Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
07-16-2017, 09:59 AM,
#31
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
27

अब आगे....

बड़के दादा: बैठो मुन्ना
(मैं चुप-चाप बैठ गया, मेरे तेवर देख के कोई भी कह सकता था कि अगर उन्होंने मेरी शादी कि बात कि तो मैं बगावत कर दूँगा|)

पिताजी: देखो बेटा, बात थोड़ी सी गंभीर है| लड़की मानने को तैयार नहीं है... वो जिद्द पे अड़ी है कि वो शादी तुम से ही करेगी| इसलिए हमने उनसे थोड़ा समय माँगा है ...

मैं: समय किस लिए? आपको जवाब तो मालुम है|
(मेरे तेवर गर्म हो चुके थे .. तभी भौजी ने मेरे कंधे पे हाथ रख के मुझे शांत होने का इशारा किया|)

पिताजी: देखो बेटा हम कल शादी नहीं कर रहे... हमने केवल सोचने के लिए समय माँगा है|

मैं: पिताजी आप मेरा जवाब जानते हो, मैं उससे शादी कभी नहीं करूँगा!!! आप मेरे एक सवाल का जवाब दो, कल को शादी के बाद भी वो इसी तरह कि जिद्द करेगी तो मैं क्या करूँगा? हर बार उसकी जिद्द के आगे झुकता रहूँ? आप लोगों का क्या? मैं और आप तो काम धंधे में लगे रहेंगे और वो घर में माँ को तंग करेगी?
ऐसी जिद्दी लड़की तो मुझे आपसे भी अलग कर देगी और तब बात तलाक पे आएगी? क्या ये ठीक है? आप यही चाहते हो? मैं ये नहीं कह रहा कि लड़की मेरी पसंद कि हो, परन्तु वो काम से काम आप लोगों को तो खुश रख सके| माँ-बाप अपने बच्चों को इतने प्यार से पालते हैं और जब वही बचे बड़े हो के गलत फैसले लें या उनके माँ-बाप उनके लिए गलत फैसले लें तो सब कुछ तबाह हो जाता है|

मेरे दिमाग में जितने भी बहाने आये मैंने सब पिताजी के सामने रख दिए|अब मैं उनका जवाब सुनने को बेचैन था|

पिताजी: बेटा तू इतना जल्दी बड़ा हो गया? हमारे बारे में इतना सोचता है? हमें और क्या चाहिए?

बड़के दादा: भैया तुमने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं अपने लड़के को| मुझे तुम पे गर्व है!!! तुम चिंता मत करो मुन्ना, कल हम जाके ठाकुर साहब को समझा देंगे| अगर फिर भी नहीं माना तो पंचायत इक्कट्ठा कर लेंगे|बहु चलो खाना बनाओ अब सब कुछ ठीक हो गया है, चिंता कि कोई बात नहीं है|

मैं उठ के खड़ा हुआ तो बड़की अम्मा ने मेरा माथा चूमा और माँ ने भी थोड़ा दुलार किया| अगर किसी का मुँह देखने लायक था तो वो था अजय भैया और चन्दर भैया का| दोनों के दोनों हैरान थे और मुझे शाबाशी दे रहे थे|मैं मन ही मन सोच रहा था कि बेटा तू राजनीति में जा ..अच्छा भविष्य है तेरा| क्या स्पीच दी है.. सबके सब खुश होगये!!! मैं मन ही मन अपने आपको शाबाशी देने लगा| भोजन का समय था, सभी पुरुष सदस्य एक कतार में बैठे थे और मेरा नंबर आखरी था| भौजी एक-एक कर के सब को भोजन परोस रही थी| नेहा खाना खा चुकी थी और आँगन में खेल रही थी, सब लोग अब भी शाम को हुई घटना के बारे में बात कर रहे थे| भौजी अभी खामोश थीं... मैं भी चुप-चाप अपना भोजन कर रहा था| तभी नेहा भागते-भागते गिर गई और रोने लगी.. मैंने सोचा कि शायद चन्दर भैया उसे उठाने जायंगे पर उन्होंने तो बैठ-बैठे ही भौजी को हुक्म दे दिया; "जरा देखो, नेहा गिर गई है|" मुझे बड़ा गुस्सा आया उनपर, इसलिए मं खुद भागता हुआ गया और नेहा को गोद में उठाया|

चन्दर भैया: अरे मानु भइया, पहले भोजन तो कर लो; तुम्हारी भाभी देख लेगी उसे|

मैं: अभी आता हूँ| अव्व ले ले मेरे बेटा.. चोट लग गई आपको?

मैं नेहा को हैंडपंप के पास ले गया, अपने हाथ धोये फिर उसके हाथ-पाँव धोये| अपने रुमाल से उसके चोट वाली जगह को धीरे-धीरे पोंछा, इतने में भौजी भी वहाँ भागती हुई आ गईं;

भौजी: लाओ मानु मैं देखती हूँ मेरी लाड़ली को क्या होगया?

मैं: नहीं आप अभी इसे छू नहीं सकते... आपने बाकियों को भोजन परोसना है| मैं नेहा को दवाई लगा के अभी लाता हूँ|

मैं नेहा को पुचकारते हुए अपने साथ बड़े घर लेग्या और उसके चोट ओ डेटोल से साफ़ किया फिर दवाई लगाई| ज्यादा गंभीर चोट नहीं थी पर बच्चे तो आखिर बच्चे होते है ना| करीब पंद्रह मिनट बाद वापस आया तो देखा सब खाना खा के उठ चुके थे| मैंने नेहा को गोद से उतरा और अपनी चारपाई पे बैठा दिया|
:आप यहीं बैठो.. मैं खाना खा के आता हूँ, फिर आपको क नै कहानी सुनाउंगा|"

मैंने भौजी से पूछा कि मेरी थाली कहाँ है तो उन्होंने उसमें और भोजन परोस के दे दिया| मैं उनकी ओर हैरानी से देखने लगा; तभी वो बोलीं "सभी बर्तन जूठे हैं इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ ही खाऊँगी|"
मैंने एक रोटी खाई और उठने लगा तो भौजी ने मेरा हाथ पकड़ के बैठा दिया ओर कहा; "एक रोटी मेरी ओर से|" मैंने ना में सर हिलाया तो वो बनावटी गुस्से में बोलीं; "ठीक है तो फिर मैं भी नहीं खाऊँगी|" अब मैंने जबरदस्ती एक और रोटी खा ली और हाथ-मुँह धो के नेहा के पास आ गया| नेहा मेरा इन्तेजार करते हुए अब भी जाग रही थी... नेहा को अपनी गोद में लिए मैं टहलने लगा और कहानी सुनाता रहा और उसकी पीठ सहलाता रहा ताकि वो सो जाए| इधर सभी अपने-अपने बिस्तर में घुस चुके थे... मैं जब टहलते हुए पिताजी के पास पहुंचा तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठने को कहा; तभी भौजी वहाँ बड़के दादा के लिए लोटे में पानी ले के आ गईं ताकि अगर उन्हें रात में प्यास लगे तो पानी पी सकें|

पिताजी: क्या हुआ चक्कर क्यों काट रहा है?

मैं: अपनी लाड़ली को कहनी सुना रहा हूँ|
(मेरे मुँह से "मेरी लाड़ली" सुनते ही भौजी के मुख पे छत्तीस इंच कि मुस्कराहट फ़ैल गई|)

भौजी मुझे छेड़ते हुए बोलीं:

भौजी: कभी हमें भी कहानी सुना दिया करो... जब देखो "अपनी लाड़ली" को गोद में लिए घूमते रहते हो|

मैं: सुना देता पर नेहा तो आधी कहनी सुनते ही सो जाती है, पर आपको सुलाने के लिए काम से काम तीन कहनियाँ लगेंगी| तीन कहनी सुनते-सुनते आधी रात हो जाएगी और आप तो सो जाओगे अपने बिस्तर पे, और मुझे आँखें मलते हुए अपने बिस्तर पे आके सोना होगा|

मेरी बात सुनके सब हँस पड़े| खेर मैं करीब आधे घंटे तक नेहा को अपनी गॉड में लिए घूमता रहा और कहनी सुनाता रहा| जब मुझे लगा की नेहा सो गई है तब मैं उसे लेके भौजी की घर की ओर चल दिया| हंसेः कि तरह, आँगन में दो चारपाइयाँ लगीं थी.. एक पे भौजी लेटी थी और दूसरी नेहा के लिए खाली थी| मैंने नेहा को चारपाई पे लेटाया;

भौजी: सो गई नेहा?

मैं: हाँ बड़ी मुश्किल से!

भौजी: आओ मेरे पास बैठो|
(मैं भौजी के पास बैठ गया|)

मैं: (गहरी सांस लेते हुए|) बताओ क्या हुक्म है मेरे लिए?

भौजी: तुम जब मेरे पास होते हो तो मुझे नींद बहुत अच्छी आती है|

मैं: आप तो सो जाते हो पर मुझे आधी रात को अपने बिस्तर पे जाना पड़ता है|

भौजी: अच्छा जी! खेर मैं "आपको" एक बात बताना चाहती थी, कल मेरा व्रत है|

मैं: व्रत, किस लिए?

भौजी: कल XXXXXX का व्रत है जो हर पत्नी अपने पति की खुशाली के लिए व्रत रखती है| तो मैं भी ये व्रत आपके लिए रखूंगी|

मैं: ठीक है.... तो इसका मतलब कल मैं आपको नहीं छू सकता!

भौजी: सिर्फ शाम तक.. शाम को पूजा के बाद मैं आपके पास आऊँगी|

मैं: ठीक है, अब मैं चलता हूँ|

भौजी: मेरे पास बैठने के लिए तो तुम्हारे पास टाइम ही नहीं है?

मैं: दरवाजा खुला है, घर के सभी लोग अभी जगे हैं... अब किसी ने मुझे आपके साथ देख लिया तो???

भौजी: ठीक है जाओ!!! सोने!!! मैं अकेले यहाँ जागती रहूंगी!!!

मैं बिना कुछ कहे उठ के अपने बिस्तर पे आके लेट गया| अभी दस मिनट ही हुए होंगे की भौजी नेहा को गोद में ले के आइन और मेरे पास लिटाते हुए बोलीं: "लो सम्भालो अपनी लाड़ली को!" मैं कुछ कहता इससे पहले ही वो चलीं गई... मैं करवट लेके लेट गया और नेहा की छाती थपथपाने लगा| कुछ ही देर में नेहा भी मुझसे लिपट के सो गई|
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07-16-2017, 10:00 AM,
#32
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
28

अब आगे....

सुबह हुई, नहा धो के फ्रेश हो के बैठ गया| बड़के दादा और पिताजी ठाकुर से बात करने जाने वाले थे|

मैं: पिताजी आप और दादा कहाँ जा रहे हो?

पिताजी: ठाकुर से बात करने|

मैं: तो आप क्यों जा रहे हो, उन्हें यहाँ बुलवा लो|

पिताजी: नहीं बेटा हमें ही जाके बात करनी चाहिए|

पिताजी और बड़के दादा चले गए, और मैं उत्सुकता से आँगन में टहल रहा था की पता नहीं वहां क्या होगा? अगर माहुरी फिर से ड्रामे करने लगी तो? इधर घर की सभी औरतें मंदिर जा चुकीं थी ... घर में बस मैं और नेहा ही थे| नेहा बैट और बॉल ले आई, और मैं और वो उससे खेलने लगे| तभी पिताजी और बड़के दादा वापस आ गए|

मैं: क्या हुआ? आप इतनी जल्दी मना कर के आ गए?

बड़के दादा: नहीं मुन्ना, ठाकुर साहब घर पे नहीं थे कहीं बहार गए हैं, कल लौटेंगे|

इतना बोल के वे भी खेत चले गए| अब तो मैं ऊब ने लगा था... घर अकेला छोड़ के जा भी नहीं सकता था| करीब बारह बज रहे थे; घडी में भी और मेरे भी! सुबह से सिर्फ चाय ही पी थी वो भी ठंडी! मैंने नेहा को दस रूपए दिए और उसे चिप्स लाने भेज दिया, भूख जो लग रही थी| दस मिनट में नेहा चिप्स ले आई और हम दोनों बैठ के चिप्स खाने लगे, तभी भौजी और सभी औरतें लौट आईं|

बड़की अम्मा: मुन्ना चिप्स काहे खा रहे हो?

मैं: जी भूख लगी थी, घर पे कोई नहीं था तो नेहा को भेज के चिप्स ही मँगवा लिए|

माँ: हाँ भई शहर में होते तो अब तक खाने का आर्डर दे दिया होता|

भौजी हंसने लगी !!!

मैं: आप क्यों हंस रहे हो?

भौजी: क्यों मैं हंस भी नहीं सकती|

भौजी ने नाश्ते में पोहा बनाया था, तब जाके कुछ बूख शांत हुई! नाश्ते के बाद मैं खेत की ओर चल दिया, इतने दिनों से घर पे जो बैठ था| सोचा चलो आज थोड़ी म्हणत मजदूरी ही कर लूँ? पर हंसिए से फसल काटना आये तब तो कुछ करूँ, मुझे तो हंसिया पकड़ना ही नहीं आता था| अब कलम पकड़ने वाला क्या जाने हंसिया कैसे पकड़ते हैं? फिर भी एक कोशिश तो करनी ही थी, मैंने पिताजी से हंसिया लिया ओर फसल काटने के लिए बैठ गया, अब हंसिया तो ठीक-ठाक पकड़ लिया पर काटते कैसे हैं ये नहीं आत था| इधर-उधर हंसिया घुमाने के बाद मैंने हार मान ली|

पिताजी: बस! थक गए? बेटा तुम्हारा काम पेन चलना है हंसिया नहीं| जाओ घर जाओ और औरतों को कंपनी दो|

अब तो बात इज्जत पे आ गई थी| मैंने आव देखा न ताव फसल को जड़ से पकड़ के खींच निकला| अब तो मैं जोश से भर चूका था, इसलिए एक बार में जितनी फसल हाथ में आती उसे पकड़ के खींच निकालता| ये जोश देख के पिताजी हंस रहे थे... अजय भैया और चन्दर भैया जो कुछ दूरी पर फसल काट रहे थे वो भी ये तमाशा देखने आ गए|

बड़के दादा: अरे मुन्ना रहने दो| तुम शहर से यहाँ यही काम करने आये हो?

पिताजी अब भी हंस रहे थे और मैं रुकने का नाम नहीं ले रहा था| तो बड़के दादा ने उन्हें भी डाँट के चुप करा दिया|

बड़के दादा: तुम हंसना बंद करो, हमारा मुन्ना खेत में मजदूरी करने नहीं आया है|

मैं: दादा .. आखिर मैं हूँ तो एक किसान का ही पोता| ये सब तो खून में होना चाहिए| अब ये तो शहर में रहने से इस काम की आदत नहीं पड़ी, ये भी तजुर्बा कर लेने दो| काम से काम स्कूल जाके अपने दोस्तों से कह तो सकूंगा की मैंने भी एक दिन खेत में काम किया है|

मेरे जोश को देखते हुए उन्होंने मुझे हंसिया ठीक से चलाना सिखाया, मैं उनकी तरह माहिर तो नहीं हुआ पर फिर भी धीमी रफ़्तार से फसल काट रहा था| समय बीता और दोपहर के दो बज गए थे और नेहा हमें भोजन के लिए बुलाने आ गई|भोजन करते समय बड़के दादा मेरे खेत में किये काम के लिए शाबाशी देते नहीं थक रहे थे| खेर भोजन के उपरान्त, सब खेत की ओर चल दिए जब मैं जाने के लिए निकलने लगा तो भौजी ने मुझे रोकना चाहा|

भौजी: कहाँ जा रहे हो "आप"?

मैं: खेत में

भौजी: "आपको" काम करने की क्या जर्रूरत है? "आप" घर पर ही रहो.. मेरे पास! आप शहर से यहाँ काम करने नहीं आये हो| मेरे पास बैठो कुछ बातें करते हैं|

मैं: मेरा भी मन आपके पास बैठने को है पर आज आपका व्रत है| और अगर मैं आपके पास बैठा तो मेरा मन आपको छूने का करेगा| इसलिए अपने आपको व्यस्त रख रहा हूँ|

भौजी थोड़ा नाराज हुई, पर मैं वहां रुका नहीं और खेत की ओर चल दिया|

घर से खेत करीब पंद्रह मिनट की दूरी पे था.... जब मैं आखिर में खेत पहुंचा तो पिताजी, बड़के दादा समेत सभी मुझे वापस भेजना चाहते थे, पर वापस जा के मैं क्या करता इसलिए जबरदस्ती कटाई में लग गया| अजय भैया के पास शादी का निमंत्रण आया था तो उन्हें चार बजे निकलना था और चन्दर भैया भी उनके साथ जाने वाले थे|अभी साढ़े तीन ही बजे थे की दोनों भाई तैयार होने के लिए घर की ओर चल दिए| वे मुझे भी साथ ले जाने का आग्रह कर रहे थे परन्तु मैं नहीं माना|शाम के पाँच बजे थे, मौसम का मिज़ाज बदलने लगा था| काले बदल आसमान में छा चुके थे... बरसात होने की पूरी सम्भावना थी| इधर खेत में बहुत सा भूसा पड़ा था, अगर बरसात होगी तो सारा भूसा नष्ट हो जायेगा| दोनों भैया तो पहले ही जा चुके थे, अब इस भूसे को कौन घर तक ले जाए? खेत में केवल मैं. पिताजी और बड़के दादा थे| मैंने स्वयं बड़के दादा से कहा; "दादा आप बोरों में भूसा भरो मैं इसे घर पहुँचता हूँ|" बड़के दादा मना करने लगे पर पिताजी के जोर देने पे वो मान गए| मैंने आज से पहले कभी इस तरह सामान नहीं ढोया था|पिताजी भी इस काम जुट गए, मैं एक-एक कर बोरों को लाद के घर ला रहा था... पसीने से बुरा हाल था| मैंने गोल गले की लाल टी-शर्ट पहनी थी, जो पसीने के कारण मेरे शरीर से चिपक गई थी| अब मेरी बॉडी सलमान जैसी तो थी नहीं पर भौजी के अनुसार मैं "सेक्सी" लग रहा था| जब मैं बोरियां उठा के ला रहा था तो बाजुओं की मसल अकड़ जातीं और टी-शर्ट में से मसल साफ़ दिखती|

मेरा इन बातों पे ध्यान नहीं था... अब केवल तीन बोरियां शेष रह गई थीं| जब मैं पहली बोरी लेके आरहा था तभी माधुरी मेरे सामने आके खड़ी हो गई| मैंने उसकी ओर देखा फिर नज़र फेर ली और बोरी रखने चला गया| जब बोरी लेके लौटा तब माधुरी बोली: "तो अब आप मुझसे बात भी नहीं करोगे?" मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और दूसरी बोरी उठाने चला गया, जब तक मैं लौटता माधुरी हाथ बांधे प्यार भरी नजरों से मुझे देख रही थी|

माधुरी: मेरी बात तो सुन लो?

मैं: हाँ बोलो| (मैंने बड़े उखड़े हुए अंदाज में जवाब दिया|)

माधुरी: कल मैं आपसे I LOVE YOU कहने आई थी| पर भाभी ने मेरी बात सुने बिना ही झाड़ दिया|

मैं: मैंने कल भी तुम से कहा था, मैं तुमसे प्यार नहीं करता| तुम क्यों अपनी जिंदगी बर्बाद करने में तुली हो !!!

मेरी आवाज में कठोरता झलक रही थी, और आवाज भी ऊँची थी जिसे सुन के भौजी भी भागी-भागी आईं| मैंने उन्हें हाथ के इशारे से वहीँ रोक दिया... मैं नहीं चाहता था की खामा-खा वो इस पचड़े में पड़े| तभी पीछे से पिताजी भी आखरी बोरी ले के आ गए और उनके पीछे ही बड़के दादा भी आ गए|

पिताजी: क्या हुआ पुत्तर यहाँ क्यों खड़े हो? अरे माधुरी बेटा.. तुम यहाँ क्या कर रहे हो?

