिया था,उसे निकाला.वो उसकी सारी को पकड़े उसे देखे जा रहा था.रंभा ने देखा उन आँखो मे उसके जिस्म की बहुत तारीफ थी.

"आहह..!",रंभा की आह ना चाहते हुए भी निकल गयी.विजयंत ने काम ही ऐसा किया था.गुलाब की लंबी डंठल को उसने उसकी सारी जहा अटकी वाहा उसकी सारी & कमर के बीच मे घुसाया & उसी डंठल से उसकी सारी की अटकी परतों को बाहर निकालने लगा.ऐसा करने से डंठल रंभा के निचले पेट को खरोंच उसके जोश को & बढ़ाने लगा.अब उसकी चूत मे उठ रही कसक बहुत तेज़ हो गयी थी.विजयंत ने फूल को बेड पे फेंका & उसकी सारी को फर्श पे गिराया & झुक के बैठ गया.

उसने बाए हाथ को रंभा की कमर की दाई तरफ जमाया & दाए हाथ की उंगलियो को उसके पेट पे फिराया,रंभा ने अपने बाल पकड़े & बड़ी मुश्किल से अपनी आह को दबाया.विजयंत आगे हुआ & उसके पेट को चूम लिया.उसके चूमने मे मस्ती थी,गर्मी थी जो रंभा की तड़प मे इज़ाफ़ा कर रही थी.वो पेट को चूमता उसकी नाभि की ओर पहुँचा & रंभा का दिल खुशी से उच्छलने लगा कि अब वो उसकी नाभि की गहराई नपेगा लेकिन नही वो नाभि के ठीक नीचे के हिस्से को होंठो मे दबा के काटने जैसी हरकत कर रहा था.रंभा को पता भी ना चला & उसकी कमर हिलने लगी & वो थोड़ा च्चटपटाने लगी.चूत की कसक अब बिल्कुल चरम पे थी.विजयंत वैसे ही उसकिनाभि के नीचे अपने होंठो से चबाए जा रहा था,फ़र्क बस ये था कि अब उसकी ज़ुबान भी उस हिस्से पे घूम रही थी.रंभा अपने बालो मे उंगलिया फिराती,सर झटकती कसमसा रही थी की उसे लगा की उसकी चूत की कसक बिकुल अपनी इंतेहा पे पहुँच गयी है & वो चीखी.उसे लगा कि उसकी टाँगे जवाब दे रही हैं.वो आँहे भरते हुए झाड़ रही थी.

विजयंत ने वैसे ही उसके पेट से खेलते हुए उसकी कमर को थाम उसे गिरने से रोक लिया & घुमा के दीवार के सहारे खड़ा कर दिया.जब वो थोड़ा संभली तो उसकी कमर के बाई तरफ लगे पेटिकोट के हुक & ज़िप को खोल दिया.पेटिकोट फ़ौरन फर्श पे गिरा नज़र आने लगा.विजयंत ने उसकी कमर से हाथ हटाए & उठ खड़ा हुआ.रंभा अभी भी थोड़ा कांप रही थी.उसने उसके दोनो हाथ थामे & उन्हे अपने सीने पे रख दिया.वो उसका इशारा समझ गयी-वो उसे अपनी कमीज़ खोलने को कह रहा था.उसने नज़रे नीची कर ली लेकिन विजयंत ने उसकी ठुड्डी पकड़ चेहरा उठाके फिर से वही इशारा किया.वो 1 बार फिर उसके & दीवार के बीच फँसी थी.उसने नज़रे नीची की & उसके बटन्स खोलने लगी.अंदर काफ़ी बाल नज़र आ रहे थे.विजयंत के इशारे पे उसने शर्ट को उसके कंधो से सरकाया & वो भी फर्श पे उसकी सारी & पेटिकोट के साथ गिरी दिखने लगी.

रंभा की आँखे फैल गयी थी.विजयंत का गोरा सीना बहुत चौड़ा & मज़बूत था & सुनहरे बालो से भरा हुआ था.ऐसे ही सीने तो उसे पसंद थे.उसका पेट ज़रा भी बाहर नही निकला था & बाजुओ का घेरा तो इतना बड़ा था कि शायद उसके दोनो हाथो मे नही समाता.कसरती बदन की 1-1 मांसपेशी जैसे तराशि हुई थी.विजयंत ने उसके हाथ सीने पे रख दिए.उसके दिल ने तो कहा की पूरे सीने को सहलाए,उसे चूमे & अपनी सारी हसरतें पूरी कर ले लेकिन नही उसे ऐसा नही करना था.वो वैसे ही खड़ी रही केवल उसका सीना उपर-नीचे होता रहा.विजयंत मुस्कुराया & उसके हाथो के उपर अपने बड़े-2 हाथ जमाए & उन्हे नीचे फिसलाने लगा.उसने रंभा के हाथ अपने पेट से होते हुए अपनी पॅंट की बेल्ट पे रख दिए.रंभा उसका इशारा समझ गयी & 1 पल के बाद उसकी पॅंट खोल दी.पॅंट सर्की तो विजयंत ने उस से अपनी टाँगे निकाली.अब बस 1 सफेद अंडरवेर उसके बदन मे था.रंभा ने सोचा था कि वो उधर नही देखेगी लेकिन उसकी निगाह पड़ी & अंडरवेर से चिपक गयी.इतना फूला अंडरवेर उसने आज तक नही देखा था.लंड के आकर की कल्पना से ही उसकी चूत मे दोबारा कसक उठने लगी.

विजयंत की जंघे किसी पेड़ की मोटी शाख जैसी थी & वो भी घने बालो से ढँकी थी.रंभा ने नज़रे उपर कर ली लेकिन विजयंत की निगाहो से नही मिलाई.विजयंत झुका & उसके होंठो से अपने होंठ सटा दिए.1 नयी बिजली की लहर रंभा के बदन मे दौड़ गयी & वो थरथरा उठी.पहली बार विजयंत ने उसके होंठ चूमे थे.उसकी किस मे गर्मजोशी थी लेकिन बदहवासी नही.अभी तक जितने मर्द उसके जिस्म का लुत्फ़ उठाने की खुशकिस्मती पाए थे,उनमे से सभी मस्ती मे पागल हो जाते थे & उनकी किस मे बड़ी बेसब्री होती थी.विजयंत की किस बहुत मस्त थी लेकिन रंभा को 1 पल को भी नही लगा कि वो उसके जिस्म को देख अपना काबू खो रहा है.उसे अच्छी लगी ये बात.विजयंत के होंठ उसके लबो को चूम उसकी मस्ती को कम नही होने दे रहे थे.वो थोड़ा लड़खड़ाई & उसके ससुर की मज़बूत बाहो ने उसे अपने आगोश मे भर लिया.उसका सीना विजयंत के चौड़े सीने से पिस गया & उसके हाथ अपने आप उसके कंधे पे लग गये.

विजयंत के होंठ उसके होंठो का रस पिए जा रहे थे & अब उसकी ज़ुबान का स्वाद भी चखना चाहते थे.रंभा ने अपने होंठ अलग करने की कोशिश की,मस्ती की शिद्दत बहुत बढ़ गयी थी & वो सिहर रही थी.विजयंत के सख़्त हाथ उसकी कमर & पीठ पे थे,उसका सीना उसकी चूचियो को दबा रहा था & नीचे चूत से उपर पेट पे उसका सख़्त लंड वो महसूस कर रही थी.उसकी चूत मे मस्ती की लहरे कसका बन के उमड़े जा रही थी.वो अब कमज़ोर पड़ रही थी & इसी बात का फ़ायदा उठाके विजयंत ने अपनी ज़ुबान उसके मुँह मे घुसा दी & रंभा की ज़ुबान जैसे ही उस से टकराई & गुत्थमगुत्था हुई,उसके बदन मे तूफान आ गया जोकि उसकी चूत से उठा था.उसकी आहें ससुर के लबो से सिले होंठो के बावजूद सुनाई दे रही थी & वो 1 बार फिर कमर हिलाते काँपने लगी थी.अभी तक वो पूरी नंगी भी नही हुई थी,उसके किसी नाज़ुक अंग को उसके ससुर ने च्छुआ तक नही था & वो दोबारा झाड़ रही थी.

रंभा के पैरो ने फिर जवाब दिया तो विजयंत ने दाई बाँह जोकि उसकी कमर को कसे थी उसे उसकी गंद के नीचे लगाया & बिना किस तोड़े उसकी जाँघो को पकड़ उसे गोद मे उठा लिया & उसे बिस्तर पे ले गया.रंभा की ज़ुबान को विजयंत अपनी ज़ुबान से छेड़े चले जा रहा था.वो अपनी बाई करवट पे लेता उसे अपने से चिपकाए चूमे चला जा रहा था.उसका दाया हाथ उपर आया & अपनी बहू की पीठ के पार ब्लाउस के स्ट्रॅप के हुक्स को खोल दिया.

रंभा उसकी इस हरकत से चौंक गयी & किस तोड़ दी.विजयंत की बाई बाँह उसके उपरी पीठ के पार थी & उसने उसी मे उसे कसे हुए रंभा के ब्लाउस को दाए हाथ से पकड़ उसकी गर्दन से निकाल दिया & उसके जुड़े को खोल उसके लंबे बालो को आज़ाद किया & फिर नीचे देखा.रंभा ने नारंगी रंग का ही स्ट्रेप्लेस्स ब्रा पहना था & विजयंत के सीने से दबे होने के कारण ऐसा लगता था कि उसकी चूचिया ब्रा के उपर से छलक जाना चाहती हो.उसने गुजरात के बीच पे भी उसे ब्रा & पॅंटी मे देखा था लेकिन आज की बात ही और थी.

आज वो उसकी बाहो मे थी & माहौल बिल्कुल मस्ताना था.उसने रंभा को देखा तो उन आँखो से छलक रही उसके जिस्म की चाह से वो आहत हो गयी & उसकी बाहो से निकल के घूमी & पेट के बल बिस्तर मे मुँह च्छूपा के लेट गयी.अभी का नज़ारा भी कोई कम मस्त नही था.विजयंत ने उसके बाल उसकी पीठ से हटा के उसके दाए कंधे के उपर से बिस्तर पे कर दिए.उसकी पीठ पे बस 1 पतला सा ब्रा का ट्रॅन्स्परेंट स्ट्रॅप नज़र आ रहा था & ऐसा लगता था मानो पीठ पूरी नंगी ही है.नीचे छ्होटी सी पॅंटी मे च्छूपी उसकी मोटी गंद का दिलकश आकार दिख रहा था.विजयंत का लंड कुच्छ & खड़ा हो गया & अब उसका सिरा उसके अंडरवेर के वेस्ट बंद मे दबा नज़र आ रहा था-वो बाहर आने के लिए छॅट्पाटा रहा था.

विजयंत की निगाह बिस्तर के दूसरे कोने पे पड़े रंभा के बगल मे पड़े गुलाब के फूल पे पड़ी.उसने उसे उठाया & फिर उसकी डंठल को रंभा की गर्दन के पीछे से शुरू करते हुए उसकी नर्म पीठ पे चलाते हुए नीचे आने लगा.रंभा ने सर बिस्तर से उठाया & उसके बालो की आब्नूसी चिलमन के पीछे से विजयंत को 1 दबी आह सुनाई दी.

फूल के डंठल की राह मे ब्रा स्ट्रॅप अड़चन बना तो विजयंत ने उसे खोल दिया.अब खुला ब्रा रंभा की चूचियो के नीचे दबा था.डंठल नीचे बढ़ा चला जा रहा था.रंभा ने आज रात जैसी मस्ती पहले कभी महसूस नही की थी.उसकी चूत मे तो जैसे कसक आज शांत ही नही होने वाली थी.उसने जंघे आपस मे भींच उसे समझाने की कोशिश की.

डंठल उसकी कमर के बीचोबीच उसकी पॅंटी के वेस्ट बंद पे रुकी हुई थी.रंभा का दिल ज़ोरो से धड़क उठा.उसकी गंद उसके ससुर के सामने नंगी होने वाली थी.विजयंत ने बिना उसकी कमरको छुए पॅंटी के बीचोबीच वेयैस्टबंड मे उंगली फँसा के उसे नीचे खींचा.उसके पीछे-2 डंठल रंभा की गंद की दरार मे उतार गयी.

"आननह..!",रंभा ने सर उठाके आह भरी.अब वो बहुत मदहोश हो गयी थी.उसकी कमर बहुत हौले-2 उचक रही थी.पॅंटी उसकी गंद से नीचे उसकी टाँगो से होते हुई बाहर निकाल दी गयी.डंठल उसकी दरार मे & नीचे उतरी तो रंभा की जंघे खुद बा खुद थोड़ी फैल गयी & विजयंत को उसकी रस टपकती चूत दिखाई दी.उसके दिल मे खुशी & जोश का तूफान मच गया.चूत उस फूल से,जिसे उसने हाथ मे थामा हुआ था,भी ज़्यादा नाज़ुक & कोमल थी.

