Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
08-18-2019, 02:59 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
लोग कहते है मुझे घमंड नही करना चाहिए लेकिन मेरे साथ सिचुयेशन ही ऐसी पैदा हो जाती है कि मैं घमंडी होने पर मज़बूर हो जाता हूँ.अब आज के खूनी ग्राउंड के खेल को उदाहरण के तौर पर ले लो....कॉलेज के एक से एक सूरमाओ को पानी पिलाने के बाद अब बंदा घमंड ना करे तो क्या शरम करे. वैसे भी लाइफ मे मज़ा हवा की तरफ बहकर नही आता ,उसके खिलाफ जाकर आता हैं,ये बात अलग है की कभी-कभी यहिच मज़ा...सज़ा दे जाता है.

लोग कहते है कि मैं ज़्यादा हवा मे उड़ता हूँ लेकिन उन बक्लोलो को कौन समझाए कि दुनिया उपर से ही खूबसूरत दिखती है,नीचे से तो लगभग सब कुच्छ बदसूरत ही है.ऐसी लाइन्स मैं घंटो बोल सकता हूँ, लेकिन अभी आराधना हॉस्पिटल मे अड्मिट थी ,इसलिए मैं अपने सपने से निकलकर वास्तविक दुनिया मे आया....जहाँ मैं , पांडे जी और अरुण बाइक पर हॉस्पिटल की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे थे.

"देख कर चलाओ ,अरुण भाई...वरना अभी तो हमलोग किसी का हाल चाल पुछने हॉस्पिटल जा रहे है ,कही थोड़ी देर बाद लोग हमारा हाल-चाल पुछने ना आ जाए..."

"लवडे, तुझे भाई की ड्राइविंग पर शक़ है...रुक अभी तुझे मैं अपना कंट्रोल दिखाता हूँ...."कहते हुए अरुण ने स्पीड बढ़ा दी....

"एक बात बताओ बे, तुमलोग उधर कैसे पहुँचे..."

"किधर...ग्राउंड पर..."

"ह्म..."

"वो तो लवडा मुझे कल ही हॉस्टिल के एक लौन्डे ने बता दिया था कि ,तुझे पेलने का प्लान महंत और यशवंत बना रहे है.जो मैं तुझे कल बताना भूल गया और सुबह-सुबह वही लौंडा आया और हम सबको जगा कर बोला कि तुझे ग्राउंड पर घेरने का प्लान है ,बस फिर क्या था...पहुच गये हम लोग..."

"और ये लड़का कौन था,जिसने मुझे बचा लिया...उसे तो ऑस्कर मिलना चाहिए..."

"महंत के ग्रूप का ही लड़का है ,जिसने ऐन वक़्त पर दल बदल लिया,वरना अभी मैं और पांडे आराधना को नही, तुझे देखने जा रहे होते...."

"यदि वो महंत के ग्रूप का था तो फिर ग्राउंड पर क्यूँ नही था...."

"तुझे क्या लगता है, बहाने सिर्फ़ तू ही बना सकता है...उसने भी कुच्छ बहाना बना दिया होगा और उसे ये सब इतना एग्ज़ॅक्ट इसलिए पता था क्यूंकी हमे ये सब इन्फर्मेशन देने वाला और कोई नही बल्कि कालिया-महंत के रूम मे रहने वाला उनका रूम पार्ट्नर था..."

"लवडे के बाल ,आलुंद...जब तुझे मालूम था कि वो लोग मुझे पेलने का प्रोग्राम बना रहे थे तो तूने मुझे रात को क्यूँ नही बताया....मैं पेला जाता तो, तुझे मालूम है कि मेरी कितनी फट गयी थी..."

"अब लवडा मुझे क्या मालूम था कि रोज 10 बजे उठने वाला ,आज 8 बजे उठकर बीड़ी पीने जाएगा...एक तो साले सुबह जल्दी उठकर घोर पाप करता है ,उपर से इल्ज़ाम मेरे उपर डाल रहा है...हट लवडा, बात मत कर तू मुझसे, उतार बाइक से..."

"ज़्यादा होशियारी मत झाड़...नही तो उठाकर नीचे फेक दूँगा..."
.
जब मुझे पता चला था कि आराधना ने स्यूयिसाइड किया है तो मैं बहुत टेन्षन मे आ गया था लेकिन जब मुझे ये मालूम चला कि वो ज़िंदा है तो मैं उतना ही रिलॅक्स भी हो गया....लेकिन जो मैं सोच रहा था..हालात उससे ज़्यादा खराब थे, बहुत ज़्यादा खराब....जिसका पता मुझे हॉस्पिटल पहुच कर लगा....

हॉस्पिटल मे पहुचने वाला मैं अकेला नही था ,वहाँ मेरे पहुचने से पहले ही कॉलेज के बहुत से लोग मौज़ूद थे, जिसमे गर्ल्स हॉस्टिल की वॉर्डन, उसकी फ्रेंड्स और कुच्छ लड़के थे,जिनका रूम हॉस्पिटल से थोड़ी दूरी पर ही था...

"जाओ बे ,पुछ्कर आओ कि वो अब कैसी है और ये ज़रूर पुछ्ना की आराधना ने स्यूयिसाइड क्यूँ किया...."

"चल पांडे..."अरुण ने कहा...

"तू मत जा...राजश्री पांडे को अकेले भेज...जा बे पांडे ए टू Z ,सब कुच्छ पता करके आना...."

मैं और अरुण कॉलेज के बाकी लोगो से बहुत दूर ही बैठे और राजश्री पांडे ,उन सबकी तरफ जानकारी इकट्ठा करने गया....राजश्री पांडे, बहुत देर तक उनलोगो से बात करता रहा और जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता ,पांडे जी की शक्ल की रंगत ख़तम होती जा रही थी...जिसके कारण मेरा भी गला सुख़्ता जा रहा था की तभी अरुण ने मुझसे पुछा...

"अबे ,अरमान...कही आराधना तेरी वजह से तो....."

"हट साले...इस टाइम पर मज़ाक मत कर..."

"मैं मज़ाक नही कर रहा...तूने ,उसे छोड़ दिया कही इसलिए तो उसने स्यूयिसाइड नही किया....."

"पा...पागल है क्या बे.प्यार मे भी कोई स्यूयिसाइड करता है...यहाँ यूनिवर्स हर एक सेकेंड मे मिलियन्स माइल एक्सपॅंड हो रहा है और तू उन पुरानी बातों को लेकर पड़ा है...."मैने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए हड़बड़ाहट मे बोला"और ये भोसड़ीवाले, पांडे...वहाँ लड़कियो को लाइन मारने लगा क्या...जो अभी तक वापस नही आया..."

मेरी ये गाली तुरंत असर कर गयी और राजश्री पांडे अपनी बात-चीत ख़तम करके हमारी तरफ आने लगा....शुरू-शुरू मे जब मैं हॉस्पिटल के अंदर आया था तब मैने सोचा था कि आराधना बिल्कुल ठीक होगी और बेड पर शरम के मारे अपना सर झुकाए पड़ी होगी...जहाँ जाकर मैं उससे कहूँगा कि'कैसे बे...ज़िंदा कैसे बच गयी...' लेकिन यहाँ आकर मैने जो सीन देखा उसे देखकर मैं इतना बेचैन हो गया कि पांडे जी के हमारे पास पहुचने से पहले ही मैं अपनी जगह पर खड़ा हुआ और तुरंत पांडे जी कि तरफ चल दिया.....जिसके कारण कॉलेज से जो-जो लोग वहाँ मौज़ूद थे, उन सबकी नज़र मुझपर पड़ गयी.....
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"अरमान भाई, अभी आप चुप-चाप मेरे साथ बाहर चलो, बाहर सबकुच्छ बताता हूँ..."

"हुआ क्या...वो ठीक तो है ना..."

"आइ.सी.यू. मे है...डॉक्टर्स बोल रहे है कि 50-50 का चान्स है...अभी आप बाहर चलो, वरना यदि कॉलेज के लड़कियो ने आपको यहाँ देख लिया तो कही बवाल ना मचा दे...आप मेरे साथ सीधे बाहर चलो..."
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वहाँ से बाहर आने के बाद राजश्री पांडे ने वो सब कुच्छ बताया, जो उसे आराधना की सहेलियों से पता चला था...जिसके अनुसार...आराधना ने कल सुबह रॅट पाय्सन खाया था, लेकिन रॅट पाय्सन ने तुरंत असर नही किया और दोपहर तक उसकी तबीयत जब कुच्छ डाउन हुई तो उसे हॉस्टिल मे ही ग्लूकोस के कुच्छ बॉटल चढ़ा दिए गये, जिसके बाद वो कुच्छ देर तक ठीक रही और फिर आधे-एक घंटे के लिए फेरवेल पार्टी मे भी आई.फेरवेल पार्टी से आने के बाद उसकी तबीयत फिर खराब हुई और जब उसकी सहेलियो ने वॉर्डन को इसकी खबर दी तो वॉर्डन ने उसे हॉस्पिटल मे अड्मिट होने के लिए कहा...लेकिन आराधना ने ही हॉस्पिटल जाने से मना कर दिया और फिर रात को नींद की कयि गोलिया खाकर सो गयी लेकिन आज सुबह होते ही उसकी हालात बहुत ज़्यादा खराब हो गयी....जिसके बाद एमर्जेन्सी मे उसे यहाँ हॉस्पिटल लाया गया.

राजश्री पांडे ने मुझे आराधना के स्यूयिसाइड की वजह भी बताई और वो वजह मैं था...जिसका उल्लेख आराधना ने बाक़ायदा स्यूयिसाइड लेटर लिखकर किया था, जो पहले आराधना की सहेलियो को मिला और फिर उसकी सहेलियो के द्वारा वॉर्डन को......
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"अबे महान चूतिए....."अपना माथा पकड़ कर अरुण बोला"ये क्या किया तूने.....उधर कलेक्टर के लड़के का केस और इधर ये आराधना का स्यूयिसाइड केस...."

"ऐसा थोड़े होता है...कॉलेज के कितने लड़के-लड़किया एक-दूसरे को ऐसे धोखा देते है...तो क्या सब स्यूयिसाइड कर ले....इसमे मेरी क्या ग़लती है..."

"तेरी पहली ग़लती ये है कि तूने एक ग़लत लड़की को धोखा दिया और दूसरी ग़लती ये की उसने तेरा नाम भी मेन्षन कर दिया है....."

"रुक जा...कुच्छ नही होगा.सोचने दे मुझे..."इधर-उधर चलते हुए मैने अपने 1400 ग्राम के दिमाग़ पर ज़ोर डाला कि मुझे अब क्या करना चाहिए....लेकिन मैं जब भी कुच्छ सोचने की कोशिश करता, मैं जब भी इन सबसे निकलने के बारे मे सोचता तो आराधना की फेरवेल की रात वाली सूरत मुझे दिखने लगती....जिसके कारण मेरा सोचना तो दूर ,आँख बंद करके लंबी साँसे तक लेना दुश्वार हो गया...

"बीसी...कुच्छ समझ नही आ रहा....बचा ले उपरवाले, अब से नो दारू...नो लड़की...एसा से भी ब्रेक-अप कर लूँगा...नही ब्रेक-अप नही, कही उसने भी आराधना की तरह स्यूयिसाइड किया तो ,तब तो मैं चूस लूँगा....एसा...एसा से याद आया, उसने भी तो एक बार स्यूयिसाइड करने की कोशिश की थी, जिसकी वज़ह गौतम था....लेकिन उसे कुच्छ नही हुआ था....एसस्स...अरुण ,इधर आ भी...इस प्राब्लम से बाहर निकालने का सल्यूशन मिल गया.. .किसी वकील से जान-पहचान है क्या तेरी...मेरी एक से है ,लेकिन वो सला दूसरे स्टेट मे रहता है...जल्दी बता...किसी वकील को जानता है क्या..."

"हां...एक है..."

"कॉल कर उसे जल्दी और सारी बात बता..."

"अबे, तूने सोचा क्या है पहले ये तो बता और ऐसे फटी मे मत रह...ऐसे घबराते हुए तुझे पहले कभी देखा नही ,इसलिए मुझे बेकार लग रहा है...."

"ठीक है..."मैने अपनी आँखे बंद की और जैसा कि मैने पहले भी बताया कि आराधना की तस्वीर मेरी आँखो के सामने तांडव कर रही थी...उसके बावज़ूद मैने एक लंबी साँस भरी और आँख बंद किए हुए बोला"एक बार एश ने स्यूयिसाइड किया था गौतम की वज़ह से...लेकिन गौतम को कुच्छ नही हुआ था...इसलिए प्लान ये है कि हम भी वही करेंगे ,जो गौतम ने किया था...."

"लेकिन गौतम ने क्या किया था...ये कौन बताएगा...."

"धत्त तेरी की...अब एक और झंझट...रुक थोड़ी देर सोचने दे मुझे...."मैं फिर अरुण से थोड़ी दूर आया और वहाँ पास मे लगे छोटे-छोटे पौधो की पत्तियो को मसल्ते हुए ये सोचने लगा कि अब क्या करू....कैसे मालूम करू, वो सब कुच्छ...जो गौतम ने फर्स्ट एअर मे किया था.....

मुझे कोई आइडिया तो नही मिला,लेकिन अंजाने मे मेरे द्वारा पौधो की पत्तियो का टूटना देख, वहाँ से थोड़ी दूर पर खड़े वर्कर ने मुझे आवाज़ देकर डंडा दिखाते हुए वहाँ से दूर हटने की सलाह दी....

"इसकी माँ का...यहाँ इतना सीरीयस मॅटर चल रहा है और इसे ग्लोबल वॉरमिंग की पड़ी है..."बड़बड़ाते हुए मैने उस पौधे को जड़ से पूरा उखाड़ कर उस वर्कर के सामने वही फेक दिया....जिसके बाद वो वर्कर दौड़ते हुए मेरी तरफ आने लगा....

"माँ चोद दूँगा तेरी...नही तो जहाँ खड़ा है ,वही रुक जा...बीसी आंदु-पांडु समझ रखा है क्या, जो मुझे डंडा दिखा रहा था...गान्ड मे दम है तो आ लवडा. पहले तुझ से ही निपटता हूँ, बाकी बाद मे देखूँगा...."

गुस्से से मेरी दहाड़ सुनकर वो वर्कर रुक गया और अपने साथियो को बुलाने के लिए चला गया...

"पांडे ,चल गाड़ी निकाल....ये सटक गया है अब..."बोलकर अरुण मुझे हॉस्पिटल से बाहर ले आया.....
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ऐसे मौके पर मुझे एक शांति का महॉल चाहिए था, जहाँ कोई मुझे डिस्टर्ब करने वाला ना हो लेकिन वही शांति का महॉल मुझे नसीब नही हो रहा था.हॉस्पिटल के गेट के बाहर दूसरी साइड कयि चाय-पानी वालो ने अपना डेरा जमा रखा था...जिसमे से एक पर आराधना की कुच्छ सहेलिया अपना सर पकड़ कर बैठी हुई थी....और मुझे अरुण के साथ ,बाहर खड़ा देख,सब मुझे देखकर मन मे गालियाँ देने लगी...जिससे मेरा माइंड और डाइवर्ट हुआ...

"अरमान...एक दम शांत रहना.सोना आ रही है इधर...इसलिए वो जो कुच्छ भी बोले, चुप-चाप सुन लेना...."एक लड़की को अपनी तरफ आते देख अरुण ने खुस्पुसाते हुए कहा....

"अब यार तू ,ऐसे सिचुयेशन मे ऐसी ठर्की बात कैसे कर सकता है...इधर मैं इतनी परेशानी मे हूँ और तू सोना...चाँदी की बात कर रहा है..."बोलते हुए मैने आँखे बंद की...आराधना मुझे फिर दिखी और मैने लंबी साँस ली....

"कैसा बाकलोल है बे....तू बस उससे बहस मत करना...."

"अभी मेरा दिमाग़ बहुत ज़्यादा खराब है ,यदि उसने कुच्छ आंट-शन्ट बका तो ,दो चार हाथ जमा भी दूँगा...दो केस हो ही चुका है, तीसरा भी झेल लूँगा..."

"मेरे बाप...कुच्छ देर के लिए चार्ली चॅप्लिन बन जा...."

"चार्ली चॅप्लिन...मतलब कुच्छ ना बोलू..."