माधुरी: जी मैं....

मैं: ये फिर से कल का राग अलाप रही है|

इतना कह के मैं वहां से चला गया| पिताजी और बड़के दादा उसे समझाने में लगे हुए थे... मैं वापस आया और चारपाई पे बैठ के दम लेने लगा|भौजी मेरे लिए पानी लाईं और माधुरी के बारे में पूछने लगी:

भौजी: क्यों आई थी ये?

मैं: कल वाली बात दोहरा रही थी|

भौजी: "आपने" कुछ कहा नहीं उसे?

मैं: नहीं, जो कहना है कल पिताजी और बड़के दादा कह देंगे| छोडो इन बातों को.... आप तो पूजा के लिए जा रहे होगे? मौसम ख़राब है... छाता ले जाना|

मैं थोड़ी देर लेट के आराम करने लगा... तभी पिताजी और बड़के दादा भी मेरे पास आके बैठ गए|

मैं: आपने उसे कुछ कहा तो नहीं?

पिताजी: नहीं, बस कह दिया की कल हम आके बात करेंगे|

बड़के दादा: मुन्ना तुम चिंता मत करो, कल ये मामला निपटा देंगे|अब तुम जाके नाहा धोलो... तरो-ताज़ा महसूस करोगे|

घर की सभी औरतें पूजा के लिए चली गई थी| मैं कुछ देर बैठा रहा... पसीना सूख गया तब मैं स्नान करने बड़े घर की ओर चल दिया| मैंने दरवाजा बंद नहीं किया था, जो की शायद मेरी गलती थी! मैंने अपने नए कपडे निकाले, हैंडपंप से पानी भरा और पसीने वाले कपडे निकाले और नहाने लगा| शाम का समय था इसलिए पानी बहुत ठंडा था, ऊपर से मौसम भी ठंडा था| नहाने के बाद मैं काँप रहा था इसलिए मैंने जल्दी से कपडे बदले| मैं कमरे में खड़ा अपने बाल ही बना रहा था की, तभी भौजी अंदर आ गई तब मुझे याद आया की मैं दरवाजा बंद करना तो भूल गया| भौजी की हाथ में पूजा की थाली जिसे उन्होंने चारपाई पे रखा और मेरे पास आईं| इससे पहले की मैं कुछ बोलता उन्होंने आगे बढ़ के मेरे पाँव छुए, मैं सन्न था की भला वो मेरे पाँव क्यों छू रही हैं? आम तोर पे मैं अगर कोई मेरे पैर छूता है तो मैं छिटक के दूर हो जाता हूँ, क्यों की मुझे किसी से भी अपने पाँव छूना पसंद नहीं| परन्तु आजकी बात कुछ और ही थी, मैं नाजाने क्यों नहीं हिला| मैंने भौजी को कंधे से पकड़ के उठाया;

मैं: ये क्या कर रहे थे आप? आपको पता है न मुझे ये सब पसंद नहीं|

भौजी: पूजा के बाद पंडित जी ने कहा था की सभी स्त्रियों को अपने पति के पैर छूने चाहिए| मैंने "आपको" ही अपना पति माना है इसलिए आपके पैर छुए| उनकी बात सुनके मेरे कान सुर्ख लाल हो गए!! मैं उन्हें आशीर्वाद तो नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने उन्हें गले लगा लिया| ऐसा लग रहा था मनो ये समां थम सा गया हो! मन नहीं कर रहा था उन्हें खुद से दूर करने का!!!

भौजी: अच्छा अब मुझ छोडो, मुझे भोजन भी तो पकाना है|

मैं: मन नहीं कर रहा आपको छोड़ने का|

भौजी: अच्छा जी... कोई आ रहा है!!!

मैंने एक दम से भौजी को अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया| भौजी दूर जा के हंसने लगी, क्योंकि कोई नहीं आ रहा था| मैं भी अपने सर पे हाथ फेरते हुए हंसने लगा| उनकी इस दिल्लगी पे मुझे बहुत प्यार आ रहा था|

मैं: बहुत शैतान हो गए हो आप.... भोजन के बाद मेरे पास बैठना कुछ पूछना है|

भौजी: क्या? बताओ?

मैं: अभी नहीं, देर हो रही होगी आपको|

हम दोनों साथ-साथ बहार आये, और मैंने बड़े घर में ताला लगाया और हम रसोई की ओर चल दिए| वहां पहुँच के देखा की, माँ पिताजी के पाँव छू रही है ओर बड़की अम्मा बड़के दादा के पाँव छू रही हैं| पिताजी और बड़के दादा उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे| ये दृश्य मेरे लिए आँखा था!!!

भौजी हाथ-मुंह धो के रसोई पकाने के लिए चली गईं और मैं बड़के दादा और पिताजी के पास लेट गया| नेहा मेरे पास आके गोद में बैठ गई और मैं उसके साथ खेलने लगा| मेरा वहां बैठने का कारन यही था की उन्हें मेरा बर्ताव सामान्य लगे| क्योंकि जब से मैं आया था मैं सिर्फ भौजी के आस-पास मंडराता रहता था, ख़ास तोर पे जब वो बीमार पड़ी तब तो मैंने उन्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा था|

भोजन के पश्चात पिताजी और बड़के दादा तो अपनी चारपाई पे लेट चुके थे और मेरी चारपाई हमेशा की तरह सबसे दूर भौजी के घर के पास लगी थी| जब माँ और बड़की अम्मा अपने बिस्तर में लेट गईं तब भौजी मेरे पास आके बैठ गईं;

भौजी: तो अब बताओ की "आपने" क्या बात करनी थी?

मैं: मैंने एक चीज़ गौर की है, आपने मेरे लिए एक-दो दिनों से "आप, आपने, आपको, इन्हें" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है?

भौजी: "आपने" भी तो मुझे "भौजी" कहना बंद कर दिया?

मैं: वो इसलिए क्योंकि अब हमारे बीच में "देवर-भाभी" वाला प्यार नहीं रहा| आप मुझे अपना पति मान चुके हो और मैं आपको अपनी पत्नी तो मेरा आपको भौजी कहना मुझे उचित नहीं लगा|

भौजी: मुझे आगे बोलने की कोई जरुरत है?

मैं: नहीं... मैं समझ गया!

भौजी: आज आप बहुत "सेक्सी" लग रहे थे!!!

मैं: अच्छा जी???

भौजी: पसीना के कारन आपकी लाल टी-शर्ट आपके बदन से चिपकी हुई थी, मेरा तो मन कर रहा था की आके आपसे लिपट जाऊँ! पर घर पर सभी थे.. इसलिए नहीं आई!!! ना जाने क्यों मेरा कभी इस ओर ध्यान ही नहीं गया|
आपके पास और ऐसी टी-शर्ट हैं जो आपके बदन से चिपकी रहे?

मैं: नहीं... मुझे ढीले-ढाले कपडे पहनना अच्छा लगता है|

भौजी: तो मतलब मुझे फिर से आपको ऐसे देखने का मौका कभी नहीं मिलेगा?

मैं: अगर आप बाजार चलो मेरे साथ तो खरीद भी लेता.. मुझे तो यहाँ का ज्यादा पता भी नहीं|

भौजी: ठीक है मैं चलूंगी... पर घर में क्या बोल के निकलेंगे?

मैं: मुझे क्या पता? आप सोचो?

भौजी: तुम्हारे पास ही सारे आईडिया होते हैं.. तुम्हीं रास्ता निकाल सकते हो|

मैं: सोचता हूँ|

भौजी: अगर आप बुरा ना मनो तो मैं आपसे एक बात पूछूं?

मैं: हाँ

भौजी: आपने ये सब कहाँ से सीखा?

मैं: क्या मतलब सब सीखा?

भौजी: मेरा मतलब, हमने जब भी सम्भोग किया तो आपको सब पता था| आपको पता है की स्त्री के कौन से अंग को कैसे सहलाया जाता है? कैसे उसे खुश किया जाता है...
(इतना कहते हुए वो झेंप गईं!!!)

मैं: (अब शर्म तो मुझे भी आ रही थी पर कहूँ कैसे?) दरअसल मैंने ये PORN MOVIE में देखा था|

भौजी: ये PORN MOVIE क्या होता है?

मैंने उन्हें बताया की स्कूल में मेरे एक दोस्त के घर पर मैंने वो मूवी देखि थी| उस दिन उसके पिताजी शहर से बहार थे और उसकी माँ पड़ोस में किसी के घर गईं थी| मेरे दोस्त ने मुझे अपने घर पढ़ने के बहाने से बुलाया और हम उसके DVD प्लेयर पर वो मूवी देखने लगे| ये पहली बार था जब मैं PORN मूवी देखि थी| वो मूवी मेरे दिमाग में छप गई थी, पर मैंने उस मूवी में देखे एक भी सीने को भौजी के साथ नहीं किया था और ना ही करे का कोई इरादा था| भौजी की रूचि उस मूवी की कहनी सुनने में थी, सो मैं उन्हें पूरी कहानी सुनाने लगा| एक-एक दृश्य उन्हें ऐसे बता रहा था जैसे मैं उनके साथ वो दृश्य कर रहा हूँ| भौजी बड़े गौर से मेरी बातें दूँ रही थी... अंततः कहानी पूरी हुई और मैंने भौजी को सोने जाने को बोला|नेहा तो पहले से ही चुकी थी, और इस कहानी सुनाने के दौरान मैं उत्तेजित हो चूका था| सो मेरा मन भौजी के बदन को स्पर्श करने को कर रहा था| पर चूँकि आज सारा दिन व्रत के कारन भौजी ने कुछ खाया-पिया नहीं था| इसलिए मेरा कुछ करना मुझे उचित नहीं लगा ... थकावट इतनी थी की लेटते ही सो गया|
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07-16-2017, 10:00 AM,
#33
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
29

अब आगे...

सुबह उठने में काफी देर हो गई... सूरज सर पे चढ़ चूका था| बड़के दादा, बड़की अम्मा और पिताजी खेत जा चुके थे| घर में केवल मैं, माँ, नेहा और माँ ही रह गए थे| मैं एक दम से उठ के बैठा, आँखें मलते हुए भौजी को ढूंढने लगा| भौजी मुझे मटकी में दूध ले के आती हुई दिखाई दीं|

मैं: आपने मुझे उठाया क्यों नहीं?

भौजी: कल आप बहुत थक गए थे इसलिए पिताजी का कहना था की आपको सोने दिया जाए| और वैसे भी उठ के आपने कहाँ जाना था?

मैं: खेत...

भौजी: आपको मेरी कसम है आप खेत नहीं जाओगे... कल की बात और थी| कल व्रत के कारन आप मुझसे दूर थे पर आज तो कोई व्रत नहीं है| चलो जल्दी से नहा धो लो, मैं चाय बनाती हूँ|

मैं: अच्छा एक बात बताओ, पिताजी और बड़के दादा गए थे बात करने?

भौजी: आप नहा धो के आओ, फिर बताती हूँ|


मैं नहा धो के जल्दी से वापस आया, तब माँ भी वहीँ बैठी थी| उन्होंने भौजी से कहा; "बहु बेटा, मानु के लिए चाय ले आना|" और भौजी जल्दी से चाय ले आईं| चाय पेट हुए माँ ने बताया की पिताजी और बड़के दादा गए थे ठाकुर से बात करने| पर माधुरी अब भी अपनी जिद्द पे अड़ी है, कहती है की वो अपनी जान दे देगी अगर तुम ने हाँ नहीं बोला| हमारे पास और कोई चारा नहीं है, सिवाए पंचायत में जाने के| बदकिस्मती से तुम्हें भी पंचायत में अाना होगा| मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी की मुझे उस लड़की वजह से पंचायत तक में अपनी बत्ती लगवानी होगी| मैं बहुत परेशान था.... खून खोल रहा था| उस लड़की पे मुझे इतना गुस्सा आ रहा था की .... मैं हिंसक प्रवत्ति का नहीं था इसीलिए चुप था! मैं उठा और अभी कुछ ही दूर गया था की माँ की आवाजे आई: "बेटा, उस लड़की से दूर रहना! वरना वो तुम्हारे ऊपर कोई गलत इलज़ाम ना लगा दे|" ये मेरे लिए एक चेतावनी थी!!!

मैं वहीँ ठिठक के रह गया और वापस मुदा और आँगन में कुऐं की मुंडेर पे बैठ गया| सर नीचे झुकाये सोचने लगा... की कैसे मैं अपना पक्ष पांचों के सामने रखूँगा| चार घंटे कैसे बीते मुझे पता ही नहीं... भौजी मेरे पास आईं मुझे भोजन के लिए बुलाने के लिए|

भौजी: चलिए भोजन कर लीजिये...

मैं: आप जाओ .. मेरा मूड ठीक नहीं है|

भौजी: तो फिर मैं भी नहीं खाऊँगी|

मैं: ठीक है, एक बार ये मसला निपट जाए दोनों साथ भोजन करेंगे|

भौजी: पर मुझे भूख लगी है...

मैं: तो आप खा लो|

भौजी: बिना आपके खाए मेरे गले से निवाला नहीं उतरेगा|

मैं: प्लीज... आप मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो| और आप जाके भोजन कर लो!!!

भौजी कुछ नहीं बोलीं और उठ के चलीं गई, दरअसल मुझे मानाने के लिए माँ ने ही उन्हें भेजा था|मैं अकेला कुऐं पर बैठा रहा... अजय भैया शादी से लौट आये थे, परन्तु चन्दर भैया शादी से सीधा मामा के घर चले गए थे| सब ने एक-एक कर मुझे मानाने की कोशिश की परन्तु मैं नहीं माना... घर के किसी व्यक्ति ने खाना नहीं खाया था| सब के सब गुस्से में बैठे थे| पांच बजे पंचायत बैठी... सभी पांच एक साथ दो चारपाइयों पे बैठे और दाहिने हाथ पे माधुरी और उसका परिवार बैठा था और बाएं हाथ पे मेरा परिवार बैठा था|

सबसे पहले पंचों ने माधुरी के घरवालों को बात कहने का मौका दिया और हमें चुप-चाप शान्ति से बात सुनने को कहा| उनके घर से बात करने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, इसलिए माधुरी स्वयं कड़ी हो गई|

माधुरी: मैं इनसे (मेरी ओर ऊँगली करते हुए) बहुत प्यार करती हूँ ओर इनसे शादी करना चाहती हूँ| पर ये मुझसे शादी नहीं करना चाहते| मैं इनके बिना जिन्दा नहीं रह सकती ... मैं आत्महत्या कर लुंगी अगर इन्होने मुझसे शादी नहीं की तो!!!
(इतना कह के वो फुट-फुट के रोने लगी| ठाकुर साहब (माधुरी के पिता) ने उसे अपने पास बैठाया ओर उसके आंसूं पोछने लगे|)

ठाकुर साहब: पंचों आप बताएं की आखिर कमी क्या है हमारी लड़की में? सुन्दर है...सुशील है..पढ़ भी रही है... अच्छा खासा परिवार है मेरा, कोई गलत काम नहीं करते... सब से रसूख़ रखते है| सब हमारी इज्जत करते हैं.... ये जानते हुए भी की लड़का हमारी "ज़ात" का नहीं है हम शादी के लिए तैयार हैं| हम अच्छा खासा दहेज़ देने के लिए भी तैयार हैं, जो मांगें वो देंगे, तो आखिर इन्हें किस बात से ऐतराज है? क्यों मेरी बेटी की जिंदगी दांव पे लगा रहे हैं ये?

पंच: ठाकुर साहब आपने अपना पक्ष रख दिया है, अब हम लड़के वालों अ भी पक्ष सुनेंगे| ओर जब तक इनकी बात पूरी नहीं होती आप बीच में दखलंदाजी नहीं करेंगे|

अब बारी थी हमारे पक्ष से बात करने की ... पिताजी खड़े हुए पर मैंने उनसे विनती की कि मुझे बोलने दिया जाए| पिताजी मेरी बात मान गए ओर पुनः बैठ गए| मैं खड़ा हुआ ओर अपनी बात आगे रखी;

मैं: सादर प्रणाम पंचों! मुझे मेरे पिताजी ने सीख दी है कि "पंच परमेश्वर होते हैं" | हमें उनके आगे कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए इसलिए मैं आपसे सब सच-सच कहूँगा| पांच साल बाद मैं अपने गाँव अपने परिवार से मिलने आया हूँ ना कि शादी-व्याह के चक्करों में पड़ने| जिस दिन मैं आया था उस दिन सबसे पहले ठाकुर साहब ने अपनी बेटी का रिश्ता मुझसे करने कि बात मुझे से कि थी, और मैंने उस समय भी खुले शब्दों में कह दिया था कि मैं शादी नहीं कर सकता| मैं इस समय पढ़ रहा हूँ... आगे और पढ़ने का विचार है मेरा| मेरे परिवार वाले नहीं चाहते कि मैं अभी शादी करूँ| रही बात इस लड़की कि, तो मैं आपको बता दूँ कि मैं इससे प्यार नहीं करता| ना मैंने इसे कभी प्यार का वादा कभी किया... ये इसके दिमाग कि उपज है कि मैं इससे प्यार करता हूँ| इस जैसी जिद्दी लड़की से मैं कभी भी शादी नहीं करूँगा... जिस लड़की ने मेरे परिवार को पंचायत तक घनसीट दिया वो कल को मुझे अपने माता-पिता से भी अलग करने के लिए कोर्ट तक चली जाएगी| मैं इससे शादी किसी भी हालत में नहीं कर सकता|

पंच: शांत हो जाओ बेटा... और बैठ जाओ| माधुरी... बेटा तुम्हारा ये जिद्द पकड़ के बैठ जाना ठीक नहीं है|क्या मानु ने कभी तुम से कहा कि वो तुमसे प्यार करता है?

माधुरी: नहीं.... पर (मेरी और देखते हुए.. आँखों में आँसूं लिए) मुझे एक मौका तो दीजिये| मैं अपने आप को बदल दूंगी... सिर्फ आपके लिए! प्लीज मेरे साथ ऐसा मत कीजिये...

मैं: तुम्हें अपने आपको बदलने कि कोई जर्रूरत नहीं... तुम मुझे भूल जाओ और प्लीज मेरा पीछा छोड़ दो| तुम्हें मुझसे भी अच्छे लड़के मिलेंगे... मैं तुम से प्यार नहीं करता!!!

पंच: बस बच्चों शांत हो जाओ!!! हमें फैसला सुनाने दो|

पंचों कि बात सुन हम दोनों चुप-चाप बैठ गए... मन में उथल-पुथल मची हुई थी| अगर पंचों का फैसला मेरे हक़ में नहीं हुआ तो ? ये तो तय था कि मैं उससे शादी नहीं करूँगा!!!

पंच: दोनों कि पक्षों कि बात सुनके पंचों ने ये फैसला लिया है कि ये एक तरफ़ा प्यार का मामला है, हम इसका फैसला माधुरी के हक़ में नहीं दे सकते क्योंकि मानु इस शादी के लिए तैयार नहीं है| जबरदस्ती से कि हुई शादी कभी सफल नहीं होती... इसलिए ये पंचायत मानु के हक़ में फैसला देती है| ठाकुर साहब, ये पंचायत आपको हिदायत देती है कि आप अपनी बेटी को समझाएं और उसकी शादी जल्दी से जल्दी कोई सुशील लड़का देख के कर दें| आप या आपका परिवार का कोई भी सदस्य मानु या उसके परिवार के किसी भी परिवार वाले पर शादी कि बात का दबाव नहीं डालेगा| ये सभा यहीं स्थगित कि जाती है!!!