उसने डंठल नीचे की,रंभा दम साधे उसके चूत मे उतरने का इंतेज़ार कर रही थी लेकिन उसके ससुर ने डंठल को उसकी गंद के छेद के बगल से होते हुए उसकी बाई फाँक पे घुमाया & फिर नीचे उसकी बाई जाँघ के पिच्छले,मांसल हिस्से पे चलाते हुए नीचे आने लगा.रंभा ने मुँह बिस्तर मे च्छूपा लिया & आहें उसमे दफ़्न करने लगी.

डंठल उसकी पिछली टांग को सहलाते हुए उसके तलवे को गुदगुदा रही थी.रंभा ने बेचैन हो बाई टांग हवा मे उठा दी तो विजयंत ने डंठल से उसके दाए तलवे को गुदगुदाना शुरू कर दिया.वो उस टांग को भी उठाने ही वाली थी कि उसने उसे तलवे से हटा के टांग पे उपर बढ़ा दिया.डंठल उसकी गंद की दाई फाँक पे पे पहुँची & फिर अचानक उसकी चूत मे घुस गयी.

इस अचानक हमले से रंभा चौंक गयी & बहुत ज़ोर से आ भरी.विजयंत उस डंठल को उसकी चूत मे अंदर-बाहर करने लगा.रंभा के लिए ये सब बिल्कुल नया एहसास था & वो कमर उचकाती हुई तीसरी बार झाड़ गयी.विजयंत ने डंठल को चूत से निकाला & उसके काँपते जिस्म को देखता रहा.जब थरथराहट ख़त्म हुई तो उसने रंभा को सीधा कर दिया.

सामने का नज़ारा देख उसकी ज़ुबान फिर सुख गयी.ऐसा लगता था जैसे खुदा ने सारा हुस्न 1 ही जिस्म मे डाल दिया हो.चेहरे पे बिखरे बालो की चिलमन के बावजूद मस्ती की लकीरें सॉफ दिख रही थी & फिर नीचे सख़्त गुलाबी निपल्स से सजी चूचियाँ जोकि बिल्कुल कसी हुई थी.विजयंत ने अपने सीने पे हाथ फेरा,रंभा को पहली बार वो थोड़ा बेचैन नज़र आया.उसके दिल मे खुशी की 1 लहर उठी की उसके हुस्न उसके ससुर जैसे बांके मर्द को भी बेचैन कर ही दिया लेकिन फिर उसकी आन ने उसे इस खुशी के इज़हार से रोका.

विजयनत उसकी कसी,गुलाबी,चिकनी चूत को देख रहा था.औरत के जिस्म के इस अंग की ना जाने कितनी किसमे वो देख चुका था लेकिन ऐसी चूत उसने आज तक नही देखी थी,"तुम सी हसीन मैने आज तक नही देखी!",ससुर के मुँह से हुस्न की तारीफ सुन शर्म से रंभा ने अपनी आँखे बंद कर ली.उसे ताज्जुब हुआ कि उसे आज शर्म क्यू आ रही थी!..विजयंत की बेबाक नज़रे उसे खुद को चूमती हुई सी लग रही थी लेकिन जैसे उन्होने उसे बाँध भी रखा था & वो करवट ले अपने नंगे तन को च्छुपाने की कोशिश भी नही कर पा रही थी.

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:34 PM,
#26
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--26

गतान्क से आगे.

विजयंत ने अब डंठल थामी & गुलाब के फूल को उसके बालो से ढँके चेहरे पे फिराया & फिर नीचे ले आया.गुलाब ने उसकी बाई चूची की गोलाई के गिर्द 1 दायरा बनाया & फिर दोनो चूचियो के बीच पहुँचा & यही हरकत दाई चुची के साथ दोहराई.उसने फूल की पंखुड़ियो से उसके निपल्स को छेड़ा तो वो सिहर उठी.रंभा आँखे बंद कर बस मस्ती मे उड़ रही थी.फूल उसकी चूचियो को चूमने के बाद

नीचे उसके पेट पे आया & उसकी नाभि के गिर्द घुमाने लगा.नाभि के छेद को भी विजयंत ने पंखुड़ियो से छेड़ा.रंभा फिर से च्चटपटाने लगी थी.

फूल नीचे आया & उसकी चूत से सॅट गया,"तुम्हारी चूत की पंखुड़ियो की नज़ाकत,इनकी कोमलता के आगे इस गुलाब का हुस्न भी फीका है.मुझे तो डर है कि कही तुम्हारे इस खूबसूरत अंग से रश्क कर ये बेचारा मुरझा ना जाए!",विजयंत ने गुलाब को बिस्तर पे फेंक दिया & रंभा के दाए पैर के पास घुटनो पे बैठ गया.ऐसे शायराना अंदाज़ मे रंभा की तारीफ किसी ने नही की थी.उसका दिल उसे धिक्कार रहा था कि वो ऐसे आशिक़ का इस्तेक्बाल नही कर रही & ना ही अपनी आहो के ज़रिए उसका शुक्रिया अदा कर रही है!

उसने बालो की लड़ियो के पार देखा तो उसे विजयंत गुटनो पे बैठा नज़र आया.उसने उसके दाए पाँव को उठाके होंठो से ऐसे लगाए जैसे वो हुस्न की देवी हो & उसका ससुर उसकी इबादत कर रहा हो.उसने दोनो होंठो को मुँह के अंदर खींच अपनी आह को रोका.विजयंत उसके दाए पैर की सबसे छ्होटी उंगली को चूस रहा था.जब तक वो अंगूठे तक पहुँचा,रंभा मदहोशी मे बिस्तर पे दाए-बाए सर झटक रही थी.

विजयंत उसके पैरो की उंगलियो की पूजा करने के बाद उसकी मखमली टांग के 1-1 हिस्से को अपने होंठो से चूमता उपर उसकी मोटी जाँघ तक आया.रंभा की भारी जाँघ की कसावट उसे बहुत भाई & उसने वाहा केवल चूमा ही नही बल्कि चूस-2 के अपने होंठो के निशान उनपे छ्चोड़ दिए.रंभा अपने सर के दोनो तरफ की चादर को बेचैनी से खींचते आहे भरते कमर उचका रही थी.उसे बस इंतजार था अपने ससुर के होंठो का अपनी चूत से लगने का.

विजयंत उसकी बाई जाँघ को उठाए अपनी दाढ़ी उसपे रगड़ उसके जिस्म की बेचैनी को & बढ़ा रहा था.उसने उसकी जाँघ & कमर के जोड़ पे चूमा & फिर उसकी बाई जाँघ को उठा लिया.उसकी दाढ़ी ने वाहा भी उसे छेड़ा & उसके होंठो ने वाहा भी अपने दस्तख़त किए & फिर नीचे आ फिर से घुटनो पे बैठ वो उसके बाए पैरो की उंगलियो को पूजने लगा.रंभा बेचैनी से कमर उचका रही थी & जंघे भींच रही थी.उसने बेचैन हो अपनी चूचियो को आप ही दबाया तो विजयंत को ध्यान आया कि हुस्न के देवी के उन बला के खूबसूरत अंगो की इबादत तो उसने की ही नही!

वो उसके दाई तरफ बाई करवट पे लेटा & दाया हाथ उसके पेट पे रख सहलाते हुए अपने नाक & होंठो से उसके बालो की लड़ियो को हटा उसके कोमल चेहरे & गुलाबी होंठो को चूमने लगा.रंभा की भी तारीफ थी कि इतनी मस्ती,ऐसे रोमानी गर्म, माहौल के बावजूद उसने अभी तक 1 बार भी खुद अपनी ज़ुबान ना तो विजयंत के मुँह मे घुसाइ थी ना ही अपने हाथ उसके जिस्म पे लगा उसे इस बात का एहसास दिलाया था कि वो उसकी हर्कतो से मस्ती मे बावली हो गयी है.ये दूसरी बात थी कि कोई अँधा भी बता देता कि रंभा जोश के सातवे आसमान मे उड़ रही थी.

विजयंत ने अपनी दाढ़ी उसके सीने पे रगडी & उसकी नाभि को कुरेदा तो रंभा ने चादर भींचते हुए आह भरी & कमर उचकाई & जैसे ही उसकी बाई चूची के निपल को जीभ से चाटते हुए उसके ससुर ने उसे मुँह मे भरा & उसकी नाभि कुरेदी वो 1 बार और झाड़ गयी.विजयंत ने अपने दोनो हाथ अपनी बहू की चूचियो पे लगा दिए.उसकी छातियाँ देख मर्द पागल हो जाते थे & कई बार इतने बदहवास की रंभा को तकलीफ़ होने लगती थी.

विजयंत को भी जैसा जोश आज की रात चढ़ा था वैसा पूरी ज़िंदगी नही चढ़ा था लेकिन फिर भी रंभा ने उसके चूमने मे वो बदहवासी नही महसूस क़ी.वो जानती थी कि उसका ससुर उसके हुस्न को देख जोश से पागल हो गया है लेकिन फिर भी उसकी गर्मजोशी से भरी ज़ुबान & आतुर हाथ उसे तकलीफ़ नही पहुँचा रहे थे बल्कि जो मज़ा उसे अभी आ रहा था ऐसा उसे ना ही अपने किसी प्रेमी & ना ही पति के साथ आया था.

पता नही कितनी देर तक वो उसकी छातियो के मस्ताने उभारो से खेलता रहा & वो मदहोश होती रही.अपने हाथो को अपने ससुर के बालो को भींचने,उसके गथिले बदन को अपने आगोश मे भरने से उसने अपनी आन से मजबूर हो कैसे रोका था ये वोही जानती थी.

विजयंत ने उसके सीने से सर उठाया तो रंभा ने उसे अधखुली,नशे से बोझल पॅल्को से देखा.वो उसकी जंघे फैला के उनके बीच लेट रहा था.उसने आँखे बंद की & 1 बार फिर अपनी छातियाँ दबाने लगी.विजयंत ने उसकी चूत मे जीभ फिराई तो उसने कमर उचकाई.विजयंत ने उसकी जाँघो मे बाँह फँसा के उसके पेट को दबाते हुए उसकी चूत चाटना शुरू किया & वो अपनी चूचियाँ दबाते हुए आहे भरने लगी.उसकी कमर खुद बा खुद उच्के जा रही थी.

विजयंत उसके दाने को चाट रहा था &वो मस्ती मे उड़ रही थी.उसने अपने हाथ आगे बढ़ा उसकी चूचियो पे रखे तो रंभा ने अपने हाथ वहाँ से खीच लिए & 1 बार फिर बिस्तर की चादर की सलवटो मे इज़ाफ़ा करने लगी.

विजयंत की जीभ ने बहुत जल्द ही उसे झाड़वा दिया लेकिन उसकी चूत से अलग नही हुई.चूत से रस बहे जा रहा था & उसका ससुर उसे चाते जा रहा था.1 मुद्दत के बाद उसे 1 बार & झाड़वाने के बाद विजयंत ने अपना चेहरा उसकी गोद से लगा किया & उसकी टाँगे फैला उनके बीच खड़ा हो गया.रंभा ने अधखुली आँखो से उसे अंडरवेर उतारते देखा & जब उसका लंड बाहर आया तो उसकी आँखे हैरत से फैल गयी.

इतना बड़ा लंड!..रंभा ने ऐसा लंड केवल नंगी फ़िल्मो मे देखा था & उसे हमेशा यही लगता था कि वो फ़िल्मे बनानेवाले कोई कारस्तानी करते होंगे वरना असला ज़िंदगी मे वैसा लंबा लंड होना नामुमकिन है..लेकिनाज़ उसे पता चल रहा था कि वो ग़लत थी.विजयंत उसकी फैली जाँघो के बीच घुटनो पे बैठ गया..लंड 9 इंच से लंबा लगता है..वो नज़रो से उसके लंड को नाप रही थी & मोटाई तो 2.5 इंच से भी ज़्यादा लगती है.

विजयंत ने फॉरेस्किन पीछे की तो उसके 9.5इंच की गोरे लंड का गुलाबी सूपड़ा प्रेकुं से चमकता सामने आ गया..झांते सॉफ कर रखी है इसने.अफ!..रंभा ने आँखे बंद कर ली.उसके ससुर ने यहा आने से पहले अपने होटेल के कमरे मे अपनी झांते सॉफ की थी क्यूकी अपनी खूबसूरत बहू को चोद्ते वक़्त वो बीच मे ज़रा सी भी रुकावट नही चाहता था.

"उउन्न्ह..!",उसने अपने निचले होंठ को दाँत से काटा & चादर पे बेचैनी से हाथ चलाए.विजयंत अपना लंड उसकी चूत की दरार पे फिरा रहा था.रंभा की कमर अब उसके काबू मे नही थी & अपने आप उचकने लगी थी मानो उसकी चूत खुद ही लंड को अंदर लेना चाहती हो.विजयंत चूत की दरार पे लंड को चला उसे पागल कर रहे था & उभरे हुए उसके दाने को अपने सूपदे से छेड़ रहा था.रंभा ने अपने सर के बगल मे दोनो तरफ की चादर को हाथो मे भर के नोचा & ज़ोर से कमर उचकाई & अपना सर पीछे फेंकते हुए जिस्म कमान की तरह मोड़ा.वो लंड की हर्कतो से झाड़ गयी थी.