"मतलब...जिस दिन चार्ली चॅप्लिन के घर मे ट्रॅजिडी हुई थी उस दिन का उसका आक्ट अब तक का बेस्ट आक्ट माना गया है...इसलिए तू भी एक दम वैसिच कूल रहना...अब चुप हो जा..वो आ गयी..."
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अरुण के कारण मैं चुप हो गया.सोना हमारे पास आकर कुच्छ देर तक अपने कमर मे हाथ रखकर मुझे देखती रही और मैं कभी बाए तो कभी दाए देखता.मैने कुच्छ देर तक इंतज़ार किया कि वो मुझे अब गाली देगी...अब गाली देगी.लेकिन जब वो मुझे कुच्छ बोलने के बजे सिर्फ़ घूरती रही तो मैं बोला...
"जो बोलना है ,बोल ना जल्दी...."
"शरम आ रही है थोड़ी ,बहुत..."
"शरम ही तो मुझे नही आती...."
"डिज़्गस्टिंग....जब से आराधना के स्यूयिसाइड के बारे मे उसके पापा को पता चला है, उन्हे होश तक नही...इधर आराधना अपनी ज़िंदगी से लड़ रही है और उधर उसके पापा....क्या बिगाड़ा था उसने तेरा, जो उसे ऐसा करने पर मजबूर कर दिया.जब प्यार था ही नही ,तब क्यूँ उसके साथ संबंध रखा तूने....ब्लडी हेल...."

सोना जैसे-जैसे मुझे सुनाती,अरुण मेरा हाथ उतनी ही ज़ोर से दबा कर शांत रहने का इशारा करता...मेरी आदत के हिसाब से तो मैं किसी का लेक्चर सुन नही सकता था ,इसलिए मैं ये सोचने लगा कि एश से कैसे मालूम किया जाए कि उसने जब स्यूयिसाइड करने की कोशिश की थी तो आगे क्या हुआ था.....

"इधर देख इधर..."बोलकर सोना ने दूसरी तरफ देख रहे मेरे चेहरे को अपने हाथो से पकड़ कर अपनी तरफ किया....

"तेरी माँ की....हाथ कैसे लगाया बे तूने...ज़्यादा कचर-कचर करेगी तो कच्चा चबा जाउन्गा.बोल तो ऐसे रही है जैसे मैने खुद ने चूहे मारने वाली दवा लाकर उसे दिया और बोला हो कि'ले खा और मर जा'...खुद तो दस-दस लौन्डे घुमाती है और मुझे यहाँ आकर नसीहत दे रही है....भूल गयी पिछले साल जब एक लड़का तेरे कारण यशवंत से मार खाया था.साली खुद तो कयि लड़को की ज़िंदगी बर्बाद कर दी और यहाँ मुझे सुना रही है..."

इस बीच अरुण ने मेरा हाथ दबाना जारी रखा इसलिए मैने उसका हाथ झटकते हुए कहा...
"हाथ छोड़ बे तू...इसे आज गोली दे ही देता हूँ, बहुत शान-पट्टी कर रही है अपुन से....तूने क्या सोचा था कि तू यहाँ आएगी और मुझे चमका कर अपने सहेलियो के सामने डींगे हाँकेगी .वो और लड़के होंगे जिनपर तू हुकूमत करती होगी...मुझसे थोड़ा दूर रहना...वरना जब पोलीस मेरे पास आएगी तो तेरा नाम ले लूँगा और कहूँगा कि'तूने मुझे ऐसा करने के लिए कहा था'...अब चल निकल यहाँ से..."

"मैने सही सुना था तेरे बारे मे...तुझे लड़कियो से बात करने की तमीज़ नही है..."

"अबे निकलती है यहाँ से...या तमीज़ सिखाऊ तुझे मैं...और बाइ दा वे, तुझे बहुत तमीज़ है लड़को से बात करने की....साली........."मेरे मुँह से आगे बस गालियाँ ही निकलने वाली थी कि मैं चुप हो गया....

"अभी चाहे कितना भी अकड़ ले ,ये सब करके तुझे रात मे बहुत टेन्षन होगी.तुझे नींद तक नही आएगी...."

"अपुन की लाइफ मे जब तक टेन्षन ना हो तो टेन्षन के बिना नींद ही नही आती...अब तू चल जा..."

"हाउ डेर यू..."

"आ गयी ना अपनी औकात पे...चार साल मे इंग्लीश की सिर्फ़ एक लाइन सीखी'हाउ डेर यू'....अब चल इसी के आगे इंग्लीश मे बोल के दिखा...."

इसके बाद सोना कुच्छ नही बोली और चुप-चाप उधर से जाने लगी....लेकिन मैं फिर भी चिल्लाते हुए बोला..
"अपने कान के साथ अपना सब कुच्छ खोल सुन ले...ये सर सिर्फ़ तिरंगे के आगे झुकने के लिए बना है...लड़कियो के सामने नही और तुझ जैसी लड़की के सामने तो बिल्कुल भी नही...अगली बार से किसी लड़के को कुच्छ बोलने से पहले सोच लेना क्यूंकी हर लड़के तेरे बाय्फरेंड्स की तरह झन्डू नही होते...कुच्छ झंडे भी गाढ देते है..."
Reply
08-18-2019, 03:00 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
सोना के जाने के बाद ,मैं अरुण के साथ कुच्छ देर वही खड़ा रहा और जैसे ही राजश्री पांडे बाइक निकालकर बाहर आया...हम दोनो बाइक पर बैठकर हॉस्पिटल से निकल लिए....

"एश से पुच्छू क्या बे...बताएगी ना..."

"देख ले...डाइरेक्ट मत पुछ्ना...थोड़ा घूमा-फिरा कर बात करना..."अरुण बोला...

"मैं क्या बोलता हूँ अरमान भाई...एश को सब कुच्छ सच बता दो और फिर पुछो....मुझे पक्का यकीन है कि वो ज़रूर मदद करेगी..."पीछे मुड़कर राजश्री पांडे ने कहा...

"तू लवडे सीधे देखकर बाइक चला और जब मुझे यकीन नही है कि सच बताने से एश हेल्प करेगी तो तुझे कैसे यकीन है बे...चूतिए...अब ,लवडा तुम दोनो मे से कोई कुच्छ मत बोलना,मैं कॉल कर रहा हूँ उसके पास..."
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मैं हमेशा से यही मानता हुआ चला आ रहा था कि मेरे सामने कोई सी भी दिक्कत...कैसी भी परेशानी आए ,मैं उन सबको बड़ी आसानी से झेल सकता हूँ और मेरा यही भ्रम मुझे उस वक़्त हिम्मत दे रहा था कि मैं कुच्छ ना कुच्छ तो ऐसा सोच ही लूँगा, जो मुझे इस प्राब्लम से बाहर निकालेगा....लोग कहते है कि मुझमे घमंड बहुत है ,मुझे घमंड नही करना चाहिए ,लेकिन अब उनको ये कौन समझाए कि यही घमंड तो है, जो मुझे बुज़दिल नही बनाता......

मैने बाइक पर बैठे-बैठे अपनी आँखे बंद की और फिर लंबी साँस ली....उस वक़्त यूँ आँखे बंद करके अपने फेफड़ो को हवा से भरने मे मुझे अच्छा फील हो रहा था और मेरी बेचैनी भी कम हो रही थी....

"हेलो...."एसा के कॉल रिसीव करते ही मैं बोल पड़ा"मेरे मोबाइल पर अभी दिव्या का मेस्सेज आया था...उसने मुझसे कहा है कि तुम गौतम से प्यार करती हो और फर्स्ट एअर मे तुमने गौतम के लिए स्यूयिसाइड भी किया था...."

"सब पुरानी बात है...तुम ना ही पुछो..."जिस तेज़ी के साथ मैने सवाल किया ,उसी तेज़ी के साथ एश की तरफ से जवाब आया....

"पुरानी दारू और पुरानी घटनाए हमेशा ही असरदार होती है...."

"मैने तुमसे कभी आराधना के बारे मे पुछा, जो तुम मुझसे गौतम के बारे मे पुच्छ रहे हो...."

"अभी डाइलॉग-डाइलॉग खेलने का टाइम नही है.....जल्दी बता,,.."

"पुछते रहो..मैं नही बताने वाली..."

"ठीक है, फिर...मुझसे मिलने एक घंटे बाद सिटी केर मे आ जाना...."

"क्यूँ..."

"क्यूंकी मैं इस वक़्त हॉस्टिल की छत मे खड़ा हूँ और बस कूदने वाला हूँ....ज़िंदा रहा तो मिल लेना ,वरना दूर से देखकर चले जाना...."मोबाइल को थोड़ी दूर ले जाते हुए मैने पांडे जी से कहा"बाइक रोक साइड मे और मेरा नाम चिल्लाना..."

" तो मैं कहाँ था...हां याद आया, मैं स्यूयिसाइड करने वाला था...मुझे जब से दिव्या ने ये मेस्सेज किया है तबसे दो-तीन हार्ट अटॅक आ चुके है...पानी पीता हूँ तो प्यास और लगती है, खाना ख़ाता हूँ तो भूख और बढ़ती है....जल्दी से बता,वरना बस मैं कूदने ही वाला हूँ...."

"चिल्लाओ बे..."राजश्री पांडे को एक झापड़ मारकर मैने कहा और मेरा झापड़ खाकर वो तुरंत चिल्लाने लगा....
"अरमान भाई....अरमान भाई.....अरमान भाई...."

"बोसे ड्के नाम ही लेता रहेगा या आगे भी कुच्छ बोलेगा...."दूसरा झापड़ मारकर मैं धीरे से बोला...

"अरमान भाई...नीचे आ जाओ, वरना गिरोगे तो हाथ पैर टूट जाएँगे..."

"अबे हाथ ,पैर नही...मैं मर जाउन्गा सीधे ये बोल..."
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राजश्री पांडे ने वैसा ही बोला ,जिसे सुनने के बाद एश की जीभ लड़खड़ाने लगी और मैं समझ गया कि आराधना के स्यूयिसाइड से बचने के लिए मुझे अपने स्यूयिसाइड का खेल बस थोड़ी देर तक और जारी रखना है...

"अब बोलती है या मैं जंप मारू..."

"ठीक है.....तुम पहले वापस नीचे उतर जाओ....वो गौतम ने मुझे छोड़ने की धमकी दी थी...इसलिए मैने स्यूयिसाइड किया था..."

"बस इतना ही...हाउ बोरिंग. मैने सोचा कुच्छ इंट्रेस्टिंग मॅटर रहा होगा....उसके बाद क्या हुआ..."

"उसके बाद मैं हॉस्पिटल मे कुच्छ दिन रही और फिर वापस घर आ गयी..."

"कोई केस नही किया था तुमने या तुम्हारे घरवालो ने..."मुद्दे पर आते हुए मैने एश से पुच्छा...

"नही...शुरू मे शायद मेरे डॅड ने एफआईआर की थी ,गौतम के खिलाफ...लेकिन उनके लॉयर ने मेरे बचने के बाद मेरे डॅड को केस वापस लेने के लिए कन्विन्स कर लिया....दट'स ऑल"

"फोन रख अब....बाद मे बात करता हूँ...चल बाइ."

"अरे...ऐसे कैसे..."एश कुच्छ और बोलती उससे पहले ही मैने कॉल डिसकनेक्ट कर दिया और अरुण को घसीट कर अपनी तरफ खींचते हुए बोला"तू अपने पहचान वाले जिस लॉयर की बात कर रहा था ना,उसे फोन करके उसके पैर पकड़ ले और पूरा मॅटर बक डाल..."

"अभिच कॉल करू"

"नही...अभी क्यूँ कॉल करेगा...एक साल बाद करना.."

"वो तो मैं इसलिए पुच्छ रहा था क्यूंकी वो तेरी तरह फ़िज़ूल इंसान नही है...आड्वोकेट है वो..."

"अरुण भाई...आड्वोकेट क्या करेगा इस मॅटर मे ,लॉयर को कॉल करो...जो काला कोट पहन कर अदालत मे जाता है..."

"अबे चूतिए....."कॉल करते हुए अरुण मुझसे बोला"इसको समझा कुच्छ..."

"तू इधर आ साइड मे..."राजश्री पांडे को थोड़ी दूर लाते हुए मैने कहा"आड्वोकेट भी लॉयर ही होता है बे , लवडे...."

"मतलब..."

"अब मतलब कैसे समझाऊ तुझे....मतलब जाए गान्ड मारने अभी तू चुप रह, हॉस्टिल जाकर गूगले महाराज से पुच्छ लेना..."
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एश से बात करने पर मुझे कुच्छ खास मदद नही मिली क्यूंकी लॉयर वाला आइडिया तो मेरे दिमाग़ मे पहले ही आ गया था...लेकिन एश से बात करने के बाद जो मुझे पता चला वो ये कि , मैं अब बुरी तरह से फस गया हूँ क्यूंकी एश के केस मे उसके डॅड ने कॉंप्रमाइज़ कर लिया था और एश ज़िंदा भी बच गयी थी .मेरे केस मे फिलहाल अभी तो ऐसा कुच्छ भी नही था...क्यूंकी ना तो आराधना का बाप मुझसे कॉंप्रमाइज़ करने वाला था और ना ही अभी ये श्योर था कि आराधना ज़िंदा बच जाएगी....

"भट्टी भैया बोल रहे है कि पोलीस यदि तुझे लेने आए तो भागना मत और चुप-चाप उनके साथ चले जाना...."

"ये तो मैं ऑलरेडी करने वाला था....आगे बोल और ये कैसा नाम है...भट्टी"

"अबे भट्टी उन्हे प्यार से कहते है...उनका पूरा नाम भारत त्रिवेदी है...भट्टी भैया बोल रहे थे कि तू पोलीस को सब कुच्छ सच मत बताना मतलब तू पोलीस से ये बोलना कि आराधना ही तुझे परेशान कर रही थी....तेरे और आराधना के बीच सेक्स हुआ है, इसका ज़िकरा तो बिल्कुल भी मत करना....बाकी भट्टी भैया कुच्छ घंटे मे हॉस्टिल आ जाएँगे..."

"तो मुझे करना ये है कि अब मैं चुप-चाप हॉस्टिल जाउ और वही पड़ा रहूं....है ना..."

"हां..."

"तो चल....अब थोड़ा बेटर फील कर रहा हूँ..."
.
यदि मुझे मालूम होता कि मेरे छोड़ने के बाद आराधना ऐसा गुल खिलाएगी तो मैं कभी उसे देखता तक नही...कभी उससे बात तक नही करता. वो तो मेरी ही किस्मत फूटी थी जो मैं उसकी रॅगिंग के वक़्त वहाँ कॅंटीन मे मौज़ूद था...जिसके बाद हम दोनो की बात-चीत चली.ये बात-चीत वही दब जाती लेकिन फिर एश के कारण मेरे अंदर आंकरिंग करने का कीड़ा जागा और वहाँ मुझे फिर आराधना मिली...जिसके बाद एक-दिन मेरे मुँह से एश के लिए 'आइ लव यू' निकल गया और मैने आराधना से बेतहाशा प्यार करने का एक्सक्यूस दे मारा, लेकिन मुझे क्या पता था कि मेरा वो एक्सक्यूस एक दिन मुझपर ही अक्क्यूज़ बनकर बरसेगा...जो हुआ सो हुआ ,सब कुच्छ तब भी ठीक हो सकता था लेकिन मुझे ही आराधना को छोड़ने की कुच्छ ज़्यादा ललक थी और मेरे उस वर्ब मे कल्लू के चॅलेंज ने हेल्पिंग वर्ब का काम किया....

हॉस्टिल आते समय बाइक मैं चला रहा था और साथ मे ये भी सोच रहा था कि कितना फास्ट हूँ मैं, अभी मेरे खिलाफ कोई केस तक नही बना और इधर मैने उससे बचने का रास्ता भी बना लिया लेकिन मेरी सोच मुझपर तब भारी पड़ी...जब हॉस्टिल पहुचने के कुच्छ देर बाद ही पोलीस की जीप घरघराते हुए हॉस्टिल के सामने खड़ी हुई....कयि पोलीस वाले हॉस्टिल के अंदर घुसे और जितनों को देखा उन्हे पकड़ कर बाहर निकाला और ज़मीन पर बैठा दिया....

"बहुत चर्बी बढ़ गयी है तुम लोगो के अंदर जो साले आए दिन हर किसी को मारते फिरते हो....आज बेटा कलेक्टर के लड़के को मारकर फसे हो जाल मे...अभी थाने लेजकर तुम लोगो की सारी चर्बी उतारता हूँ...."अपनी जेब से काग़ज़ का एक टुकड़ा निकाल कर एक पोलीस वाले ने कहा"मैं जिनके-जिनके नाम लूँगा...वो जाकर जीप मे बैठ जाए...."