पंच अपना फैसला सुना चुके थे...मुझे रह-रहके माधुरी पे दया आ रही थी| ऐसा नहीं था कि मेरे मन में उसके लिए प्यार कि भावना थी परन्तु मुझे उस पे तरस आ रहा था| मेरे परिवार वाले सब खुश थे... और मुझे आशीर्वाद दे रहे थे ... जैसे आज मैंने जंग जीत ली थी| ऐसी जंग जिसकी कीमत बेचारी माधुरी को चुकानी पड़ी थी| पंचायत खत्म होते ही ठाकुर माधुरी का हाथ पकड़ के उसे खींचता हुआ ले जा रहा था| माधुरी कि आँखों में आँसूं थे और उसी नजर अब भी मुझ पे टिकी थी| उसका वो रोता हुआ चेहरा मेरे दिमाग में बस गया था... पर मैं कुछ नहीं कर सकता था| अगर मैं उसे भाग के चुप कराता तो इसका अर्थ कुछ और ही निकाला जाता और बात बिगड़ जाती|

मेरे घर में आज सब खुश थे... भोजन बना हुआ था केवल उसे गर्म करना था| जल्दी से भोजन परोसा गया ... मैंने जल्दी से भोजन किया और आँगन में टहलने लगा| नेहा मेरे पास भागती हुई आई और मैं उसे गोद में ले के कहानी सुनाने लगा| पर आज उसे सुलाने के लिए एक कहानी काफी नहीं थी... इसलिए मैं उसे भौजी के घर ले गया.. आँगन में एक चारपाई बिछाई और उसे लेटाया| पर उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और विवश हो के मैं भी उसके पास लेट गया और एक नई कहानी सुनाई| कहानी सुनाते-सुनाते ना जाने कब मेरी आँख लग गई और मैं वहीँ सो गया| जब मेरी आँख खुली तो देखा भौजी नेहा को अपनी गोद में उठा के दूसरी चारपाई जो अंदर कमरे में बिछी थी उसपे लिटाने लगी| मैं जल्दी से उठा... और बहार जाने लगा; तब भौजी ने मुझे रोका\

भौजी: कहाँ जा रहे हो आप?

मैं: बहार सोने

भौजी: बहार आपकी चारपाई नहीं बिछी.. दरअसल भोजन के पश्चात घर में सब आपको ढूंढ रहे थे| पर आप तो यहाँ अपनी लाड़ली के साथ सो रहे थे तो आपकी बड़की अम्मा ने कहा कि मानु को यहीं सोने दो| दिन भर वैसे ही बहुत परेशान थे आप!
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07-16-2017, 10:00 AM,
#34
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
30

अब आगे...

मैं और कुछ नहीं बोला और वापस लेट गया... पाँच मिनट बाद भौजी भी मेरे बगल में लेट गई| मैं अब भी कुछ नहीं बोला परन्तु मेरी पीठ भौजी कि ओर थी| भौजी ने मेरी पीठ पे हाथ रखा ओर मुझे अपनी ओर करवट लेने को कहा| एक तकिये पे मैं ओर भौजी दोनों ... एक दूसरे कि आँखों में देख रहे थे| मुझे रह-रह के माधुरी का रोता हुआ चेहरा दिख रहा था| मैंने अपनी आँखें बंद कि... फिर कब भौजी का बाएं हाथ मेरी गर्दन के नीचे आया मुझे नहीं पता| मैं उनके नजदीक आया और उनके स्तन के बीचों बीच दरार में अपना मुंह छुपा के चुप-चाप पड़ा रहा| मुझे कब नींद आई.. कुछ नहीं पर हाँ मुझे उनके हाथ बारी-बारी से अपने सर को सहलाते हुए महसूस हो रहे थे| उसके बाद मेरी आँख सीधा सुबह के तीन बजे खुली... भौजी अपना हाथ मेरी गर्दन के नीचे से निकाल रहीं थी| सुआबह होने को थी और भौजी के घर का मुख्य दरवाजा बंद था| ऐसे में घर के लोगों को शक हो सकता था| इसलिए वो दरवाजा खोलने के लिए उठीं थी| मुझे जगा देख उन्होंने सर पे हाथ फेरा और मेरे होठों को चूमा!!! अब सुबह कि इससे अच्छी शुरुआत क्या हो सकती थी? मैं उठ के बैठ गया...

भौजी: कहाँ जा रहे हो?

मैं: बाहर

भौजी: पर अभी तो सब उठे भी नहीं तो बाहर अकेले में क्या करोगे?

मैं: कुछ नहीं....

भौजी मेरे पास आइन और अपने घुटनों के बल बैठ मेरे दोनों हाथों को अपने हाथ में ले के पूछने लगी:

भौजी: तुम मुझे अपनी पत्नी मानते हो ना? तो बताओ की क्या बात है जो तुम्हें आदर ही अंदर खाए जा रही है?

मैं: आप प्लीज मुझे गलत मत समझना ... कल पंचायत के बाद जब ठाकुर साहब माधुरी को घर ले जा रहे थे, उसकी आँखें भीगी हुई थीं और वो मुझे टकटकी लगाए देख रही थी| जैसे कह रही हो "मेरी इच्छाएं..मेरी जिंदगी ख़त्म हो गई" मैं उससे प्यार नहीं करता.. पर मैं नहीं चाहता था की उसका दिल टूटे! उसने जो भी किया वो सब गलत था... मेरे प्रति उसके आकर्षण को वो प्यार समझ बैठी| पर...
(मैं आगे कुछ बोल पाटा इससे पहले भौजी ने मेरी बात काट दी|)

भौजी: पर इसमें आपकी कोई गलती नहीं.. आपने उसे नहीं कहा था की वो आपसे प्यार करे|

मैं: जब आपने मुझसे पहली बार अपने प्यार का इजहार किया था तब अगर मैंने इंकार कर दिया होता तो आप पे क्या बीतती?

भौजी: मैं उसी छत से छलांग लगा देती!!!

मैं: और उस सब का दोषी मैं होता|

भौजी: नहीं.... बिलकुल नहीं!!! अगर तुम मुझे ये एहसास दिलाते की तुम मुझसे प्यार करते हो.. मेरा जिस्मानी रूप से फायदा उठाते और जब मैं अपने प्यार का इजहार करती तब तुम मुकर जाते तब तुम दोषी होते| तुमने उसके साथ ऐसा कुछ भी नहीं किया... तुम्हें बुरा इसलिए लग रहा है क्योंकि तुमने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया| आज जब माधुरी का दिल टुटा तब तुम उसे अपना दोष मान रहे हो|

इसके आगे उन्होंने मुझे कुछ बोलने नहीं दिया और मुझे गले लगा लिया| मैं रूवांसा हो उठा...

"बस.. अब आप अपनी आँखें बंद करो?"

मैं: क्यों?

भौजी: मेरे पास एक ऐसा टोटका है जिससे आप सब भूल जाओगे|

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली| भौजी का चेहरा मेरे ठीक सामने था.. मुझे उनकी गर्म सांसें अपने चेहरे पे महसूस होने लगी थी| उन्होंने मेरे बाएं पे अपने होंठ रख दिए और अगले ही पल मेरे गाल पे अपने दांत गड़ा दिया| उन्होंने धीरे-धीरे मेरे गाल को चूसना शुरू कर दिया.. मेरे रोंगटे खड़े होने लगे| जब उनका बाएं गाल से अं भर गया तब उन्होंने मेरे दायें गाल को भी इसी तरह काटा और चूसा| शुक्र है की उनके दांत के निशाँ ज्यादा गाढ़े नहीं थे वरना सब को पता चल जाता!!!

भौजी: तो उस दिन आपने मुझसे अंग्रेजी में क्या पूछा था..अम्म्म्म .. हाँ याद आया; HAPPY ?

मैं: (मुस्कुराते हुए) YEAH !!! VERY HAPPY !!!

सच में ये टोटका काम कर गया था! और उनके मुँह से HAPPY सुन के दिल खुश हो गया| भौजी तो उठ के बाहर चलीं गई... मैं कुछ देर और लेटा रहा| करीब साढ़े पाँच उठा| बाहर सब मेरा हाल-चाल पूछने लगे... जैसे मैं बहुत दोनों से बीमार हूँ| नहा-धो के चाय पि.. और फिर नेहा मेरे पास कूदते हुए आ गई और खेलने की जिद्द करने लगी| कभी पकड़ा-पकड़ी, कभी आँख में चोली .. ऐसा लग रहा था जैसे भौजी ने उसे मुझे बिजी रखने के लिए मेरे पीछे लगा दिया हो| आखिर में नेहा बैट और बॉल ले आई| उसने मुझे बैट दिया और खुद बॉल फेकने लगी| मैं देख रहा था की भौजी मुझे सब्जी काटते हुए, बॉल उड़ाते हुए देख रही है| पाँच मिनट बाद वो भी आ गईं और नेहा से बॉल ले के फेंकने लगी| उनकी पहली ही बॉल पे मैंने इतना लम्बा शोट मार की बॉल खेतों के अंदर जा गिरी| नेहा उसे लेने के लिए भागी... और इधर भौजी मेरे पास आइन और खाने लगी; "आज रात तैयार रहना... आपके लिए बहुत बड़ा सरप्राइज है!!!" मैंने आँखें मटकते हुए उन्हें देखा और कहा; "अच्छा जी... देखते हैं क्या सरप्राइज है?" और हम क दूसरे को प्यासी नजरों से देखते रहे| मैं ये तो समझ ही चूका था की सरप्राइज क्या है पर फिर भी अनजान बनने में बड़ा मजा आरहा था| इधर नेहा को बॉल ढूंढने गए हुए पाँच मिनट होने आये थे| खेत बिलकुल खाली था.. अब तक बॉल तो मिल जानी चाहिए थी| मैं उत्सुकता वास नेहा के पीछे खेत में पहुँच गया.. वहां जाके देखा तो वो बॉल लिए दूसरी दिशा से आ रही है| भौजी और मेरे बीच में कुछ दूरी थी.. जिससे वो दख सकती थीं की मैं वहां खड़ा क्या कर रहा हूँ| तभी नेहा मेरे पास आई और बोली; "चाचू.. ये कागज़ उसने दिया है|" नेहा की ऊँगली दूर बानी एक ईमारत के पास कड़ी लड़की की ओर थी और मुझे ये समझते देर ना लगी की वो लड़की कोई और नहीं माधुरी ही है| सारा मूड फीका हो गया...

मैंने पर्ची खोल के पढ़ी तो उसमें ये लिखा था: "प्लीज मुझे एक आखरी बार मिल लो!!" मैंने पर्ची जेब में डाली, नेहा को बैट थमाया और कहा; "बेटा आप घर चलो, मैं अभी आया|" मैंने पलट के देखा तो भौजी की नजर मुझ पे टिकी थी... जिस ईमारत के पास वो कड़ी थी वो गाँव का स्कूल था| अंदर पाठशाला अभी भी लगी हुई थी क्योंकि मुझे अंदर से अध्यापक द्वारा पाठ पढ़ाये जाने की आवाजें आ रहीं थी| मैं उससे करीब छः फुट दूरी पर खड़ा हो गया और सरल शब्दों में उससे पूछा;

"बोलो क्यों बुलाया मुझे यहाँ?"

माधुरी: आपको जानके ख़ुशी होगी की मेरे पिताजी ने आननफानन में मेरी शादी तय कर दी है| लड़का कौन है ? कैसा दीखता है? क्या करता है? मुझे कुछ नही पता|

मैं: तो तुम इसका जिम्मेदार मुझे मानती हो?

माधुरी: नहीं... गलती मेरी थी! मैं आपकी ओर आकर्षित थी| जाने कब ये आकर्षण प्यार में बदल गया, मुझे पता ही नहीं चला| खेर मैं आपसे प्यार करती हूँ और हमेशा करती रहूँगी... दरअसल मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ|

मैं: पूछो

माधुरी: आप प्लीज मुझसे झूठ मत बोलना... मैं जानती हूँ की आपने शादी से इंकार क्यों किया? आप किसी और से प्यार करते होना?

मैं: क्या इस बात से अब कोई फर्क पड़ता है?

माधुरी: नहीं पर... मैं एक बार उसका नाम जानना चाहती हूँ?

मैं: नाम जानके क्या होगा?

माधुरी: कम से कम उस खुशनसीब को दुआ तो दे सकुंगी ... ख़ुदा से प्रार्थना करुँगी की वो आप दोनों को हमेशा खुश रखे|

ना जाने क्यों पर मुझे उसकी बात में सच्छाई राखी पर मैं भावुक होके उसे सब सच नहीं बताना चाहता था|
इसलिए मैं नाम की कल्पना करने लगा;

मैं: रीतिका

माधुरी: नाम बताने के लिए शुक्रिया!!! अगर मैं आपसे कुछ मांगू तो आप मुझे मना तो नहीं करेंगे?

मैं: मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं| पर फिर भी मांगो अगर बस में होगा तो मना नहीं करूँगा|

माधुरी: जब मैंने किशोरावस्था में पैर रखा तो स्कूल में मेरी कुछ लड़कियाँ दोस्त बनी| उसे आप अच्छी संगत कहो या बुरी.. मुझे उनसे "सेक्स" के बारे में पता चला| वो आये दिन खतों में इधर-उधर सेक्स करती थी, पर मैंने ये कभी नहीं किया| मेरी सहेलियां मुझपे हंसती थी की तू ये दौलत बचा के क्या करेगी?... पर मैं सोचा था की जब मुझे किसी से प्यार होगा तो उसी को मैं ये दौलत सौंपूंगी| सीधे शब्दों में कहूँ तो; मैं अभी तक कुँवारी हूँ और मैं ये चाहती हूँ की आप मेरे इस कुंवारेपन को तोड़ें|

मैं: क्या??? तुम पागल तो नहीं हो गई? तुमने मुझे समझ क्या रखा है? तुम जानती हो ना मैं किसी और से प्यार करता हूँ और फिर भी मैं तुम्हारे साथ... छी-छी तुम्हें जरा भी लाज़ नहीं आती ये सब कहते हुए? ओह!!! अब मुझे समझ आया...तुम चाहती हो की हम "सेक्स" करें और फिर तुम इस बात का ढिंढोरा पूरे गाँव में पीटो ताकि मुझे मजबूरन तुमसे शादी करनी पड़े? सॉरी मैडम!!! मैं वैसा लड़का बिलकुल भी नहीं हूँ!!!
(मैं घर की ओर मुड़ा ओर चल दिया| वो मेरे पीछे-पीछे चलती रही|)

माधुरी: मैं जानती हूँ आप ऐसे नहीं हो वरना कबका मेरा फायदा उठा लेते| और मेरा इरादा वो बिलकुल नहीं है जो आप सोच रहे हो| प्लीज ... मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ| कम से कम मेरी ये ख्वाइश तो पूरी कर दीजिये!!!
(इतना कह के वो सुबकने लगी और फुट-फुट के रोने लगी|)
(मैंने चलते हुए ही जवाब दिया|)

मैं: मेरा जवाब अब भी ना है|

माधुरी: अगर आपके दिल में मेरे लिए जरा सी भी दया है तो प्लीज !!!
(मैं नहीं रुका|)

"ठीक है...मैं तब भी आपका इसी स्कूल के पास इन्तेजार करुँगी... !!! रोज शाम छः बजे!!!!!! इसी जगह!!!"

मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और वापस घर की ओर चलता रहा| जब मैं घर के नजदीक पहुंचा तो भौजी अब भी उसी जगह कड़ी मेरी ओर देख रही थी| जब मैं उनके पास पहुँच तो उन्होंने पूछा;

"अब क्या लेने आई थी यहाँ? और आप उससे मिलने क्यों गए थे?"

मैं: अभी नहीं... दोपहर के भोजन के बाद बात करता हूँ|

भौजी: नहीं.. मुझे अभी जवाब चाहिए?

मैं: (गहरी सांस लेते हुए) उसने नेहा के हाथ पर्ची भेजी थी, उसमें लिखा था की वो मुझसे एक आखरी अबार मिलना चाहती है| बस इसलिए गया था ...

भौजी: अब क्या चाहिए उसे?

मैं: ये मैं आपको दोपहर भोजन के बाद बताऊँगा|

भौजी: ऐसा क्या कह दिया उसने?

मैं: प्लीज!!
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07-16-2017, 10:00 AM,
#35
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
30

अब आगे...

मैं और कुछ नहीं बोला और वापस लेट गया... पाँच मिनट बाद भौजी भी मेरे बगल में लेट गई| मैं अब भी कुछ नहीं बोला परन्तु मेरी पीठ भौजी कि ओर थी| भौजी ने मेरी पीठ पे हाथ रखा ओर मुझे अपनी ओर करवट लेने को कहा| एक तकिये पे मैं ओर भौजी दोनों ... एक दूसरे कि आँखों में देख रहे थे| मुझे रह-रह के माधुरी का रोता हुआ चेहरा दिख रहा था| मैंने अपनी आँखें बंद कि... फिर कब भौजी का बाएं हाथ मेरी गर्दन के नीचे आया मुझे नहीं पता| मैं उनके नजदीक आया और उनके स्तन के बीचों बीच दरार में अपना मुंह छुपा के चुप-चाप पड़ा रहा| मुझे कब नींद आई.. कुछ नहीं पर हाँ मुझे उनके हाथ बारी-बारी से अपने सर को सहलाते हुए महसूस हो रहे थे| उसके बाद मेरी आँख सीधा सुबह के तीन बजे खुली... भौजी अपना हाथ मेरी गर्दन के नीचे से निकाल रहीं थी| सुआबह होने को थी और भौजी के घर का मुख्य दरवाजा बंद था| ऐसे में घर के लोगों को शक हो सकता था| इसलिए वो दरवाजा खोलने के लिए उठीं थी| मुझे जगा देख उन्होंने सर पे हाथ फेरा और मेरे होठों को चूमा!!! अब सुबह कि इससे अच्छी शुरुआत क्या हो सकती थी? मैं उठ के बैठ गया...

भौजी: कहाँ जा रहे हो?

मैं: बाहर

भौजी: पर अभी तो सब उठे भी नहीं तो बाहर अकेले में क्या करोगे?

मैं: कुछ नहीं....

भौजी मेरे पास आइन और अपने घुटनों के बल बैठ मेरे दोनों हाथों को अपने हाथ में ले के पूछने लगी:

भौजी: तुम मुझे अपनी पत्नी मानते हो ना? तो बताओ की क्या बात है जो तुम्हें आदर ही अंदर खाए जा रही है?

मैं: आप प्लीज मुझे गलत मत समझना ... कल पंचायत के बाद जब ठाकुर साहब माधुरी को घर ले जा रहे थे, उसकी आँखें भीगी हुई थीं और वो मुझे टकटकी लगाए देख रही थी| जैसे कह रही हो "मेरी इच्छाएं..मेरी जिंदगी ख़त्म हो गई" मैं उससे प्यार नहीं करता.. पर मैं नहीं चाहता था की उसका दिल टूटे! उसने जो भी किया वो सब गलत था... मेरे प्रति उसके आकर्षण को वो प्यार समझ बैठी| पर...
(मैं आगे कुछ बोल पाटा इससे पहले भौजी ने मेरी बात काट दी|)

भौजी: पर इसमें आपकी कोई गलती नहीं.. आपने उसे नहीं कहा था की वो आपसे प्यार करे|

मैं: जब आपने मुझसे पहली बार अपने प्यार का इजहार किया था तब अगर मैंने इंकार कर दिया होता तो आप पे क्या बीतती?

भौजी: मैं उसी छत से छलांग लगा देती!!!