वो कमर उचकाते हुए झाड़ ही रही थी कि विजयंत ने सूपदे को चूत मे धकेल दिया.कुच्छ उसके धक्के कुच्छ उसकी चूत ने ही उचक के उसके सूपदे को अंदर ले लिया.रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी & उसने दर्द के एहसास से आँखे मींच ली.उसकी चूत को विजयंत का लंड बुरी तरह फैला रहा था.वो बेचैनी से बिस्तर की चादर को पकड़े हुए थी.उसकी आन अभी भी उसे अपने ससुर को उसकी गर्म हर्कतो से पैदा हुई मस्ती के इज़हार से रोक रही थी.

विजयंत ने उसकी चूत के गीलेपन का फ़ायदा उठा के लंड 7 इंच तक अंदर घुसा दिया.वो भी उसकी चूत की कसावट से आहत हुआ था & ज़िंदगी मे पहली बार उसे लगा था कि वो बिना लड़की को झड़वाए खुद पहले झाड़ जाएगा.रंभा को अब दर्द नही हो रहा था.विजयंत ने घुटने पे बैठे-2 ही उसकी चुदाई शुरू की.रंभा को पता ही ना चला & अपने आप उसकी जंघे हवा मे उठ गयी.विजयंत ने उन्हे अपने हाथो मे समेटा & टाँगे फैलाते हुए अपनी बहू के उपर झुक गया.

वो धक्के लगाए जा रहा था & मस्ती मे डूबी रंभा आहे भरे जा रही थी.उसकी कमर उसके ससुर के हर धक्के का जवाब दे रही थी.तभी विजयंत को अपने उपर से काबू हटता महसूस हुआ.रंभा चीख रही थी & 1 बार फिर जिस्म को कमान की तरफ उपर मोदते,सर को पीछे झटकते,बिस्तर की चादर को नोचते झाड़ रही थी & उसकी चूत झाड़ते वक़्त सिकुड-फैल रही थी.

विजयंत ने अपनी ज़िंदगी मे ना जाने कितनी लड़कियो को चोदा था मगर झाड़ते वक़्त ऐसी मस्त हरकत उसने कभी महसूस नही की थी.उसका लंड उस अनूठे एहसास की खुमारी मे खोता अपना रस उगल ही देता लेकिन उस लंड के मालिक ने अपने पे किसी तरह काबू कर ही लिया.

"आईईईईईययययईई......!",रंभा बहुत ज़ोर से चीखी.उसकी चूत की मस्तानी हरकत से आहत हो विजयंत ने ज़ोर का धक्का मारा था & लंड जड़ तक उसकी चूत मे समाता उसकी कोख से जा टकराया था.रंभा के चेहरे पे दर्द की लकीरें खिंच गयी & वो च्चटपटाने लगी.विजयंत झुक के उसके चेहरे को चूमने लगा & चुदाई रोक दी.रंभा छटपटाती रही.विजयंत के होंठ उसके होंठो के करीब आते तो वो अपने होंठ पीछे खींच लेती क्यूकी वो जानती थी कि 1 बार दोनो के लब टकराए तो वो सारी आन भूल के अपने ससुर को चूमती हुई उस से लिपट जाएगी.

कुच्छ देर बाद उसका दर्द ख़त्म हो गया तो विजयंत ने दोबारा चुदाई शुरू की.रंभा का जिस्म हर धक्के पे मज़े से कांप उठता क्यूकी लंड सीधा उसकी कोख पे चोट करता.ऐसा अनूठा मज़ा उसे आज तक नही आया था.वो बस आहें भरे जा रही थी.उसकी मदहोशी का कोई हिसाब नही था लेकिन अभी भी वो अपने ससुर को अपने होंठो का स्वाद चखने नही दे रही थी.

विजयंत उसके गाल से होठ पे पहुँचता तो वो मुँह फेर लेती.विजयंत ने उसकी चूचियो का रुख़ किया & उन्हे चूस्ते हुए अपनी बहू को चोदने लगा.रंभा ने अपनी टाँगे उसकी कमर पे लपेट दी थी लेकिन आपने हाथ अपने सर के दोनो तरफ बिस्तर की चादर पे ही लगाए रखे थे.

विजयंत अब उसकी चूचियो से उठा के अपने हाथ बिस्तर पे जमा के धक्के लगा रहा था.रंभा भी तेज़ी से कमर उचका रही थी.विजयंत भी उसकी कसी चूत के जलवे से आहत हो आहें भर रहा था.अचानक रंभा जिस्म को कमान की तरह मोदते चीखने लगी,उसकी कमर भी बुरी तरह उचक रही थी.रंभा ने झड़ने की शिद्दत इतनी इंतेहा के साथ कभी महसूस नही की थी & वो मदहोशी मे डूबी हुई बस चीखे जा रही थी.

विजयंत भी अब बहुत तेज़ी से धक्के लगा रहा था & झड़ती रंभा की चूत ने जैसे ही सिकुड़ना-फैलना शुरू किया उसके लंड ने देर से अण्दो मे उबाल रहा गर्म वीर्य उसकी चूत मे उदेलना शुरू कर दिया.विजयंत का जिस्म झटके खा रहा था & वो आहें भर रहा था.उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो रंभा की चूत उसके लंड को पकड़ उसके वीर्य को निचोड़-2 के निकाल रही हो.वही रंभा ने उसके वीर्य को सीधा अपनी कोख मे गिरते महसूस किया & उसके झड़ने की मस्ती दुगुनी हो गयी.

विजयंत का लंड रस बहाते ही चला जा रहा था & रंभा झाडे चले जा रही थी.

"आन्न्‍न्णनह..!",वो चीखी & बिस्तर से उठते हुए उसने ससुर के मज़बूत उपरी बाजुओ मे अपने नाख़ून धंसा दिए.

"आहह..!",नखुनो के धँसने से हल्का सा खून निकला & विजयंत कराहा & उसने 1-2 धक्के और लगा दिए & 1 बार फिर उसके लंड से वीर्य छूटने लगा.वो इतनी देर तक पहले कभी नही झाड़ा था.

रंभा झड़ने की शिद्दत से आहत हो या फिर अपनी आन की वजह से अपने ससुर का पूरे जोश के साथ साथ ना देने की मजबूरी,उसकी आँखे छलक गयी & वो रोने लगी & झाड़ के उसके उपर पड़े हान्फ्ते विजयंत को उसने खुद से अलग किया & सुबक्ती हुई बिस्तर से उतर गयी.

"इन आँसुओ की वजह क्या है?",बाथरूम की ओर जाती रंभा का रास्ता बिस्तर से उतर के विजयंत मेहरा ने रोक लिया था,"..ये कि मैने तुम्हारी मजबूरी का फ़ायदा उठाया या ये कि तुम्हारी आन ने तुम्हे खुल के हम दोनो की चुदाई का मज़ा नही लेने दिया!",रंभा की रुलाई रुक गयी & उसने हैरत से विजयंत को देखा..क्या उसने उसका मन पढ़ लिया था?

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:35 PM,
#27
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--27

गतान्क से आगे.

"रंभा,जब मैने तुम्हे पहली बार देखा तभी से तुम्हे पाने की ख्वाहिश मेरे दिल मे पैदा हो गयी थी लेकिन फिर तुमने समीर से शादी कर ली & मुझे लगा कि मेरी ये ख्वाहिश अब कभी हक़ीक़त नही बनेगी,लेकिन तक़दीर का खेल देखो कि समीर की गुमशुदगी ने मुझे ये मौका दे दिया.",रंभा अभी भी हैरत से उसे देखे जा रही थी.

"..तुम सोच रही होगी कि मैं कैसा नीच हू जोकि बेटे के मुसीबत मे होने के वक़्त भी अपनी हवस पूरी करने की सोच रहा है.पर मैं क्या करू?तुम इतनी हसीन हो & मैं हू ही ऐसा!"

"..रंभा,मैं 1 कारोबारी हू & मेरा उसूल है कि नुकसान से भी कुच्छ फ़ायदा तो निकाल ही लेना चाहिए.बस इसी लिए मैने तुमसे आज सवेरे अपनी पेशकश की जिसे तुमने मान लिया.चाहती तो तुम अपने कार्ड्स मेरे मुँह पे मार चली जाती.ऐसा तो नही कि तुम्हारे खुद के पैसे नही हैं लेकिन समीर के पैसे छ्चोड़ने तुम्हे मंज़ूर नही था.तुम भी तो मेरे जैसे ही,1 कारोबारी के जैसे ही सोच रही थी.पर ये मत समझो कि मैं तुम्हारी खिल्ली उड़ा रहा हू.नही,बल्कि मुझे ये बात पसंद आई है.तुम बहुत तरक्की करोगी.."

"रंभा,दूसरी बात जो तुम्हारी मुझे अच्छी लगी वो है तुम्हारी आन,तुम्हारा आत्म-सम्मान.तुम्हारा जिस्म मेरे साथ मज़े ले रहा था लेकिन तुमने 1 बार भी उसका इज़हार नही किया.मैं तुम्हारे इस जज़्बे की कद्र करता हू & माफी माँगता हू कि मेरी वजह से ये मोटी छल्के..",उसने उसके आँसुओ से भीगे गाल अपने हाथो से पोन्छे,"..मेरी तो यही तमन्ना रहेगी की तुम्हारे साथ ये जो रिश्ता अभी जुड़ा है उसे मैं मरते दम तक कायम रखू लेकिन अब इसका फ़ैसला तुमपे छ्चोड़ता हू.अगर तुम भी इस रिश्ते को बरकरार रखना चाहती तो ठीक है नही तो अब मैं तुम्हे हाथ नही लगाउन्गा.",& वो उसके रास्ते से हट गया.रंभा बाथरूम मे चली गयी.

उसने देखा की उसके ससुर का वीर्य उसकी चूत से निकल के उसकी जाँघो पे बह रहा था.आज तक उसकी चूत को किसी मर्द ने ऐसे नही भरा था.उसने चूत को धो के साफ किया & फिर वॉशबेसिन पे मुँह धोने लगी..उसका ससुर तो उसे किसी किताब की तरह पढ़ ले रहा था..& चुदाई भी ऐसी कमाल की की थी कि उसका रोम-2 खुशी से भर उठा था..लेकिन उसने उसे मजबूर किया था..उसके तो दिमाग़ मे ये ख़याल कभी आया ही नही था..झूठ!..गुजरात मे गेस्ट हाउस के बाथरूम मे उसने उसी को सोच के अपनी चूत पे उंगली फिराई थी & बाद मे भी 1-2 बार वो उसके शरीर ख़यालो का हिस्सा बना था..तो क्या उसे अपने ससुर का हाथ थाम लेना चाहिए..हां क्यू नही!..लेकिन उसकी सास,ननद..

वो इन्ही ख़यालो मे डूबी थी की उसके ज़हन मे बिजली सी कौंधी..विजयंत ने माना था कि उसने उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाने के लिए कार्ड्स ब्लॉक करवाए थे तो कही उसके जिस्म की हवस मे अँधा होकर उसी ने तो समीर को गायब नही करवाया?..हां ये मुमकिन है..अब तो ससुर जी से रिश्ता कायम रखना ही होगा!

बाथरूम से बाहर निकली तो देखा की विजयंत 2 खाने की तालिया लेके बैठा है.जब वो घर मे दाखिल हुआ था तो उसके हाथ मे जो पॅकेट था उसमे खाना ही था.रंभा की तो सवेरे की ससुर से मुलाकात के बाद भूख ही मर गयी थी लेकिन अब उसकी कारस्तानियो के बाद उसकी भूख जाग गयी थी.विजयंत ने उसे उसकी थाली थमायी & दोनो खामोशी से खाना खाने लगे.खाना ख़त्म होने पे रंभा ने ससुर के हाथ से थाली ली & झूठे बर्तन रसोई मे रखने चली गयी.

जब वो कमरे मे लौटी तो देखा की विजयंत ने वाहा बाकी बत्तियाँ बुझा के सिर्फ़ 1 मद्धम रोशनी वाला लॅंप जला रखा है & वो पलंग के हेआडबोर्ड से टेक लगाके टाँगे फैलाए,कमर तक चादर डाले बैठा है.रंभा अपने बाल ठीक करती धीरे-2 बिस्तर तक आई & उसके दाई तरफ बैठ गयी.विजयंत की बाँह पे उसके नखुनो की खरोन्चे दिख रही थी.उसने उसपे उंगलिया फिराई & फिर 2 पलो के बाद झुक के बहुत हल्के से चूम लिया.