"अरमान....अरुण....सौरभ...राजश्री पांडे....उमेश....संतोष...बृजेश....सूरज प्रताप...राधेलाल...सब यही पर है..."

जवाब मे वहाँ मौज़ूद लौन्डो ने अपना हाथ उठा दिया...जीप के पीछे वाली सीट पर आराम से 4 और मुश्किल से सिर्फ़ 6 लोग ही बैठ सकते थे...लेकिन उन सालो ने बोरियो की तरह दस लोगो को दबा-दबा कर भरा....कौन कितना डर रहा था ,किसकी कितनी फटी थी...ये हम मे से कोई नही जानता था...लेकिन इतना तो ज़रूर था कि जिन 10 लड़को को पोलीस ने पकड़ा था उनमे से कोई थाने ले जाते वक़्त रोया नही और ना ही किसी ने पोलीस के सामने अपने हाथ जोड़े...बीसी सब रोल से जीप मे ऐसे बैठे जैसे उन्हे पोलीस स्टेशन नही बल्कि किसी फंक्षन मे ले जाने के लिए ऐज आ चीफ गेस्ट इन्वाइट किया गया हो....

दुनिया मे कुच्छ भी करो, किसी के लिए भी करो ,कैसे भी करो...सबसे ज़्यादा इंपॉर्टेंट होता है उसकी शुरुआत और उससे भी ज़्यादा इंपॉर्टेंट होता है उस शुरुआत का अंत.फिर चाहे वो कोई साइन्स प्रॉजेक्ट हो या फिर कोई एग्ज़ॅम...फिर चाहे वो प्यार करना हो या फिर मूठ मारना...हर एक करता, हर एक करम और हर एक कारण मे ये फिट बैठता है...

मेरे कॉलेज लाइफ की शुरुआत एक दम झान्ट हुई थी ,ये मुझे मालूम था लेकिन मेरी कॉलेज लाइफ का अंत भी झाटु होगा ,ये मुझे नही मालूम था...बिल्कुल भी नही...ज़रा सा भी नही...एलेक्ट्रान के साइज़ के बराबर भी नही. यदि 8थ सेमेस्टर को निचोड़ा जाए तो बहुत से ऐसे रीज़न मालूम होंगे...जिसके चलते वो सब कुच्छ हुआ, जिसे बिल्कुल भी नही होना चाहिए था....जैसे कॉलेज के 50 साल उसी साल पूरे हुए, जब मैं फाइनल एअर मे था और प्रिंसीपल ने पूरे फाइनल एअर को ऑडिटोरियम मे बुलाकर गोल्डन जुबिली के फंक्षन की जानकारी दी...फिर च्छत्रु महोदय बीच मे अपने आंकरिंग का ढिंढोरा पीटने के लिए आ गये और एश के करीब जाने की चाह मे मैं भी आंकरिंग करने घुस गया.


एश और मैने पूरे सात सेमेस्टर एक-दूसरे को इग्नोर मारकर गुज़रा था लेकिन उस 8थ सेमेस्टर मे आंकरिंग के चलते हम-दोनो के बीच जो गिले-शिकवे थे सब दूर हो गये....पूरे सात सेमेस्टर एश के मुँह से फ्रेंड...दोस्त का एक लफ्ज़ भी मेरे लिए नही निकला ,लेकिन 8थ सेमेस्टर मे उसने डाइरेक्ट 'आइ लव यू' बोल डाला....आंकरिंग के दौरान ही ऑडिटोरियम मे देखते ही देखते आराधना मेरी लवर बन गयी, बीसी जहाँ सात सेमेस्टर मेरी रियल लाइफ मे कोई लड़की नही थी...अरे रियल लाइफ गयी भाड़ मे मेरे तो फ़ेसबुक लाइफ मे भी कोई लड़की नही थी वही 8थ सेमेस्टर मे एक ज़िंदा हाड़-माँस की लड़की को मेरे सामने परोस दिया गया...

और तो और आंकरिंग की वजह से ही फेरवेल के दिन मेरी ज़िंदगी मे कलेक्टर का लौंडा घुसा.कुल मिलाकर कहे तो सारे फ़साद की जड़ आंकरिंग ही थी...क्यूंकी यदि मेरे अंदर आंकरिंग करने का कीड़ा ना पैदा हुआ होता तो ना तो एश और मैं एक दूसरे से कभी बात करते और ना ही आराधना मेरी कभी गर्लफ्रेंड बनती और ना ही कलेक्टर के लौन्डे से मेरी कभी मुलाक़ात होती, क्यूंकी मेरे आंकरिंग ना करने की सिचुयेशन मे हॉस्टिल और सिटी के स्टूडेंट्स का फेरवेल अलग-अलग होता.......................
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पोलीस स्टेशन पहुचते ही हम सबको लॉक अप के अंदर डाल दिया गया...कयि घंटे हम सब लॉक अप मे एक साथ बंद रहे ,लेकिन हम मे से कोई कुच्छ नही बोला....सब ऐसे बिहेव कर रहे थे जैसे कोई एक-दूसरो को जानता तक ना हो या फिर सब गुंगे बहरे हो गये थे...

"क्या ये सब मेरी वजह से हुआ है..."उन सबको ऐसे शांत किसी सोच मे डूबा हुआ देख मैने खुद से कहा"नही...यदि ये लोग मुझे कसूरवार मानते तो कबका अरुण मुझसे भिड़ गया होता...वैसे मैने किया भी क्या है, ये सब तो होता रहता है...यदि मैं उन लोगो को नही मारता तो वो लोग मुझे मारते...नोप, मैने कुच्छ ग़लत नही किया ,मैं कुच्छ ग़लत कर भी नही सकता..."

"तुम मे से अरमान कौन है...."मेरे ध्यान मे विघ्न डालते हुए एक कॉन्स्टेबल ने लॉकप के बाहर से पुछा...

"मैं हूँ..."अपना एक हाथ खड़ा करते हुए मैने जवाब दिया...

"चल बाहर आ....एस.पी. साहब बुला रहे है..."

"एस.पी.....ये तो अपना ही आदमी है. दो-चार नसीहत देकर छोड़ देगा...बच गये लवडा..."एस.पी. का नाम सुनकर मेरे अंदर यही ख़याल आया और मैं तुरंत उठकर कॉन्स्टेबल के पीछे चल दिया...
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"नमस्ती सर..."एस.पी. को देखकर मैं बोला...

"चल बैठ..."

"धन्यवाद सर..."झटके से चेयर खींच कर मैं ऐसे बैठा जैसे अभी थोड़ी ही देर के बाद हम दोनो मिलकर दो-दो पेग मारेंगे....

मेरी नज़र मे आर.एल.डांगी यानी कि अपने पोलीस अधीक्षक की जो छवि थी ,वो एक बहुत ही सज्जन पुरुष की थी...एक दम सीधा-साधा जीवन, शांत स्वाभाव...सरल व्यवहार...अत्यंत दयालु...कुल मिलाकर मैं आर.एल.डांगी को एक बहुत ही नेक दिल इंसान समझता था, लेकिन मेरी ये ग़लतफहमी उस दिन दूर गयी...
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08-18-2019, 03:00 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"तूने आज किसे मारा है, पता है..."

"ह्म्म..."गर्दन अप-डाउन करते हुए मेरी मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकला....

"जब तुझे पता है कि तूने किसे मारा है तो ये बता कि किसके बल पर तूने ऐसा किया....कौन है तेरे पीछे..."

"मेरे पीछे....कोई नही..."

"तुझे क्या लगता है कि मैं यहाँ क्यूँ आया हूँ...."

"केस को दबाने के लिए और मुझे पक्का यकीन है कि आपके यहाँ से जाने के थोड़ी देर बाद ही हम लोग भी निकल जाएँगे...."

"अरमान...तूने उस दिन जिस सूपरिंटेंडेंट ऑफ पोलीस को देखा था उसका बर्ताव कुच्छ अलग था और तू आज जिस सूपरिंटेंडेंट ऑफ पोलीस को देखेगा उसका भी बर्ताव कुच्छ अलग ही होगा, मेरे कहने का मतलब है कि उस दिन तूने मुझे अच्छा-भला कहा होगा लेकिन आज के बाद बुरा-भला कहेगा...इसको पकड़कर डाल दे अंदर और ठीक ढंग से मेहमान नवाज़ी करो इन सालो की...."कहते हुए डांगी महाशय खड़े हुए और फिर कॉन्स्टेबल की तरफ देखकर बोले"पहले तो इन सबकी खूब धुलाई करो और जब इनकी धुलाई हो जाए तो मुझे कॉल कर देना...."

"इस मेहरबानी की कोई खास वजह ,सर..."

"खास वजह...ह्म्म..."पीछे पलटकर डांगी बोला"खास वजह ये है कि कलेक्टर मेरा बहुत अच्छा दोस्त है और उसके लड़के को मैं अपना बेटा मानता हूँ..."

"ऐसे तो मैं भी खुद को नारायण भगवान का अवतार मानता हूँ तो मैं क्या सच मे अवतार हूँ...ये सब दकियानूसी बातें है और एक इंसान को इन सब बातो मे बिल्कुल नही पड़ना चाहिए...समझदार इंसान को तो बिल्कुल भी नही...."

"सबसे ज़्यादा इसे ही मारना और इसे इसका अहसास ज़रूर दिलाना कि दकियानूसी बातें भी दकियानूसी नही होती"

"अबे एमसी...साथ नही देना था तो मत देता...कौन सा हमलोग तुझसे मदद मॅगने गये थे बे झक़लेट...लेकिन ऐसे अपने चम्चो को हमे ठोकने के लिए बोलकर तूने बहुत ग़लत किया....रुक लवडा...मुझे बनने दे एस.पी. फिर तुझे और तेरे उस कलेक्टर को एक साथ चोदुन्गा...."स.प. को वहाँ से जाता हुआ देख मैं बड़बड़ाया....
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एस.पी. के जाने के बाद कॉन्स्टेबल ने मुझे वापस मेरे गॅंग के पास पहुचा दिया और सबको खड़े होने के लिए कहा.....
अब हमलोग शादी मे तो आए नही थे, जो पोलीस वेल नाश्ता-पानी पुचहते ,सालो ने हाथ मे डंडा लिया और जिसको पाया उसको पेलना शुरू कर दिया...बीसी मुझे टाइम ही नही मिल रहा था की कुच्छ सोच साकु...क्यूंकी मैं जब भी कुच्छ सोचने के लिए दिमाग़ पर ज़ोर डालता ,तब तक मेरे बॉडी का कोई ना कोई पोर्षन डंडे से लाल हो जाता.....शुरू-शुरू मे तो मैने दो-चार डंडे सह लिए ,लेकिन अगली बार जब कॉन्स्टेबल ने अपना डंडा उठाया तो मैने डंडा पकड़ लिया.....

"मेरे खिलाफ एक तरफ कलेक्टर और दूसरी तरफ एस.पी. है तो क्या हुआ..मेरा मामा भी एमएलए है ,इसलिए अपनी ये लाठी चार्ज अब बंद करो, वरना तुम सबकी दाई-माई एक कर दूँगा...बीसी चूतिया ,समझ कर रखे हो का बे...."मुझे मार रहे कॉन्स्टेबल पर चीखते हुए मैने कहा...."रुक क्यूँ गया , मार....तू तो बेटा ख़तम है अब....बस पता लगने दे मेरे मामा को"
मेरे मामा एमएलए है इसका उनपर जोरदार असर हुआ और थोड़ी देर तक एक-दूसरे की शक्ल देखकर वो सब लॉक अप से बाहर निकल गये....

"लवडे बोला था...मत मार उस कलेक्टर के लौन्डे को और चूतिए तेरा मामा ,एमएलए है ,ये तूने पहले ही बता दिया होता तो इतना सब कुच्छ होता ही नही..."

"मेरा कोई मामा-वामा नही है बे...वो तो ये साले पेलते ही जा रहे थे ,इसलिए हवा से एक एमएलए का कॅरक्टर लाना पड़ा...."

"वाह बेटा ,अब तो और ढंग से पेल्वा दिया तूने...जब इनको पता चलेगा कि तू इनसे झूठ बोल रहा था तब तो ये और प्यार से हमारी बॅंड बजाएँगे.....एक बार मैं यहाँ से निकल जाउ, कसम ख़ाता हूँ,तेरी सूरत ज़िंदगी मे कभी नही देखूँगा...."अरुण बोला...

"टेन्षन मत ले...जब तक इनको सच पता चलेगा तब तक तेरा वो लॉयर हमे यहाँ से निकाल ले जाएगा....मुझे तो डर इस बात का है कि कहीं ये लोग मेरे घर खबर ना पहुचा दे कि मैं यहाँ लॉक अप मे बंद पड़ा हूँ, वरना मेरा राम-राम सत्य हो जाएगा...मुझे बहुत शरीफ मानते है मेरे घरवाले..."

"तू कुच्छ भी बोल अरमान...लेकिन आज के बाद तेरी-मेरी दोस्ती ख़तम..."बोलते हुए अरुण जहाँ खड़ा था ,वही अपना सर पकड़ कर बैठ गया.....

जब से मैने एमएलए वाला झूठ बोला था, तब से मुझे सिर्फ़ आड्वोकेट भारत का इंतज़ार था कि वो आए और जल्दी से हमे निकाल ले जाए....भारत के इंतज़ार करते-करते शाम हो गयी, लेकिन वो नही आया....शाम से रात हुई, तब भी वो नही आया, उपर से अरुण मुझसे रूठा हुआ था ,जिसके कारण मैं उससे कुच्छ बात भी नही कर पा रहा था....

उस दिन हमलोग आधी रात तक जागते रहे इस आस मे कि अभिच अरुण के पहचान वाला लॉयर आएगा और हमलोगो को छुड़ा कर चलता करेगा ,लेकिन बीसी वो रात को भी नही आया....रात को क्या, वो तो लवडा सवेरे भी नही आया और तब मेरी फटनी शुरू हुई....
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"अरुण...तेरे वो भैया कहाँ रह गये..."

"गान्ड मरा तू...मुझसे क्या पुच्छ रहा है. कोई आए चाहे ना आए लेकिन यदि इन लोगो ने मुझे फिर मारा तो लवडा मैं सॉफ बोल दूँगा कि इसमे तेरा हाथ था, हमलोग को छोड़ दो..."

"दिखा दी ना अपनी औकात..."

"ह्म लवडा ,दिखा दी अपनी औकात...अब तू हर जगह अपना चूतियापा करेगा तो कहाँ तक हमलोग सहेंगे...हज़ार बार बोला था कि कलेक्टर के लड़के को हाथ मत लगा लेकिन नही यदि तू ऐसा करता तो ये दा ग्रेट अरमान की शान मे गुस्ताख़ी होती...खुद तो चूसा ही ,हमलोग को भी चुस्वा दिया...तुउउउ....बात मत कर मुझसे, वरना लवडा आज लड़ाई हो जाएगी...."

"चल बे फट्टू...इतनी ही फटी मे रहता है तो जाकर चाट ले कलेक्टर का..."

"अरमान मैं, बोल रहा हूँ...चुप हो जा..."

"अरे चल बे...तुम जैसो की बात मैं मानने लगा तो हो गया मेरा बंटाधर..."

बाकी के लौन्डो ने हम दोनो की बढ़ती लड़ाई को रोका और दोनो को एक-एक कोने मे फेक दिया....

मैं उस वक़्त कयि कारणों से परेशान था...पहला कारण कलेक्टर की पवर थी ,जिसके ज़रिए वो मेरी ऐसी-तैसी कर सकता था...दूसरा कारण ऐन मौके पर एस.पी. का मेरे खिलाफ हो जाना...तीसरा कारण आराधना थी...जिसके बारे मे ना चाहते हुए भी मुझे सोचना पड़ रहा था और चौथा कारण जो मुझे परेशान कर रहा था ,वो ये कि कल दोपहर से मेरे पेट मे खाने का एक नीवाला तक नही गया था ,जिसके चलते मेरे दिमाग़ की डोर खाने से जुड़ी हुई थी....अब खाली पेट ऐसे सिचुयेशन मे कुच्छ सोचना ठीक वैसा ही था ,जैसे की बिना लंड के चुदाई के कॉंपिटेशन मे हिस्सा लेना....
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"चलो बे ,बाहर निकलो सब...एस.पी. साहब आए है..."अपना डंडा ठोक कर एक कॉन्स्टेबल ने दूर से ही हम सबको बाहर आने के लिए कहा...

"एस.पी. आ गया है, सब लोग उसके सामने अपनी गर्दन झुका कर खड़े रहना और सिर्फ़ मुझे ही बात करने देना..."अपनी जगह पर खड़ा होते हुए सौरभ बोला"और अरमान तू ,सबसे पीछे रहना..."