मैं: और उस सब का दोषी मैं होता|

भौजी: नहीं.... बिलकुल नहीं!!! अगर तुम मुझे ये एहसास दिलाते की तुम मुझसे प्यार करते हो.. मेरा जिस्मानी रूप से फायदा उठाते और जब मैं अपने प्यार का इजहार करती तब तुम मुकर जाते तब तुम दोषी होते| तुमने उसके साथ ऐसा कुछ भी नहीं किया... तुम्हें बुरा इसलिए लग रहा है क्योंकि तुमने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया| आज जब माधुरी का दिल टुटा तब तुम उसे अपना दोष मान रहे हो|

इसके आगे उन्होंने मुझे कुछ बोलने नहीं दिया और मुझे गले लगा लिया| मैं रूवांसा हो उठा...

"बस.. अब आप अपनी आँखें बंद करो?"

मैं: क्यों?

भौजी: मेरे पास एक ऐसा टोटका है जिससे आप सब भूल जाओगे|

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली| भौजी का चेहरा मेरे ठीक सामने था.. मुझे उनकी गर्म सांसें अपने चेहरे पे महसूस होने लगी थी| उन्होंने मेरे बाएं पे अपने होंठ रख दिए और अगले ही पल मेरे गाल पे अपने दांत गड़ा दिया| उन्होंने धीरे-धीरे मेरे गाल को चूसना शुरू कर दिया.. मेरे रोंगटे खड़े होने लगे| जब उनका बाएं गाल से अं भर गया तब उन्होंने मेरे दायें गाल को भी इसी तरह काटा और चूसा| शुक्र है की उनके दांत के निशाँ ज्यादा गाढ़े नहीं थे वरना सब को पता चल जाता!!!

भौजी: तो उस दिन आपने मुझसे अंग्रेजी में क्या पूछा था..अम्म्म्म .. हाँ याद आया; HAPPY ?

मैं: (मुस्कुराते हुए) YEAH !!! VERY HAPPY !!!

सच में ये टोटका काम कर गया था! और उनके मुँह से HAPPY सुन के दिल खुश हो गया| भौजी तो उठ के बाहर चलीं गई... मैं कुछ देर और लेटा रहा| करीब साढ़े पाँच उठा| बाहर सब मेरा हाल-चाल पूछने लगे... जैसे मैं बहुत दोनों से बीमार हूँ| नहा-धो के चाय पि.. और फिर नेहा मेरे पास कूदते हुए आ गई और खेलने की जिद्द करने लगी| कभी पकड़ा-पकड़ी, कभी आँख में चोली .. ऐसा लग रहा था जैसे भौजी ने उसे मुझे बिजी रखने के लिए मेरे पीछे लगा दिया हो| आखिर में नेहा बैट और बॉल ले आई| उसने मुझे बैट दिया और खुद बॉल फेकने लगी| मैं देख रहा था की भौजी मुझे सब्जी काटते हुए, बॉल उड़ाते हुए देख रही है| पाँच मिनट बाद वो भी आ गईं और नेहा से बॉल ले के फेंकने लगी| उनकी पहली ही बॉल पे मैंने इतना लम्बा शोट मार की बॉल खेतों के अंदर जा गिरी| नेहा उसे लेने के लिए भागी... और इधर भौजी मेरे पास आइन और खाने लगी; "आज रात तैयार रहना... आपके लिए बहुत बड़ा सरप्राइज है!!!" मैंने आँखें मटकते हुए उन्हें देखा और कहा; "अच्छा जी... देखते हैं क्या सरप्राइज है?" और हम क दूसरे को प्यासी नजरों से देखते रहे| मैं ये तो समझ ही चूका था की सरप्राइज क्या है पर फिर भी अनजान बनने में बड़ा मजा आरहा था| इधर नेहा को बॉल ढूंढने गए हुए पाँच मिनट होने आये थे| खेत बिलकुल खाली था.. अब तक बॉल तो मिल जानी चाहिए थी| मैं उत्सुकता वास नेहा के पीछे खेत में पहुँच गया.. वहां जाके देखा तो वो बॉल लिए दूसरी दिशा से आ रही है| भौजी और मेरे बीच में कुछ दूरी थी.. जिससे वो दख सकती थीं की मैं वहां खड़ा क्या कर रहा हूँ| तभी नेहा मेरे पास आई और बोली; "चाचू.. ये कागज़ उसने दिया है|" नेहा की ऊँगली दूर बानी एक ईमारत के पास कड़ी लड़की की ओर थी और मुझे ये समझते देर ना लगी की वो लड़की कोई और नहीं माधुरी ही है| सारा मूड फीका हो गया...

मैंने पर्ची खोल के पढ़ी तो उसमें ये लिखा था: "प्लीज मुझे एक आखरी बार मिल लो!!" मैंने पर्ची जेब में डाली, नेहा को बैट थमाया और कहा; "बेटा आप घर चलो, मैं अभी आया|" मैंने पलट के देखा तो भौजी की नजर मुझ पे टिकी थी... जिस ईमारत के पास वो कड़ी थी वो गाँव का स्कूल था| अंदर पाठशाला अभी भी लगी हुई थी क्योंकि मुझे अंदर से अध्यापक द्वारा पाठ पढ़ाये जाने की आवाजें आ रहीं थी| मैं उससे करीब छः फुट दूरी पर खड़ा हो गया और सरल शब्दों में उससे पूछा;

"बोलो क्यों बुलाया मुझे यहाँ?"

माधुरी: आपको जानके ख़ुशी होगी की मेरे पिताजी ने आननफानन में मेरी शादी तय कर दी है| लड़का कौन है ? कैसा दीखता है? क्या करता है? मुझे कुछ नही पता|

मैं: तो तुम इसका जिम्मेदार मुझे मानती हो?

माधुरी: नहीं... गलती मेरी थी! मैं आपकी ओर आकर्षित थी| जाने कब ये आकर्षण प्यार में बदल गया, मुझे पता ही नहीं चला| खेर मैं आपसे प्यार करती हूँ और हमेशा करती रहूँगी... दरअसल मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ|

मैं: पूछो

माधुरी: आप प्लीज मुझसे झूठ मत बोलना... मैं जानती हूँ की आपने शादी से इंकार क्यों किया? आप किसी और से प्यार करते होना?

मैं: क्या इस बात से अब कोई फर्क पड़ता है?

माधुरी: नहीं पर... मैं एक बार उसका नाम जानना चाहती हूँ?

मैं: नाम जानके क्या होगा?

माधुरी: कम से कम उस खुशनसीब को दुआ तो दे सकुंगी ... ख़ुदा से प्रार्थना करुँगी की वो आप दोनों को हमेशा खुश रखे|

ना जाने क्यों पर मुझे उसकी बात में सच्छाई राखी पर मैं भावुक होके उसे सब सच नहीं बताना चाहता था|
इसलिए मैं नाम की कल्पना करने लगा;

मैं: रीतिका

माधुरी: नाम बताने के लिए शुक्रिया!!! अगर मैं आपसे कुछ मांगू तो आप मुझे मना तो नहीं करेंगे?

मैं: मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं| पर फिर भी मांगो अगर बस में होगा तो मना नहीं करूँगा|

माधुरी: जब मैंने किशोरावस्था में पैर रखा तो स्कूल में मेरी कुछ लड़कियाँ दोस्त बनी| उसे आप अच्छी संगत कहो या बुरी.. मुझे उनसे "सेक्स" के बारे में पता चला| वो आये दिन खतों में इधर-उधर सेक्स करती थी, पर मैंने ये कभी नहीं किया| मेरी सहेलियां मुझपे हंसती थी की तू ये दौलत बचा के क्या करेगी?... पर मैं सोचा था की जब मुझे किसी से प्यार होगा तो उसी को मैं ये दौलत सौंपूंगी| सीधे शब्दों में कहूँ तो; मैं अभी तक कुँवारी हूँ और मैं ये चाहती हूँ की आप मेरे इस कुंवारेपन को तोड़ें|

मैं: क्या??? तुम पागल तो नहीं हो गई? तुमने मुझे समझ क्या रखा है? तुम जानती हो ना मैं किसी और से प्यार करता हूँ और फिर भी मैं तुम्हारे साथ... छी-छी तुम्हें जरा भी लाज़ नहीं आती ये सब कहते हुए? ओह!!! अब मुझे समझ आया...तुम चाहती हो की हम "सेक्स" करें और फिर तुम इस बात का ढिंढोरा पूरे गाँव में पीटो ताकि मुझे मजबूरन तुमसे शादी करनी पड़े? सॉरी मैडम!!! मैं वैसा लड़का बिलकुल भी नहीं हूँ!!!
(मैं घर की ओर मुड़ा ओर चल दिया| वो मेरे पीछे-पीछे चलती रही|)

माधुरी: मैं जानती हूँ आप ऐसे नहीं हो वरना कबका मेरा फायदा उठा लेते| और मेरा इरादा वो बिलकुल नहीं है जो आप सोच रहे हो| प्लीज ... मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ| कम से कम मेरी ये ख्वाइश तो पूरी कर दीजिये!!!
(इतना कह के वो सुबकने लगी और फुट-फुट के रोने लगी|)
(मैंने चलते हुए ही जवाब दिया|)

मैं: मेरा जवाब अब भी ना है|

माधुरी: अगर आपके दिल में मेरे लिए जरा सी भी दया है तो प्लीज !!!
(मैं नहीं रुका|)

"ठीक है...मैं तब भी आपका इसी स्कूल के पास इन्तेजार करुँगी... !!! रोज शाम छः बजे!!!!!! इसी जगह!!!"

मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और वापस घर की ओर चलता रहा| जब मैं घर के नजदीक पहुंचा तो भौजी अब भी उसी जगह कड़ी मेरी ओर देख रही थी| जब मैं उनके पास पहुँच तो उन्होंने पूछा;

"अब क्या लेने आई थी यहाँ? और आप उससे मिलने क्यों गए थे?"

मैं: अभी नहीं... दोपहर के भोजन के बाद बात करता हूँ|

भौजी: नहीं.. मुझे अभी जवाब चाहिए?

मैं: (गहरी सांस लेते हुए) उसने नेहा के हाथ पर्ची भेजी थी, उसमें लिखा था की वो मुझसे एक आखरी अबार मिलना चाहती है| बस इसलिए गया था ...

भौजी: अब क्या चाहिए उसे?

मैं: ये मैं आपको दोपहर भोजन के बाद बताऊँगा|

भौजी: ऐसा क्या कह दिया उसने?

मैं: प्लीज!!
-  - 
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07-16-2017, 10:00 AM,
#36
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
32

अब आगे ...

चन्दर भैया को आज जो भी हुआ वो सब पता चला... वो मेरे पास आके बैठे और कोशिश करने लगे की मेरा ध्यान इधर उधर भटका सकें| उनके अनुसार मैंने जो भी किया वो सबसे सही था! कुछ समय में भोजन तैयार था .. सब ने भोजन किया और अपने-अपने बिस्तरे में घुस गए| मैं भी अपने बिस्तर में घुस गया; सोचने लगा की क्या भौजी ने कोई रास्ता निकाला होगा? मैं उठा और टहलने के बहाने संतुष्टि करना चाहता था की सब कहाँ-कहाँ सोये हैं| सबसे पहले मैं अजय भैया को ढूंढने लगा, पर वे मुझे कहीं नहीं नजर आये|मैंने सोचा की ज्यादा ताँका-झांकी करने सो कोई फायदा नहीं, और मैं अपने बिस्तर पे आके लेट गया| कुछ ही समय में मुझे नींद आने लगी और मैं सो गया| उसके बाद मुझे अचानक ऐसा लगा जैसे कोई मेरे होंठों को चूम रहा हो| वो शख्स मेरे लबों को चूसने लगा| मुझे लगा ये कोई सुखद सपना है और मैं भी लेटे-लेटे उसके होठों को चूमता रहा| जब उस शख्स की जीभ मेरी जीभ से स्पर्श हुई तो अजीब सी मिठास का अनुभव हुआ! मैंने तुरंत अपनी आँखें खोलीं... देखा तो वो कोई और नहीं भौजी ही थीं| वो मेरे सिराहने झुक के अपने होंठ मेरे होंठों पे रखे खड़ी थीं| भौजी ने मुझे इशारे से अंदर आने को कहा, मैं उठा और एक नजर घर में सोये बाकी लोगों की चारपाई पर डाली| सब के सब गहरी नींद में सोये थे...समय देखा तो साढ़े बारह बजे थे! मैदान साफ़ था! मैं भौजी के घर में घुसा.. वो अंदर खड़ी मुस्कुरा रही थी| मैं दरवाजा बंद करना भूल गया और उनके सामने खड़ा हो गया| वो मेरी और चल के आइन और बगल से होती हुई दरवाजे की ओर चल दिन| वहां पहुँच उन्होंने दरवाजा बड़े आराम से बंद किया की कोई आवाज ना हो!

फिर वो पलटीं और मेरी ओर बढ़ने लगी, दस सेकंड के लिए रुकीं और......

फिर बड़ी तेजी के साथ उन्होंने मेरे होठों को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिए| दोनों बेसब्री से एक दूसरे को होठों का रसपान कर रहे थे... करीब पांच मिनट तक कभी वो तो कभी मैं उनके होठों को चूसता... उनके मुख से मुझे पेपरमिंट की खुशबु आ रही थी| मेरी जीभ उनके मुख में विचरण कर रही थी.. और कभी कभी तो भौजी मेरी जीभ को अपने दांतों से काट लेती! धीरे-धीरे उनके हाथ मेरे कन्धों तक आ पहुंचे और उन्होंने एक झटके में मुझे अपने से दूर किया| मैं हैरान था की भला वो मुझे इस तरह अपने से दूर क्यों कर रहीं है? उन्होंने आज तक ऐसा नहीं किया था.... कहीं उन्हें ये सब बुरा तो नहीं लग रहा? अभी मैं अपने इन सवालों के जवाब धुंध ही रहा था की उन्होंने मुझे बड़ी जोर से धक्का दिया! मैं पीठ के बल चारपाई पे गिरा... वो तो शुक्र था की तकिया था वरना मेरा सर सीधा लकड़ी से जा लगता! अब मुझे कुछ शक सा होने लगा था.. भौजी के बर्ताव में कुछ तो अजीब था| मैं अब भी असमंजस की स्थिति में था.. तभी भौजी ने अपनी साडी उतारना चालु कर दी... साड़ी उतारके उन्होंने मेरे ऊपर फेंकी, और पेटीकोट और ब्लाउज पहने मेरी छाती पे आके बैठ गईं| अब तो मेरी धड़कनें तेज होने लगीं... उन्होंने अपनी उतारी साडी के एक सिरे से मेरा दाहिना हाथ चारपाई के एक पाये से बाँध दिया... मैं उनसे लगातार पूछ रहा था की आपको हो क्या गया है और ये आप क्या कर रहे हो? पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्कुराये जा रहीं थी| अब उनकी मुस्कराहट देख के मुझे भी संतोष होने लगा की कुछ गलत नहीं हो रहा बस उनकर व्यवहार थोड़ा अटपटा सा लगा|

देखते ही देखते उन्होंने मेरा बाएं हाथ भी अपनी साडी के दूसरे छोर के साथ चारपाई के दूसरे पाय से बांद दिया| वो अब भी मुस्कुरा रहीं थी.... फिर उन्होंने अपना ब्लाउज उतार के फेंक दिया अब मुझे उनके गोर-गोर स्तन दिख रहे थे; मैं उन्हें छूना चाहता था परन्तु हाथ बंधे होने के कारन छू नही सकता था|भौजी अपने सर पे हाथ रखके अपनी कमर मटका रही थी.. उनकी कमर के मटकने के साथ ही उनके स्तन भी हिल रहे थे और ये देख के मुझे बड़ा मजा आ रहा था| फिर अचानक भौजी को क्या सूझी उन्होंने मेरी टी-शर्ट के बटन खोले अब टी-शर्ट उतरने से तो रही क्योंकि मेरे दोनों हाथ बंधे थे... इसलिए भौजी ने तेश में आके मेरी टी-शर्ट फाड़ डाली!!! अब इसकी उम्मीद तो मुझे कतई नहीं थी और भौजी का ये रूप देख के ना जाने मुझे पे एक सा सुरुर्र छाने लगा था|उन्होंने मेरी फटी हुई टी-शर्ट भी उठा के घर के एक कोने में फेंक दी... अब वो मेरी छाती पे बैठे-बैठे ही झुक के मुझे बेतहाशा चूमने लगी| मेरी आँखें, माथा, भौएं, नाक, गाल और होठों पे तो उन्होंने चुम्मियों की झड़ी लगा दी| वो तो ऐसा बर्ताव कर रहीं थीं मानो रेगिस्तान के प्यास के सामने किसी ने बाल्टी भर पानी रख के छोड़ दिया हो और वो प्यासा उस बाल्टी में ही डुबकी लगाना चाहता हो! भौजी नीचे की और बढ़ीं और अब उन्होंने मेरी गर्दन पे बड़ी जोर से काटा.... इतनी जोर से की मेरी गर्दन पे उनके दांतों के निशान भी छप गए थे| मेरे मुंह से बस सिस्कारियां निकल रहीं थी..."स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स्स्स्सह्ह्ह " ऐसा लगा मानो आज वो मेरे गले से गोश्त का एक टुकड़ा फाड़ ही लेंगी|

धीरे-धीरे वो और नीचे आइन और अब वो ठीक मेरे लंड पे बैठी थीं| उनकी योनि से निकल रही आँच मुझे अपने पजामे पे महसूस हो रही थी... साथ ही साथ उनकी योनि का रस अब मेरे पजामे पे अपनी छाप छोड़ रहा था| उन्होंने धीरे से मेरे बाएं निप्पल को प्यार से चूमा.. और अगले ही पल उन्होंने उस पे अपने दांत गड़ा दिए!!! मैं दर्द से छटपटाने लगा पर अगर चिल्लाता तो घर के सब लोग इकठ्ठा हो जाते और मुझे इस हालत में देख सबके सब सदमें में चले जाते!!! मैं बस छटपटा के रह गया और मुंह से बस एक दबी सी आवाज ही निकाल पाया; "अह्ह्ह्ह उम्म्म्म"!!! आज तो जैसे भौजी के ऊपर सच में कोई भूत सवार हो!!! उन्होंने फिर मेरे बाएं निप्पल का हाल भी यही किया! पहले चूमा और फिर बड़ी जोर से काट लिया.... मैं बस तड़प के रह गया| लेकिन उनका मन अब भी नहीं भरा था उन्होंने मेरी पूरी छाती पे यहाँ-वहां काटना शुरू कर दिया| जैसे की वो मेरे शरीर से गोश्त का हर टुकड़ा नोच लेना चाहती हो| माथे से लेके मेरे "बेल्ली बटन" तक अपने "लव बाइट्स" छोड़े थे!!! पूरा हिस्सा लाल था और हर जगह दांतों के निशान बने हुए थे|

मैं तो ये सोच के हैरान था की आखिर भौजी को हो क्या गया है और वो मुझे इतनी यातनाएं क्यों दे रही हैं?
अब भौजी और नीचे बढ़ीं और उन्होंने चारपाई से नीचे उतर मेरे पाँव के पास खड़ी हो के मेरे पजामे को नीचे से पकड़ा और उसे एक झटके में खीच के निकला और दूसरी तरफ फेंक दिया| वो वापस चारपाई पे आइन और झुक के मेरे तने हुए लंड को गप्प से मुंह में भर लिया और अंदर-बहार करने लगीं| जब वो अपना मुंह नीचे लाती तो लंड सुपाड़े से बहार आके उनके गालों और दांतों से टकराता और जब वो ऊपर उठतीं तो सुपाड़ा वापस चमड़ी के अंदर चला जाता| इस प्रकार की चुसाई से अब मैं बेचैन होने लगा था.. दिमाग ने काम आना बंद कर दिया था और मैं बस तकिये पे अपना मुंह इधर-उधर पटकने लगा था| मैंने पहली बार कोशिश की, कि कैसे भी मैं अपने हाथों को छुड़ा सकूँ पर नाकामयाब रहा| इधर भौजी का मन जैसे चूसने से भर गया था अब वो मेरी और किसी शेरनी कि अरह बढ़ने लगीं ... अपने हाथों और घुटनों के बल मचलती हुई| अब तो मेरा शिकार पक्का था! वो मेरे मुख के सामने आके रुकीं; उनकी योनि ठीक मेरे लंड के ऊपर थी| उन्हेोन अपना दायें हाथ नीचे ले जाके मेरे लंड को पकड़ा और अपनी योनि के द्वार पे रखा| फिर वो सीढ़ी मेरे लंड पे सवार हो गईं.... पूरा का पूरा लंड उनकी योनि में घुस गया था|
उनकी योनि अंदर से गर्म और गीली थी.. "स्स्स्स्स्स आआह्हह्हह्ह हुम्म्म्म" कि आवाज आँगन में गूंजने लगी! अब भौजी ने धीरे-धीरे लंड पे उछलना शुरू किया... हर झटके के साथ मेरा लंड उनकी बच्चेदानी से टकरा रहा था जिससे वो चिहुक जाती पर फिर भी वो बाज़ नहीं आइन और कूदती रहीं| उनकी योनि ने मेरे लंड को जैसे कास के जकड रखा हो, जैसे ही वो ऊपर उठती तो सुपाड़ा चमड़ी में कैद हो जाता और जब वो नीचे आतीं तो सुपाड़ा सीधा उनकी बच्चे दाने से टकराता| एक पल के लिए तो मुझे लगा कि कहीं मेरा लंड उनकी बच्चेदानी के आर-पार ना हो जाये!!! उनकी ये घुड़ सवारी वो ज्यादा देर न बर्दाश्त कर पाईं और पंद्रह मिनट में ही स्खलित हो गईं| अंदर कि गर्मी और गीलेपन के कारन मेरे लंड ने भी जवाब दे दिया और अंदर एक जबरदस्त फव्वारा छोड़ा!!! हम दोनों ही हांफने लगे थे... और फिर भौजी पास्ट होके मेरे ऊपर हो गिर गईं | मैंने आज तक ऐसे सम्भोग कि कभी कल्पना नहीं कि थी... आज सच में मुझे बहुत मजा आया| सारा बदन वैसे ही भौजी के काटे जाने से दुक रहा था ऊपर से जो रही-सही कसार थी वो भौजी के साथ सम्भोग ने पूरी कर दी थी|

जब सांसें थोड़ा नार्मल हुईं तो मैंने भौजी को हिलाया ताकि वो जागें और मेरे हाथ खोलें वरना सुबह तक मैं इसी हालत में रहता और फिर बवाल होना तय था!