विजयंत समझ गया कि रंभा को उन दोनो का ये रिश्ता मंज़ूर था & उसने उसे दाई बाँह के घेरे मे ले लिया.रंभा ने भी चादर मे घुसते हुए बाया हाथ उसके सीने पे रखा & अपनी छातियाँ उसकी बगल मे दबाते हुए उसके कंधे पे सर रख उसके पहलू मे आ गयी.उसका ससुर उसकी गुदाज़ दाई बाँह को प्यार से सहला रहा था.विजयंत के चौड़े सीने के घने बालो मे उंगलिया फिराना रंभा को बहुत भला लग रहा था.कितनी देर से उसने खुद को ऐसा करने से रोका था मगर अब नही,अब तो वो जितनी मर्ज़ी उतनी देर तक इस मज़बूत जिस्म से खेल सकती थी.

"समीर के साथ क्या हुआ है?..आपको क्या लगता है?",रंभा के दाए हाथ की उंगली ससुर के सीने से उसकी दाढ़ी पे आ गयी थी.उसने विजयंत की ठुड्डी चूमि & फिर उसके होंठो पे उंगली फिराई.विजयंत उसकी कलाई थामे था.उसने पहले उसकी उंगली को चूमा & उसे खुद से थोड़ा & चिपका लिया.रंभा ने भी दाई टांग उठा के ससुर की टांगो पे चढ़ा दी.

"कुच्छ समझ नही आता..",विजयंत के चेहरे पे चिंता नज़र आ रही थी,"..कोई हादसा हुआ होता तो उसकी कार मिलती या फिर..",उसके जैसा मज़बूत दिल वाला शख्स भी बेटे की मौत के बारे मे बोलने से घबरा रहा था,"..& ऐसी दुश्मनी भी नही किसी से कि कोई उसे नुकसान पहुँचाए.",रंभा गौर से उसे देख रही थी....या तो ये आदमी झूठ बोलने मे माहिर है या ये बिल्कुल सच्चा है.

"तो अब क्या करेंगे?",उसका हाथ वापस ससुर के सीने पे फिसलने लगा था & अब धीरे-2 नीचे बढ़ रहा था.उसने अपनी मुलायम तंग से विजयंत की टाँगो के उपर धीरे-2 सहलाना शुरू कर दिया था.उसने नीचे देखा तो चादर मे तंबू बन गया था.उसने चादर को हटा के नीचे फेंक दिया & सामने ताज़ा सॉफ की गयी झांतो की वजह से & लंबा दिखता विजयंत का लंड देख उसकी आँखे चमक उठी.

"सोचा है मैने कुच्छ..उउम्म्म्म..",उसकी बहू उसके सीने को चूम रही थी & चूमते हुए उसके पेट के बिल्कुल निचले हिस्से पे जहा बाल ख़त्म हो रहे थे वाहा पे सहला रही थी.रंभा को अपनी टाँगो पे विजयंत की टाँगो के बालो की छुअन मस्त कर रही थी.उसने अपने होंठो मे उसका बाया निपल लिया & चूस लिया.उसके ससुर ने आह भरते हुए उसके बालो मे उंगलिया फिरा दी.रंभा ने दूसरे निपल को भी थोड़ी देर चूसा & उसके बाद चूमते हुए नीचे जाने लगी,"..लेकिन उस से पहले कल सुबह हम डेवाले जाएँगे."

रंभा अब उसके पहलू से निकल उसकी टाँगो को फैला के उसके लंड को देख रही थी.इतना बड़ा,इतना तगड़ा लंड देख के ही उसे मस्ती चढ़ने लगी थी.उसने लंड के नीचे लटक रहे गोल्फ बॉल जैसे आंडो को थपथपाया..कितने दिनो से वो किसी मर्दाने अंग से इस तरह नही खेली थी.आज वो जी भर के खेलेगी अपने ससुर के लंड से!

उसने लंड को हाथ मे पकड़ा.वो इतना मोटा था कि उसकी मुट्ठी के घेरे मे नही आ रहा था सो उसने दूसरा हाथ भी उसपे कस दिया.अभी भी लंड का काफ़ी बड़ा हिस्सा उसके छ्होटे-2 हाथो की पकड़ के बाहर था.लंड की गर्मी ने उसके जिस्म की तपिश भी बढ़ा दी थी.वो झुकी & गुलाबी सूपदे पे पहली बार अपने होंठो की मोहर लगाई.विजयंत ने मस्ती मे आँखे बंद कर ली.

रंभा उसके लंड को हिलाते हुए सूपदे को चूस रही थी.कुच्छ देर चूसने के बाद उसने सूपदे को मुँह से निकाला & उसपे जीभ फिराई & फिर लंड को पकड़ उसे अपने दोनो गालो & होंठो पे फिराने लगी.उसने नाक लंड & आंडो के बीच की जगह पे दबाते हुए उसके 1 अंडे को मुँह मे भर के चूसा तो विजयंत अपनी कमर उचकाते हुए सीधा बैठ गया & उसके सर को थाम लिया.

रंभा उसकी मस्ती से बेपरवाह उसके दूसरे अंडे को चूस रही थी कि उसकी नज़र पास पड़े गुलाब के फूल पे पड़ी.उसके ससुर ने उस गुलाब से ही उसे पागल कर दिया था.अब उसकी बारी थी.उसने लंड को छ्चोड़ दिया & गुलाब को हाथ मे ले उसे सुपादे पे रखा.गुलाब की बड़ी सी पंखुड़ी से जब उसने विजयंत के लंड के छेद को छेड़ा तो विजयंत ने आँखे बंद करते हुए ज़ोर से आह भारी.सूपदे की नाज़ुक स्किन पे फिसलती पंखुड़ी 1 अजीब सा मज़ा उसके जिस्म मे भर रही थी.

रंभा ने गुलाब को नीचे सरकाते हुए उसके लंड को फूल से सहलाया & फिर उसके आंडो पे उसी फूल से हल्के से मारा & ससुर को देख मुस्कुराइ.विजयंत ने उसे उपर खींचा & बाहो मे भरते हुए उसके होंठो से अपने होंठ सटा दिए.जब तक वो अपनी ज़ुबान आगे करता,रंभा की ज़ुबान उसके मुँह मे दाखिल हो चुकी थी.वो उसकी मांसल कमर को दबाते हुए उसकी किस का लुत्फ़ उठा रहा था.रंभा उसके चेहरे को पकड़े उसे शिद्दत से चूमे जा रही थी.काफ़ी देर तक दोनो उस मस्तानी किस का लुत्फ़ उठाते रहे,तब तक जब ताकि सांस लेने के लिए उन्हे अलग ना होना पड़ा.

रंभा लंबी-2 साँसे लेती अपने सीने के उभारो को ससुर के मुँह से सटाने लगी.विजयंत ने उसकी गंद की फांको को दबोचा & उसकी चूचियों को चूसने लगा.जब उनके बीच की वादी मे अपना मुँह घुसा के अपनी नाक उसने रगडी तो रंभा ने मस्ती & खुशी से मुस्कुराते हुए आह भरी & अपना सर पीछे झटका.उसके ससुर ने चूत को च्छुआ भी नही था & वो बुरी तरह से कसमसाते हुए रस बहाने लगी थी.

रंभा ने अपनी छातियाँ विजयंत के मुँह से खींची & पीछे हो अपने दोनो घुटने उसकी कमर के दोनो ओर जमाए & चूत को लंड पे झुकाने लगी.उसने बाया हाथ पीछे ले जाके लंड को थामा & फिर चूत को झुका के उसके मत्थे पे रखा & बैठने लगी.उसकी आँखे बंद हो गयी & चेहरा पे बस जोश दिखने लगा.इस पोज़िशन मे लंड 7-8 इंच तक अंदर घुस गया था & उसकी चूत को पूरा भर दिया था.

रंभा उसके सीने पे हाथ जमाए उसे मस्ती भरी निगाहो से देखती कूदने लगी.1 बार फिर चुदाई शुरू हो गयी थी & इस बार दोनो प्रेमी बिना किसी उलझन के उसका लुत्फ़ उठा रहे थे.विजयंत के बड़े हाथ रंभा के पूरे जिस्म पे घूम रहे थे.जब वो उसकी गंद के उभारो को नही दबा रहे होते तो वो उसकी चूचियो की गोलाई नाप रहे होते.उसकी चूचियो को भींचते हुए विजयंत ने अपने दोनो हाथो को उनके बीच की वादी से नीचे किया & उसके पेट को सहलाया.

विजयंत ने बगल मे पड़ा फूल उठाया & इस बार उसकी डंठल को सीधा रंभा के दाने पे लगा दिया.

"आननह....!",रंभा के चेहरे पे मस्तानी शिकाने पड़ गयी & वो मुस्कुराते हुए पीछे हो गयी ताकि उसकी चूत & उसका दाना उसके ससुर को आसानी से दिखें.उसने अपने हाथ विजयंत के पेड़ के तने सरीखी टाँगो पे टिकाए & कमर हिलाने लगी.विजयंत उसकी नज़र से नज़रे मिलाता हुआ उसके दाने पे डंठल रगड़ता रहा.

रंभा की आँखे अब नशे के बोझ तले आधी ही खुली रह पा रही थी.विजयंत की ये हरकत उसे मदहोशी के आलम मे ले गयी थी & अब वो उसे देख चूमने का इशारा करती हुई उसकी जाँघ पे हाथ टिकाए बहुत ज़ोर से कमर हिला रही थी.तभी उसकी चूत ने वही हरकते शुरू कर दी जो वो झड़ने के वक़्त करती थी & विजयंत के चेहरे पे भी उसकी बहू की तरह मस्ती भरी शिकन पड़ गयी & वो आहे भरने लगा लेकिन उसने दाने पे डंठल की रगड़ को नही रोका.

"आन्न्न्नह..डॅड.....!",रंभा झड़ी & उसे अब डंठल की रगड़ नकबीले. बर्दाश्त लगी.उसने फूल को पकड़ के किनारे फेंका & अपने ससुर के उपर झुक गयी.अपनी भारी-भरकम चूचिया उसके बालो भरे सीने पे दबाते हुए वो आहे भरती सुबक्ती हुई उसे दीवानो की तरह चूमने लगी.विजयंत ने उसे बाहो मे भर लिया & उसकी किस का जवाब देता रहा.

जब रंभा थोड़ा संभली तो विजयंत ने उसे बाहो मे भरे-2 पलटा & अपने नीचे कर लिया.रंभा ने सरसुर के बालो मे उंगलिया फिराते हुए उसके सर को थाम लिया & उसकी दाढ़ी पे अपने गाल रगड़ने लगी.

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1 कार रंभा & समीर के बंगल के बाहर खड़ी थी.उसमे 1 शख्स बैठा उपरी मंज़िल की ओर देख रहा था.वो काफ़ी देर से उस बुंगले पे नज़र रखे था.उसने विजयंत को आते देखा था लेकिन अभी उसकी समझ मे ये नही आ रहा था कि उपर अभी कौन जगा था.पहले निचली मंज़िल & उपरी मंज़िल पे बत्तिया जल रही थी लेकिन अभी कुच्छ देर पहले सारे घर की बत्तिया किसी ने बुझाई मगर उपर के कमरे मे तेज़ रोशनी बंद कर मद्धम रोशनी कर दी गयी थी.

उस शख्स ने 1 सिगरेट सुलआगाई. & लाइटर की रोशनी मे उसका चेहरा दिखा जिसपे बाए गाल पे 1 निशान था,लगभग 2 इंच बड़ा.निशान किसी बड़ी पुरानी चोट का लगता था.वो आदमी लगभग 50-55 बरस का होगा & उसके बॉल डाइड थे.सिगरेट पीते हुए वो सोच रहा था..इतनी मुश्किल से उसे इस लड़की का पता मिला था.उसने सोचा था कि अब तलाश ख़त्म हुई & वो उस से बात कर लेगा लेकिन यहा तो और ही कहानी चल रही थी.अब पता नही कब उसका पति मिलेगा & कब वो उस से बात कर पाएगा!..उसने सिगरेट को खिड़की से बाहर फूटपाथ पे फेंका & पॅकेट से दूसरी निकाल के सुलगाई.

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:35 PM,
#28
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--28

गतान्क से आगे.

"ऊहह....हान्णन्न्..",रंभा सर पीछे किए ख़ुसी से मुस्कुरा रही थी.उसके उपर सवार विजयंत उसकी गर्दन चूम रहा था & बहुत ही हल्के धक्को के साथ उसकी चुदाई कर रहा था.रंभा ने सर के उपर फैले अपने हाथ नीचे किए & अपने ससुर की पीठ सहलाई..अफ..कितना मज़बूत,कितना सख़्त जिस्म था..उसने आँखे बदन की & विजयंत के सर को चूमते हुए हाथ उसकी गंद पे ले गयी & वाहा दबाने लगी.अपने इस नये प्रेमी के गथिले जिस्म पे हाथ फेरने से भी उसकी चूत की कसक बढ़ा रही थी. विजयंत ने अभी भी लंड पूरा नही घुसाया था.