"ये दुनिया बड़ी ज़ालिम है मेरे भाई..जितना दबोगे उतना अधिक ही दबाए जाओगे.अब कल रात का मामला ही ले ले...यदि मैं इन कॉन्स्टेबल्स को अपनी अकड़ नही दिखाता तो साले सुबह तक मारते रहते लेकिन ऐसा...."

"रहम करके अब कोई फिलॉसोफी मत झाड़ क्यूंकी बाहर जो तेरा बाप बैठा है ना उसके सामने गर्दन झुकाने मे ही भलाई है इसलिए प्लीज़ अब कोई नया बखेड़ा खड़ा मत करना...."मेरी बात ख़त्म होती उससे पहले ही सौरभ मुझ पर घायल शेर की तरह टूट पड़ा...

"मुझे पता होता कि तुम लोग ऐसे रोंदू हो तो कभी तुम लोग के साथ नही रहता..."

"कहे का रोंदू बे....भूल मत कि कॉलेज मे तेरी जो ये गुंडागर्दी चलती है ना वो हमी लोगो की बदौलत चलती है...एक बार तेरे उपर से हॉस्टिल का टॅग हट गया ना तो फिर तेरी कोई औकात नही...इसलिए अब शांत रहना..."

"किसी महान पुरुष ने सच ही कहा है कि......"

"अबे ओये महान पुरुष....ये आपस मे बात-चीत करना बंद करो और बाहर आओ...साहब बुला रहे है."मुझे बीच मे ही रोक कर कॉन्स्टेबल ने एक बार फिर अपना डंडा ज़मीन पर ठोका....
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हमारे लॉकप से बाहर निकलते ही कॉन्स्टेबल ने अपने हाथ मे पकड़े हुए डंडे से हमे बाहर जाने का इशारा किया ,जहाँ एस.पी. एक चेयर पर आराम से बैठकर कुच्छ पी रहा था और दो कॉन्स्टेबल उसके साथ वही पर खड़े थे.....सब लौन्डे अटेन्षन की पोज़िशन लेकर एस.पी. के सामने खड़े हो गये. सौरभ के प्लान के मुताबिक़ सौरभ सबसे आगे खड़ा था और मैं सबसे पीछे....


"जाओ , उसे लेकर आओ..." ग्लास टेबल पर रखकर एस.पी. ने अपने पास खड़े कॉन्स्टेबल से कहा और फिर हम लोगो की नज़र उस कॉन्स्टेबल पर अड़ गयी कि बीसी अब कौन आया है...कही कलेक्टर महाशय खुद तो नही पधारे है ,ये देखने के लिए कि हमलोगो को बराबर मार पड़ी है या नही.....

"नही लवडा...कलेक्टर आता तो महॉल ही कुच्छ अलग होता.ये कोई दूसरा झन्डू है, कही मेरा कोई फॅन तो नही..." बाहर खड़ी लाल बत्ती वाली गाड़ी की तरफ टकटकी लगाए मैने धीरे से कहा और कलेक्टर के लड़के को कॉन्स्टेबल का सहारा लेकर लन्गडाते हुए चलता देख मैं भौचक्का रह गया....

"ये लवडा....ये इतनी जल्दी कैसे होश मे आ गया, कल ही तो मारा था इसको....साले को जान से मार देना चाहिए था"
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"पहचाना इसे...इसी की वजह से तुमलोग यहाँ पर हो..."टेबल पर रखी ग्लास को हाथ मे लेकर हिलाते हुए एस.पी. बोला"इसने मुझे बताया कि इसे सिर्फ़ एक ने मारा है और मुझे पक्का यकीन है कि वो एक तुम मे से ही है ,इसलिए अपने आप बता दो कि वो कौन था...."

उस वक़्त एस.पी. के सामने जाने के सिवाय मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नही था ,क्यूंकी यदि मैं खुद सामने नही जाता तो फिर कलेक्टर का वो चूतिया लड़का अपनी टूटी हुई उंगली मेरी तरफ कर देता...इसलिए मैं अपना सर झुकाए आगे गया और मुझे अपनी तरफ आता देख एस.पी. को ये समझने मे बिल्कुल भी मुश्क़िल नही हुई कि वो महान पुरुष मैं ही हूँ, जिसने उसके मुंहबोले बेटे का ये हश्र किया था.

"तू....तूने मारा इसे..."

जवाब मे मैं एक दम मूर्ति के माफ़िक़ खड़ा रहा .कलेक्टर का लड़का तक़रीबन 5 मिनिट मे हमारे पास कछुए की चाल से चलते हुए नही बल्कि मैं कहूँ तो रेंगते हुए पहुचा और जब वो हमारे पास पहुचा तो उसे चेयर मे बैठने के लिए ही कयि मिनिट लग गये....

मैने कलेक्टर के लड़के पर नज़र डाली...माथे पर कही जगह गहरा निशान था और लवडे का आधा नाक छिल गया था और हाथ-पैर का तो पुछो मत ,साला लुला-लंगड़ा हो गया था कुच्छ हफ़्तो के लिए या फिर कुच्छ महीनो के लिए....लेकिन एक बात जो मुझे अंदर से खाए जा रही थी वो ये कि ये चूतिया(एस.पी.) अपने साथ इस दूसरे चूतिए को क्यूँ लाया है...कहीं ये हमे मुज़रा तो नही दिखाने वाला....

"ये था वो..."मुझे पास आने का इशारा करते हुए एस.पी. ने अपनी उंगलिया हवा मे घुमाई और मैं जैसे ही उसके पास गया ,उसने मेरा शर्ट अपने हाथो मे पकड़कर कलेक्टर के लड़के से एक बार फिर पुछा"यही था ना वो...."

"ह...ह..हां...."मरी हुई आवाज़ के साथ मेरे दुश्मन ने मुझपर मुन्हर लगा दिया.

"चल नीचे बैठ...घूरता क्या है बे , बैठ नीचे ज़मीन पर..."

"ये मैं नही करूँगा सर..."दबी हुई आवाज़ मे मैं बोला...

"अरे बैठ जा ना ज़मीन पर...सर से ज़ुबान क्यूँ लड़ा रहा है..."सौरभ एस.पी. का पक्ष लेते हुए बोला...

"कुच्छ भी कर लो, मैं ज़मीन पर नही बैठने वाला...."

"ओये, बैठाओ साले को मारकर ज़मीन पर..."

एस.पी. के मुँह से इतना सुनते ही एक कॉन्स्टेबल मेरे पास आया और दो-चार मुक्के मुझे झड़कर ,मुझे जबर्जस्ति ज़मीन पर बैठने के लिए मज़बूर कर दिया....

"अब चल साले माफी माँग मेरे बेटे से..."

अबकी बार मैने कोई मूव्मेंट नही किया...ना तो हाँ कहा और ना ही ना कहा...कोई इशारा तक नही किया कि मैं ये करूँगा भी या नही...बस जैसे ज़मीन पर बैठा था,वैसे ही बैठा रहा....

"जाओ ,जाकर सबको बाहर बुला लाओ और यदि ये माफी ना माँगे तो साले को घेरकर मारना...."

मेरा ज़मीर तो ये करने की इज़्ज़ज़त नही दे रहा था लेकिन फिर भी मैने ये किया और साला दूसरा कोई रास्ता भी तो नही था...क्यूंकी यदि मैं उस वक़्त उनकी बात नही मानता तो वो बीकेएल मुझे जान से ही मार देते....कलेक्टर के लड़के से माफी माँगने के बाद मैं जब खड़ा हुआ तो एस.पी. मुस्कुराते हुए बोला....

"तुझ जैसे लड़को को बहुत अच्छी तरीके से जानता हूँ, मैं...तुम लोगो को मारने-पीटने से कुच्छ नही होता,बल्कि तुम लोगो को तुम्हारी ही नज़र मे गिरा देना ही असली ज़ख़्म देना होता है...जो मैने तुझे अभी-अभी दिया है.अब तू ज़िंदगी भर अपना सर नही उठाएगा क्यूंकी जब-जब तू अपना सर उठाने की कोशिश करेगा ,तब-तब तुझे मैं और ये पोलीस स्टेशन तुझे याद आएगा....अब चल निकल जा यहाँ से क्यूंकी तेरे प्रिन्सिपल से मैने तुम लोगो को जल्दी छोड़ने का वादा किया है..."
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मैं वहाँ से बिल्कुल शांत चला जाता ,जब एस.पी. ने मुझे जाने के लिए कहा था लेकिन जब मैं पीछे मुड़ा तो मुझे सबसे पहले सौरभ की शक्ल दिखी ,जो सबसे आगे खड़ा था और फिर उसके द्वारा कही गयी बातें मुझे याद आई, जो उसने मुझसे लॉक अप के अंदर कहा था....उसका जवाब मैं लॉक अप के अंदर ही दे देता यदि कॉन्स्टेबल ने अपना डंडा पीटकर हमे बाहर आने के लिए ना कहा होता तो.....

मुझे तब बहुत गुस्सा आया था ,जब मेरी नसीहत पर चलने वाला अरुण मुझे नसीहत देने लगा था,लेकिन मैने खुद को कंट्रोल किया...मुझे तब भी बहुत गुस्सा आया था जब कॉन्स्टेबल्स हमे पीट रहे थे, लेकिन मैने खुद को कंट्रोल किया...मुझे तब भी बहुत गुस्सा आया था जब सौरभ आज सुबह मुझसे मेरी औकात की बात कर रहा था,लेकिन मैने खुद पर कंट्रोल किया और मुझे तब भी गान्ड-फाड़ गुस्सा आया था जब एस.पी. ने मुझे ज़मीन पर बैठवा कर कलेक्टर के लड़के से सॉरी बुलवाया ,लेकिन अबकी बार भी मैने खुद को कंट्रोल कर लिया पर जब पीछे पलट कर मैने सौरभ को देखा और उसकी कही हुई बात मुझे याद आई कि"मेरी औकात सिर्फ़ हॉस्टिल की वज़ह से है' तो अबकी बार मैं खुद पर कंट्रोल नही कर पाया और पीछे पलट कर चेयर पर बैठे कलेक्टर के लड़के की छाती पर कसकर एक लात मारा ,जिसके परिणामस्वरूप कलेक्टर का लड़का चेयर समेत नीचे ज़मीन पर जा गिरा....

"तू आज क्या बोल रहा था बे सौरभ कि तुम लोगो के कारण मेरी पॉवर है और यदि हॉस्टिल का टॅग मेरे नाम के पीछे से हट गया तो मैं कुच्छ भी नही...तो तू देख चूतिए...मेरी अकड़ तुमलोगो की वज़ह से नही है और मेरे नाम के पीछे से हॉस्टिल का टॅग हट जाने के बाद मेरा क्या होगा, वो तो बाद मे देखेंगे ,लेकिन तुम लोगो के पीछे से यदि मेरे नाम का टॅग हट गया तब देखना कि तुम लोगो का क्या होता है और बेटा तुम लोगो के अंदर कितना दम है ये मैने आज देख लिया....इसलिए अब यहाँ से जाओ और अपने मुँह मे कालिख पोतकर छिप जाओ.अबे सालो जितने तुम्हे लोगो के नाम याद नही होंगे ना उससे ज़्यादा मुझे कबीर के दोहे याद है ,इसलिए मुझे क्रॉस करने की कोशिश कभी मत करना...."गुस्से से काँपते हुए मैने अपनी गर्दन एस.पी. की तरफ घुमाई और बोला"और तू बे लोडू...खुद को समझ क्या रखा है बे..तू मेरा घमंड कम करेगा...तो सुन, तेरे अंदर जितना खून नही है ना उससे ज़्यादा मेरे अंदर घमंड भरा पड़ा है ,जिसे तू तो क्या ,तेरा बाप भी ख़त्म नही कर सकता और अब तू मुझे याद करके अपना सर शरम से झुकाएगा कि एक मामूली से लड़के ने तुझे तेरे ही थाने मे तेरे ही लोगो के बीच ,लोडू...चूतिए ,आबे...साले कहा था.अब तुझे जो उखड़ना है ,उखाड़ ले और अपने इस बकलुंड बेटे को यहाँ से ले जा ,वरना अबकी बार मैं लात छाती पर नही बल्कि गर्दन पर रखूँगा..."एक और लात उसकी छाती पर रखते हुए मैं चीखा और पिछले कई घंटो से जो जवालामुखी मेरे अंदर धधक रहा था, वो फाइनली फुट गया साथ ही ये अहसास दिलाते हुए कि अब ये लोग मुझे बहुत फोड़ेंगे.
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08-18-2019, 03:01 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
जब मुझे यकीन हो गया कि अब मेरा भजिया तलना तय है तो फिर मैने सोचा कि क्यूँ ना तेल को और गरम किया जाए इसलिए मैं हॉस्टिल के लड़को की फाड़ते हुए बोला....

"तुम लोग बेटा ,सब अपना समान बाँध कर जल्दी से घर निकल लो क्यूंकी यहाँ से मुक्ति पाते ही मैं सबसे पहले तुम सबको इस दुनिया से मुक्त करूँगा...मुझे जहाँ दिखोगे वही गोली मारकर तुम लोगो की जीवन-लीला ख़त्म कर दूँगा...सालो मेरे खिलाफ जाते हो..."फिर कलेक्टर के लड़के की तरफ देखते हुए मैं बोला"तू पहले क्या बोल रहा था बे झाटुए कि तू मुझसे नही डरता पर अब तू ये कहने से ही डरेगा कि'तुझे मुझसे डर नही लगता'....."

मेरी पिछले कुच्छ देर की हरक़तो से जहाँ मेरे सारे दोस्त हैरान थे वही एस.पी. के साथ सारे पोलीस वाले भी शॉक्ड थे कि लवडा कही मैं पागल तो नही हो गया.....

हॉस्टिल के लौन्डे कुच्छ देर थाने के परिसर मे खड़े रहे और फिर वहाँ से चल दिए.इसके बाद दो कॉन्स्टेबल ने मेरे दोनो हाथ पीछे करके पकड़ लिया क्यूंकी उन्हे शायद ये डर था कि कही मैं एस.पी. को भी ना चोद दूं....

"लटका बोसे ड्के ,इसको...."एक कॉन्स्टेबल को गाली बकते हुए एस.पी. बोला और कलेक्टर के छोरे को उठाने लगा....

मैने जो पुन्य का काम कुच्छ देर पहले किया था उसकी वजह से उन लोगो ने मेरी बहुत आरती उतारी और इतनी आरती उतारी कि आरती नाम से मुझे नफ़रत हो गयी....सालो ने बॉडी के हर एक पार्ट्स पर निशान दिया और जब गुस्सा शांत हुआ तो मुझे ले जाकर लॉक अप मे फेक दिया......

"ठोक एमसी पर रॅगिंग का केस...साले की ज़िंदगी बर्बाद कर दूँगा मैं..."कॉन्स्टेबल्स पर चिल्लाते हुए एस.पी. बोला और वही चेयर पर बैठ गया.....

"ह्म लवडा, मैं ही एक चूतिया दिख रहा हूँ ना....पर एक बात जान लो कि मैं तुम लोगो की तरह अनपढ़ गँवार नही हूँ और ना ही सारी दुनिया तुम लोगो की तरह चूतिया है जो ये ना समझ पाए कि ये रॅगिंग नही थी और वैसे भी वहाँ एक से एक तुम जैसे गधे डिटॅनर्स ,सीनियर्स थे....और जब कोर्ट मे मेरा .लॉयर ये पुछेगा तब कि 'क्या मैं उन सीनियर्स और डिटॅनर्स की भी रॅगिंग ले रहा था'...तब बोलो लवडा ,क्या जवाब दोगे...."मिड्ल फिंगर उन सबको दिखाते हुए मैं बोला...

"तुझे शायद मालूम नही की मैं क्या चीज़ हूँ ,मैं केस कोर्ट तक पहुचने ही नही दूँगा..."

"बाप का राज़ है क्या...जहाँ 100 स्टूडेंट्स पोस्टर लेकर सड़क पर निकल जाएँगे ,वहिच तू चूस लेगा...तू अभी अधिक से अधिक सिर्फ़ मुझे कुच्छ दिन यहाँ रख सकता है और थोड़ी देर मार सकता ,इससे अधिक तू कुच्छ नही कर सकता...अड्मिट इट. और मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ कि तू कौन है, पर शायद तू नही जानता कि मैं कौन हूँ...."

"निकाल कर लटका फिर से साले को और तब तक मारो जब तक मर ना जाए...."