मैं: उम्म्म... उठो? उठो ना?

भौजी: उम्म्म्म ... रहने दोना ऐसे ही|

मैं: अगर मैं बाहर नहीं गया तो सुबह बवाल हो जायेगा|

भौजी: कुछ नहीं होगा... कह देना कि रात को मेरी तबियत खराब थी इसलिए सारी रात जाग के आप पहरेदारी कर रहे थे|

मैं: ठीक है बाबा !!! कहीं नहीं जा रहा पर कम से कम मेरे हाथ तो खोल दो!

भौजी मेरे सीने पे सर रख के मेरे ऊपर ही लेटी हुई थीं... उन्होंने हाथ बढ़ा के एक गाँठ खोल दी और मेरा दायां हाथ फ्री हो गया| फिर मैंने अपने दायें हाथ से किसी तरह अपना बायें हाथ कि गाँठ को खोला| फिर भौजी के सर पे हाथ फेरता रहा और वो मुझसे लिपटी पड़ी रहीं| समय देखा तो पौने दो हो रहे थे... अब मुझे कसी भी बाहर जाना था पर जाऊं कैसे? भौजी मेरे ऊपर पड़ी थीं.. बिलकुल नंगी! सारे कपडे इधर-उधर फेंके हुए थे! और मेरी हालत ऐसी थी जैसे किसी ने नोच-नोच के मेरी छाती लाल कर दी हो| और नीचे कि हालत तो और भी ख़राब थी! मेरा लंड अब भी भौजी कि योनि में सिकुड़ा पड़ा था! जैसे उनकी योनि ने उसे अपने अंदर समां लिया हो... मैं पन्द्रह्मिनुते तक ऐसे ही पड़ा रहा... फिर जब मुझे संतोष हुआ कि भौजी सो गई हैं तो मैंने उन्हें धीरे से अपने ऊपर से हटाया और सीधा लेटा दिया| फिर उठा और स्नानघर से पानी लेके अपने लंड को साफ़ किया .. अपना पजामा और कच्छा उठाया और पहना... अब ऊपर क्या पहनू? टी-शर्ट तो फाड़ दी भौजी ने? मैंने उनके कमरे से एक चादर निकाली और बाहर जाने लगा... फिर याद आय कि भौजी तो एक दम नंगी पड़ी हैं| मैंने एक और चादर निकाली और उन्हें अच्छी तरह से उढ़ा दी| भौजी के कपडे जो इधर-उधर फैले थे उन्हें भी समेत के तह लगा के उनके बिस्तर के एक कोने पे रख दिया| धीरे-धीरे दरवाजा खोला और दुबारा से बंद किया और मैं चुप-चाप बाहर आके अपनी चारपाई पे लेट गया| अब भी मेरे सर पे एक मुसीबत थी... मेरी टी-शर्ट! मैंने खुद को उसी चादर में लपेटा और लेट गया| लेटे-लेटे सोचता रहा कि आखिर आज जो हुआ वो क्या था... काफी देर सोचने के बाद याद आया... भौजी ने आज मेरे साह वही किया जो मैंने उन्हें उस कहानी के रूप में बताया था| मैंने अपना सर पीटा कि हाय !! उन्होंने मेरी ख़ुशी के लिए इतना सब कुछ किए? पूरी कि पूरी DVD कि कहानी उन्हें याद थी.. वो एक एक विवरण जो मैंने उन्हें दिया था वो सब!!!

ये बात तो साफ़ हो गई कि भौजी का सरप्राइज वाकई में जबरदस्त था... पर मुझे अब भी एक बात का शक हो रहा था| मुझे लग रहा था कि उन्होंने जो भी किया वो किसी न किसी नशे के आवेश में आके किया? इस बात को साफ़ करने का एक ही तरीका था कि जब सुबह होगी तब उनसे इत्मीनान से बात करूँ| पर सबसे पहले मुझे किसी के भी जागने से पहले टी-शर्ट का जुगाड़ करना होगा,ये सोचते-सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला| सुबह जब आँख खुली तो सात बज रहे थे... माँ मुझे उठाने आईं;

माँ: चल उठ भी जा... सारी रात जाग के क्या हवन कर रहा था| सारे लोग उठ के खेत भी चले गए और तू अब भी चादर ओढ़े पड़ा है|

मैं: उठ रहा हूँ...

दर के मारे मैं अंगड़ाई भी नहीं ले सकता था क्योंकि मैंने खुद को चादर में लपेट रखा था... अब चादर हटता भी कैसे? माँ सामने बैठी थी... तभी भौजी आ गईं उनके हाथ में कुछ था जो उन्होंने अपने पीछे छुपा रखा था, वो ठीक मेरी बगल में आक खड़ी हुई और वो कपडा मेरी ओर फेंका| माँ ये सब नहीं देख पाई... अब दिक्कत ये थी कि मैं उसे पहनू कैसे? भौजी ने माँ का ध्यान बताया और मैंने वो कपडा खोला तो वो मेरी गन्दी टी-शर्ट थी जिसे मैंने धोने डाला था| मैंने तुरंत वही टी-शर्ट पहन ली...

माँ: ये कौन सी टी-शर्ट पहनी है तूने? कल रात तो हरी वाली पहनी थी? अब काली पहनी हुई है?

मैं: नहीं तो मैंने काली ही पहनी थी... अँधेरे में रंग एक जैसे ही दीखते हैं| खेर मैं फ्रेश होक आता हूँ|

मैं फटा-फट उठा और बड़े घर कि ओर भगा|फ्रेश होक लौटा.. चाय पी, ओर एक बात गौर कि, की भौजी मुझसे नजर नहीं मिला पा रही थी| मेरे अंदर भी भौजी से अपने प्रश्नों के जवाब जानने की उत्सुकता थी|पर मैं सही मौके की तलाश कर रहा था.. क्योंकि अब तो घर में रसिका भाभी भी थीं| बड़की अम्मा और माँ तो खेत जा चुके थे|मैंने नजर बचा के भौजी को मिलने का इशारा किया... और जा के कुऐं की मुंडेर पे बैठ गया| भौजी ने मुझे आवाज लगाते हुए कहा; "आप मेरी चारा आतने में मदद कर दोगे?" मैंने हाँ में सर हिलाया और उनके पीछे जानवरो का चारा काटने वाले कमरे की ओर चल दिया| वहां पहुँच के भौजी ओर मैं मशीन चलाने लगे जिससे की चारा कट के नीचे गिर रहा था|

मैं: पहले आप ये बताओ की आप मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?

भौजी: वो... कल रात.... मैंने

मैं: प्लीज बताओ

भौजी: मैंने कल रात को नशे की हालत में वो सब किया...

मैं: (बीच में बात काटते हुए|) क्या? आपने नशा किया था? पर क्यों? ओर क्या नशा किया? शराब या भांग खाई थी?

भौजी: वो आपके चन्दर भैया ने शराब छुपा के रखी थी .. उसमें से ... बस एक ही घूँट ही पिया था! सच आपकी कसम! बहुत कड़वी थी ओर इतनी गर्म की पेट तक जला दिया!!!

मैं: पर क्यों? भला आपको शराब पीने की क्या जर्रूरत थी|

भौजी : वो आपने उस दिन मुझे उस फिल्म की सारी कहानी सुनाई थी... सुन के लगा की आपको वो फिल्म बहुत अच्छी लगी थी| मैंने सोचा क्यों ना मैं उस फिल्म हेरोइन की तरह आपके साथ वो सब....पर मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी.. की उस हेरोइन की तरह आपको पलंग पे धक्का दूँ ओर भी बहुत कुछ जो मुझे बोलने में शर्म आ रही है|

मैं: पर आपको ये सब करने के लिए मैंने तो नहीं कहा? क्या जर्रूरत थी आपको ये सब करने की?

भौजी: पिछले कई दिनों से आपका मन खराब था ओर उस दिन सुबह जब मैंने आपको परेशान देखा तो मुझसे रहा नहीं गया ओर मैंने ये सब सिर्फ ओर सिर्फ आपको खुश करने के लिए किया|

मैं: आप सच में मुझसे बहुत प्यार करते हो! पर हाँ आज के बाद आप कभी भी किसी तरह को नशा नहीं करोगे| हमारे बच्चे को आप यही गुण देना चाहते हो?

भौजी: आपकी कसम मैं कभी भी कोई भी नशा नहीं करुँगी|

मेरा मन तो कर रहा था की भौजी को गोद में उठा के उन्हें चूम लूँ पर मौके की नजाकत कुछ और कह रही थी|

मैं: वैसे कल रात आपको होश भी है की आपने मेरे साथ क्या-क्या किया?

भौजी: थोड़ा बहुत होश है....घर में मैंने आपकी फटी हुई टी-शर्ट देखि थी बस इतना ही याद है| सुबह उठने के बाद सर घूम रहा था| हुआ क्या कल रात ?

मैंने अपनी टी-शर्ट ऊपर कर के दिखाई... भौजी का मुंह खुला का खुला रह गया था| अब भी मेरी छाती पे उनके दांतों के निशान बने हुए थे| कई जगह लाल निशान भी पड़ गए थे!

भौजी: हाय राम!!! ये मेरी करनी है?

मैं: अभी तक तो सिर्फ आपने ही मुझे छुआ है!

भौजी अपने सर पे हाथ रख के खड़ी हो गईं..

भौजी: मुझे माफ़ कर दो!!! ये सब मैंने जान-बुझ के नहीं किया! मुझे हो क्या गया था कल रात? ये मैंने क्या कर दिया... चलो मैं मलहम लगा देती हूँ|

मैं: नहीं रहने दो... अकेले में कहीं फिर से आपके अंदर की शेरनी जाग गई तो मेरी शामत आ जाएगी| (मैंने उन्हें छेड़ते हुए कहा)

भौजी: आप भी ना... चलो मैं मलहम लगा दूँ वरना किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा?

मैं: नहीं रहने दो... ये आपके LOVE BITES हैं.. कुछ दिन में चले जायेंगे तब तक इन्हें रहने दो|

भौजी मुस्कुरा दि और हम चारा काटने में लग गए... 

वो सारा दिन मैं भौजी को बार-बार यही कह के छेड़ता रहा की आपने तो मेरा बलात्कार कर दिया!!! और हर भर भौजी झेंप जाती... शाम के छः बजे थे... नाजाने क्यों पर मेरी नजर स्कूल की ओर गई.. वहां कोई नहीं था| मुझे यकीन हो गया था की माधुरी मुझे बरगलाने के लिए वो सब कह रही थी| वो सच में थोड़े ही वहां मेरा इन्तेजार करने वाली थी| मैं वापस नेहा के साथ खेलने में व्यस्त हो गया| वो रात ऐसे ही निकल गई... कुछ ख़ास नहीं हुआ बस वही भौजी के साथ बातें करना, उनको बार-बार छेड़ना ऐसे ही रात काट गई| अगले दिन सुबह भी बारह बजे तक सब शांत था... तभी अचानक माधुरी की माँ हमारे घर आईं ओर रसिका भाभी को पूछने लगी|

मैं और नेहा घर के प्रमुख आँगन में बैट-बॉल खेल रहे थे| रसिका भाभी जल्दी-जल्दी में माधुरी के घर निकल गईं, मुझे थोड़ा अट-पटा तो लगा पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया| करीब एक घंटे बाद रसिका भाभी लौटी, उस समय मैं छापर के नीचे नेहा के साथ बैठ खेल रहा था| भौजी रसोई में आँटा गूंद रहीं थी....

रसिका भाभी: मानु... तुम्हें मेरे साथ चलना होगा!!!

मैं: पर कहाँ ?

रसिका भाभी: (मेरे नजदीक आते हुए, धीरे से खुस-फ़ुसाइन) माधुरी तुमसे मिलना चाहती है|

मैं: (खुस-फुसते हुए) पर क्यों?

रसिका भाभी: (अपने हाथ जोड़ते हुए) मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ... बस एक आखरी बार उससे मिल लो, उसने पिछले तीन दिनों से कुछ नहीं खाया है, बस तुमसे कुछ कहना चाहती है| उसके लिए ना सही काम से काम मेरे लिए ही एक बार चलो!

मैं कुछ नहीं बोला और चुप चाप उठ के माधुरी के घर की ओर चल दिया| पीछे-पीछे रसिका भाभी भी आ गईं|

रसिका भाभी: मानु, माधुरी की माँ बाजार गई हैं और वो मुझे कहने आईं थी की उनकी गैर हाजरी में मैं उसका ध्यान रखूं| प्लीज घर में किसी से कुछ मत कहना वरना मेरी शामत है आज|

मैं: मैं कुछ नहीं कहूँगा पर उसके पिताजी कहाँ हैं?

रसिका भाभी: वो शादी के सील-सिले में बनारस गए हैं| उन्हें तो पता भी नहीं की माधुरी की तबियत यहाँ खराब हो गई है| घर में केवल उसकी माँ के और कोई नहीं जो उसका ध्यान रखे|

मैं: क्यों आप हो ना... चिंता मत करो मैं घर में सब को समझा दूंगा आप यहीं रह के उसका ख्याल रखा करो| और अगर किसी चीज की जर्रूरत हो तो मुझे कहना मैं अजय भैया से कह दूंगा|

हम बातें करते-करते माधुरी के घर पहुँच, वहां पहुँच के देखा तो वो बिस्तर पे पड़ी थी.. कमजोर लग रही थी|मैं चुप-चाप खड़ा उसे देख रहा था, तभी रसिका भाभी उसके पास आके बैठ गईं|

माधुरी: भाभी मुझे इनसे कुछ बात करनी है... अकेले में|
(भाभी चुप-चाप उठ के बहार चली गईं) 
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07-16-2017, 10:00 AM,
#37
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
33

मैं: आखिर क्यों तुम अपनी जान देने पे तुली हो?

माधुरी: सब से पहले मुझे माफ़ कर दो... मैं दो दिन स्कूल आके आपका इन्तेजार नहीं कर पाई| दरअसल तबियत अचानक इतनी जल्दी ख़राब हो जाएगी मुझे इसका एहसास नहीं था| आप भी सोच रहे होगे की कैसी लड़की है जो ....

मैं: (उसकी बात काटते हुए) प्लीज !!! ऐसा मत करो !!! क्यों मुझे पाप का भागी बना रही हो| ये कैसी जिद्द है... तुम्हें लगता है की मैं इस सब से पिघल जाऊंगा|

माधुरी: मेरी तो बस एक छोटी से जिद्द है... जिसे आप बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हो पर करना नहीं चाहते|

मैं: वो छोटी सी जिद्द मेरी जिंदगी तबाह कर देगी... मैं जानता हूँ की तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है, तुम उस जिद्द के जरिये मुझे पूरे गाँव में बदनाम कर दोगी|

माधुरी: (मुझे एक पर्ची देते हुए) ये लो इसे पढ़ लो!

मैंने वो पर्ची खोल के देखि तो उसमें जो लिखा था वो इस प्रकार है:

"आप मुझगे गलत मत समझिए, मेरा इरादा आपको बदनाम करने का बिलकुल नहीं है| मैं सिर्फ आपको आपने कौमार्य भेंट करना चाहती हूँ.... इसके आलावा मेरा कोई और उद्देश्य नहीं है| अगर उस दौरान मैं गर्भवती भी हो गई तो इसमें आपकी कोई गलती नहीं होगी| अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं अपनी जान दे दूंगी!!! "

माधुरी: मैं ये लिखित में आपको इसलिए दे रही हूँ ताकि आपको तसल्ली रहे की मैं आपको आगे चल के ब्लैकमेल नहीं करुँगी| इससे ज्यादा मैं आपको और संतुष्ट नहीं कर सकती| प्लीज मैं अब और इस तरह जिन्दा नहीं रह सकती| अगर अब भी आपका फैसला नहीं बदला तो आप मुझे थोड़ा सा ज़हर ला दो| उसे खा के मैं आत्मा हत्या कर लुंगी| आप पर कोई नाम नहीं आएगा... कम से कम आप इतना तो कर ही सकते हो|

मैं: तुम पागल हो गई हो... अपने होश खो दिए हैं तुमने| मैं उस लड़की से धोका कैसे कर सकता हूँ?

माधुरी: धोका कैसे ? आपको रीतिका को ये बात बताने की क्या जर्रूरत है?

मैं: तो मैं अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दूँ? प्लीज मुझे ऐसी हालत में मत डालो की ना तो मैं जी सकूँ और ना मर सकूँ|

माधुरी: फैसला आपका है.... या तो मेरी इच्छा पूरी करो या मुझे मरने दो?

मैं: अच्छा मुझे कुछ सोचने का समय तो दो?

माधुरी: समय ही तो नहीं है मेरे पास देने के लिए| रेत की तरह समय आपकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है|

मेरे पास अब कोई चारा नहीं था, सिवाए इसके की मैं उसकी इस इच्छा को पूरा करूँ|

मैं: ठीक है.... पर मेरी कुछ शर्तें हैं| ससे पहली शर्त; तुम्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ होना होगा| क्योंकि अभी तुम्हारी हालत ठीक नहीं है, तुमने पिछले तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है और तुम काफी कमजोर भी लग रही हो|

माधुरी: मंजूर है|

मैं: दूसरी शर्त, मैं ये सब सिर्फ मजबूरी में कर रहा हूँ! ये सिर्फ एक बार के लिए है और तुम दुबारा मेरे पीछे इस सब के लिए नहीं पड़ोगी?