"ओईईईईईई..माआआअ..!",वो उसकी गर्दन से उठा & उसकी आँखो मे देखते हुए 1 धक्का लगाया.लंड जड तक समा गया & रंभा की कोख से टकराया.उसकी टाँगे खुद बा खुद विजयंत की कमर पे कैंची की तरह कस गयी & कमर अपनेआप हिलने लगी,"..डॅड..1 बात बताइए...आन्न्‍न्णनह..!"

"क्या?",विजय्न्त के हाथ उसकी गंद के नीचे जा लगे थे & उसकी फांको को मसल रहे थे.

"क्या मम्मी भी मुझसे नाराज़ हैं?..उउन्न्ञणनह..!",लंड कोख पे चोट पे चोट किए जा रहा था.उसका बदन उसके बस मे नही था & झटके खाए जा रहा था.वो विजयंत की पीठ को अपने नाख़ून से छल्नी कर रही थी.

"तुम्हारी वजह से उसका बेटा घर छ्चोड़ के चला गया,कुच्छ तो नाराज़गी होगी ही लेकिन मुझे नही लगता इस मुश्किल वक़्त मे रीता तुमसे कोई बेरूख़ी दिखाएगी.",विजयंत उसकी गंद मसलते हुए उसे चूमते हुए चुदाई कर रहा था.

"हूँ.....आनह....हाईईईईईईईई.....हे भगवांनणणन्..!",रंभा अब सर पीछे फेंक जिस्म को कमान की तरह मोड़ कमर पागलो की तरह उचका रही थी.उसकी कसी चूत की गिरफ़्त लंड पे & कसी तो विजयंत ने भी मस्ती मे सर पीछे फेंका & आह भरी & ज़ोरदार धक्के लगाए.उसका जिस्म झटके खाने लगा.रंभा के नाख़ून उसकी गंद मे धन्से थे & वो उसके उपर उच्छल रहा था-ससुर & बहू 1 बार फिर 1 साथ झाड़ रहे थे.

रंभा ने विजयंत को नीचे खींचा & सिसकते हुए उसके चेहरे को चूमने लगी.दोनो जानते थे कि आज की रात दोनो ही नही सोने वाले हैं.

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1 बजे वो शख्स समझ गया कि विजयंत आज रात वही रुकने वाला है.उपरी मंज़िल के कमरे की बत्ती अभी भी जल रही थी..या तो घर मे मौजूद दोनो मे से कोई 1 शख्स अपनी परेशानी की वजह से सो नही पा रहा है या फिर किसी 1 को बत्ती जला के सोने की आदत है..उसने सिगरेट का टोटा फेंका & कार वाहा से आगे बढ़ा दी.

अगली सुबह विजयंत मेहरा रंभा के साथ डेवाले पहुँच गया & सीधा ट्रस्ट ग्रूप के दफ़्तर पहुँचा.रंभा को उसने सोनम के साथ अपने कॅबिन मे छ्चोड़ा & खुद उस एमर्जेन्सी मीटिंग को हेड करने चला गया जो उसने बुलाई थी.मीडीया ने बात अब पूरी फैला दी थी & रंभा के घर से निकलते वक़्त,पंचमहल एरपोर्ट,डेवाले एरपोर्ट & फिर अपने दफ़्तर की बिल्डिंग के बाहर-हर जगह उसे प्रेस वालो का सामना करना पड़ा.

"लॅडीस & जेंटल्मेन,आप सभी जानते हैं कि ये मीटिंग क्यू बुलाई गयी है.मिस्टर.समीर मेहरा लापता हैं & अभी तक उनका कोई सुराग नही मिला है.हालाकी वो अब हमारे ग्रूप का हिस्सा नही हैं लेकिन ये हक़ीक़त है कि वो मेरे बेटे हैं & इस वक़्त मेरी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उसे ढूढ़ना है.मीडीया की निगाह भी इस केस पे पड़ चुकी है & इसीलिए मैं चाहता हू कि इस हॉल मे जो भी बातें हो रही हैं वो यहा से बाहर ना जाएँ.."

"..मैने फ़ैसला लिया है कि जब तक समीर या उसकी सलामती की कोई खबर नही मिल जाती,मैं पंचमहल मे ही रहूँगा..",हॉल मे बैठे सभी लोग फुसफुसाने लगे.

"..लेकिन उस से ग्रूप के काम मे कोई अड़चन नही आएगी.",विजयंत ने हाथ उठा के सब को शांत रहने का इशारा किया,"..मैं अपनी जगह मिस्टर.प्रणव कपूर को तब तक के लिए अपायंट करने जा रहा हू जब तक कि मैं वापस यहा ना लौट आऊँ.क्या आपलोगो को इस बारे मे कुच्छ पुच्छना है?",बारी-2 से सभी अपने शुबहे दूर करने लगे.प्रणव खामोश बैठा था & उसके चेहरे पे कोई भाव नही था लेकिन उसका दिल बल्लियो उच्छल रहा था.

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"रंभा,यार ऐसा कैसा हो सकता है कि कोई इंसान ऐसे गायब हो जाए & उसका कोई अता-पता भी ना चले?..यार,समीर का किसी से कुच्छ झगड़ा-वॉग्डा तो नही हुआ था ना?"

"नही,यार.मेरी तो खुद कुच्छ समझ मे नही आ रहा.",रंभा ने अपनी पेशानी पे हाथ फिराया.रात को विजयंत की बाहो मे वो अपनी सारी परेशानी भूल गयी थी लेकिन सुबह होते ही फिर से उसे तनाव हो गया था.

"तो तुझे ना कुच्छ अंदाज़ा है ना ही किसी पे शक़?"

"नही,सोनम."

"हूँ.",सोनम ने तय कर लिया कि मौका मिलते ही सारी बातें ब्रिज कोठारी को ज़रूर बताएगी.

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जिस रोज़ समीर के गायब होने की खबर सोनम ने उसे दी थी,ब्रिज की तो खुशी का ठिकाना ही नही रहा था.सोनिया को उस रोज़ उसने कुच्छ ज़्यादा ही प्यार किया & उसके नशीले जिस्म को अपने आगोश मे भरे हुए उसे ये बात बताई.

"तुम खुश हो ब्रिज इस खबर से?",दोनो झाड़ चुके थे & ब्रिज उसके उपर लेटा धीरे-2 उसकी बाई चूची चाट रहा था.

"हा,जानेमन!मेरा दुश्मन कमज़ोर हो गया है.अब & क्या चाहिए!",सोनिया को उस पल अपना पति 1 अजनबी लगा.ब्रिज उसके चेहरे के भाव से अनजाना बस उसके निपल पे जीभ फिराए जा रहा था.सोनिया का दिमाग़ तेज़ी से घूम रहा था..कही ब्रिज का ही हाथ तो नही इसके पीछे?..नही..ब्रिज ऐसा नही कर सकता..विजयंत को हराने के लिए वो इस हद्द तक नही गिर सकता!

"डार्लिंग..",उसने पति के बालो मे उंगलिया फिराई,"..1 बात कहु तो ग़लत तो नही समझोगे मुझे?"

"क्या बात है,सोनिया?",ब्रिज ने मुँह उसकी चुचियो से उठाया & उसपे ठुड्डी जमा के उस से दबाया,"..तुम सवाल पुछो फिर बताउन्गा..& अगर बुरा लगा भी तो मुझे मना लेना तुम!",वो मुस्कुरा दिया तो सोनिया भी मुस्कुरा दी..शायद इसी अदा के चलते उसने उस से शादी कर ली थी.

"तुम विजयंत को हमेशा हारा हुआ देखना चाहते हो..हर कीमत पे उसे खुद से नीचे देखना चाहते हो..& मुझे डर लगता है कि कही इस चक्कर मे मैं उस ब्रिज को खो दू जिस से मैने शादी की थी."

"देखो,सोनिया.इस उम्र मे मैने तुमसे शादी की है तो कुच्छ तो खास बात होगी तुम मे जिसने मुझे दीवाना बना दिया.तो फिर तुम ये कैसे सोचती हो की मैं तुमसे दूर हो जाउन्गा?",ब्रिज ने उसका चेहरा हाथो मे ले लिया था & उसकी आँखो मे झाँक रहा था.सोनिया को उन निगाहो मे कही भी झूठ नही दिख रहा था लेकिन उसके दिल मे शक़ तो पैदा हो ही गया था.वो मुस्कुरा दी & उसे अपने सीने से लगा लिया & उसके जिस्म को प्यार से सहलाने लगी.उसने तय कर लिया था कि वो अपने शुबहे को दूर करके रहेगी.

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"डॅड,आपने जो ज़िम्मेदारी मुझे दी है मैं उसे निभाने मे पीछे नही हटूँगा लेकिन मैं यही चाहता हू कि आप जल्द से जल्द वापस आ फिर से काम संभालेंगे.",कान्फरेन्स हॉल की मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी & अब बस वाहा ससुर & दामाद बात कर रहे थे.

"तो दुआ करो बेटा की समीर जल्दी मिल जाए."

"हां डॅड,मैं उस बारे मे भी बात करना चाहता था.आपने अभी तक की सारी बात बता दी लेकिन ये नही बताया कि आगे क्या करने वाले हैं."

"प्रणव,मैने कुच्छ सोचा है लेकिन बुरा मत मानना,मैं ये बात अभी किसी को नही बताउन्गा..",विजयंत अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ & पीछे लगे बड़े शीशे का परदा हटा के नीचे शहर को देखने लगा,"..वो नीचे जो लोग खड़े हैं,वो अंजाने मे भी समीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं."

"कौन..प्रेस,डॅड?",उसका दामाद उसके साथ आ खड़ा हुआ था.

"हां,देखो प्रणव.1 बहुत बड़ा चान्स है कि समीर अगवा हो गया है.अब ऐसे मे अगर मीडीया को पता चल जाए कि मैं क्या करनेवाला हू तो वो तो उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बना देंगे & समीर की सलामती के लिए ये बात ख़तरनाक है."

"आप कोई इनाम का एलान तो नही करनेवाले?"

"नही.उस से कुच्छ हासिल नही होता बस लालचियो की फौज इकट्ठी होती है अपने दरवाज़े पे.",विजयंत ने घूम के प्रणव के कंधे थाम लिए,"..प्रणव,मैं जानता हू कि तुम भी समीर के लिए बहुत चिंतित हो लेकिन मैं अभी तुम्हे ज़्यादा नही बता सकता.तुम बस ट्रस्ट को सांभलो,मैं समीर की तलाश का काम देखता हू."

"ओके,डॅड.",प्रणव वाहा से बाहर चला गया.विजयंत ने 1 नज़र उस स्टेट्मेंट पे डाली जोकि उसने खुद लिखी थी.उस स्टेट्मेंट मे उसने ये कहा था की वो अभी कुच्छ दिन पंचमहल मे ही रहेगा & प्रणव के बागडोर संभालने की बात बताई थी.साथ ही उसने कंपनी के सभी क्लाइंट्स को भरोसा भी दिलाया था कि इस से ट्रस्ट के काम-काज पे कोई भी असर नही पड़ेगा.ऐसी ही 1 दूसरी स्टेट्मेंट उसने अपनी कंपनी मे काम करनेवालो के लिए तैय्यार की थी.

अब वक़्त आ गया था समीर की तलाश के लिए पहला अहम कदम उठाने का.उसने सोनम को इंटरकम से रंभा के साथ ही रहने को कहा & हॉल से निकल गया.लिफ्ट से वो सीधा बेसमेंट पार्किंग मे पहुँचा जहा उसका ड्राइवर 1 काले शीशो वाली सफेद ज़्क्स4 की चाभी लिए कार के साथ खड़ा था.विजयंत ने चाभी ली & कार मे बैठ गया & वाहा से निकल गया.बाहर खड़े रिपोर्टर्स ने उस कार पे कोई ध्यान नही दिया.उन्हे तो बस विजयंत की मर्सिडीस का इंतेज़ार था.

कार डेवाले की 1 रिहैइयाशी कॉलोनी के मार्केट पे पहुँच के रुक गयी & उसका आगे का पॅसेंजर साइड का दरवाज़ा खुला तो वाहा पहले से खड़ा 1 40 बरस का पतली मून्छो वाला चुस्त आदमी अंदर बैठ गया.

"हेलो,बलबीर..",विजयंत ने सफेद कमीज़ के उपर गहरे नीले कोट & स्लेटी रंग की पॅंट पहने उस लंबे कद के शख्स से हाथ मिलाया.ये था बलबीर मोहन-1 माना हुआ जासूस.बलबीर फौज मे था & कयि ख़तरनाक ऑपरेशन्स का हिस्सा रहा था.उसके जिस्म पे आज भी उन मुठभेदो के निशान मौजूद थे.वो कोई भी ख़तरा उठाने से नही हिचकिचाता था & मेज़ पे कागज़ी काम करना उसे बिल्कुल पसनद नही था.जब फौज ने तरक्की के बाद उसे ऐसी ही 1 पोस्टिंग दी तो उसने फौज छ्चोड़ना ही बेहतर समझा & 1 सेक्यूरिटी एजेन्सी खोल ली.