एस.पी. के आदेश का पालन करते हुए दो-तीन कॉन्स्टेबल लॉक अप मे घुस गये लेकिन तभी एस.पी. ने बड़ी धीमी आवाज़ मे उन सबको वापस आने के लिए कहा......

"इसे क्या हुआ ,फट क्यूँ गयी इसकी...बीसी कहीं मीडीया तो नही आ गयी...कितना फेमस हूँ मैं "

"ये तो इसका दोस्त है, जो लॉयर को लेकर आ रहा है...."एस.पी. बोला....

"गुड मॉर्निंग ,मिस्टर. आर.एल.डांगी...आइ आम आड्वोकेट भारत त्रिवेदी...."

"बैठिए...."

इसके बाद मैने लॉक अप से जो सीन देखा वो ये था कि भारत त्रिवेदी ने लंबे-चौड़े कयि काग़ज़ के पन्ने निकालकर टेबल पर फेक दिए,जिसके बाद एस.पी. के चेहरे का रंग उतर गया और फिर उसने अकेले मे भारत त्रिवेदी से कुच्छ देर बात करने की पेशकश की,जिसे उन्होने मान लिया और वहाँ से उठकर थाने के परिसर मे घूमते हुए बहुत देर तक दोनो बातें करते रहे.....

" बीसी कहीं ये दोनो एक-दूसरे को राजशर्मास्टॉरीज की कोई सेक्स स्टोरी तो नही सुनाने लगे...पक्का लवडे बाहर एक-दूसरे का लवडा पकड़ कर 61-62 कर रहे होंगे...वरना इतनी देर तो कोर्ट मे केस नही चलता , जितनी देर ये लोग केस चला रहे है....."

खैर थोड़ी देर बाद दोनो वापस आए और एस.पी. ने कहा कि मुझे छोड़ दिया जाए....उस वक़्त जब वो ये बोल रहा था तो उसके चेहरे का एक्सप्रेशन कुच्छ ऐसा था जैसे दुनिया का सबसे बड़ा दुखी इंसान उस वक़्त वही है....

जैसे तैसे करके मैं खड़ा हुआ और धीरे-धीरे लॉक अप के बाहर आया...अब मेरे चलने की स्पीड ठीक वैसी हो गयी थी, जैसे कुच्छ देर पहले मैने कलेक्टर के लड़की की बताई थी बस फ़र्क इतना सा था कि वो सहारा लेकर चल रहा था और मैं बिना किसी के सहारे के चल रहा था....उस वक़्त मेरी ये हालत करने वाले कॉन्स्टेबल्स के अंदर ना जाने कहा से मेरे लिया ढेर सारा प्यार उमड़ आया ,जो मुझे सहारा देने के लिए आगे बढ़े....

"क्यूँ नौटंकी कर कर रहे हो बे...छुना मत मुझे. सालो तुम्ही ने ये हालत की है मेरी...लवडे दोगले कही के..."

"अरुण....ये ऐसे कैसे बिहेव कर रहा है..."मेरा ऐसा रवैया देखकर आड्वोकेट के माथे पर शिकन उत्पन्न हो गयी और वो अरुण की तरफ देखकर बोले...

जवाब मे अरुण सिर्फ़ मेरी तरफ देखता रह गया और जब मैं कछुए की माफ़िक़ रेंगते-रेंगते थोड़ा और आगे बढ़कर अरुण और आड्वोकेट के पास पहुचा तब अरुण मुझे कंधा देने के लिए मेरी तरफ आया....

"छूना मत मुझे...अपुन को किसी की हेल्प की ज़रूरत नही है."

"व्हाट दा हेल मॅन, अरुण मुझे यहाँ लेकर आया और मेरी वज़ह से तुम यहाँ से बाहर जा रहे हो, इसने तुम्हारी मदद की है , यू शुड थॅंक हिम..."

"ये कौन है यार...ये भाई मैने ना तो तुझे बुलाया था और ना ही इसे कहा था कि तुझे लेकर आए...मैं एक इंजिनियर होने के साथ-साथ एक लॉयर भी हूँ और मैने एलएलबी ,एनएलएसयू,बंगलोर से तब कंप्लीट कर ली थी ,जब तूने एलएलबी की शुरुआत तक नही की थी और ये ,मेरा फॉर्मर फ्रेंड...जो तुझे यहाँ लेकर आया है वो इसलिए नही क्यूंकी इसे मेरी मदद करना था,बल्कि इसलिए क्यूंकी इसे डर था कि कही वापस लौटकर मैं इसका गेम ना बजा दूं....यनना रसकल्ला"

"मिस्टर.डांगी ,मेरे सारे पेपर्स वापस कीजिए और इसे वापस अंदर कीजिए..."

"मुँह मे ले लो अब...उधर रिजिस्टर-वेजिस्टर मे इन लोगो ने कुच्छ-कुच्छ चढ़ा दिया है और यदि अब ये तुझे तेरे पेपर्स वापस करते है तो ये लोग ढंग से चूसेंगे...."

"भारत भैया, आप मेरे साथ आओ, मैं बताता हूँ आपको...."बोलकर अरुण,भारत त्रिवेदी को अपने साथ पोलीस स्टेशन से बाहर ले गया.....

मुझे पोलीस स्टेशन का गेट पार करने मे 5 मिनिट लगे और गेट से निकलते वक़्त मैने पीछे पलट कर एस.पी. और उसके कॉन्स्टेबल्स को एक बार फिर से अपनी मिड्ल फिंगर के दर्शन कराए और फाइनली बाहर निकला....बाहर ,भारत त्रिवेदी ,अरुण के साथ अपनी कार के आगे खड़ा था. कुच्छ देर पहले जहाँ भारत त्रिवेदी का चेहरा रोने सा हो गया था ,वही अब वो एक दम शांत खड़ा था...मुझे बाहर देख कर अरुण बोला....
"चल ,कार मे बैठ अरमान...."

"इस कार मे... "

"नही तो क्या तेरे लिए अब मैं बगाटी या फरारी लाउ..."

"ऐसी कार तो मुझे कोई फ्री मे दे तब भी मैं ना लूँ...मैं पैदल ही हॉस्टिल जाउन्गा...लवडा भूख बहुत लगी है एक काम करता हूँ पहले 20-30 समोसे खा लेता हूँ, फिर हॉस्टिल की तरफ प्रस्थान करूँगा...."

मुझे उस वक़्त पता नही क्या हो गया था जो मैं वैसी अजीब-हरक़ते करने लगा था....मेरे ऐसे बिहेवियर से सब हैरान थे...कुच्छ ने तो पागल ,सटका तक कह डाला था और ये सवाल मैं आज भी खुद से पुछ्ता हूँ कि क्या वाकई मैं उस दिन पोलीस स्टेशन मे सटक गया था या वो सब सिर्फ़ मेरा घमंड , मेरा अकड़ ,मेरा आटिट्यूड था....

पोलीस स्टेशन से निकलकर मैं एक समोसे वाली दुकान पर गया और उस दुकान वाले से भी मेरी बहस हो गयी....

"हरामी साले...कल के समोसे खिलाता है.जा लवडा पैसा नही दूँगा...."मैने प्लेट ज़मीन पर फेक कर कहा....

"छोटू ,लल्लन को बोल एक लड़का नाटक कर रहा है...."

"माँ छोड़ दूँगा लल्लन की और तुम सबकी यदि हाथ लगाया तो....अभी-अभी जैल से छूटा हूँ और मालूम है क्या केस था मुझ पर....एक मर्डर और 7-8 हाफ मर्डर.कल से लवडा यदि बासी समोसा ताज़े समोसे के बीच मे डालकर मिलाया तो तुझे और तेरी दुकान को मिट्टी मे मिला दूँगा...."

जहाँ तक मेरी याददाश्त जाती है और यदि मैं सही हूँ, जो कि मैं हमेशा रहता हूँ तो मैं उसी दिन वापस पोलीस स्टेशन गया और अबकी मेरी पहले से भी ज़्यादा दुर्गति हुई....अबकी बार मेरी दुर्गति का कारण आराधना बनी.पोलीस स्टेशन से हॉस्टिल की दूरी यूँ कुच्छ 5 किलोमीटर के लगभग होगी पर मुझे वहाँ पहुचने मे 2 घंटे लग गये और जब हॉस्टिल के सामने पहुचा तो वहाँ पोलीस जीप खड़ी दिखाई दी......

"ये लोग कहीं मुझसे माफीनामा तो माँगने नही आए...सालो को माफ़ नही करूँगा...मैं भी लटका-लटका कर मारूँगा..."पोलीस जीप की तरफ बढ़ते हुए मैने कहा.....

"चलिए सर ,वापस....पोलीस स्टेशन आपके बिना सूना-सूना है..."हॉस्टिल के गेट के अंदर से निकलते हुए एस.पी. बोला"मैं खुद तुझे अरेस्ट करने आया हूँ ,इसका मतलब तुझमे कुच्छ बात तो है...."

"चाहे जितनी तारीफ कर ले, मैं ऑटोग्राफ नही दूँगा...."

मैं उस समय सोच बिल्कुल भी नही रहा था कि ये लोग मुझे वापस पकड़ कर ले जाने के लिए आए है ,मैने सोचा कि यूँ ही कुच्छ बयान-व्यान लेने आए होंगे....

"ऑटोग्राफ तो अब मैं तुझे दूँगा ,वो भी ज़िंदगी भर के लिए....क्यूंकी तेरे उपर अब हाफ-मर्डर का नही बल्कि मर्डर का केस चलेगा...."

"क्यूँ...कलेक्टर का लौंडा उपर चला गया क्या...."

"वो नही , एक लड़की है-आराधना....वो उपर चली गयी है...आधे घंटे पहले ही थाने मे उसकी वॉर्डन और उसकी सहेलियो ने आकर तेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी है.....अब तू तो गया बेटा....तुझे मुझसे होशियारी नही छोड़नी चाहिए थी उपर से अबकी बार तेरा प्रिन्सिपल ही तेरे खिलाफ है,जो हर बार तुझे बचा कर ले जाता था....."

"आराधना मर गयी...पर उसकी हालत तो उतनी भी खराब नही थी..."

"पर तेरी हालत ज़रूर खराब होगी ,वो भी मेरे हाथो...ऐसा तोड़ूँगा तुझे कि फिर कभी जुड़ नही पाएगा. इसे भरो रे..."कॉन्स्टेबल्स पर गला फाड़ते हुए आर.एल.डांगी ने कहा....

आर.एल. डांगी के हुक़म की तामील करते हुए उसके पन्टरो ने मुझे तुरंत जीप के अंदर घुसेड़ा ,ये कहते हुए कि"हमे मालूम है कि ,तेरा कोई मामा एमएलए वगेरह नही है...एस.पी. साहब ने पूरी छान-बीन कर ली है...अब तो हमारे हाथ तुझे मारने से पहले एक पल के लिए भी नही रुकेंगे....."

उधर मुझे जीप मे बैठाकर ,एस.पी. खुद को मिली सरकारी गाड़ी मे बैठकर निकला और इधर मेरे पास सिवाय आराधना के बारे मे सोचने के आलवा कुच्छ नही बचा था ,क्यूंकी बेशक मैं चाहता था कि आराधना मेरी ज़िंदगी से निकल जाए ,लेकिन वो तो दुनिया से ही निकल गयी...बेशक ही आराधना के स्यूयिसाइड के कयि रीज़न रहे हो जैसे कि उसकी दिमागी हालत खराब होना , कायर होना पर जो बात मुझे कच्चा चबाए जा रही थी वो ये कि मैं खुद उन कयि रीज़न्स मे से एक रीज़न था ,जिसकी वज़ह से आराधना ने स्यूयिसाइड की थी या फिर थोड़ा और डीटेल मे कहूँ तो मैं ही वो था जिसने आराधना को स्यूयिसाइड करने के लिए रीज़न्स दिए...मैं कुच्छ भी बहाना मार सकता था,अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करके मैं कोई भी तिकड़म खेल सकता था,जिससे आराधना को बुरा ना लगे या फिर कम बुरा लगे....पर मैने ऐसा नही किया ,बिल्कुल भी नही किया...1 पर्सेंट भी नही और नतीज़ा आराधना की मौत के रूप मे सामने आया था.

उस वक़्त मुझे जो सबसे ज़्यादा परेशान कर रहा था वो ना तो सूपरिंटेंडेंट ऑफ पोलीस था और ना ही आराधना की मौत...उस वक़्त जो मुझे सबसे ज़्यादा परेशान कर रहा था ,वो मैं खुद ही था.मेरा दिमाग़ हर घड़ी दो घड़ी मुझपर चिल्लाकर कहता कि'मैने आराधना को मारा..मेरी वज़ह से उसकी मौत हुई' और फिर जिस हॉस्पिटल मे आराधना अड्मिट थी ,वहाँ उसकी मौत के बाद की एक काल्पनिक तस्वीर मेरे सामने आ रही थी...मैने आराधना के माँ-बाप मे से किसी को नही देखा था ,पर तब भी मेरा दिमाग़ आराधना के माँ-बाप की एक काल्पनिक तस्वीर मुझे दिखाता,जो कि बहुत ही....बहुत ही ज़्यादा दर्दनाक और दयनीय थी...

उस दिन पोलीस वॅन मे बैठे-बैठे मुझे पता चला कि असल मे झटका लगना किसे कहते है और मैं दुआ कर रहा था कि मुझे जल्दी से जल्दी 10-12 अटॅक आए और मैं भी परलोक सिधार लूँ....क्यूंकी पोलीस वॅन मे पड़े-पड़े मेरे दिमाग़ द्वारा मुझे दिखाई गयी हर एक काल्पनिक तस्वीर मुझे ऐसा ज़ख़्म दे रही थी ,जिसका कोई निशान तो नही था ,पर दर्द बहुत ज़्यादा था...इतना ज़्यादा कि मैं उस वक़्त ये चाहने लगा था कि मैं अब बस मर जाउ.

वैसे हर एक नॉर्मल इंसान ,हर कोई जो मुझे पसंद या नापसंद करता था...हर कोई जो मेरे दोस्तो मे था या फिर दुश्मनो मे था ,वो सिर्फ़ यही सोच रहा था अब मुझे बहुत बुरी मार पड़ेगी...कोई तो मुझे 302 धारा के अंतर्गत दोषी भी मान चुका था पर ऐसा बिल्कुल नही था और कमाल की बात तो ये है कि सब कुच्छ बिल्कुल ऐसा ही था...कहने का मतलब मेरी इतनी जोरदार ठुकाई हुई ,जितनी कि ना तो पहले हुई थी और ना ही अब कभी होगी...मुझपर 302 धारा भी चढ़ाई गयी पर ये सब उस वक़्त मेरे लिए कोई मायने नही रखते थे ,क्यूंकी आराधना की मौत ने मेरे दिल और दिमाग़ मे बहुत गहरा ज़ख़्म दिया था और लाख कोशिशो के बावज़ूद मैं इस ज़ख़्म से उबर नही पा रहा था...मैं जितने भी दिन पोलीस स्टेशन मे रहा हर पल मेरे खुद की इमॅजिनेशन मेरी जान निकलती रही...मेरा तेज़ दिमाग़ ही मेरे उन ज़ख़्मो को भरने नही देता ,जो उस वक़्त मेरी आत्मा का गला दबा रहा था...दिन का वक़्त तो फिर भी निकल जाता ,पर रात को हर रोज आराधना मेरे सपनो मे आती ,पहले तो वो मुझे हँसती हुई दिखती...भागते हुए मेरा नाम पुकारती और हर बार मैं इस भ्रम मे पड़ जाता कि वो अब भी ज़िंदा है लेकिन जैसे ही मैं सपनो के इस मायाजाल मे फँसता ,तभी आराधना की हॉस्टिल मे पंखे से लटकी हुई तस्वीर मुझे दिखती और उसकी जीभ जो बाहर निकल आई थी वो बहुत देर तक हिलती रहती थी.....जिसके बाद एक तेज़ दर्द मेरे सर को पकड़ लेता और मेरी आँख खुलते ही मैं अपने सर को पकड़ लेता....

मैं कुल एक हफ्ते थाने के एक लॉकप मे बंद रहा शुरू के दो-तीन दिन तो पोलीस वालो ने मुझे खूब धोया पर जब मेरी तरफ से कोई रेस्पोन्स नही मिला और ना ही मैने कोई तेवर दिखाए तो उन्होने भी मुझे मारना छोड़ दिया...
Reply
08-18-2019, 03:01 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
उन 7 दिनो मे मेरी आँखे पूरी काली पड़ चुकी थी,शरीर के कयि अंग थोड़ी सी मूव्मेंट मे ही गान्ड फाड़ दर्द देते थे,इतना दर्द कि खुद के दम पर चलना तो दूर उठना तक मुश्क़िल हो गया था....