माधुरी: मंजूर है|

मैं: और आखरी शर्त, जगह और दिन मैं चुनुँगा?

माधुरी: मंजूर है|

मैं: और हाँ मुझसे प्यार की उम्मीद मत करना... मैं तुम्हें प्यार नहीं करता और ना कभी करूँगा| ये सब इसीलिए है की तुमने जो आत्महत्या की तलवार मेरे सर पे लटका राखी है उससे मैं अपनी गर्दन बचा सकूँ| बाकी रसिका भाभी को तुम क्या बोलोगी, की हम क्या बात कर रहे थे?

माधुरी: आप उन्हें अंदर बुला दो|

मैंने बहार झाँका तो रसिका भाभी आँगन में चारपाई पे सर लटका के बैठी थीं| मैंने दरवाजे से ही भाभी को आवाज मारी.... भाभी घर के अंदर आईं;

रसिका भाभी: हाँ बोलो ....क्या हुआ? मेरा मतलब की क्या बात हुई तुम दोनों के बीच?

माधुरी: मैं बस इन्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहती थी|

मैं: और मैं माधुरी को समझा रहा था की वो इस तरह से खुद को और अपने परिवार को परेशान करना बंद कर दे| वैसे भी इसकी शादी जल्द ही होने वाली है तो ये सब करने का क्या फायदा|

बात को खत्म करते हुए मैं बहार चल दिया| उसके बाद दोनों में क्या बात हुई मुझे नहीं पटा.. पर असल में अब मेरा दिमाग घूम रहा था... मैं भौजी को क्या कहूँ? और अगर मैं उन्हें ये ना बताऊँ तो ये उनके साथ विश्वासघात होगा!!!!
शकल पे बारह बजे थे... गर्मी ज्यादा थी ... पसीने से तरबतर मैं घर पहुंचा| मैं लड़खड़ाते हुए क़दमों से छप्पर की ओर बढ़ा और अचानक से चक्कर खा के गिर गया! भौजी ने मुझे गिरते हुए देखा तो भागती हुई मेरे पास आईं ... उसके बाद जब मेरी आँख खुली तो मेरा सर भौजी की गोद में था और वो पंखे से मुझे हवा कर रहीं थी|

मुझे बेहोश हुए करीब आधा घंटा ही हुआ था... मैं आँखें मींचते हुए उठा;

भौजी: क्या हुआ था आपको?

मैं: कुछ नहीं... चक्कर आ गया था|

भौजी: आप ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी! डॉक्टर के जाना है?

मैं: नहीं... मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूँ|

दोपहर से ले के रात तक मैं गुम-सुम रहा... किसी से कोई बोल-चाल नहीं, यहाँ तक की नेहा से भी बात नहीं कर रहा था| रात्रि भोज के बाद मैं अपने बिस्तर पे लेटा तभी नेहा मेरे पास आ गई| वो मेरी बगल में लेती और कहने लगी; "चाचू कहानी सुनाओ ना|" अब मैं उसकी बात कैसे टालता ... उसे कहानी सुनाने लगा| धीरे-धीरे वो सो गई| मेरी नींद अब भी गायब थी.... रह-रह के मन में माधुरी की इच्छा पूरी करने की बात घूम रही थी| मैंने दुरी ओर करवट लेनी चाही पर नेहा ने मुझे जकड़ रखा था अगर मैं करवट लेता तो वो जग जाती| इसलिए मैं सीधा ही लेटा रहा.. कुछ समय बाद भौजी मेरे पास आके बैठ गईं ओर मेरी उदासी का कारन पूछने लगी;

भौजी: आपको हुआ क्या है? क्यों आप मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हो? जर्रूर आपके और माधुरी के बीच कुछ हुआ है?

मैं: कुछ ख़ास नहीं ... वाही उसका जिद्द करना|

भौजी: वो फिर उसी बात के लिए जिद्द कर रही है ना?

मैं: हाँ ...

भौजी: तो आपने क्या कहा?

मैं: मन अब भी ना ही कहता है| (मैंने बात को घुमा के कहा.. परन्तु सच कहा|)
खेर छोडो इन बातों को... आप बहुत खुश दिख रहे हो आज कल?

भौजी: (अपने पेट पे हाथ रखते हुए) वो मुझे....

मैं: रहने दो.. (मैंने उनके पेट को स्पर्श किारते हुए कहा) मैं समझ गया क्या बात है| अच्छा बताओ की अगर लड़का हुआ तो?

भौजी: (मुस्कुराते हुए) तो मैं खुश होंगी!

मैं: और अगर लड़की हुई तो ?

भौजी: मैं ज्यादा खुश होंगी? क्योंकि मैं लड़की ही चाहती हूँ....

मैं: (बात बीच में काटते हुए) और अगर जुड़वाँ हुए तो?

भौजी: हाय राम!!! मैं ख़ुशी से मर जाऊँगी!!!

मैं: (गुस्सा दिखाते हुए) आपने फिर मरने मारने की बात की?

भौजी: (कान पकड़ते हुए) ओह सॉरी जी!

मैं: एक बात बताओ आपने अभी तक नेहा को स्कूल में दाखिल क्यों नहीं कराया?

भौजी: सच कहूँ तो मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं ... मेरा ध्यान तो केवल आप पे ही था| अगर आप नहीं होते तो मैं कब की आत्महत्या कर चुकी होती| आपके प्यार ने ही तो मुझे जीने का सहारा दिया है|

मैं: मैं समझ सकता हूँ... मैं कल ही बड़के दादा से बात करता हूँ और कल ही नेहा को स्कूल में दाखिल करा देंगे|

भौजी: जैसे आप ठीक समझो... आखिर आपकी लाड़ली जो है|

अभी हमारी गप्पें चल रहीं थी की पीछे से पिताजी की आवाज आई;

पिताजी: क्यों भई सोना नहीं है तुम दोनों ने? सारी रात गप्पें लदानी है क्या ?

भौजी ने जैसे ही पिताजी की बात सुनी उन्होंने तुरंत घूँघट ओढ़ लिया और उठ के खड़ी हो गईं| मैं खुश था की काम से काम पिताजी ने मुझसे बात तो की वरना जबसे मैंने रसिका भाभी से बहस बाजी की थी तब से तो वो मुझसे बोल ही नहीं रहे थे|

मैं: पिताजी आप अगर जाग ही रहे हो तो मुझे आपसे एक बात करनी थी|

पिताजी: हाँ बोलो

मैं उठ के पिताजी की चारपाई पे बैठ गया.. मेरे साथ-साथ भौजी भी पिताजी के चारपाई के सिराहने घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: पिताजी, मैं भौजी से पूछ रहा था की उन्होंने नेहा को अब तक स्कूल में दाखिल नहीं करवाया? चन्दर भैया का तो ध्यान ही नहीं है इस बात पे, तो क्या आप बड़के दादा से इस बारे में बात करेंगे? शिक्षा कितनी जर्रुरी होती है ये मैंने आप से ही सीखा है तो फिर हमारे ही खानदान में लड़कियां क्यों वंचित रहे?

पिताजी: तू फ़िक्र ना कर... मैं कल भैया को मना भी लूंगा और तू खुद जाके मास्टर साहब से बात करके कल ही दाखिला भी करवा दिओ| दाखिले के लिए तू अपनी भाभी को साथ ले जाना ठीक है?

मैं: जी... अब आप सो जाइये शुभ रात्रि!!!

पिताजी: शुभ रात्रि तुम भी जाके सो जाओ सुबह जल्दी उठना है ना?

मैं और भौजी ख़ुशी-ख़ुशी वापस मेरी हारपाई पे आ गए;

मैं: अब तो आप खुश हो ना?

भौजी: हाँ... अभी आप सो जाओ मैं आपको बाद में उठाती हूँ?

मैं: नहीं... आज नहीं सुबह जल्दी भी तो उठना है|

भौजी: तो मेरा क्या? मुझे नींद कैसे आएगी? आपके बिना मुझे नींद नहीं आती|

मैं: अव्व्व् कल नेहा का एडमिशन हो जाए फिर आप जो कहोगे वो करूँगा पर अभी तो आप मेरी बात मान लो|

भौजी: ठीक है पर अब आप कोई चिंता मत करना और आराम से सो जाना|

भौजी उठ के चलीं गईं पर मुझे नींद कहाँ आने वाली थी... मुझे तो सबसे ज्यादा चिंता माधुरी की थी| उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में अधिक से अधिक दो दिन लगते ... और मुझे इसी बात की चिंता थी| मैं उसका सामना कैसे करूँ? और सबसे बड़ी बात मैं भौजी को धोका नहीं देना चाहता था.... कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था अगर मैं भाग भी जाता तो भी समस्या हल होती हुई नहीं नजर आ रही थी| क्या करूँ? ... क्या करूँ? ..... मैंने एक बार अपनी जेब में रखी पर्ची फिर से निकाली और उसे पड़ा ...सिवाय उसकी बात मैंने के मेरे पास कोई और चारा नहीं था| ठीक है तो अब सबसे पहले मुझे जगह का जुगाड़ करना है... हमारे अड़े घर के पीछे ही एक घर था| मैंने गौर किया की वो घर हमेशा बंद ही रहता था... अब इस घर के बारे में जानकारी निकालना जर्रुरी था| दुरी बात ये की मुझे समय तय करना था? दिन के समय बहुत खतरा था... और रात्रि में मैं तो घर से निकल जाता पर माधुरी कैसे आती?

जब किसी काम को करने की आपके दिल की इच्छा ना हो तो दिमाग भी काम करना बंद कर देता है| यही कारन था की मुझे ज्यादा आईडिया नहीं सूझ रहे थे|

अगले दिन सुबह मैं जल्दी उठा... या ये कहूँ की रात में सोया ही नहीं| फ्रेश हो के तैयार हो गया| हमेशा की तरह चन्दर भैया और अजय भैया खेत जा चुके थे| घर पे केवल माँ-पिताजी, रसिका भाभी, भौजी रो बड़के दादा और अब्द्की अम्मा ही थे| मैं जब चाय पीने पहुंचा तो बड़की अम्मा मेरी तारीफ करने लगी की इस घर में केवल मैं ही हूँ जिसे भौजी की इतनी चिंता है| पता नहीं क्यों पर मेरे कान लाल हो रहे थे| खेर इस बात पे सब राजी थे की नेहा का दाखिल स्कूल में करा देना चाहिए तो अब बारी मेरी थी की मैं नेहा को स्कूल ले जाऊँ| मैंने भौजी को जल्दी से तैयार हो जाने के लिए कहा और मैं और नेहा चारपाई पे बैठ के खेलने लगे|

करीब आधे घंटे बाद भौजी तैयार हो के आईं... हाय क्या लग रहीं थी वो! पीली साडी .... माँग में सिन्दूर.... होठों पे लाली... उँगलियों में लाल नेल पोलिश... पायल की छम-छम आवाज...और सर पे पल्लू.... हाय आज तो भौजी ने क़त्ल कर दिया था मेरा!!!! सच में इतनी सुन्दर लग रहीं थी वो| वो मेरे पास आके खड़ी हो गईं;

भौजी: ऐसे क्या देख रहे हो आप?

मैं: कुछ नहीं.... बस ऐसे ही आपकी सुंदरता को निहार रहा था| कसम से आज आप कहर ढा रहे हो|

भौजी: आप भी ना... चलो जल्दी चलो आके मुझे वापस चुलाह-चौक सम्भालना है| आपकी रसिका भाभी तो सुबह से ही कहीं गयब हैं|

रास्ते भर मेरे पेट में तितलियाँ उड़ती रहीं| ऊपर से भौजी ने डेढ़ हाथ का घूँघट काढ़ा हुआ था| हम स्कूल पहुंचे, वो स्कूल कुछ बड़ा नहीं था बस प्राइमरी स्कूल जैसा था... तीन कमरे और कुछ नहीं... ना ही छात्रों के बैठने के लिए बेन्चें ना कुर्सी ... ना टेबल... पंखे तो भूल ही जाओ| केवल एक ही कुर्सी थी जिस पे मास्टर साहब बैठ के पढ़ा रहे थे| मैं पहली कक्षा में घुसा और हेडमास्टर साहब के लिए पूछा तो मास्टर जी ने कहा की वो आखरी वाले कमरे में हैं| हम उस कमरे की ओर बढ़ लिए... नेहा मेरी गोद में थी ओर भौजी ठीक मेरे बराबर में चल रहीं थी| कमरे के बहार पहुँच के मैंने खट-खटया.. मास्टर जी ने हमें अंदर बुलाया| अंदर एक मेज था जो मजबूत नहीं लग रहा था, और बेंत की तीन कुर्सियां|

हम उन्हीं कुर्सियों पे बैठ गए और बातों का सिल-सिला शुरू हुआ;

मैं: HELLO SIR !

हेडमास्टर साहब: हेलो ... देखिये मैं आपको पहले ही बता दूँ की मेरी बदली हुए कुछ ही दिन हुए हैं और मैं हिंदी माध्यम से पढ़ा हूँ तो कृपया आप मुझसे हिंदी में ही बात करें|

मैं: जी बेहतर!

हेडमास्टर साहब: तो बताइये मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ? (नेहा की ओर देखते हुए) ओह क्षमा कीजिये.. मैं समझ गया आप अपनी बेटी के दाखिले हेतु आय हैं| ये लीजिये फॉर्म भर दीजिये|

मैं: जी पर पहले मैं कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ? इस स्कूल में केवल दो ही कमरे हैं जिन में अध्यापक पढ़ा रहे हैं? यह स्कूल कितनी कक्षा तक है और क्या ये स्कूल किसी सरकारी स्कूल या कॉलेज से मान्यता प्राप्त है? मतलब जैसे दिल्ली में स्कूल CBSE से मान्यता प्राप्त होते हैं ऐसा कुछ?

हेडमास्टर साहब: जी हमें उत्तर प्रदेश हाई स्कूल बोर्ड से मान्यता प्राप्त है| हमारे स्कूल में केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ाया जाता है... हमें कुछ फंड्स केंद्रीय सरकार से मिलने वाले हैं जिसकी मदद से इस स्कूल का निर्माण कार्य जल्द ही शुरू होगा और फिर ये स्कूल दसवीं कक्षा तक हो जायेगा|

मैं: जी ठीक है पर आप के पास कुछ कागज वगैरह होंगे... ताकि मुझ तसल्ली हो जाये| देखिये बुरा मत मानियेगा परन्तु मैं नहीं चाहता की बच्ची का साल बर्बाद हो.. फिर उसे तीसरी कक्षा के लिए हमें दूसरा स्कूल खोजना पड़े|

हेडमास्टर साहब: जी जर्रूर मुझे कोई आपत्ति नहीं|

और फिर हेडमास्टर साहब ने मुझे कुछ सरकारी दस्तावेज दिखाए| उन्हें देख के कुछ तसल्ली तो हुई.. फिर मैंने फॉर्म भरा और फीस की बात वगैरह की| हेडमास्टर साहब फॉर्म पढ़ने लगे...
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07-16-2017, 10:01 AM,
#38
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
33

मैं: आखिर क्यों तुम अपनी जान देने पे तुली हो?

माधुरी: सब से पहले मुझे माफ़ कर दो... मैं दो दिन स्कूल आके आपका इन्तेजार नहीं कर पाई| दरअसल तबियत अचानक इतनी जल्दी ख़राब हो जाएगी मुझे इसका एहसास नहीं था| आप भी सोच रहे होगे की कैसी लड़की है जो ....

मैं: (उसकी बात काटते हुए) प्लीज !!! ऐसा मत करो !!! क्यों मुझे पाप का भागी बना रही हो| ये कैसी जिद्द है... तुम्हें लगता है की मैं इस सब से पिघल जाऊंगा|

माधुरी: मेरी तो बस एक छोटी से जिद्द है... जिसे आप बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हो पर करना नहीं चाहते|

मैं: वो छोटी सी जिद्द मेरी जिंदगी तबाह कर देगी... मैं जानता हूँ की तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है, तुम उस जिद्द के जरिये मुझे पूरे गाँव में बदनाम कर दोगी|

माधुरी: (मुझे एक पर्ची देते हुए) ये लो इसे पढ़ लो!

मैंने वो पर्ची खोल के देखि तो उसमें जो लिखा था वो इस प्रकार है:

"आप मुझगे गलत मत समझिए, मेरा इरादा आपको बदनाम करने का बिलकुल नहीं है| मैं सिर्फ आपको आपने कौमार्य भेंट करना चाहती हूँ.... इसके आलावा मेरा कोई और उद्देश्य नहीं है| अगर उस दौरान मैं गर्भवती भी हो गई तो इसमें आपकी कोई गलती नहीं होगी| अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं अपनी जान दे दूंगी!!! "

माधुरी: मैं ये लिखित में आपको इसलिए दे रही हूँ ताकि आपको तसल्ली रहे की मैं आपको आगे चल के ब्लैकमेल नहीं करुँगी| इससे ज्यादा मैं आपको और संतुष्ट नहीं कर सकती| प्लीज मैं अब और इस तरह जिन्दा नहीं रह सकती| अगर अब भी आपका फैसला नहीं बदला तो आप मुझे थोड़ा सा ज़हर ला दो| उसे खा के मैं आत्मा हत्या कर लुंगी| आप पर कोई नाम नहीं आएगा... कम से कम आप इतना तो कर ही सकते हो|

मैं: तुम पागल हो गई हो... अपने होश खो दिए हैं तुमने| मैं उस लड़की से धोका कैसे कर सकता हूँ?

माधुरी: धोका कैसे ? आपको रीतिका को ये बात बताने की क्या जर्रूरत है?

मैं: तो मैं अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दूँ? प्लीज मुझे ऐसी हालत में मत डालो की ना तो मैं जी सकूँ और ना मर सकूँ|

माधुरी: फैसला आपका है.... या तो मेरी इच्छा पूरी करो या मुझे मरने दो?

मैं: अच्छा मुझे कुछ सोचने का समय तो दो?

माधुरी: समय ही तो नहीं है मेरे पास देने के लिए| रेत की तरह समय आपकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है|

मेरे पास अब कोई चारा नहीं था, सिवाए इसके की मैं उसकी इस इच्छा को पूरा करूँ|

मैं: ठीक है.... पर मेरी कुछ शर्तें हैं| ससे पहली शर्त; तुम्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ होना होगा| क्योंकि अभी तुम्हारी हालत ठीक नहीं है, तुमने पिछले तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है और तुम काफी कमजोर भी लग रही हो|

माधुरी: मंजूर है|

मैं: दूसरी शर्त, मैं ये सब सिर्फ मजबूरी में कर रहा हूँ! ये सिर्फ एक बार के लिए है और तुम दुबारा मेरे पीछे इस सब के लिए नहीं पड़ोगी?

माधुरी: मंजूर है|

मैं: और आखरी शर्त, जगह और दिन मैं चुनुँगा?

माधुरी: मंजूर है|

मैं: और हाँ मुझसे प्यार की उम्मीद मत करना... मैं तुम्हें प्यार नहीं करता और ना कभी करूँगा| ये सब इसीलिए है की तुमने जो आत्महत्या की तलवार मेरे सर पे लटका राखी है उससे मैं अपनी गर्दन बचा सकूँ| बाकी रसिका भाभी को तुम क्या बोलोगी, की हम क्या बात कर रहे थे?

माधुरी: आप उन्हें अंदर बुला दो|

मैंने बहार झाँका तो रसिका भाभी आँगन में चारपाई पे सर लटका के बैठी थीं| मैंने दरवाजे से ही भाभी को आवाज मारी.... भाभी घर के अंदर आईं;

रसिका भाभी: हाँ बोलो ....क्या हुआ? मेरा मतलब की क्या बात हुई तुम दोनों के बीच?