उसकी एजेन्सी लोगो & कंपनी की हिफ़ाज़त के सभी इंतेज़ामो को देखती थी मगर उसके साथ ही वो 1 काम और भी करता था जिसके बारे मे चंद खास लोग ही जानते थे-वो था जासूसी.

"ये अभी तक की सारी डीटेल्स हैं..",विजयंत ने उसे 1 लिफ़ाफ़ा थमाया,"..बलबीर,मुझे लगता है कि समीर की गुमशुदगी मे ब्रिज का हाथ है & मैं चाहता हू कि तुम ज़रा इस बारे मे पता लगाओ.",बलबीर को लगा था कि विजयंत उसे पंचमहल जा समीर को ढूँढने को कहेगा.

"हां मगर आपके बेटे को ढूँढना भी तो है?"

"वो काम मैं खुद करूँगा.तुम बस ये पता लगाओ कि ब्रिज कोठारी का इसमे हाथ है या नही."

"मेहरा साहब,बुरा मत मानीएगा लेकिन आपको नही लगता कि उसे ढूँढने का काम किसी पेशेवर को करना चाहिए?"

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:35 PM,
#29
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--29

गतान्क से आगे.

"तुम्हारी बात सही है लेकिन फिर ब्रिज कोठारी की छनबीन कौन करेगा.बलबीर,इस काम के मुझे तुम्हारे अलावा किसी और पे भरोसा नही है & फिर मैं खुद तो कोठारी की जासूसी कर नही सकता.मैं वाहा समीर की तलाश करूँगा & तुम यहा ये काम सम्भालो.ज़रूरत महसूस होने पे मैं तुम्हे वाहा बुला लूँगा.वैसे मुझे कुच्छ समान चाहिए था.",बलबीर के साथ विजयंत कही गया & 2 घंटे बाद वो वापस दफ़्तर लौटा.वाहा उसने रंभा को नीचे पार्किंग मे खड़ी कार मे जाने को कहा & उसके जाते ही सोनम से मुखातिब हुआ.

"मेरे जाने की खबर तो तुम्हे मिल ही गयी होगी,सोनम.मैं चाहता हू कि तुम मेरे आने तक प्रणव के साथ काम करो.ओके?"

"ओके,सर.",सोनम उसके करीब आई & उसकी टेढ़ी हुई टाइ को ठीक किया.विजयंत ने उसे गोद मे बिठा लिया तो सोनम ने अपनी बाहें उसके गले मे डाल दी.

"सोनम,तुम्हे मेरा 1 बहुत ज़रूरी काम करना है लेकिन उसकी भनक किसी को भी नही लगनी चाहिए."

"क्या सर?",उसने अपने बॉस के बालो मे उंगलिया फिराई.

"मुझे यहा से हर रोज़ की रिपोर्ट मिलेगी,ई-मैल से & फोन से लेकिन मुझे हर रोज़ तुमसे भी 1 रिपोर्ट चाहिए.",सोनम ने सवालीयो निगाहो से उसे देखा.

"मैं चाहता हू कि हर रोज़ तुम मुझे शाम मे अपने घर पहुँच के यहा हुई सभी बातो की जानकारी दो.मैं चाहता हू कि तुम अपने आँख-कान खुले रखो & कोई भी बात हो चाहे वो किसी के बारे मे भी हो..प्रणव के बारे मे भी..तो फ़ौरन मुझे बताओ.ओके?",उसने उसकी गंद थपथपा के उठने का इशारा किया तो वो उसकी गोद से उतर गयी.

"ओके.",उसने विजयंत के गले मे बाहे डाल के उचकते हुए उसे चूमा & विदा किया.सोनम मुस्कुरा रही थी..कितना भरोसा करते थे लोग उसपे!..अब विजयंत के लिए भी जासूसी करनी थी उसे लेकिन सवाल ये था कि क्या उसे ये बात ब्रिज को बतानी चाहिए या नही?उसी वक़्त इंटरकम बजा तो सोनम ने इस बात पे रात को सोचने का फ़ैसला किया.आख़िर उसे ये भी तो देखना था कि उसे किस बात से ज़्यादा फ़ायदा था.

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वो आदमी बौखलाया खड़ा था.सवेरे मेडियावालो की भीड़ के बीच उसने रंभा को अपने ससुर के साथ वाहा से जाते देखा था.वो भी अपनी गाड़ी से उनके पीछे हो लिया था.उसे लगा था कि वो लोग पोलीस स्टेशन या फिर समीर के दफ़्तर जा रहे थे लेकिन जब कार एरपोर्ट की ओर मूडी तो उसका माथा तनका.कुच्छ देर बाद उसे झल्लाता छ्चोड़ वो किसी प्लेन मे सवार पंचमहल से निकल चुके थे.

काफ़ी देर तक वो शहर का चक्कर लगाता रहा.1 रेस्टोरेंट से खाना खा के निकलने के बाद उसने कोट की जेब मे हाथ डाला तो उसे याद आया कि उसकी सिगरेट्स ख़त्म हो गयी हैं.वो 1 पान वाले की दुकान पे गया & 1 पॅकेट खरीदा.अपने लाइटर से 1 सिगरेट जलाके वो घूम ही रहा था कि उसके कानो मे पॅनवाडी के छ्होटे से टीवी पे आ रही 4 बजे की खबरो की आवाज़ सुनाई दी जोकि अभी-2 जारी हुए विजयंत के स्टेट्मेंट के बारे मे बता रहा था.

वो सिगरेट जलाके आगे बढ़ा..इसका मतलब था कि मेहरा वापस यहा ज़रूर आएगा & शायद उसके साथ उसकी बहू भी..भगवान से ऐसा ही होने की दुआ माँगते हुए वो अपनी कार मे बैठा & वाहा से चला गया.

"ये रंभा है.",बंगल के हॉल मे बैठी रीता & शिप्रा को विजयंत मेहरा ने रंभा का परिचय दिया.मा-बेटी के चेहरे पे नापसनदगी के भाव सॉफ नज़र आ रहे थे.रंभा आगे बढ़ी & सास के पाँव छुए लेकिन रीता फिर भी वैसे ही खामोश बैठी रही.शिप्रा ने भी बहुत ठण्डेपन से उसकी हेलो का जवाब दिया.रंभा समझ गयी कि ये लोग अभी भी उस से नाराज़ हैं पर जब तक विजयंत उसके साथ था,उसे इस बात की क्या परवाह थी!

1 नौकर ने विजयंत के कहने पे उसका समान समीर के कमरे मे रखवा दिया & फिर अपनी बीवी & बेटी से मुखातिब हुआ,"तुमलोगो ने सुन तो लिया ही होगा की मैं समीर को ढूँडने के काम मे जुटने वाला हू & इसीलिए अभी कुच्छ दिन पंचमहल ही रहूँगा.मैं कल ही रंभा के साथ वाहा जा रहा हू & उसके बाद समीर की तलाश मे जुट जाउन्गा.वाहा की पोलीस को अभी तक कोई सुराग नही मिला है & अब वक़्त आ गया है कि मैं खुद इस काम मे लगु."

"डॅड,समीर ऐसे अचानक कैसे गायब हो गया?आपने पता किया उसकी वाहा किसी से कुच्छ दुश्मनी या अनबन तो नही हो गयी थी?"

"नही शिप्रा,ऐसा कुच्छ भी नही था इसीलिए तो बात & पेचीदा लगती है.",विजयंत ने ब्रिज कोठारी पे शक़ होने की बात & बलबीर को उसकी छान-बीन करने के लिए लगाने की बात खुद तक रखने का ही फ़ैसला किया था.

"तो आपने इस से पुचछा दाद?",रंभा का खून खौल उठा..ये अपने को समझती क्या थी..उसका नाम लेने मे तकलीफ़ हो रही थी उसे तो ज़ुबान खींच लेती हू इस कामिनी की फिर बोलने की ही तकलीफ़ नही होगी कभी!..उसने अपने गुस्से को लफ़ज़ो की शक्ल नही दी,"..मुझे तो लगता है कि मेरे भाई की गुमशुदगी मे इसी का कुच्छ हाथ है?"

"शिप्रा!",विजयंत गरजा.सच तो ये था की रंभा के नज़दीक आने का कारण केवल उसके लिए उसकी वासना नही थी बल्कि ये बात भी थी जो उसकी बेटी कह रही थी.उसने सोचा था कि हर पल उसे अपने करीब रख वो उसपे नज़र रखेगा मगर वो रंभा को इस बात की ज़रा भी भनक नही लगने देना चाहता था,"..ये तुम्हारे भाई की बीवी है.तुम्हे पसन्द हो या ना हो लेकिन इसकी कद्र करनी होगी तुम्हे.माफी माँगो रंभा से."

"डॅड!"

"माफी माँगो,शिप्रा."

"आइ'म सॉरी.",उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए कह. रंभा ने बस सिर हिला दिया लेकिन अपनी जलती आँखो से शिप्रा को ये एहसास भी करा दिया कि वो उसे हल्के मे लेने की ग़लती ना करे.रीता की आँखो से आँसू बहने लगे थे.शिप्रा ने उसे गले से लगा लिया,"प्लीज़ मम्मी,रो मत.सब ठीक हो जाएगा.चुप हो जाओ."

"रीता..",विजयंत अपनी बीवी के पास आया & उसका हाथ पकड़ उसे सोफे से उठाया,"आओ.",रीता पति से लिपट गयी & दोनो उपरी मंज़िल पे बने अपने कमरे की ओर चले गये.उनके जाते ही रंभा उठी & अपने कमरे मे चली गयी.

"डॅड ने बोला तो मैने माफी माँग ली मगर ये मत समझना कि तुम इस घर मे आराम से रह सकती हो.जब तक मेरे भाई का पता नही चल जाता तब तक मेरी निगाह तुमपे जमी रहेगी.",शिप्रा उसके पीछे-2 उसके कमरे तक आ गयी थी.

"क्या भाई-2 लगा रखा है?हैं!",रंभा उसके बिल्कुल करीब आ गयी & अपनी अँगारे बरसाती नज़रें उसकी आँखो से मिला दी,"..वो मेरा भी पति है & तुमसे ज़्यादा मुझे फ़िक्र है उसके हाल की & 1 बात और.तुम्हारे भाई मुझसे शादी करने को पागल हो रहा था मैं नही & आइन्दा से इस बात का ख़याल रखना कि मेरे सामने तुम अपनी तमीज़ ना भूलो.",शिप्रा उसके कमरे के दरवाज़े पे खड़ी थी.रंभा ने दरवाज़ा पकड़ा & उसके मुँह पे बंद कर दिया.अपनी मा के घर मे ऐसी बेइज़्ज़ती होने से उसकी आँखे भर आई & वो दनदनाती हुई वाहा से अपने बंगल पे चली गयी.

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सोनम ने तय कर लिया था कि वो ब्रिज को ये बात नही बताएगी की विजयंत ने उसे ट्रस्ट ग्रूप मे अपना जासूस बना दिया है.उसने तय कर लिया था कि उसे दोनो तरफ खेल खेलना चाहिए & आख़िर मे बाज़ी जिसके हक़ मे जाती दिखेगी वो भी उसी तरफ हो जाएगी.

बलबीर मोहन अपने दफ़्तर मे बैठा अपने पाइप के कश खींचता ये सोच रहा था कि ब्रिज की जासूसी कैसे की जाए.उसने सेक्यूरिटी कंपनी पैसे कमाने के लिए खोली थी & जासूसी वो अपने दिल की तसल्ली के लिए करता था & इस बात के बारे मे उसकी बीवी & कंपनी के 2-3 लोगो के अलावा & कोई नही जानता था.उसने इंटरनेट ऑन किया & सबसे पहले ब्रिज & कोठारी ग्रूप के बारे मे जानकारी जुटाने लगा.

पंचमहल मे वो शख्स 1 होटेल के कमरे मे बैठा सिगरेट फूँक रहा था.बिस्तर पे उसके पास ही रखी अश्-ट्रे जोकि वेटर ने थोड़ी देर पहले ही सॉफ की थी ,फिर से 4-5 टोटो & राख से भर गयी थी.वो शख्स अपनी ज़िंदगी के बारे मे सोच रहा था.आज वो 1 अंजान शहर मे 1 होटेल मे बैठा अपने फेफड़ो को सुलगा रहा है लेकिन सिगरेट की जलन उसके दिल की बेचैनी की आग के आगे कुच्छ भी ना थी....बस 1 बार वो इस बात को पक्का कर ले की रंभा वही है जो वो समझ रहा है तो बस उसकी तलाश पूरी हुई समझो!..उसने सिगरेट को बुझाया & अपना कोट पहना.रात हो चुकी थी & उसे ये देखने जाना था कि कही विजयंत मेहरा अपनी बहू को लेके अभी ही तो वापस नही आ गया.