"चल बाहर निकल...तुझपर से केस हटा लिया गया है...तेरा बड़ा भाई आया हुआ है तुझे लेने..."बाहर से एक कॉन्स्टेबल ने मुझे आवाज़ दी तब मैने अपनी आँखे खोली और मुझे पता चला कि अभी दिन है .

क्यूंकी लॉकप मे मेरा अधिकतर समय आँख बंद किए हुए गुज़रता था और इस समय मैं अपने दिमाग़ पर हावी होने की कोशिश करता था...मतलब कि मैं अपने वही पुराने तेवर ,वही पुराना घमंड ,वही पुराना आटिट्यूड ,वही पुरानी सोच को खुद के अंदर पैदा करने की कोशिश करता ,जिनकी वज़ह से मैं यहाँ था क्यूंकी मुझे मालूम था कि यहाँ से जब मैं निकलूंगा तो मुझे इन्ही की सबसे ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी...

पूरे एक हफ्ते बाद जब मैं लॉक अप से निकला तो ऐसा लगा जैसे कि मुझे नयी ज़िंदगी मिली हो ,मैं खुद के दम पर उठ भी नही सकता था ,पर यहाँ से बाहर निकलने की चाह ने मुझे इतना सशक़्त बना दिया कि मैं अब अपने ही दम पर चल रहा था....बाहर आर.एल.डांगी ,मेरे पिता श्री, मेरा बड़ा भाई और एक लॉयर बैठा था.मैं सीधे उनके पास गया और पूरी ताक़त लगाकर सबसे पहले अपने पिता श्री के पैर छुए और फिर बड़े भाई के.....

"इसको सुधार लो ,वरना अबकी बार तो ये बच गया पर अगली बार नही बचेगा....उपर से इसकी अकड़ इतनी है कि हमारे ही पोलीस स्टेशन मे हमे ही गालियाँ दे रहा था....फिलहाल अभी तो हमने इसकी अकड़ निकाल दी है..."

ऐसे ही एस.पी. मुझे कयि नसीहत देते रहा ,मेरी शिक़ायत करता रहा और आख़िर मे उसने आराधना का नाम लिया....
"एक बात बता, तुझे कैसा लगा एक भोली-भाली लड़की की ज़िंदगी ख़त्म करके...तूने उसके माँ-बाप की हालत नही देखी शायद...उसकी माँ ने एक हफ्ते से पानी तक नही पिया ,वो अब आइसीयू मे अड्मिट है और बेचारा उसका बाप, वो तो लगभग पागल हो गया है...वो अब भी ये मानने को तैयार नही कि उसकी बेटी मर चुकी है....अरमान तूने बहुत ग़लत किया... "

"आपके मुँह से किसी दूसरे के लिए ग़लत शब्द शोभा नही देता..."इतनी देर से एस.पी. की बक-बक सुनकर मैं जब मरने की हालत मे पहुच गया तब मैने भी एक तीर छोड़ा"एक बात बताओ ,आप...यदि इस केस के पहले कलेक्टर के लड़के का केस ना होता...या फिर मैं अरमान ना होकर कोई दूसरा लड़का होता तो क्या तब भी आप मेरी वही हालत करते जो आपने की है....दरअसल ग़लत तो आपने किया है..."

"देखा आपने..."मेरे पापा की तरफ देख कर आर.एल.डांगी बोला"मैं इसकी इसी अकड़ की बात कर रहा था...हमे माफ़ करो और इसे लेकर यहाँ से जाओ...एक तो किसी की ज़िंदगी ख़त्म कर दी उपर से माफी माँगने के बजाय ज़ुबान लड़ा रहा है...नॉनसेन्स"

"आपके घर मे चाकू है...."

"हां है...तो"भड़कते हुए एस.पी. बोला

"तो आप उस चाकू से क्या करते है..."

"क्या करते है मतलब..."

"आप उस चाकू से क्या करते है मतलब आप उस चाकू से क्या करते है..."

जवाब मे डांगी साहब चुप ही रहा तब मैं बोला...
"आपके घर मे चाकू है और आप उस चाकू से सब्ज़िया काट-ते है अपनी गर्दन नही...प्यार भी उसी चाकू की तरह होता है डांगी जी ,जिसमे दोषी प्यार नही बल्कि बल्कि वो इंसान होता है जो या तो प्यार मे अपनी जान देता है या फिर उस प्यार को लात मारकर आगे बढ़ जाता है....ग़लती आराधना ने की थी,मैने नही..."

"सही कह रहा है तू ,ग़लती उसने की...तुझ जैसे इंसान के लिए अपनी जान देकर...."

"ग़लती तो आख़िर ग़लती ही होती है और हर ग़लती की एक सज़ा तय होती है ,बस खुद के अंदर जिगरा होना चाहिए उस सज़ा को स्वीकार करने की...आराधना मे दरअसल हिम्मत ही नही थी ,इसीलिए उसने मुझसे बदला लेने के लिए अपने जान दे दी ,वरना यदि वो मुझसे प्यार करती तो क्या मेरा नाम स्यूयिसाइड नोट मे लिखकर जाती ? एस.पी. साहब दुनिया की सबसे बड़ी प्राब्लम है जलन...जिसके अंदर जिसके भी खिलाफ ये जलन पैदा हो गयी तो फिर उन दोनो का कल्याण होना निश्चित है...आराधना के अंदर भी मेरे लिए यही जलन पैदा हो गयी थी ,उससे मेरी खुशी देखी नही गयी और बाइ दा वे मैं ये तुझे क्यूँ समझा रहा हूँ, मैं तो अब छूट गया हूँ और नेक्स्ट टाइम जब कभी भी तेरा पाला मुझसे पड़े तो कुच्छ करने से पहले ये ज़रूर सोच लेना कि जब तू एक मर्डर केस मे मेरा कुच्छ नही उखाड़ पाया तो अब क्या उखाड़ लेगा...."एस.पी. की घंटी बजाकर मैं कॉन्स्टेबल्स की तरफ पलटा और बोला"तुम लोग तो अपनी ख़ैरियत मनाओ, क्यूंकी अब मेरा सिर्फ़ एक ही ऐम है...यूपीएससी का एग्ज़ॅम क्लियर करना और फिर तुम सबको क्लियर करना"

मुझे बाहर निकालने के लिए एक एमएलए ,एक संसद और एक हाइ कोर्ट के लॉयर ने अपनी-अपनी पवर का इस्तेमाल किया....एमएलए को मेरे भाई ने ढूँढा ,लॉयर को हॉस्टिल वालो ने और सांसद तो हॉस्टिल मे रहने वाले एक लौन्डे का बाप था....वैसे भी स्यूयिसाइड नोट मे किसी का भी नाम लिख देने से वो अपराधी साबित नही होता ,लेकिन कुच्छ दिन दिक्कतो का सामना ज़रूर करना पड़ता है.

लॉक अप से निकालकर मुझे सीधे घर ले जाया गया और जब तक एग्ज़ॅम शुरू नही हुआ तब तक मैं घर मे ही अपना इलाज़ करवाता रहा....मेरा मोबाइल छीन लिया गया, घर से बाहर कही भी मेरे आने-जाने पर बॅन लगा दिया गया, यहाँ तक कि मेरे किसी दोस्त को भी मुझसे मिलने नही दिया गया और जब मेरे फाइनल एग्ज़ॅम शुरू होने मे दो दिन बाकी थे ,तब पांडे जी की लड़की...जो कि मेरी फ्यूचर भाभी थी..वो मुझसे मिलने आई और उस दिन मेरी लाइफ मे एक और ट्विस्ट ने प्रवेश किया....जो ये था कि पांडे जी की दो बेटी थी और जिसने बचपन से मेरा जीना हराम कर रखा था वो पांडे जी कि छोटी बेटी थी और उसकी बड़ी बहन से मेरे भाई की शादी हो रही थी.....

"कमाल है , आज तक मुझे यही पता था कि पांडे जी के बगीचे मे सिर्फ़ एक फूल है...लेकिन यहाँ तो दो फूल निकले..."

पांडे जी कि बड़ी बेटी भी है और उससे विपिन भैया की शादी होने वाली है ,ये जानकर मुझे राहत मिली और मैं थोड़ा-बहुत सुकून लेकर वापस कॉलेज के लिए रवाना हुआ.....

"अबकी बार कुच्छ ग़लत नही होना चाहिए अरमान....ये बात तू याद रख ले, वरना पूरे कॉलेज के सामने मारते-मारते घर लाउन्गा...."रेलवे स्टेशन मे बड़े भैया ने शब्द रूपी तीर चलाया और मुझे वापस कॉलेज के लिए रवाना किया......
.
मेरा मन अब ये फालतू की मार-धाड़ ,डाइलॉग बाज़ी से खप चुका था और फाइनली मैं वो बन रहा था ,जो कि मुझे फर्स्ट एअर मे ही बन जाना चाहिए था...उस दिन कॉलेज आते वक़्त ट्रेन मे बहुत माल मिली ,लेकिन अपुन ने किसी की तरफ ध्यान तक नही दिया...मैं बस शांत अपनी सीट पर पूरे रास्ते बैठा रहा और खिड़की के बाहर झाँकते हुए एश के बारे मे सोचते रहा...

मैं सोच रहा था कि वो मुझे देखकर पहले तो एक दम से खुश होगी ,फिर थोड़ा सा इग्नोर मरेगी ,मुझसे लड़ेगी...और आख़िर मे आइ लव यू बोल देगी...अब एश ही मेरे पास एक ऐसी अच्छी याद थी ,जिसे लेकर मैं अपने कॉलेज से जाना चाहता था ,लेकिन मुझे क्या मालूम था कि एश के रूप मे एक और बॉम्ब मेरा इंतज़ार कर रहा था जो मुझपर बस फूटने ही वाला था....

हॉस्टिल मे मुझे वापस देख कर मेरे खास दोस्तो के आलावा बाकी सब खुश हुए , सबने हाल चल पुछा और आराधना को गालियाँ बकि....पूरा दिन मेरे रूम मे जुलूस उमड़ता रहा और फर्स्ट एअर से लेकर फाइनल एअर तक के लड़के मुझसे मिलने आए....सिवाय मेरे खास दोस्तो के. वो लोग तो तब रूम मे भी नही रहते थे,जब मैं रूम मे होता...बस बीच-बीच मे अपना कोई समान लेने आते और चले जाते...रात को भी वो किसी दूसरे के रूम मे ही सोते थे...ना तो उन्होने कोई पहल की और अपने को तो पहल करने की आदत ही नही थी.मेरे खाती दोस्तो मे से सिर्फ़ एक राजश्री पांडे ही था जो मुझसे मिला था और अरुण-सौरभ के रूम छोड़ने के बाद वो मेरे ही रूम मे रहने लगा था.....

हॉस्टिल पहूचकर दिल किया कि एश को कॉल कर लूँ लेकिन फिर सोचा कि कल तो एग्ज़ॅम है और एग्ज़ॅम देने तो कॉलेज आएगी ही इसलिए उससे सीधे कॉलेज मिल लिया जाएगा.इसलिए दूसरे दिन जब मैं 8थ सेमेस्टर का पहला एग्ज़ॅम देने कॉलेज पहुचा तो नोटीस बोर्ड मे सबसे पहले ये देखा कि सीएस-फाइनल एअर वाले किस क्लास मे बैठे है और फिर अपनी क्लास देखा...

एग्ज़ॅम हॉल से बाहर निकलते ही मैं ए-18 की तरफ भागा ,जो एश की क्लास थी और क्लास के गेट से अंदर नज़र डाली....एश बैठी हुई थी.मैं तक़रीबन आधा घंटे तक वहाँ क्लास के बाहर खड़ा रहकर एश का इंतज़ार करता रहा और जब वो बाहर आई तो मैं उसकी तरफ बढ़ा...
"हाई...कैसी है..."

"गौतम आया हुआ है ,इसलिए प्लीज़ तुम ना तो मुझसे बात करना और ना ही मेरे पीछे आना...."

"मारूँगा साले को, यदि तेरे और मेरे बीच मे आया तो..."तेज़ आवाज़ मे मैं बोला, लेकिन फिर रेलवे स्टेशन मे बड़े भैया की नसीहत याद आते ही मैं धीमा पड़ा और बोला"मेरा मतलब था ,मैं अभी जाता हूँ और तेरे पीछे नही आउन्गा...."

उस दिन के बाद एश मुझसे फेस टू फेस नही मिलती थी और जब मैं उसके नंबर पर कॉल करता तब उसका नंबर हमेशा स्विच ऑफ का गान करते हुए मिलता ,इसलिए मैने मज़बूरन एक दिन अवधेश को हॉस्टिल बुलाया और उससे पुछा कि इतने दिनो मे ऐसा क्या हो गया ,जो एश ना तो मुझसे मिल रही है और ना ही बात कर रही है....

"कुच्छ खास पता नही ,पर कुच्छ दिनो पहले सुनने मे आया था कि दिव्या और एश के बीच पॅच अप हो गया है...."
"ह्म...."
"यो ब्रो...एश आंड दिव्या आर बॅक टू बीयिंग फ्रेंड्स..."

"बस यही बचा था अब सुनने को... "

"और तो और ,गौतम उसे हर एग्ज़ॅम के दिन कॉलेज छोड़ने और लेने आता है....कुच्छ तो ये भी बोलते है दोनो की एंगेज्मेंट भी एश के 8थ सेमेस्टर ख़त्म होने के बाद हो जाएगी...."

"ग़ज़ब...चल ठीक है, तू जा...बाइ..."

"बाइ...."
.
बीसी ,वो सब क्या हो रहा था...मुझे कुच्छ समझ नही आ रहा था , इसलिए मैने डिसाइड किया कि नेक्स्ट पेपर के दिन जब एश कॉलेज आएगी तब मैं उससे ज़रूर बात करूँगा...फिर चाहे वहाँ दिव्या का भाई खड़ा हो या फिर मेरा भाई.वैसे भी लवडा आख़िरी तीन दिन ही बचे है कॉलेज मे और यदि अब नही पुछा तो ज़िंदगी भर नही पुच्छ पाउन्गा......

इतने दिनो मे हर दिन एश की क्लास के बाहर खड़े होकर इंतज़ार करते हुए मैने एश की टाइमिंग अब्ज़र्व कर ली थी...जिसके अकॉरडिंग,वो एग्ज़ॅम टाइम के ठीक 5 मिनिट पहले क्लास के अंदर घुसती और फिर पूरे तीन घंटे बाद ही बाहर निकलती थी. लेकिन फिर भी अपुन को रिस्क नही माँगता था...इसलिए मैं उस दिन भी आधे घंटे पहले एग्ज़ॅम हॉल से निकला और एश के एग्ज़ॅम हॉल के बाहर खड़ा उसका इंतज़ार करने लगा....

एश अपने टाइमिंग के अनुसार ही बाहर निकली और बाहर मुझे देखते ही उसने वही कहा,जो वो पिछले कयि दिनो से मुझसे कहती आ रही थी....लेकिन इस बार मैं नही माना और उसके शॉर्टकट मारकर उससे पहले पार्किंग पर पहुच गया.....पार्किंग मे मुझे देखकर पहले तो एश चौकी और एक बार फिर उसने वही लाइन दोहराई...
"गौतम ,यही है...इसलिए तुम ना तो मुझसे बात करो और ना ही मेरे पीछे आओ..."

"गौतम की माँ की.......जय, चूतिया समझ रखा है क्या...जो इतने दिन से घुमा रही है,अभी घुमा कर एक हाथ दूँगा तो सारी बत्तीसी निकल आएगी...."

"मुझे तुमसे कोई बात नही करनी..."

"वाह बेटा, जब मन किया तब कूद कर आ गयी और जब मन किया तो चली गयी....भूल मत कि मैं वही अरमान हूँ ,जो....."

"जो इस कॉलेज का सबसे बड़ा चूतिया है...."मेरी आवाज़ को काट-ते हुए एक तीसरी आवाज़ आई और जब निगाहे उस आवाज़ की तरफ गयी तो गौतम के दर्शन हुए.....

"तू...निकल ले बेटा, पिछली बार की मार भूल गया क्या..."

"नही भूला ,इसीलिए तो इतने दिन से एश के साथ कॉलेज आ रहा हूँ ,इसी मौके के इंतज़ार मे कि कब तू आज वाली हरक़त करे और मैं तुझ पर अपनी भडास निकाल सकूँ...."