माधुरी: मैं बस इन्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहती थी|

मैं: और मैं माधुरी को समझा रहा था की वो इस तरह से खुद को और अपने परिवार को परेशान करना बंद कर दे| वैसे भी इसकी शादी जल्द ही होने वाली है तो ये सब करने का क्या फायदा|

बात को खत्म करते हुए मैं बहार चल दिया| उसके बाद दोनों में क्या बात हुई मुझे नहीं पटा.. पर असल में अब मेरा दिमाग घूम रहा था... मैं भौजी को क्या कहूँ? और अगर मैं उन्हें ये ना बताऊँ तो ये उनके साथ विश्वासघात होगा!!!!
शकल पे बारह बजे थे... गर्मी ज्यादा थी ... पसीने से तरबतर मैं घर पहुंचा| मैं लड़खड़ाते हुए क़दमों से छप्पर की ओर बढ़ा और अचानक से चक्कर खा के गिर गया! भौजी ने मुझे गिरते हुए देखा तो भागती हुई मेरे पास आईं ... उसके बाद जब मेरी आँख खुली तो मेरा सर भौजी की गोद में था और वो पंखे से मुझे हवा कर रहीं थी|

मुझे बेहोश हुए करीब आधा घंटा ही हुआ था... मैं आँखें मींचते हुए उठा;

भौजी: क्या हुआ था आपको?

मैं: कुछ नहीं... चक्कर आ गया था|

भौजी: आप ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी! डॉक्टर के जाना है?

मैं: नहीं... मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूँ|

दोपहर से ले के रात तक मैं गुम-सुम रहा... किसी से कोई बोल-चाल नहीं, यहाँ तक की नेहा से भी बात नहीं कर रहा था| रात्रि भोज के बाद मैं अपने बिस्तर पे लेटा तभी नेहा मेरे पास आ गई| वो मेरी बगल में लेती और कहने लगी; "चाचू कहानी सुनाओ ना|" अब मैं उसकी बात कैसे टालता ... उसे कहानी सुनाने लगा| धीरे-धीरे वो सो गई| मेरी नींद अब भी गायब थी.... रह-रह के मन में माधुरी की इच्छा पूरी करने की बात घूम रही थी| मैंने दुरी ओर करवट लेनी चाही पर नेहा ने मुझे जकड़ रखा था अगर मैं करवट लेता तो वो जग जाती| इसलिए मैं सीधा ही लेटा रहा.. कुछ समय बाद भौजी मेरे पास आके बैठ गईं ओर मेरी उदासी का कारन पूछने लगी;

भौजी: आपको हुआ क्या है? क्यों आप मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हो? जर्रूर आपके और माधुरी के बीच कुछ हुआ है?

मैं: कुछ ख़ास नहीं ... वाही उसका जिद्द करना|

भौजी: वो फिर उसी बात के लिए जिद्द कर रही है ना?

मैं: हाँ ...

भौजी: तो आपने क्या कहा?

मैं: मन अब भी ना ही कहता है| (मैंने बात को घुमा के कहा.. परन्तु सच कहा|)
खेर छोडो इन बातों को... आप बहुत खुश दिख रहे हो आज कल?

भौजी: (अपने पेट पे हाथ रखते हुए) वो मुझे....

मैं: रहने दो.. (मैंने उनके पेट को स्पर्श किारते हुए कहा) मैं समझ गया क्या बात है| अच्छा बताओ की अगर लड़का हुआ तो?

भौजी: (मुस्कुराते हुए) तो मैं खुश होंगी!

मैं: और अगर लड़की हुई तो ?

भौजी: मैं ज्यादा खुश होंगी? क्योंकि मैं लड़की ही चाहती हूँ....

मैं: (बात बीच में काटते हुए) और अगर जुड़वाँ हुए तो?

भौजी: हाय राम!!! मैं ख़ुशी से मर जाऊँगी!!!

मैं: (गुस्सा दिखाते हुए) आपने फिर मरने मारने की बात की?

भौजी: (कान पकड़ते हुए) ओह सॉरी जी!

मैं: एक बात बताओ आपने अभी तक नेहा को स्कूल में दाखिल क्यों नहीं कराया?

भौजी: सच कहूँ तो मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं ... मेरा ध्यान तो केवल आप पे ही था| अगर आप नहीं होते तो मैं कब की आत्महत्या कर चुकी होती| आपके प्यार ने ही तो मुझे जीने का सहारा दिया है|

मैं: मैं समझ सकता हूँ... मैं कल ही बड़के दादा से बात करता हूँ और कल ही नेहा को स्कूल में दाखिल करा देंगे|

भौजी: जैसे आप ठीक समझो... आखिर आपकी लाड़ली जो है|

अभी हमारी गप्पें चल रहीं थी की पीछे से पिताजी की आवाज आई;

पिताजी: क्यों भई सोना नहीं है तुम दोनों ने? सारी रात गप्पें लदानी है क्या ?

भौजी ने जैसे ही पिताजी की बात सुनी उन्होंने तुरंत घूँघट ओढ़ लिया और उठ के खड़ी हो गईं| मैं खुश था की काम से काम पिताजी ने मुझसे बात तो की वरना जबसे मैंने रसिका भाभी से बहस बाजी की थी तब से तो वो मुझसे बोल ही नहीं रहे थे|

मैं: पिताजी आप अगर जाग ही रहे हो तो मुझे आपसे एक बात करनी थी|

पिताजी: हाँ बोलो

मैं उठ के पिताजी की चारपाई पे बैठ गया.. मेरे साथ-साथ भौजी भी पिताजी के चारपाई के सिराहने घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: पिताजी, मैं भौजी से पूछ रहा था की उन्होंने नेहा को अब तक स्कूल में दाखिल नहीं करवाया? चन्दर भैया का तो ध्यान ही नहीं है इस बात पे, तो क्या आप बड़के दादा से इस बारे में बात करेंगे? शिक्षा कितनी जर्रुरी होती है ये मैंने आप से ही सीखा है तो फिर हमारे ही खानदान में लड़कियां क्यों वंचित रहे?

पिताजी: तू फ़िक्र ना कर... मैं कल भैया को मना भी लूंगा और तू खुद जाके मास्टर साहब से बात करके कल ही दाखिला भी करवा दिओ| दाखिले के लिए तू अपनी भाभी को साथ ले जाना ठीक है?

मैं: जी... अब आप सो जाइये शुभ रात्रि!!!

पिताजी: शुभ रात्रि तुम भी जाके सो जाओ सुबह जल्दी उठना है ना?

मैं और भौजी ख़ुशी-ख़ुशी वापस मेरी हारपाई पे आ गए;

मैं: अब तो आप खुश हो ना?

भौजी: हाँ... अभी आप सो जाओ मैं आपको बाद में उठाती हूँ?

मैं: नहीं... आज नहीं सुबह जल्दी भी तो उठना है|

भौजी: तो मेरा क्या? मुझे नींद कैसे आएगी? आपके बिना मुझे नींद नहीं आती|

मैं: अव्व्व् कल नेहा का एडमिशन हो जाए फिर आप जो कहोगे वो करूँगा पर अभी तो आप मेरी बात मान लो|

भौजी: ठीक है पर अब आप कोई चिंता मत करना और आराम से सो जाना|

भौजी उठ के चलीं गईं पर मुझे नींद कहाँ आने वाली थी... मुझे तो सबसे ज्यादा चिंता माधुरी की थी| उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में अधिक से अधिक दो दिन लगते ... और मुझे इसी बात की चिंता थी| मैं उसका सामना कैसे करूँ? और सबसे बड़ी बात मैं भौजी को धोका नहीं देना चाहता था.... कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था अगर मैं भाग भी जाता तो भी समस्या हल होती हुई नहीं नजर आ रही थी| क्या करूँ? ... क्या करूँ? ..... मैंने एक बार अपनी जेब में रखी पर्ची फिर से निकाली और उसे पड़ा ...सिवाय उसकी बात मैंने के मेरे पास कोई और चारा नहीं था| ठीक है तो अब सबसे पहले मुझे जगह का जुगाड़ करना है... हमारे अड़े घर के पीछे ही एक घर था| मैंने गौर किया की वो घर हमेशा बंद ही रहता था... अब इस घर के बारे में जानकारी निकालना जर्रुरी था| दुरी बात ये की मुझे समय तय करना था? दिन के समय बहुत खतरा था... और रात्रि में मैं तो घर से निकल जाता पर माधुरी कैसे आती?

जब किसी काम को करने की आपके दिल की इच्छा ना हो तो दिमाग भी काम करना बंद कर देता है| यही कारन था की मुझे ज्यादा आईडिया नहीं सूझ रहे थे|

अगले दिन सुबह मैं जल्दी उठा... या ये कहूँ की रात में सोया ही नहीं| फ्रेश हो के तैयार हो गया| हमेशा की तरह चन्दर भैया और अजय भैया खेत जा चुके थे| घर पे केवल माँ-पिताजी, रसिका भाभी, भौजी रो बड़के दादा और अब्द्की अम्मा ही थे| मैं जब चाय पीने पहुंचा तो बड़की अम्मा मेरी तारीफ करने लगी की इस घर में केवल मैं ही हूँ जिसे भौजी की इतनी चिंता है| पता नहीं क्यों पर मेरे कान लाल हो रहे थे| खेर इस बात पे सब राजी थे की नेहा का दाखिल स्कूल में करा देना चाहिए तो अब बारी मेरी थी की मैं नेहा को स्कूल ले जाऊँ| मैंने भौजी को जल्दी से तैयार हो जाने के लिए कहा और मैं और नेहा चारपाई पे बैठ के खेलने लगे|

करीब आधे घंटे बाद भौजी तैयार हो के आईं... हाय क्या लग रहीं थी वो! पीली साडी .... माँग में सिन्दूर.... होठों पे लाली... उँगलियों में लाल नेल पोलिश... पायल की छम-छम आवाज...और सर पे पल्लू.... हाय आज तो भौजी ने क़त्ल कर दिया था मेरा!!!! सच में इतनी सुन्दर लग रहीं थी वो| वो मेरे पास आके खड़ी हो गईं;

भौजी: ऐसे क्या देख रहे हो आप?

मैं: कुछ नहीं.... बस ऐसे ही आपकी सुंदरता को निहार रहा था| कसम से आज आप कहर ढा रहे हो|

भौजी: आप भी ना... चलो जल्दी चलो आके मुझे वापस चुलाह-चौक सम्भालना है| आपकी रसिका भाभी तो सुबह से ही कहीं गयब हैं|

रास्ते भर मेरे पेट में तितलियाँ उड़ती रहीं| ऊपर से भौजी ने डेढ़ हाथ का घूँघट काढ़ा हुआ था| हम स्कूल पहुंचे, वो स्कूल कुछ बड़ा नहीं था बस प्राइमरी स्कूल जैसा था... तीन कमरे और कुछ नहीं... ना ही छात्रों के बैठने के लिए बेन्चें ना कुर्सी ... ना टेबल... पंखे तो भूल ही जाओ| केवल एक ही कुर्सी थी जिस पे मास्टर साहब बैठ के पढ़ा रहे थे| मैं पहली कक्षा में घुसा और हेडमास्टर साहब के लिए पूछा तो मास्टर जी ने कहा की वो आखरी वाले कमरे में हैं| हम उस कमरे की ओर बढ़ लिए... नेहा मेरी गोद में थी ओर भौजी ठीक मेरे बराबर में चल रहीं थी| कमरे के बहार पहुँच के मैंने खट-खटया.. मास्टर जी ने हमें अंदर बुलाया| अंदर एक मेज था जो मजबूत नहीं लग रहा था, और बेंत की तीन कुर्सियां|

हम उन्हीं कुर्सियों पे बैठ गए और बातों का सिल-सिला शुरू हुआ;

मैं: HELLO SIR !

हेडमास्टर साहब: हेलो ... देखिये मैं आपको पहले ही बता दूँ की मेरी बदली हुए कुछ ही दिन हुए हैं और मैं हिंदी माध्यम से पढ़ा हूँ तो कृपया आप मुझसे हिंदी में ही बात करें|

मैं: जी बेहतर!

हेडमास्टर साहब: तो बताइये मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ? (नेहा की ओर देखते हुए) ओह क्षमा कीजिये.. मैं समझ गया आप अपनी बेटी के दाखिले हेतु आय हैं| ये लीजिये फॉर्म भर दीजिये|

मैं: जी पर पहले मैं कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ? इस स्कूल में केवल दो ही कमरे हैं जिन में अध्यापक पढ़ा रहे हैं? यह स्कूल कितनी कक्षा तक है और क्या ये स्कूल किसी सरकारी स्कूल या कॉलेज से मान्यता प्राप्त है? मतलब जैसे दिल्ली में स्कूल CBSE से मान्यता प्राप्त होते हैं ऐसा कुछ?

हेडमास्टर साहब: जी हमें उत्तर प्रदेश हाई स्कूल बोर्ड से मान्यता प्राप्त है| हमारे स्कूल में केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ाया जाता है... हमें कुछ फंड्स केंद्रीय सरकार से मिलने वाले हैं जिसकी मदद से इस स्कूल का निर्माण कार्य जल्द ही शुरू होगा और फिर ये स्कूल दसवीं कक्षा तक हो जायेगा|

मैं: जी ठीक है पर आप के पास कुछ कागज वगैरह होंगे... ताकि मुझ तसल्ली हो जाये| देखिये बुरा मत मानियेगा परन्तु मैं नहीं चाहता की बच्ची का साल बर्बाद हो.. फिर उसे तीसरी कक्षा के लिए हमें दूसरा स्कूल खोजना पड़े|

हेडमास्टर साहब: जी जर्रूर मुझे कोई आपत्ति नहीं|

और फिर हेडमास्टर साहब ने मुझे कुछ सरकारी दस्तावेज दिखाए| उन्हें देख के कुछ तसल्ली तो हुई.. फिर मैंने फॉर्म भरा और फीस की बात वगैरह की| हेडमास्टर साहब फॉर्म पढ़ने लगे...
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07-16-2017, 10:01 AM,
#39
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
बदलाव के बीज--34

हेडमास्टर साहब: तो मिस्टर चन्दर जी...

मैं: जी माफ़ कीजिये परन्तु मेरा नाम चन्दर नहीं है, मेरा नाम मानु है| (भौजी की ओर इशारा करते हुए) चन्दर इनके पति का नाम है, मैं उनका चचेरा भाई हूँ|

हेडमास्टर साहब: ओह माफ़ कीजिये मुझे लगा आप दोनों पति-पत्नी हैं! खेर आप कितना पढ़े हैं?

मैं: जी मैं बारहवीं कक्षा में हूँ ओर अगले साल CBSE बोर्ड की परीक्षा दूँगा|

हेडमास्टर साहब: वाह! वैसे इस गाँव में लोग बेटियों के पढ़ने पर बहुत काम ध्यान देते हैं| मुझे जानेक ख़ुशी हुई की आप अपनी भतीजी के लिए इतना सोचते हैं| खेर मैं आपका ज्यादा समय नहीं लूंगा... यदि आप कभी फ्री हों तो आइयेगा हम बैठ के कुछ बातें करेंगे|

मैं: जी अवश्य... वैसे मैं पूछना भूल गया, ये स्कूल सुबह कितने बजे खुलता है ओर छुट्टी का समय क्या है|

हेडमास्टर साहब: जी सुबह सात बजे से दोपहर डेढ़ बजे तक|

मैं: और आप कब तक होते हैं यहाँ?

हेडमास्टर साहब: जी दरअसल मैं दूसरे गाँव से यहाँ आता हूँ तो मुझे तीन बजे तक हर हालत में निकलना पड़ता है| तो आप जब भी आएं तीन बजे से पहले आएं तीन बजे के बाद यहाँ कोई नहीं होता|

मेरा मकसद समय पूछने के पीछे कुछ और ही था| खेर हम घर आगये और मैंने ये खुश खबरी सब को सुना दी| सब खुश थे और नेहा तो सबसे ज्यादा खुश थी!!! पर नाजाने क्यों भौजी का मुंह बना हुआ था| मैं सबके सामने तो कारन नहीं पूछ सकता था... इसलिए सिवाए इन्तेजार करने के और कोई चारा नही था| दोपहर का भोजन तैयार था.. कुछ ही देर में रसिका भाभी भी आ गई, मेरे पास आके पूछने लगी;

रसिका भाभी: मानु... तुमने माधुरी से कल ऐसा क्या कह दिया की उस में इतना बदलाव आ गया? कल से उसने खाना-पीना फिर से शुरू कर दिया!!!

मैं: मैंने कुछ ख़ास नहीं कहा... बस उसे समझाया की वो ये पागलपन छोड़ दे| और मुझे जानके अच्छा लगा की वो फिर से खाना-पीना शुरू कर रही है|

बस इतना कह के मैं पलट के चल दिया... असल में मेरी फ़ट गई थी| अब मुझे जल्दी से जल्दी कुछ सोचना था| समय फिसलता जा रहा था.... समय... और बहाना... जगह का इन्तेजाम तो लघभग हो ही गया था|

इतना सोचना तो मुझे भौजी को सुहागरात वाला सरप्राइज देते हुए भी नहीं पड़ा था| ऊपर से भौजी का उदास मुंह देख के मन और दुःखी था... मैं शाम का इन्तेजार करने लगा... जब शाम को भौजी अपने घर की ओर जा रहीं थीं तब मैं चुप-चाप उनके घर के भीतर पहुँचा| अंदर भौजी चारपाई पे बैठी सर नीचे झुकाये सुबक रहीं थी|

मैं: क्या हुआ अब? जब से हम स्कूल से बात कर के लौटे हैं तब से आप उदास हो? क्या आप नहीं चाहते नेहा स्कूल जाए?

भौजी: नहीं... (सुबकते हुए) ऐसी बात नहीं है| वो... हेडमास्टर साहब ने समझा की आप ओर मैं पति-पत्नी हैं तो उस बात को लेके मैं...

मैं: तो क्या हुआ? उन्हें गलत फैमि ही तो हुई थी|

भौजी: इसी बात का तो दुःख है.. काश मैं आपकी पत्नी होती! काश हमारी शादी असल में हुई होती!

मैं: AWW मेरा बच्चा| (गले लगते हुए) !!! मैंने तो आपको पहले ही कहा था की भाग चलो मेरे साथ| पर आप ही नहीं माने ...

भौजी थोड़ा मुस्कुराई .. और मुझसे लिपटी रहीं... मैं उनकी पीठ सहलाता रहा| मन कर रहा था की उन्हें सबकुछ बता दूँ पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था|
भौजी: आप कुछ कहना चाहते हो?

मैं: नहीं तो

भौजी: आपकी दिल की धड़कनें बहुत तेज होती जा रही हैं|

मैं: अम्म ... हाँ एक बात है|

भौजी: क्या बात है बोलो...

मैंने आँखें बंद करते हुए, एक सांस में भौजी को सारी बात बता दी| मेरी बात सुन के भौजी स्तब्ध थी...

भौजी: तो आप उसकी बात मान रहे हो?

मैं: मेरे पास कोई और चारा नहीं.. अगर उसे कुछ हो गया तो मैं कभी भी इस इल्जाम के साथ जी नहीं पाउँगा| (मैंने भौजी की कोख पे हाथ रखा) मैं अपने होने वाले बच्चे की कसम खता हूँ मेरा इसमें कोई स्वार्थ नहीं!

भौजी कुछ नहीं बोली और चुप-चाप बाहर चली गईं और मैं उन्हें नहीं रोक पाया| मैं भी बाहर आ गया...