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"मेरा बेटा..विजयंत..",खाना खाने के बाद रीता फिर से समीर की याद मे आँसू बहाने लगी थी.विजयंत ने उसे बाहो मे भरा & बिस्तर पे ले गया & लिटा दिया.उसने कमरे-अब उसे कमरा कहना तो ग़लत होगा,था तो वो 1 विशाल हॉल-की सारी बत्तिया बुझा दी सिवाय 1 मध्हम लॅंप के & अपने बड़े से पलंग पे आ अपनी बीवी को आगोश मे भर उसे समझाने लगा.

चुदाई इंसान कयि बातो के लिए इस्तेमाल करता है.सबसे पहला तो होता है अपने महबूब के करीब आ उसके दिल से जोड़,अपने इश्क़ का इज़हार करने का.कुच्छ गलिज़ लोग इसे किसी ना चाहते हुए इंसान के साथ कर अपनी गंदी हवस को पूरा करते हैं & कयि बार इंसान इसे अपने या अपने साथी के घाव पे मरहम लगाने के लिए भी इस्तेमाल करता है.

इस वक़्त विजयंत ने भी कुच्छ ऐसा ही किया.बीवी को ये तसल्ली देते हुए कि वो उसकी औलाद को ढूंड के ला के ही दम लेगा,उसने उसके जिस्म को सहलाया & उसके होतो को चूमा.पति की बाहो मे रीता को भी हौसला मिला & उसका जिस्म उस जाने-पहचाने एहसास से जागने भी लगा.थोड़ी ही देर मे दोनो बिल्कुल नंगे उस बड़े से पलंग पे रीता की पसंदीदा पोज़िशन मे चुदाई कर रहे थे.रीता अपने घुटनो & हाथो पे अपनी गंद निकाले हुए थी & विजयंत पीछे से उसकी कमर थाम उसकी चूत मे धक्के लगा रहा था.

रंभा ने अपना खाना कमरे मे ही मंगवा लिया था & खाना खाने के बाद कपड़े बदल रही थी.उसने पीच कलर की बस गंद के नीचे तक की सॅटिन की नेग्लिजी पहनी थी कि किसी ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया.दरवाज़ा बस भिड़ा हुआ था & खटखटनेवाले के हाथ की थाप से वो खुल गया.रंभा उसी वक़्त घूमी & उसी वक़्त दरवाज़ा यू खुलने से चौंकते प्रणव ने अंदर देखा & उसकी निगाहें सामने खड़ी हुस्न की हसीन मूरत से चिपक गयी.

1 पल मे ही उसकी नज़रो ने अपने साले की बीवी के जिस्म को सर से पाँव तक पूरा देख लिया.सुडोल टाँगे & कसी जंघे रोशनी मे चमक रही थी & नेग्लिजी मे उसके सीने का बड़ा सा उभार बड़ा दिलकश लग रहा था.रंभा ने उसके नीचे ब्रा तो पहना नही था & उसके निपल्स की नोक नेग्लिजी के कपड़े मे से झलक रही थी.रंभा के गुलाबी गाल शर्म से & सुर्ख हो गये & उसने जल्दी से पास मे बिस्तर पे रखा अपना ड्रेसिंग गाउन उठाके पहन लिया.

"आइ'म सॉरी!",प्रणव होश मे आया,"..वो दरवाज़ा खुला था & मैं..-"

"-..इट'स ओके.",रंभा & प्रणव 1 दूसरे से नज़रे मिलाने मे हिचकिचा रहे थे.

"आपने खाना खा लिया?"

"हां.",रंभा ने बालो को हाथो से ठीक किया.

"गुड.यहा कैसा लग रहा है आपको?",रंभा बस मुस्कुरा दी,"मैं समझता हू लेकिन क्या करें ये 1 मुश्किल वक़्त है & मम्मी बहुत परेशान हैं & शिप्रा भी.."

"..मैं अभी आया तो शिप्रा ने मुझे शाम को हुई बातें बताई.रंभा,मैं उसकी ओर से आपसे माफी माँगता हू.वो दिल की बुरी नही है मगर क्या करें बहुत बचपाना है उसमे & तैश मे आ वो ऐसी हरकतें कर बैठती है.प्लीज़,आप उसे ग़लत मत समझिएगा.1 बार ये परेशानी दूर हो जाए फिर सब ठीक हो जाएगा."

"प्लीज़,मुझे शर्मिंदा मत कीजिए.छ्चोड़िए अब उस बात को."

"थॅंक्स.",प्रणव मुस्कुराया,"..ओके,गुड नाइट!"

"गुड नाइट!",प्रणव गया तो रंभा ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद किया & अपना गाउन उतार बिस्तर पे लेट गयी.प्रणव ने उसे नेग्लिजी मे देख लिया था & 1 पल को उसकी आँखो मे उसके जिस्म की तारीफ & वही मर्दाना भूख चमक उठी थी जिस से वो अच्छी तरह से वाकिफ़ थी.

वो बिस्तर पे लेटी & अपना जिस्म सहलाने लगी.उसे अपने ससुर की याद आ रही थी.कल की रात उसकी ज़िंदगी की सबसे हसीन & मस्तानी रात थी.विजयंत का गतिला जिस्म,उसके हाथो की च्छुअन,होंठो की तपिश & लंड की रगड़ याद आते ही उसकी चूत कसमसाने लगी & उसका हाथ अपनी पॅंटी मे घुस गया & खुद से खेलने लगा.पॅंटी उसे इस काम मे रोड़ा अटकाती नज़र आई तो उसने जल्दी से घुटने उपर उठाते हुए मोड & उसे उतार दिया & ज़ोर-2 से अपने दाने पे गोलाई मे उंगली चलाने लगी.कुच्छ ही पॅलो मे वो झाड़ गयी लेकिन उसके जिस्म की आग ठंडी नही हुई.काफ़ी देर तक बिस्तर पे करवटें बदलने & तकियो को अपने जिस्म पे दबाने के बाद वो बेचैनी से उठ बैठी & सोचा की 1 बार चेक किया जाए की विजयंत सच मे सो गया या अभी जगा हुआ है.

ड्रेसिंग गाउन पहन वो कमरे से निकली तो देखा की बुंगले मे बस 1-2 धीमी बत्तियाँ जल रही हैं & सभी नौकर भी अपने क्वॉर्टर्स मे जा चुके हैं.उसे ये तो पता था नही कि उसके ससुर का कमरा है कौन सा.उसे बस इतना पता था कि वो कमरा उपरी मंज़िल पे है.

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क्रमशः.......
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12-19-2017, 10:35 PM,
#30
RE: Desi Kahani Jaal -जाल
जाल पार्ट--30

गतान्क से आगे.

जब बुंगले का चक्कर लगाती रंभा विजयंत & रीता के कमरे तक पहुँची तो उसने देखा कि दरवाज़ा बंद नही है बस ऐसे ही भिड़ा हुआ है.उसने उसे हल्के से खोला & अंदर का नज़ारा देख उसका बदन & ताप उठा.विजयंत घुटनो पे झुकी,अपना चेहरा बिस्तर मे धंसाए उसकी चादर को अपने हाथो मे भींचती रीता की चूत मे पीछे से बहुत ज़ोरदार धक्के लगा रहा था.रंभा की निगाह अपनी सास की उठी गंद से ससुर के बालो भरे सपाट पेट & चौड़े सीने से होते हुए उसकी आँखो तक पहुची .विजयंत ने भी उसे देखा & हल्के से मुस्कुराते हुए जाने का इशारा किया फिर हाथ को कान तक ले जाके उसे फोन करने का इशारा किया.

उसी वक़्त रीता ने ज़ोर से चीख मारते हुए अपना चेहरा बिस्तर से उठा लिया.वो झाड़ गयी थी.सास के चेहरे पे जो मस्ती का भाव था उसे देख रंभा का हाथ फिर उसकी चूत पे चला गया.वो थोड़ा पीछे हुई & दरवाज़ा & पीछे खींचा लेकिन अंदर देखती ही रही.विजयंत भी झटके खा रहा था.रंभा समझ गयी कि उसकी सास की चूत उसके ससुर के गाढ़े वीर्य से भर रही है.मदहोशी से मुस्कुराती हुई रीता बिस्तर पे ढेर हो गयी तो रंभा ने दरवाज़ा बंद किया & वापस अपने कमरे को चली गयी.

अपने बिस्तर पे आ उसने फिर से अपना गाउन उतार फेंका & अपने जिस्म से खेलने लगी.सास-ससुर की चुदाई ने उसे बहुत गरम कर दिया था.ससुर के गथिले बदन की प्यास & बढ़ गयी थी & साथ ही उसे सास से जलन भी हो रही थी.वो आधे घंटे तक खुद से खेलती रही.उसके मोबाइल बजा,देखा तो विजयंत का नंबर था,"हूँ."

"मेरे कमरे मे आओ.",रंभा फ़ौरन उठी & अपनी नेग्लिजी मे वैसे ही अपने ससुर के कमरे की ओर चली गयी.

रंभा कमरे पे पहुँची तो देखा कि कमरा अब घुप अंधेरे मे डूबा था.विजयंत उसे वाहा नही दिखा.उसने खटखटाने की सोची पर डर था कि कही रीता ना आ जाए.उसे आश्चर्य हुआ की उसे बुलाने के बाद खुद विजयंत नदारद है & वो जाने ही लगी थी कि 2 मज़बूत बाजुओ ने उसे पकड़ के कमरे के अंदर खींच लिया & दरवाज़े के बगल की दीवार से लगा दिया.वो तो रंभा हाथो की छुअन से समझ गयी की वो विजयंत है वरना वो तो ज़रूर चीख उठती.

"मम्मी कहा हैं?",वो फशहूसाइ.

"सो रही है.",विजयंत ने सर पीछे की ओर हिला के इशारा किया & उसके गुदाज़ बाज़ू दबाते हुए उसके चेहरे पे झुकाने लगा.

"प्लीज़,यहा नही.वो जाग गयी तो ग़ज़ब हो जाएगा!",वो छूटने की कोशिश करती कसमसाई.

"मुझपे भरोसा रखो.कुच्छ नही होगा.",विजयंत की गर्म साँसे उसके पहले से ही बहाल जिस्म का हाल & बुरा कर रही थी.उसने उसके सीने पे हाथ रखे उसे दूर करने को लेकिन उसके हाथ वाहा स्टेट ही विजयंत के ड्रेसिंग गाउन के उपर से ही उसके सीने को सहलाने लगे.विजयंत ने अभी 1 ट्रॅक पॅंट & उसके उपर गाउन पहन रखा था,"देखो वो गहरी नींद मे सो रही है."

"फिर भी डर लगता है.",ससुर के गाउन को भींचते हुए उसने उसके कंधे के उपर से बिस्तर पे सो रही सास को देखा.कमरा विशाल होने की वजह से बिस्तर थोड़ा दूर था & उसे भी लगा कि रीता उनकी फुसफुसाहट से शायद ना जागे.

"कुच्छ नही होगा.वो नही उठेगी.",विजयंत ने बात दोहराई & उसका दाया हाथ उसकी बाँह से उसके चेहरे पे आया.

"प्लीज़,डॅड..उउंम्म..!",विजयंत के हाथ उसके चेहरे को सहलाने के बाद उसकी गर्दन के नीचे उसकी नेग्लिजी के गले से दिख रही उसकी त्वचा पे फिरने लगे & वो उसके चेहरे पे झुकने लगे.उसकी गर्म साँसे & ऐसा रोमांच भरा माहौल पहले से ही मस्त रंभा को और मस्त करने लगे.

विजयंत के हाथ सहलाते हुए उपर आए & उसकी गर्दन से होते हुए उसके चेहरे को ऐसे थामा की उसके अंगूठे उसके कानो पे आसानी से फिर सके,फिर वो झुका & उसके होंठो को हल्के से चूमा.रंभा पीछे दीवार से लग गयी & इस बार उसने अपनी ना-नुकर बंद कर दी.उसके हाथ उसके सर के बगल मे दीवार पे आ लगे.दाया हाथ दरवाज़े की चौखट थामे उपर-नीचे हो रहता.उसकी आँखे अब मस्ती मे बंद हो गयी थी & विजयंत का हाथ 1 बार फिर नीचे जा रहा था.

"तुम्हे प्यार किए बिना तो मुझे नींद आनी नही थी.",विजयंत उसके होंठो के पास अपने लब ला फुसफुसाया & अपने हाथ उसकी गर्दन से होते हुए उसकी चूचियो की बगलो से होते हुए उसके बदन की दोनो तरफ बगल मे चलते हुए कमर पे ले गया & फिर थोड़ा सख्ती से चलते हुए उपर लाया & उसकी नेग्लिजी के उपर से ही उसकी चूचियो पे से चलता हुआ उसके कंधो पे ले गया.रंभा ने दीवार & चौखट पे और बेसब्री से हाथ फिराए.