"तू...मुझपर भडास निकालेगा."जबारपेली हँसते हुए मैं बोला"चल बे ,तुझ जैसे हज़ार भी आ जाए तो मेरा कुच्छ नही उखाड़ नही सकते...और मेरा मूड कही घूम गया तो यही पर लिटा-लिटा कर मारूँगा,इसलिए थोड़ी देर के लिए चल फुट ले..."

"ले नही जाता यहाँ से ,बोल क्या करेगा...."मेरे पास आते हुए गौतम बोला...

"गौतम...तुम इससे लड़ क्यूँ रहे हो.इसे सच बताओ और इस कहानी को यही ख़त्म करो.."गौतम का हाथ पकड़ कर एश बोली...

"मेरी तरह शायद इसे भी पता है कि यदि तू मुझसे भिड़ा तो दुर्गति तेरी ही होनी है ,इसीलिए इसने तुझे रोक लिया...."फिर एश की तरफ देख कर मैं बोला"यदि तूने ऐसे हाथ पकड़ कर मुझे बुरे काम करने से रोकने की कोशिश की होती तो कसम से मैं आज वो नही होता ,जो मैं हूँ...खैर कोई बात नही ,जो हुआ उसका गम तुम जैसे छोटे और नीच लोग मनाते है ,मैं तो युगपुरुष हूँ...मुझे इससे क्या मतलब कि कल क्या हुआ और कल क्या होगा....इसलिए अब अपना मुँह फाडो और बकना चालू करो.5 मिनिट का टाइम है तुम दोनो के पास, वो सब कुच्छ याद करने के लिए जो तुम कहने वाले हो..."
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08-18-2019, 03:01 PM,
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
गौतम मुझे कुच्छ देर शांति से देखकर अपने दिमाग़ की बत्ती जलाता रहा और मैं वही खड़ा एश को देख कर सोच रहा था कि जाने ये लोग अब कौन सा धमाका करने वाले है....क्यूंकी अब मैं इतना सक्षम नही था कि कोई धमाका सह सकूँ...और इस लड़की को परखने मे मैं कैसे धोखा खा गया...इसने कभी तो ऐसा कुच्छ किया ही नही जिससे इसपर मुझे कभी कोई शक़ हो....साला दिल टूट गया यार, इन आख़िरी के दिनो मे.दिल तो करता है कि मैं भी स्यूयिसाइड कर लूँ ,लेकिन नही मैं तो युगपुरुष हूँ और यदि मैने स्यूयिसाइड कर लिया तो मेरे जो इतने सारे फॅन है ,उनका क्या होगा,.....

"अरमान , क्या तुमने कभी सोचा कि जब ग्राउंड पर गौतम के गुंडे तुम्हे मार कर चले गये थे तो तुम्हे हॉस्पिटल किसने पहुचाया था...."मुझे बहुत देर से अपनी तरफ देखता हुआ पाकर एश अनकंफर्टबल महसूस करने लगी और तब वो बोली....
"किसी ने 108 को कॉल कर दिया होगा...."

"एक दम सही जवाब पर कॉल किसने किया था ,क्या ये मालूम है..."

"देख अभी मेरा दिमाग़ चढ़ा हुआ है, इसलिए ज़्यादा शानपट्टी मत झाड़ और सीधे-सीधे बोल कि कहना क्या चाहती है...."

"108 को कॉल एश ने किया था..."एश के कुच्छ बोलने से पहले गौतम मेरे और एश के बीच खड़ा होते हुए बोला"और बस वही से तेरी बर्बादी की नीव रखी गयी...तुझे तो एश के पैर छुकर उसे थॅंक्स कहना चाहिए कि उसने तेरी जान बचा ली..."

"वो भी कर लेंगे,पहले आगे तो बक...और आइन्दा कभी ऐसे अचानक मेरे सामने खड़े मत होना ,वरना अचानक ही सामने वाले के चेहरे पर मुक्के मारने की बहुत खराब आदत है मुझे..."

"अरमान...बस तेरी इसी आदत की वज़ह से हमने वो सब कुच्छ किया ...."

"मुक्के खाने के लिए ? अबे झन्डू तू एक बार बोलकर तो देखता ,1000-2000 मुक्के तो मैं फ्री मे दे देता मैं तुझे...."

"तूने थर्ड सेमेस्टर के उस खूनी अंत के बाद मुझे बहुत शांत-शांत देखा होगा...है ना. तूने उस वक़्त सोचता था कि मेरी तुझसे फट गयी है और मैं तुझसे डरता हूँ, पर मेरे लल्लू लाल ऐसा कुच्छ भी नही था...आक्च्युयली एक दिन जब मैं और मेरे डॅड एक साथ बैठकर तेरे बारे मे सोच रहे थे तभी मुझे ख़याल आया कि यदि तुझे हराना है तो क्यूँ ना उस फील्ड मे हराया जाए, जहाँ तू कभी पवरफुल है....यानी कि दिमागी खेल और उसी दिन से मैने तेरे दिमाग़ के साथ खेलना शुरू कर दिया था....तेरे सिटी वालो के साथ हर छोटे-बड़े झगड़े सिर्फ़ मेरे दिमाग़ की उपज थी ,ताकि तुझे पोलीस की नज़र मे लाया जा सके...मैं तुझे और तेरी शक्सियत को ठीक तरह से भाँप गया था ,इसलिए जो मैं सोचता तू वही करता और फिर अपने इसी प्लान मे मैने एश को शामिल किया या फिर ये कहे कि एश खुद शामिल हुई ये कहते हुए कि'वो लल्लू ,लट्टू है मुझपर..दो लाइन यदि प्यार से भी बात कर ली तो साँस लेना तक भूल जाएगा...' और यही मेरा बोनस साबित हुआ...वैसे तो मैने कभी ध्यान नही दिया था कि तू ,एश पर फिदा है...पर जब फ्लॅशबॅक मे जाकर मैने सब कुच्छ याद किया तब मेरा काम आसान हो गया और यहाँ से मेरे इस मिशन की बागडोर एश के हाथ मे आ गयी....सेवेंत सेमेस्टर तक हमने तेरे दिमाग़ के साथ खेला ,तुझे परखा कि तू किस सिचुयेशन मे कैसी हरक़ते करता है और फिर जब तुझे पूरी तरह जान लिया तो हम सबने मिलकर आगे का प्रोग्राम सेट किया...


.वैसे तो तेरे साथ पिछले कुच्छ दिनो जो हुआ,वो मैं बहुत पहले भी करा सकता था ,लेकिन 8थ सेमेस्टर के आख़िरी दिन सूभ महूरत की तरह थे...जिसमे तू एक तो बेहद ही कड़वी याद लेकर जाता और दूसरा तुझे संभालने का कोई मौका नही मिलने वाला था.फर्स्ट एअर से लेकर फाइनल एअर तक तूने कयि कहावते कही होंगी पर एक फेमस कहावत है कि'यदि वक़्त खराब हो तो ऊट पर बैठे इंसान को भी कुत्ता काट लेता है' और यदि तेरे साथ हुआ....आराधना का तेरी लाइफ मे आना हमारे लिए बोनस था... हमे मालूम था कि जब एश तुझे प्रपोज़ करेगी तो तू उसके प्रपोज़ल को आक्सेप्ट ही करेगा और उसके बाद आराधना को लात मारकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर देगा और एक लड़की को जब किसी से सच्चा प्यार हो जाए तो वो इतनी आसानी से उसे नही छोड़ती....इसीलिए एश ने आराधना से तेरी सेट्टिंग करवाई ताकि यदि हम फैल हो जाए तब भी आराधना कुच्छ ना कुच्छ बवाल खड़ा करेगी ही....लेकिन वो स्यूयिसाइड कर लेगी ,इसका अंदाज़ा किसी को नही था....अब आते है उन दिनो की तरफ जहाँ ये सब हुआ.


सिटी और हॉस्टिल का फेरवेल एक साथ कराकर तू उस दिन ये सोच रहा था कि जीत तेरी हुई ,पर हक़ीक़त ठीक उल्टी थी...हम तो चाहते ही थे कि पूरे कॉलेज का फेरवेल एक साथ हो और तू उसमे आंकरिंग करे....क्यूंकी हमे तुझे कलेक्टर के लड़के से जो मिलवाना था.दरअसल बात ये है कि कलेक्टर के लड़के से मेरी बहुत लंबी शर्त थी कि वो फेरवेल के दिन सबके सामने वैसे गंदे कॉमेंट्स दे सकता है कि नही....शुरू मे तो उसने मना कर दिया पर फिर मैने उसका मज़ाक उड़ाना चालू कर दिया कि वो, अरमान से डर गया है,इसीलिए चॅलेज आक्सेप्ट नही कर रहा...अबकी बार उसने चॅलेंज आक्सेप्ट कर लिया और फिर फेरवेल के दिन तेरी ,उससे नोक-झोक हुई....जिसके बाद मैने उसे और भड़काया...साथ ही तेरे पूरे दुश्मनो को भी मैने ही ये कहकर हवा मे बैठा दिया कि'अब तो तुम्हारे साथ कलेक्टर का लड़का है, अकेले मे बुला कर मार दो...कोई पोलीस केस भी नही होगा...."....उन बेचारो को तो इस बात की हवा तक नही है कि वो सब मेरे दोस्त नही ,मेरे प्लान का सिर्फ़ एक हिस्सा थे. वेल इन्षियली मेरा जो प्लान था उसके अकॉरडिंग, तू ग्राउंड मे बुरी तरह मार ख़ाता और अपने फाइनल एग्ज़ॅम नही दे पता....लेकिन फिर मैने सोचा कि इसे क्यूँ ना थोड़ा और ख़तरनाक बनाया जाए. इसलिए मैं तेरे हॉस्टिल के अंदर ऐसे बन्दो की तलाश करने लगा ,जो तुझसे खुन्नस खाए हुए हो और मुझे पता था कि तेरे घमंड और तेरे बुरे बर्ताव के कारण ऐसे एक नही कयि लड़के मिल जाएँगे...जो तुझे मारना चाहते हो...और वही मुझे कालिया और उसके रूम पार्ट्नर्स मिल गये....उस दिन जब तुझे ग्राउंड मे पेलने का प्लान था तो उसके एक दिन पहले कालिया के रूम पार्ट्नर द्वारा अरुण को इन सबकी खबर देना ,ये उस लड़के ने मेरे कहने पर ही किया था...आक्च्युयली मेरे प्लान के अकॉरडिंग उस दिन मार तू नही बल्कि मेरे खुद के दोस्त खाने वाले थे, जिसमे कलेक्टर का लड़का भी शामिल था.वैसे यदि तू चाहता तो कलेक्टर के लड़के को छोड़ कर इन सबसे बच सकता था ,लेकिन तूने ऐसा नही किया और ठीक ऐसा ही मैने सोचा था.....इसके बाद की कहानी तो तुझसे बेटर कोई नही जान सकता और फिर आराधना का केस....उफ़फ्फ़, कितना सुकून मिल रहा है मुझे .और तू ऐसे दिन देख सके इसीलिए एश ने उस दिन 108 को कॉल करके तेरी जान बचाई ,वरना तू तो उसी दिन निपट गया होता....कैसा लगा मेरा गेम..."


गौतम के इतने लंबे प्लान को सुनकर मेरा सर घूमने लगा क्यूंकी वकयि मे उसका प्लान सक्सेस्फुल हुआ था और मेरी हर तरफ से बंद बज चुकी थी...मुझे कुच्छ सूझ ही नही रहा था कि अब क्या बोलू.इसलिए मैने एक बार एश को देखा ,आँखो ही आँखो मे बाइ कहा और पार्किंग से हॉस्टिल की तरफ चल दिया.......

"सीडार के बारे मे नही जानना चाहेगा कि ,उसके साथ क्या हुआ..."हँसते हुए गौतम बोला"उसकी मौत कैसे हुई ,ये भी नही जानना चाहेगा क्या..."

"सीडार के मामले मे तो चुप ही रह तू ,वरना ज़िंदा ,ज़मीन मे गाढ दूँगा...मैं शांत हूँ इसका मतलब ये नही कि कुच्छ करूँगा नही.इसलिए चुप-चाप यहाँ से निकल जा और यही दुआ करना कि ज़िंदगी मे कभी मुझसे मुलाक़ात ना हो..."

"इसी...तेरी इसी आदत ने तेरी मारी है...वैसे एक बार फिर पुच्छ रहा हूँ
क्या तू ये जानना नही चाहेगा कि सीडार के साथ क्या हुआ..."

"क्या हुआ बे सीडार के साथ....स्ट्राइक मे दंगा हुआ था...ये मुझे मालूम है"

"दंगे करवाए भी जा सकते है अरमान सर.वैसे ये सब करवाने का हमारा कोई मूड नही था ,लेकिन तेरे कोमा मे जाने के बाद वो कुच्छ ज़्यादा ही उंगली कर रहा था...वरना तू ही सोच कि स्ट्राइक मे चाकू, तलवार लेकर कौन आता है...."

"तेरी माँ की चूत...तू गया काम से..."गौतम की तरफ दौड़ते हुए मैने उसकी गर्दन पकड़ी और पीछे खड़ी कार मे उसका सर दे मारा.

"यदि पूरे शहर की औलाद ना होकर सिर्फ़ एक बाप की औलाद है तो रुक यही..."बोलकर मैं पार्किंग मे से दौड़ते हुए दूर आया और एक बड़ा सा पत्थर उठाने लगा....लेकिन बीसी पत्थर इतना बड़ा था कि मुझसे उठा ही नही, इसलिए मैं वापस गौतम की तरफ भागा कि कही वो भाग ना जाए और तभिच मेरा सिक्स्त सेन्स ,जो इतने दिनो से बंद पड़ा था ,उसने काम करना शुरू कर दिया.....

"एक मिनिट....कहीं गौतम ये तो नही चाहता कि मैं इससे लड़ाई करू...यदि मैं इससे अभी लड़ता हूँ तो माँ कसम इसे इसके दोस्तो के पास पहुचा दूँगा और फिर मुझपर एक पोलीस केस बनेगा और अबकी बार तो मेरी और भी दुर्गति होगी क्यूंकी एस.पी. तो मुँह फाडे मेरा इंतज़ार ही कर रहा है कि कब मैं वापस आउ....इसीलिए...इसिचलिए जब मैने सब कुच्छ सुनने के बाद भी कुच्छ नही किया तो लवडे ने सीडार का टॉपिक छेड़ दिया, ताकि मैं इसे मारू और जैल चला जाउ....वाह बेटा, वन्स अगेन नाइस प्लान....लेकिन अब नही...."

"ले मार...मारना...दम है तो मार..."

"जिस चीज़ मे मुझे महारत हासिल है ,उसमे तू एक बार जीत गया ,इसका मतलब ये नही कि हर बार जीतेगा...जा तुझे और तेरे बाप को माफ़ किया, तुम भी क्या याद रखोगे कि किस इंसान से पाला पड़ा था..."

"तू खुद को बहुत यूनीक समझता है...अबे तुझ जैसे दारू पीकर ,हॉस्टिल के दम पर लड़ाई-झगड़ा करने वाले हर कॉलेज मे कौड़ियो के दम पर मिलते है.तू मेरी जेब मे रखा सिर्फ़ एक पटाखा है, जिसे जेब से निकाल कर मैं कही भी फोड़ सकता हूँ...."

"बेशक मैं एक पटाखा हूँ लेकिन मैं फूटुंगा वही ,जहाँ मैं चाहता हूँ....और तू अपने किस जीत की बात कर रहा है, जहाँ तेरे कयि दोस्त बुरी तरह मार खा गये ? ,जहाँ कुच्छ ने अपनी जान गवाँ दी ?

और इतना सब होने के बावज़ूद तू मुझसे मार खा रहा है,वो भी खुशी से....शरम कर कुच्छ. यूँ मेरी तरह डाइलॉग डेलिवरी या मेरे फुट-स्टेप फॉलो करने से तू अरमान नही बन सकता....क्यूंकी ओरिजिनल तो मैं हूँ ,तू तो सिर्फ़ मेरा एक कॉपी कट है...तूने दो साल लगा दिए मुझे हराने मे ,अबे मंद-बुद्धि ,तूने ये नही सोचा कि मेरे पास पूरी ज़िंदगी पड़ी है इन सबका बदला लेने के लिए और तू खुद सोच जब तू सिर्फ़ मेरी तरह सोचकर मेरा इतना नुकसान कर सकता है तो जब मैं खुद तेरे बारे मे सोचूँगा तो तेरा कितना नुकसान करूँगा....तेरा प्लान एक दम पर्फेक्ट था ,लेकिन तब तक ही जब तक के तूने मुझे अपने प्लान के बारे मे बताया नही था...."