विजयंत ने उसके दाए कंधे से नेग्लिजी का स्ट्रॅप नीचे किया तो रंभा ने बहुत धीमी आह भारी & जब विजयंत के होंठ उसके होठ के बिल्कुल बगल मे उसके बाए गाल से चिपके तो उसके हाथ अपने ससुर के कंधे से आ लगे & उसके ड्रेसिंग गाउन को बेसब्री से भींचने लगे.विजयंत झुका & उसकी गर्दन चूमि & उसकी नुमाया दाई चूची को बाए हाथ मे भरा & नीचे झुका.उसने अपनी प्यारी बहू की चूची को ना चूमा ना चूसा बस अपना पूरा मुँह खोल अपनी गरम सांसो से उसे भिगाता हुआ उसके उपर चला दिया.

रंभा अब पूरी मस्त हो गयी.ससुर की इस हरकत ने उसे अपनी सास की मौजूदगी भी भुला दी थी.विजयंत झुका & उसकी दाई चूची को दबोच के दबाया & फिर उसपे जीभ चलाते हुए चूसा.रंभा बड़ी मुश्किल से अपनी आहो को आवाज़ देने से रोक रही थी.वो अब विजयंत के सर को थामे थी.

विजयंत उसकी छाती को बड़ी शिद्दत से चूम रहा था & जब वो चूस्ते हुए थोड़ा झुका तो उसके साथ-2 उसकी बहू भी नीचे हुई & उसके बालो को खींचा.विजयंत उसकी चूची से फिर उपर गया & उसकी गर्दन पे बाई तरफ चूमते हुए अपना लंड उसकी चूत पे दबाते हुए रगड़ा.उसके बाए हाथ ने नेग्लिजी को बाए कंधे से उतरा & फिर दोनो हाथो ने रंभा के चेहरे को थामा तो उसने खुद ही आगे बढ़ अपने ससुर के होंठ चूम लिए.विजयंत ने उसके दोनो गालो पे अपनी दाढ़ी रगडी & उसकी नेग्लिजी को नीचे कर झुक के उसकी चूचियो को पीने लगा.

रंभा के दोनो कंधे दीवार से टीके थे & बाकी जिस्म आगे हो अपने ससुर के बदन से चिपका था.विजयंत उसके सीने पे अपने मुँह से मोहरे लगा रहा था.उसकी मस्ती भी बहुत बढ़ गयी थी.उसने रंभा की चूचियो के गुलाबी निपल्स को चूस्ते हुए जल्दी से अपने गाउन की बेल्ट खोल उसे नीचे गिराया & फिर उसकी कमर थाम ली.रंभा के बेचैन हाथ उसकी गर्दन मे आ फँसे & वाहा से उसकी पीठ पे फिसल अपनी बेसब्री बयान करने लगे.

विजयंत ने उसकी कमर थाम उसके जिस्म को खुद से चिपकाया & उसकी चूचियाँ चूमने & चूसने लगा.रंभा के कंधे अब भी भी दीवार से लगे थे & वो ससुर के सर को थामे अपने सीने पे दबाते हुए अपने जिस्म को उस से सताए जा रही थी.उसके होंठ खुल रहे थे लेकिन आवाज़ बाहर नही आ रही थी.अगर आती भी तो बस इतनी की वो केवल विजयंत को सुनाई दे & उसका जोश & बढ़े.

विजयंत रंभा के जिस्म का दीवाना हो गया था.उसने आज तक उसके जैसी मस्त लड़की नही देखी थी.वो झुका & उसकी दोनो चूचियो को हाथो मे थामे आपस मे दबा दी & उन्हे चूसने लगा.उसकी इस हरकत ने रंभा को बहुत मस्त कर दिया & उसकी चूत तो बिल्कुल बुरी तरह कसमसाई.विजयंत नीचे हुआ & उसके साथ-2 दोनो जिस्मो के बीच रंभा की कमर पे अटकी नेग्लिजी भी.

विजयंत नीचे बैठ गया & रंभा के पेट को चूमते हुए उसकी बाई जाँघ को अपने दाए कंधे पे चढ़ाया & उसकी गीली चूत से होंठ लगा दिए.रंभा ने दाए हाथ को सर के उपर ले जाते हुए बगल की चौखट थाम रखी थी & बाए से विजयंत के बॉल नोचती उसे अपनी चूत पे दबाए हुए थी.उसके कंधे वैसे ही दीवार से लगे थे & उसकी कमर आगे-पीछे हो रही थी.विजयंत पूरे जोश के साथ उसकी चूत मे मुँह घुमा रहा था.

रंभा की चूत का रस उसकी जाँघो पे भी बह आया था & विजयंत ने वाहा से भी उसे चाट लिया.उसका दाया हाथ रंभा की गंद बाई फाँक को बाई जाँघ के नीचे से जाते हुए पकड़ चुका था & बया उसकी कमर को थामे था.गंद दबोचते हुए वो अपनी महबूबा की चूत चाते चला जा रहा था.रंभा ने अधखुली पॅल्को से अपनी बेख़बर सो रही सास को देखा & मुस्कुराइ..अफ कितना रोमांच आ रहा था उसे..उसकी सास भी यही मौजूद थी लेकिन इस बात से अंजान की उसका पति उसकी अपनी बहू की चूत मे जीभ घुसाए उसकी बहू के कदमो मे बैठा है.

विजयंत की ज़ुबान अब रंभा को बहुत पागल कर रही थी.उसकी टाँगे कमज़ोर होती महसूस हुई तो उसने बाया हाथ भी उसके सर से हटाया & दीवार को थाम लिया लेकिन फिर भी वो नीचे झुकने लगी.विजयंत ने भी बाए हाथ मे चौखट को पकड़ा & दाए को दीवार पे लगा दिया & बहू की चूत मे ज़ुबान ऐसे घुसाने लगा मानो वो लंड हो.कंधे दीवार से लगाए रंभा दीवार के सहारे हल्की-2 आहे लेते हुए कमर विजयंत के मुँह पे थेल्ते हुए उचकाने लगी.विजयंत की ज़ुबान कुच्छ ज़्यादा अंदर गयी & रंभा के हाथ जो उसके सर के उपर थे,नीचे फिसले & चौखट & दीवार को थामे वो कमर उचकाने लगी & थोड़ी तेज़ आह भर दी.वो झाड़ गयी थी.

विजयंत फ़ौरन उठा & उसकी कमर को थाम उसे खुद से चिपका लिया.रंभा ने अपनी आहें उसके सीने मे मुँह च्छूपा के दफ़्न की.तभी रीता ने करवट ली तो दोनो बुत बन गये.,रंभा ने धीरे से विजयंत के बाए कंधे के उपर से सास को देखा तो विजयन ने भी गर्दन घुमाई.रीता को कुच्छ पता नही चला था & वो अभी भी सो रही थी.विजयंत ने रंभा को पलटा तो 1 बार फिर रंभा ने दीवार & चौखट को थामा मगर इस बार बाया हाथ चौखट पे था & दाया दीवार पे.

विजयंत ने उसकी कमर थाम उसके दाए कान को पीछे से चूमा तो रंभा ने अपनी कमर पीछे उचका उसके लंड पे अपनी मोटी गंद दबाई.विजयंत ने फ़ौरन अपनी ट्रॅक पॅंट को थोड़ा नीचे किया & उसकी टाँगे फैला दी.रंभा गंद पीछे निकालते थोड़ा झुकी & विजयंत ने 1 पल मे लंड उसकी चूत मे घुसा दिया.रंभा की गंद की मोटाई लंड को जड तक समाने से रोक रही थी लेकिन उस से उसे कोई परेशानी नही थी.लंड इतना बड़ा था कि अभी भी वो उसकी बहुत मस्त चुदाई कर रहा था.

विजयंत ने बहू की कमर को बाए हाथ मे थामा & डाए से उसके बॉल पकड़ के खींचे तो रंभा ने आह भरी & अपना सर पीछे कर अपने खुले होंठ अपने ससुर की शान मे पेश किए.विजयंत ने उसके बॉल पकड़े-2 ही उसे चूमा & फिर उसका चेहरा आगे कर थोडा पीछे हुआ तो रंभा गंद & पीछे करते हुए उस से चुद्ति & झुकी.विजयंत ने उसके रेशमी बालो को आगे करते हुए उसकी पीठ को चूमा तो रंभा ने बेसब्री से चौखट पे हाथ फिराया.

विजयंत जितना झुक सकता था,उतना झुक के बहू की मखमली पीठ पे अपने गर्म लब चला रहा था.रंभा दीवार खरोंछती उसके लंड की चोट से मस्त हो रही थी.उसकी चूत 1 बार फिर झड़ने को तैय्यार थी.विजयंत सीधा खड़ा हो उसके कंधो से लेके उपरी बाहो से होते हुए उसके जिस्म के बगल मे अपने सख़्त हाथ फिराते हुए गहरे धक्के लगा रहा था.रंभा भी गंद पीछे कर उसके धक्को का जवाब दे रही थी.

विजयंत थोड़ा आगे हो गया & उसकी कमर थाम धक्के लगाने लगा तो रंभा भी सीधी खड़ी हो गयी & गंद को पीछे कर दिया & दीवार पे दया गाल सटाके बाए पे अपने प्रेमी के तपते लबो की गर्मी महसूस करते उसके धक्को का मज़ा लेने लगी.रंभा ने चौखट को जाकड़ लिया & & दीवार पे नाख़ून चलाया & बहुत ज़ोर से कमर हिलाई.वो झड़ने लगी थी & विजयंत ने आगे झुक के उसके होंठो को अपने लाबो की क़ैद मे ले उसकी आहो को भी अपने हलक मे दफ़्न कर लिया.

रंभा धीमे-2 सिसकते हुए खड़ी थी.विजयंत ने लंड बाहर खींचा,पॅंट उपर की & उसे घुमा उसका मस्ती भरा चेहरा अपने सामने किया.रंभा की आँखे नशे मे डूबी हुई थी.उसके दोनो बाज़ू उसके सर के बगल मे दीवार से लगे थे.विजयंत का बाया हाथ उसकी गर्दन पे आया & उसके चेहरे को थामा & फिर वो उसके बाए गाल पे चूमने लगा.रंभा ने आह भरते हुए अपनी मरमरी बाहें उसकी गर्दन मे डाली तो विजयंत ने थोड़ा झुकते हुए उसकी दाई चूची को अपने बाए हाथ मे दबोचा & उसकी गर्दन चूमने लगा.

रंभा की मस्ती को आज वो ज़रा भी कम नही होने दे रहा था.रंभा ने उसे खुद से चिपका लिया & वो उसकी छाती पे चूमने लगा.उसका बाया हाथ चूची से सरका & रंभा के चेहरे पे मस्ती की शीकने पैदा करवाने के लिए उसकी चूत से जा लगा.रंभा पागलो की तरह कमर हिलाने लगी.रंभा घुटने झुकती टाँगो को फैलाती मानो ससुर की उंगली को अंदर ले लेना चाहती थी.विजयंत उसकी चूचियो को चूमता हुआ नीचे हुआ & उसके पेट पे अपने लबो के निशान छ्चोड़ता हुआ उसकी चूत पे आया & चाटने लगा.रंभा तो मस्ती मे पागल हो गयी.

विजयंत थोड़ी देर चूत को चूमने,चाटने के बाद वापस पेट से होता हुआ उपर पहुँचा & सीधा खड़ा हो बहू को बाँहो मे भरने लगा तो उसने उसके लोहे सरीखे सख़्त बाजुओ को पकड़ उसे खुद से थोडा दूर किया & दया हाथ नीचे ले जाके उसकी ट्रॅक पॅंट के उपर से लंड को दबाने लगी.विजयंत उसके चेहरे को पकड़ उसे चूमने लगा तो रंभा ने कुच्छ देर लंड को दबाने के बाद उसकी पॅंट को नीचे सरका दिया & फिर उसे बाहो मे भर उसके बालो भरे सीने को अपने सीने पे,उसके पेट को अपने चिकने पेट पे & उसके लंड को अपनी चूत पे दबा दिया.

विजयंत उसकी इस हरकत से जोश से पागल हो उठा.उसने बहू को बाहो मे भर उसकी गर्दन चूमते हुए चूत पे ऐसे ही लंड दबा के कमर गोल-2 हिलानी शुरू कर दी.उस से चिपटि उसके बाए कंधे के उपर से सास पे नज़र रखी रंभा तो बस हवा मे उड़ी जा रही थी.उसके हाथ उसकी गर्दन से फिसले & उसके मज़बूत पीठ की मांसपेशियो की गठन को महसूस करते हुए नीचे आए & उसकी पुष्ट गंद से चिपक गये.विजयंत समझ गया कि बहू अभी & चुदना चाहती है.

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क्रमशः.......
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