"दम है तो मार... ले मारना"

"अबे तुम्हारी इतनी औकात कहाँ कि मेरे हाथ से मार खा जाओ...तुम जैसो को मारा नही जाता,उनके मुँह मे सिर्फ़ थुका जाता है "गौतम के मुँह पर थुक्ते हुए मैने कहा...लेकिन मेरा निशाना ठीक नही लगा और गौतम बच गया....तब मैं बोला"साला, तू तो मेरे थूक के भी काबिल नही....बदबयए, तेरी तो मैं अब कह के लूँगा..."

"अरमान...मैं तुम्हारी दिमागी हालत समझ सकती हूँ..."एश बीच मे बोली...

"जब मैं किसी से बात कर रहा हूँ तो इंटर्फियर कभी मत करना....तू...यकीन नही होता तू इस गंदे आदमी के साथ इसके गंदे प्लान मे शामिल हुई.तू तो पूरे एक सेमेस्टर 'अरमान...आइ लव यू....अरमान आइ लव यू' बोलती रही एश...मेरा दिमाग़ मुझे कहता कि तू झूठी है,लेकिन मैं नही माना...आइ रियली लव यू,एश...लेकिन इसका मतलब ये नही कि मैं वो सब भूल जाउन्गा जो तूने किया....तुझे तडपा दूँगा मैं मेरे पास आने के लिए...इतना मज़बूर कर दूँगा कि पागलो की तरह मुझे ढूँढेगी और तब मैं तेरे सामने आकर तुझे रिजेक्ट करूँगा."

"अरमान...मुझे तुम्हारे लिए सच मे बुरा लग रहा है ,इसलिए सबकी भलाई इसी मे है कि तुम अब अपनी ज़िंदगी मे आगे बढ़ो और इस कहानी को यही ख़त्म करो...."

"वाह ,अपनी बारी आई तो ज़िंदगी मे आगे बढ़ो...हुह, उस वक़्त तुम लोग ज़िंदगी मे आगे क्यूँ नही बढ़े ,जब ये सब कहा..."गॉगल लगाते हुए मैं बोला"और ये कहानी यही ख़त्म नही होगी ,मैं इसका सेक़ुअल बनाउगा और हीरो मैं ही रहूँगा...उसमे तुम सबके हर पाप का पाई-पाई हिसाब चुकाया जाएगा....गुडबाइ, हेट यू"

पार्किंग से हॉस्टिल की तरफ जाते हुए मुझे कुच्छ याद आया ,इसलिए मैं पार्किंग से थोड़ी दूर मे ही रुक कर चिल्लाया...
"सुन बे गौतम चूतिए, तुझे तेरी गर्ल फ्रेंड ने बताया है कि नही मुझे नही मालूम पर एक शानदार, जानदार और धमाकेदार दुश्मन होने के कारण मेरा फ़र्ज़ बनता है कि मैं तुझे बता दूं कि फेरवेल के दिन मैने तेरी गर्ल फ्रेंड को बहुत देर तक किस किया था....यकीन ना आए तो पुच्छ लियो..."

ये सुनते ही गौतम की गान्ड फटी और वो एश की तरफ देखने लगा....

"देखा बेटा ,ये है अरमान का जलवा...तुम दोनो यहाँ आए थे मुझे उल्लू साबित करने...पर उल्लू साबित खुद हो गये,इसलिए अब एक काम और करना कि उल्लू की तरह आज रात भर जागना.वैसे भी अब जो मैने बोलने वाला हूँ,उसे सुनकर तुझे आज रात नींद नही आएगी और वो ये है कि' फेरवेल के दिन एश ने मुझे सेक्स करने के लिए कहा था...वो भी एक बार नही बल्कि तीन-चार बार, वो तो मेरी ही नियत अच्छी थी,वरना....चलो जाओ बे, तुम भी क्या याद रखोगे कि किस महान व्यक्ति से पाला पड़ा था....बदबयए"

ये उन दोनो से मेरी आख़िरी मुलाक़ात थी और फिर फाइनल एग्ज़ॅम्स ख़त्म करके मैं ठीक अकेला वैसे ही कॉलेज से निकला ,जैसे कॉलेज मे आया था.....

"अब मैं समझ गया कि तू ऐसे मरा हुआ क्यूँ यहाँ आया...लेकिन घर से क्यूँ भागा..."जमहाई मरते हुए वरुण ने पुछा....

"उसकी वज़ह पांडे जी की बेटी थी..."

"कौन ,तेरी होने वाली भाभी..."

"नही बे...वो तो बहुत बढ़िया है ,लेकिन उसकी छोटी बहन. एक दिन जब उसके घरवाले और मेरे घरवाले एक साथ बैठे थे ,तब पांडे जी की छुटकी लौंडिया ने मेरे कॉलेज के बारे मे पुछ्ना शुरू कर दिया....फिर रिज़ल्ट्स की बात छेड़ दी ,तब बड़े भैया उसकी साइड लेकर मेरी इज़्ज़त उतारने लगे....बहुत देर तक तो मैं सहता रहा और जब सहा नही गया तो ऐसे कड़वे वचन बोले कि वहाँ बैठे सभी लोगो की उल्टी साँस चलने लगी...जिसके थोड़ी देर बाद पांडे जी की लौंडिया रोने लगी और बड़े भैया ने घुमाकर एक थप्पड़ मेरे गाल पर रख दिया...."

"तो इसमे वनवास ग्रहण करने वाली कौन सी बात थी बे... "

"आगे तो सुन....मेरा गाल पर एक थप्पड़ चिपकाने के बाद उन्होने कहा कि'रहना है तो जैसे सब रहते है,वैसे रह...नही तो घर छोड़ दे'...बस फिर क्या था, वहाँ से उठकर मैने अपना बॅग भरा और यहाँ भाग आया...."

"ह्म्म....तो कहानी ख़त्म ,है ना...कहने का मतलब है कि अब मैं सब कुच्छ जान चुका हूँ ,राइट..."

"रॉंग, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त...."

"अब काहे की पिक्चर बाकी है बे...जब सामने दा एंड लिखा गया तो..."

"क्या तूने कभी एश के अजीब-ओ-ग़रीब बिहेवियर पर ध्यान दिया कि कैसे अचानक उसका मूड बदल जाता था ,याद कर जब फिफ्थ सेमेस्टर मे हम लोग 3 दिनो के कॅंप के लिए गये थे...."

"वो कॅंप....कैसे भूल सकता हूँ मैं उस कॅंप को और आंजेलीना डार्लिंग को....उसकी फोटो रखा है क्या.."

"मेरे ख़याल से मैं शायद एश की बात कर रहा था, आंजेलीना की नही...."

"ओह..हां...बोल"

"याद कर कॅंप मे मेरी एश और दिव्या से कैसे भयानक लड़ाई हुई थी और फिर जब मैं एश के लिए खाना पहुचाने गया था तो उसने कैसे बड़े प्यार से खाना ले लिया था....इसके बाद जब गोल्डन जुबिली के फंक्षन के लिए आंकरिंग का आडिशन चल रहा था तब कैसे एश और मेरी ऑडिटोरियम के बाहर घमासान जंग हुई थी ,लेकिन उस घमासान जंग के अगले दिन ही वो ऐसे बर्ताव करने लगी जैसे वो घमासान जंग कभी हुई ही ना हो...."

"तू दिमाग़ मत खा और बोल कि कहना क्या चाहता है.... "

"मैं कहना ये चाहता हूँ कि एश को एक बीमारी है..अम्नईषिया ,जिसके कारण उसकी मेमोरी बहुत वीक है और वो अक्सर सामने खड़े व्यक्ति को देखकर पास्ट मे उसके और उस व्यक्ति के साथ क्या हुआ था ,वो भूल जाती है...मुझे इसकी खबर तब लगी,जब मैं कॉलेज से फाइनल एग्ज़ॅम देकर घर वापस आ गया था.उन्ही दिनो मेघा ने कॉल करके मुझे एश के बारे मे बताया था .जिसके अनुसार फर्स्ट एअर मे एश की स्यूयिसाइड करने की कोशिश ने उसके ब्रेन स्ट्रक्चर के लिमबिक सिस्टम की धज्जिया उड़ा दी थी और वही से उसकी मेमोरी वीक होने लगी....एश के ब्रेन स्ट्रक्चर की जब से धज्जिया उड़ी थी, तब से वो कयि चीज़े भूलनी लगी थी और मेघा का कहना था कि कभी-कभी तो वो ये भी भूल जाती थी कि उसने कभी स्यूयिसाइड करने की कोशिश भी की थी....वो कयि बार दिव्या को नही पहचान पाती थी और उसे क्लास मे सबके सामने इग्नोर करती थी ,जिसके कारण दिव्या और एश के बीच दरार पड़ने लगी....कयि बार क्लास मे जब कोई टीचर एश को खड़ा करता तो वो अपना नाम तक भूल जाती थी....

मेघा के इस जानलेवा खुलासे ने मुझे भी एश की कयि हरक़ते याद दिला दी ,जिसने अम्नईषिया पर अपनी मुन्हर लगा दी थी...जैसे कि कभी-कभी मैं एश को हाई करता तो मुझे बिल्कुल अनदेखा कर देती...जिसे मैं उसका घमंड समझ लेता था .एश अक्सर मंडे को सॅटर्डे बना देती थी ,लेकिन तब मैं उसे उसका मज़ाक समझता था.....अच्छे से कहूँ तो एश को सिर्फ़ वही चीज़े याद रहती थी , जो उसके आस-पास हो...जैसे उसका कॉलेज ,उसके करेंट फ्रेंड्स या फिर मैं ....मुझे याद है कि एक बार मैने एश से उसके स्कूल के बारे मे पुछा था ,तब उसने कहा था कि 'उसे याद नही है कि वो किस स्कूल से पास आउट हुई है ' और मैने इसे भी हल्के मे ले लिया....सारी चीज़े, सारी घटनाए मेरे सामने घटी ,पर मैने कभी ध्यान नही दिया और यदि एश पहले के तरह ही रही तो कुच्छ दिनो बाद शायद वो अपने कॉलेज, अपने कॉलेज फ्रेंड्स और मुझे भी भूल जाएगी...वो भूल जाएगी कि उसकी ज़िंदगी मे कभी मैं भी था...फिर वो मुझे पहचानेगी तक नही....बिल्ली कहीं की...पता नही मेरे खिलाफ उसने इतना बड़ा प्लान कैसे बना लिया.इसकी शायद एक ही वज़ह हो सकती है कि शुरुआत मे अम्नईषिया का ज़्यादा एफेक्ट उस पर ना हुआ हो.....नाउ स्टोरी ओवर ! "

"ठीक है ,तो फिर चल सोते है..."
"चल साले गे..."
"तू सुधरेगा नही..."
"सुधारना ही होता तो बिगड़ता ही क्यूँ..."

"अच्छा ये बता तेरे बाकी दोस्तो का क्या हुआ...जैसे सौरभ ,राजश्री पांडे ,सुलभ ,दिव्या वगेरह-वगेरह...."

"जहाँ तक मेरा अंदाज़ा है...जो कि हमेशा सच ही होता है ,उसके अनुसार सौरभ यूपीएससी की तैयारी मे लगा होगा...सुलभ और मेघा अब शायद एक शहर मे नही होंगे,पर एक दूसरे के टच मे ज़रूर होंगे...दिव्या जैसे झाटु के बारे मे मैं सोचता नही और राजश्री पांडे ,मेरे नक्शे कदम पर चलते हुए कॉलेज पर राज़ कर रहा होगा...."

"ठीक ही है स्टोरी, उतनी बुरी भी नही....गुड नाइट आंड स्वीट ड्रीम्स."

"बडनिगत आंड बाडड्रेआंस..."
.
वरुण के लुढ़कने के बाद मैं खड़ा हुआ, अपने दोनो हाथ उपर किया और एक मस्त अंगड़ाई वित जमहाई लेते हुए सामने पड़ी मागज़िन को उठाया...जिसमे दीपिका मॅम सॉलिड पोज़े दिए हुए थे....

"क्या यार...सुबह 5 बजे मूठ मारने का मन कर रहा है ,मैं एक युगपुरुष हूँ, मुझे इन सब पर कंट्रोल करना चाहिए...."बोलते हुए मैने मागज़िन दूर फेकि और मोबाइल लेकर बाहर बाल्कनी मे आ गया.....
.
मैं हमेशा से ही ग़लत था ,जो ज़िंदगी को पवर और पैसे के तराजू पर तौला करता था...जबकि सच तो ये था कि ज़िंदगी जीने के लिए ना तो बेहिसाब पवर की ज़रूरत होती है और ना ही बेशहमार पैसे की....ज़िंदगी जीने के लिए यदि किसी चीज़ की ज़रूरत होती है तो सिर्फ़ ऐसी ज़िंदगी की...जिसे हम जी सके...जिसमे छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव हो पर अंत मे सब कुच्छ ठीक हो जाए....

एश शायद अपनी बीमारी के चलते मुझे भूल जाए ,पर मुझे यकीन है कि वो जब भी कॉलेज के फोटोस मे मुझे देखेगी तो एक पल के लिए,एक सेकेंड के लिए उसके दिल की घंटी ज़रूर बजेगी....और यदि वो घंटी नही भी बजती तो कोई बात नही...
8थ सेमेस्टर के बाद मैने फाइनली अपने दिमाग़ पर काबू पा लिया था ,मतलब कि अब मैं वही कुच्छ सोचता हूँ,जो मैं सोचना चाहता हूँ...अब ना तो मुझे आतिन्द्र का भूत सपने मे दिखता है और ना ही आराधना....पर ये दोनो मेरे साथ तब तक जुड़े रहेंगे ,जब तक मैं इस दुनिया से जुड़ा रहूँगा....
.
"जल्दी बोल,कॉल क्यूँ किया...."इतने देर से मैं जिस चीज़ का इंतज़ार कर रहा था ,फाइनली वो हो ही गया...कॉल निशा की थी और कॉल रिसीव करते ही रूड होते हुए मैं बोला"तेरा होने वाला हज़्बेंड कहाँ है..."

"तुम तो जानते ही हो कि ,आइ लव यू यार, फिर भी..."

"लड़कियो

"लड़कियो के आइ लव यू से मुझे डर लगता है...क्यूंकी एक के आइ लव यू ने अंदर तक हिला कर रख दिया था....तू बोल ,कॉल क्यूँ किया..."

"सेक्स करने का बहुत मन कर रहा है..."

"तो आजा फिर...मैं कौन सा मना कर रहा हूँ..."

"मुझे असल मे सेक्स नही करना ,बस तुम्हे बताने का दिल कर रहा था..."

"और कुच्छ भी बताना है तो जल्दी बता दो...आँखे बंद हो रही है मेरी..."

"और कुच्छ तो नही पर मैं ये सोच रही थी कि तुम्हे डर नही लगता क्या...जो डॅड को जानते हुए भी मुझसे इश्क़ लड़ा रहे है..."

"डर-वर अपने खून मे नही है...."

"ऐसे कैसे हो सकता है...जिसका जन्म हुआ है और जो एक दिन मरेगा ,उन सबको किसी ना किसी चीज़ से डर लगता है..."

"मेरा जन्म नही हुआ है ,मेरा अवतार हुआ है...."

"चल झूठे..."
.
इसी के साथ हम दोनो 'डर' टॉपिक पर एक दूसरे से लड़ाई करने लगे....

मेरा आगे क्या होगा..इसकी मुझे ज़्यादा परवाह नही थी,क्यूंकी मुझे मालूम है कि मेरे साथ जितना बुरा होना था वो तो हो चुका है, अब उससे ज़्यादा बुरा नही हो सकता और यदि हुआ भी तो मैं होने नही दूँगा....फिलहाल तो अपनी गाड़ी निशा भरोसे चल रही थी और इतने अच्छे-बुरे अनुभव से मैने एक चीज़ जो सीखी थी वो ये कि 'लव ईज़ नोट लवेबल' क्यूंकी लव मे मतलब इसका नही रहता कि आप अपनी ज़िंदगी कैसे जीते हो,बल्कि मतलब इसका रहता है कि आप अपने सपनो को कैसे जीते हो....

"माइसेल्फ अरमान और ये थे मेरी ज़िंदगी के कुच्छ अरमान ,जिनमे से कुच्छ पूरे हुए तो कुच्छ पूरे होने बाकी है और एक बात ,किसी शायर ने हंड्रेड पर्सेंट सच ही कहा है कि 'आशिक़ बनकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद मत करना..'

--दा एंड--बोले तो समाप्त
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