मुझे रसिका भाभी नजर आईं, मैं ऊके पास आया और उनसे हमारे बड़े घर के पीछे बने घर के बारे में पूछने लगा| उन्होंने बताया की वो घर पिताजी के मित्र चूॉबेय जी का है| वो अपने परिवार सहित अम्बाला में रहते हैं| सर्दियों में यहाँ आते हैं... बातों बातों में मैंने पता लगाया की उनके घर की चाबी हमारे पास है| क्योंकि उनके आने से पहले घरवाले घर की सफाई करवा देते हैं| मैंने रसिका भाभी से कहा की मेरा वो घर देखने की इच्छा है... किसी तरह से उन्हें मना के उन्हें साथ ले गया| घर का ताला खोला तो वो तो मकड़ी के जालों का घर निकला| तभी वहां से एक छिपकली निकल के भागी, जिसे देख रसिका भाभी एक दम से दर गईं और मुझसे चिपक गईं|

मैं: भाभी गई छिपकली|

रसिका भाभी: हाय राम इसीलिए मैं यहाँ आने से मना कर रही थी|

मैंने गौर से घर का जायजा लिया| स्कूल से मुझे ये जगह अच्छी लग रही थी| घर की दीवारें कुछ दस-बारह फुट ऊंचीं थी... आँगन में एक चारपाई थी जिसपे बहुत धुल-मिटटी जमी हुई थी| मैं बाहर आया और घर को चारों ओर से देखने लगा| दरअसल मुझे EXIT PLAN की भी तैयारी करनी थी| आपात्कालीन स्थिति में मुझे भागने का भी इन्तेजाम करना था| अब मैं कोई कूदने मैं एक्सपर्ट तो नहीं था पर फिर भी मजबूरी में कुछ भी कर सकता था| जगह का जायजा लने के बाद आप ये तो पक्का था की ये ही सबसे अच्छी जगह है ... स्कूल में फिर भी खतरा था क्योंकि वो सड़क के किनारे था ओर तीन बजे के बाद वहाँ ताला लगा होता| अब बात थी की चाबी कैसे चुराऊँ? इसके लिए मुझे देखना था की चाबी कहाँ रखी जाती है, ताकि मैं वहाँ से समय आने पे चाबी उठा सकूँ| चाबी रसिका बभभी के कमरे में रखी जाती थी.. तो मेरा काम कुछ तो आसान था| मैंने वो जगह देख ली जहाँ चाबी टांगी जाती थी| अब सबसे जर्रुरी था माधुरी से दिन तय करना... मैं चाहता था की ये काम जल्द से जल्द खत्म हो! पर मैं अपना ये उतावलापन माधुरी को नहीं दिखाना चाहता था ... वरना वो सोचती की मैं उससे प्यार करता हूँ|

उससे बात करने के लिए मुझे ज्यादा इन्तेजार नहीं करना पड़ा क्योंकि मुझसे ज्यादा उसे जल्दी थी| वो शाम को छः बजे मुझे स्कूल के पास दिखाई दी| मैं चुप-चाप स्कूल की ओर चल दिया|

माधुरी: मैंने आपकी पहली शर्त पूरी कर दी.. मैं शारीरिक रूप से स्वस्थ हो गई हूँ| आप खुद ही देख लो... तो आप कब कर रहे हो मेरी इच्छा पूरी?

मैं सच में बड़ा क़तरा रहा था कुछ भी कहने से .. इसलिए मैंने सोचा की एक आखरी बार कोशिश करने में क्या जाता है|

मैं: देखो... मैंने बहुत सोचा पर मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, मुझे माफ़ कर दो!!!

माधुरी: मुझे पता था की आप कुछ ऐसा ही कहेंगे इसलिए मैं अपने साथ ये लाई हूँ| (उसने मुझे एक चाक़ू दिखाया) मैं आपके सामने अभी आत्महत्या कर लुंगी|

अब मेरी फ़ट गई... इस वक्त सिर्फ मैं ही इसके पास हूँ अगर इसे कुछ हो गया तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा|

मैं: रुको.. रुको.. रुको... मैं मजाक कर रहा था|

माधुरी: नहीं ... मैं जानती हूँ आप मजाक नहीं कर रहे थे| (माधुरी ने अब चाक़ू अपनी पेट की तरफ मोड़ रखा था) आप मुझे धोका देने वाले हो....

मैं: ठीक है.... कल... कल करेंगे ... अब प्लीज इसे फेंक दो|

माधुरी: (चाक़ू फेंकते हुए) कल कब?

मैं: शाम को चार बजे, तुम मुझे बड़े घर के पीछे मिलना|

माधुरी: थैंक यू !!!

मैं: (मैंने एक लम्बी सांस ली और उसके हाथ से चाक़ू छीन लिया और उसे दूर फेंक दिया) दुबारा कभी भी ऐसी हरकत मत करना !

माधुरी: सॉरी आइन्दा ऐसी गलती कभी नहीं करुँगी|

मैं वहां से चल दिया ... घर लौटने के बाद भौजी से मेरी कोई बात नहीं हुई| वो तो जैसे मेरे आस-पास भी नहीं भटक रहीं थी... बस एक नेहा थी जिससे मेरा मन कुछ शांत था|

ऐसा इंसान जिसे आप दिलों जान से चाहते हो, वो आपसे बात करना बंद कर दे तो क्या गुजरती है ये मुझे उस दिन पता चला| पर इसमें उनका कोई दोष नहीं था... दोषी तो मैं था! रात जैसे-तैसे कटी... सुबह हुई.. वही दिनचर्या... मैं चाहता था की ये समय रुक जाए और घडी में कभी चार बजे ही ना| आज तो मौसम भी जैसे मुझ पे गुस्सा निकालने को तैयार हो... सुबह से काले बदल छाये हुए थे आसमान में भी और शायद मेरे और भौजी के रिश्ते पर भी|

हाँ आज तो नेहा का पहला दिन था तो मैं ही उसे पहले दिन स्कूल छोड़ने गया .. वो थोड़ा सा रोइ जैसा की हर बच्चा पहलीबार स्कूल जाने पर रोता है पर फिर उसे बहला-फुसला के स्कूल छोड़ ही दिया| दोपहर को उसे स्कूल लेने गया तो वो मुझसे ऐसे लिपट गई जैसे सालों बाद मुझे देखा हो| उसे गोद में लिए मैं घर आया, भोजन का समय हुआ तो मैंने खाने से मन कर दिया और चुप-चाप लेट गया| नेहा मुझे फिर से बुलाने आई पर मैंने उसे प्यार से मना कर दिया|

घडी की सुइयाँ टिक..टिक..टिक...टिक..टिक... करते करते तीन बजे गए| मैं उठा और सबसे पहले रसिका भाभी के कमरे की ओर निकला| किस्मत से वो सो रहीं थीं.. वैसे भी वो इस समय सोती ही थीं| मैंने चुप-चाप चाभी उठाई और खेतों की ओर चला गया| जल्दी से खेत पहुँच मैं वहीँ टहलने लगा ताकि खेत में मौजूद घर वालों को लगे की मैं बोर हो रहा हूँ| इससे पहले कोई कुछ कहे मैं खुद ही बोला की "बहुत बोर हो गया हूँ, मैं जरा नजदीक के गाँव तक टहल के आता हूँ|" किसी ने कुछ नहीं कहा ओर मैं चुप चाप वहां से निकल लिया ओर सीधा बड़े घर के पीछे पहुँच गया| घडी में अभी साढ़े तीन हुए थे... पर ये क्या वहां तो माधुरी पहले से ही खड़ी थी!

मैं: तुम? तुम यहाँ क्या कर रही हो? अभी तो सिर्फ साढ़े तीन हुए हैं?

माधुरी: क्या करूँ जी... सब्र नहीं होता| अब जल्दी से बताओ की कहाँ जाना है?

मैंने इधर-उधर देखा क्योंकि मुझे शक था की कोई हमें एक साथ देख ना ले| फिर मैंने उसे अपने पीछे आने का इशारा किया.... मैंने ताला खोला और अंदर घुस गए, फटाक से मैंने दरवाजा बंद किया ताकि कहीं कोई हमें अंदर घुसते हुए ना देख ले| दिल की धड़कनें तेज थीं... पर मन अब भी नहीं मान रहा था| हाँ दिमाग में एक अजीब से कुलबुली जर्रूर थी क्योंकि आज मैं पहली बार एक कुँवारी लड़की की सील तोड़ने जा रहा था! अंदर अपहुंच के तो जैसे मेरा शरीर सुन्न हो गया... दिमाग और दिल के बीच का कनेक्शन टूट गया| दिमाग और शरीर का तालमेल खत्म हो गया...

माधुरी: आप क्या सोच रहे हो?

मैं: कुछ... कुछ नहीं|

माधुरी: प्लीज अब आप और मत तड़पाओ!

मैं: (झिड़कते हुए) यार... थोड़ा तो सब्र करो|

माधुरी: जबसे आपको बिना टी-शर्ट के देखा है तब से मन बड़ा बेताब है आपको फिर से उसी हालत में देखने को?

मैं: तुमने मुझे बिना कपड़ों के कब देख लिया?

माधुरी: उस दिन जब आप खेतों में काम करके लौटे थे और नहाने गए थे| दरवाजा बंद करना भूल गए थे या जानबूझ के खुला छोड़ा था?

मैंने अपने माथे पे हाथ रख लिया.... शुक्र है की इसने मुझे नंगा नहीं देख लिया|

माधुरी: आज तो मैं आपको पूरा.... (इतना कहके वो हंसने लगी)

मुझे चिंता हुई... कहीं ये भौजी के "Love Bites" ना देख ले! इसलिए मैं अब भी दरवाजे के पास खड़ा था .. मन बेचैन हो रहा था| माधुरी मेरी ओर बढ़ी और मुझे चूमने के लिए अपने पंजों के बल ऊपर उठ के खड़ी हुई पर मैं उसे रोकना चाहता था तो उसके कन्धों पे मेरा हाथ था| उसे तो जैसे कोई फरक ही नहीं पड़ा और उसने अपने होंठ मेरे होंठों से मिला दिए| मैं पूरी कोशिश कर रहा था की मैंने कोई प्रतिक्रिया ना करूँ... और हुआ भी ऐसा ही| वो अपनी भरपूर कोशिश कर रही थी की मेरा मुख अपनी जीभ के "जैक" से खोल पाये पर मैं अपने आपको शांत रखने की कोशिश कर रहा था| जब उसे लगा की मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही तो वो स्वयं ही रूक गई| वो वापस अपने पैरों पे खड़ी हो गई ओर मेरी ओर एक तक-तक़ी लगाए देखती रही| मेर चेहरे पे कोई भाव नहीं थे... आखिर वो मुझसे दूर हुई और मेरी टी-शर्ट उतारने के लिए हाथ आगे बढ़ाये|
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Reply
07-16-2017, 10:01 AM,
#40
RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन
35

मैं: प्लीज .... मत करो!!!

माधुरी: पर क्यों... मैं कब से आपको बिना टी-शर्ट के देखना चाहती हूँ| पहले ही आप मुझसे दूर भाग रहे हैं और अब आप तो मुझे छूने भी नहीं दे रहे?

मैं: देखो मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ... प्लीज ये मत करो| मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर ही रहा हूँ ना ...

माधुरी: आप मेरी इच्छा बड़े रूखे-सूखे तरीके से पूरी कर रहे हैं|

मैं: मेरी शर्त याद है ना? मैंने तुम्हें प्यार नहीं कर सकता... ये सब मैं सिर्फ ओर सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए कर रहा हूँ और तुम्हें जरा भी अंदाजा नहीं है की मुझे पे क्या बीत रही है|

माधुरी: ठीक है मैं आप के साथ जोर-जबरदस्ती तो कर नहीं सकती| (एक लम्बी सांस लेते हुए) ठीक है कम से कम आप मेरी सलवार-कमीज तो उतार दीजिये|

इतना कहके वो दूसरी ओर मुड़ गई और अब मुझे उसकी कमीज उतारनी थी| मैंने कांपते हुए हाथों से उसकी कमीज को पकड़ के सर के ऊपर से उतार दिया| अब उसकी नंगी पीठ मेरी ओर थी.... उसने अपने स्तन अपने हाथों से ढके हुए थे| वो इसी तरह मेरी ओर मुड़ी... मैंने देखा की उसके गाल बिलकुल लाल हो चुके हैं ओर वो नजरें झुकाये खड़ी है| उसने धीरे-धीरे से अपने हाथ अपने स्तन पर से हटाये.... मेरी सांसें तेज हो चुकी थीं| अगर इस समय माधुरी की जगह भौजी होती तो मैं कब का उनसे लिपट जाता पर ....

धीरे-धीरे उसने अपने स्तनों पर से हाथ हटाया ... हाय! ऐसा लग रहा था जैसे तोतापरी आम| बस मैं उनका रसपान नहीं कर सकता था! उसने धीरे-धीरे अपनी नजरें उठाएं और शायद वो ये उम्मीद कर रही थी की मैं उसे स्पर्श करूँगा पर अब तक मैंने खुद को जैसी-तैसे कर के रोका हुआ था| उसने मेरे हाथों को छुआ और अपने स्तनों पर ले गई| इससे पहले की मेरे हाथों का उसके स्तनों से स्पर्श होता मैंने उसे रोक दिया|

माधुरी बोली; "आप मेरी जान ले के रहोगे| आपने अभी तक मुझे स्पर्श भी नहीं किया तो ना जाने आगे आप कैसी घास काटोगे|" मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और आँखें फेर ली| अब ना जाने उसे क्या सूझी वो नीचे बैठ गई और मेरा पाजामा नीचे खींच दिया और उसके बाद मेरा कच्छा भी खींच के बिलकुल नीचे कर दिया| बिना कुछ सोचे-समझे उसने गप्प से लंड को अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी| एक बात तो थी उसे लंड चूसना बिलकुल नहीं आता था... वो बिलकुल नौसिखियों की तरह पेश आ रही थी! यहाँ तक की भौजी ने भी पहली बार में ऐसी चुसाई की थी की लग रहा था की वो मेरी आत्मा को मेरे लंड के अंदर से सुड़क जाएंगी| और इधर माधुरी तो जैसे तैसे लंड को बस मुंह में भर रही थी... मैंने उसे रोका और कंधे से पकड़ के उठाया| मैंने आँगन में बिछी चारपाई की ओर इशारा किया और हम चारपाई के पास पहुँच के रूक गए|

इधर बहार बिलकुल अँधेरा छा गया था ... तकरीबन शाम के पोन चार या चार बजे होंगे और ऐसा लग रहा था जैसे रात हो गई| शायद आसमान भी मुझसे नाराज था! मैंने चारपाई पे उसे लेटने को कहा और वो पीठ के बल लेट गई ... उसने अब भी सलवार पहनी हुई थी, इसलिए मैंने पहले उसकी सलवार का नाड़ा खोला और उसे खींचते हुए नीचे उतार दिया| उसने नीचे पैंटी नहीं पहनी थी... उसकी चूत (क्षमा कीजिये मित्रों मैं आज पहली बार मैं "चूत" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ| दरअसल माधुरी के साथ मेरे सम्भोग को मैं अब भी एक बुरा हादसा मानता हूँ पर आप सब की रूचि देखते हुए मैं इसका इतना डिटेल में वर्णन कर रहा हूँ|)

उसकी चूत बिलकुल साफ़ थी... एक दम गोरी-गोरी थी एक दम मुलायम लग रही थी| देख के ही लगता था की उसने आज तक कभी भी सम्भोग नहीं किया| मैंने अपना पजामा और कच्छा उतारा और उसके ऊपर आ गया|मैं: देखो पहली बार बहुत दर्द होगा|

माधुरी कुछ सहम सी गई और हाँ में अपनी अनुमति दी| मैंने अपने लंड पे थोड़ा और थूक लगाया और उसकी चूत के मुहाने पे रखा| मैं नहीं चाहता था की उसे ज्यादा दर्द हो इसलिए मैंने धीरे से अपने लें को उसकी चूत पे दबाना शुरू किया| जैसे-जैसे मेरा लंड का दबाव उसकी चूत पर पद रहा था वो अपने शरीर को कमान की तरह ऐंठ रही थी| उसने अपने होठों को दाँतों तले दबा लिया पर फिर भी उसकी सिस्कारियां फुट निकली; "स्स्स्स्स्स्स अह्ह्ह्हह्ह माँ ...ह्म्म्म्म्म"

उसकी सिसकारी सुन मैं वहीँ रूक गया... अभी तक लंड का सुपाड़ा भी पूरी तरह से अंदर नहीं गया था और उसका ये हाल था| धीरे-धीरे उसका शरीर कुछ सामान्य हुआ और वो पुनः अपनी पीठ के बल लेट गई| मैंने उससे पूछा; "अभी तो मैं अंदर भी नहीं गया और तुम्हारा दर्द से बुरा हाल है| मेरी बायत मानो तो मत करो वरना पूरा अंदर जाने पे तुम दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाओगी?" तो उसका जवाब ये था; "आप मेरी दर्द की फ़िक्र मत करिये, आप बस एक झटके में इसे अंदर कर दीजिये|" उसकी उत्सुकता तो हदें पार कर रही थी ... मैंने फिर भी उसे आगाह करने के लिए चेतावनी दी; "देखो अगर मैंने ऐसा किया तो तुम्हारी चूत फैट जाएगी... बहुत खून निकलेगा और ..." इससे पहले की मैं कुछ कह पाटा उसने बात काटते हुए कहा; "अब कुछ मत सोचिये.. मैं सब सह लुंगी प्लीज मुझे और मत तड़पाइये|"

अब मैं इसके आगे क्या कहता... मन तो कर रहा था की एक ही झटके में आर-पार कर दूँ और इसे इसी हालत में रोता-बिलखता छोड़ दूँ| पर पता नहीं क्यों मन में कहीं न कहीं अच्छाई मुझे ऐसा करने से रोक रही थी| मैंने लंड को बहार खींचा और एक हल्का सा झटका मारा.. उसकी चूत अंदर से पनिया गई थी और लंड चीरता हुआ आधा घुस गया| उसकी दर्द के मारे आँखें एक दम से खुल गई.. ऐसा लगा मानो बाहर आ जाएँगी| वो एक दम से मुझसे लिपट गई और कराहने लगी; "हाय .... अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह माआआअर अह्ह्ह्हह्ह अन्न्न्न्न" वो मुझसे इतना जोर से लिपटी की मुझे उसके दिल की धड़कनें महसूस होने लगीं थी| माथे पे आया पसीना बाह के मेरी टी-शर्ट पे गिरा| वो जोर-जोर से हांफने लगी थी और इधर मेरा लंड उसकी चूत में सांस लेने की कोशिश कर रहा था| मैं चाह रहा था की जल्द स्व जल्द ये काम खत्म हो पर उसकी दर्द भरी कराहों ने मेरी गति रोक दी थी|

करीब दस मिनट लगे उसे वापस सामान्य होने में.. और जैसे ही मैंने अपने लंड को हिलाने की कोशिश की तो उसने मेरी टी-शर्ट का कॉलर पकड़ के मुझे रोक दिया और अपने ऊपर खींच लिया| मैंने सीधा उसके होंठों पे पड़ा और उसने अपने पैरों को मेरी कमर पे रख के लॉक कर दिया| अब उसने मेरे होठों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया और मैं भी अपने आप को रोक पाने में विफल हो रहा था| अँधेरा छा रहा था और कुछ ही समय में अँधेरा कूप हो गया| ऐसा लगा जैसे आसमान मुझसे नाराज है और अब कुछ ही देर में बरसेगा| मन ही मन मैं आसमान की तुलना भौजी से करने लगा और मुझे माधुरी पर और भी गुस्सा आने लगा| आखिर उसी की वजह से भौजी की आँखों में आंसू आये थे! मैंने धीरे-धीरे लंड को बहार खींचा और अबकी बार जोर से अंदर पेल दिया! उसकी चींखें निकली; "आआअक़आ अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह" अब मैं बस उसपे अपनी खुंदक निकालना चाहता था और मैंने जोर-जोर से शॉट लगाना शुरू कर दिया| इस ताकतवर हमले से तो वो लघ-भग बेसुध होने लगी| पर दर्द के कारन वो अब भी होश में लग रही थी उसकी टांगों का लॉक जो मेरी कमर के इर्द-गिर्द था वो खुल गया था|

दस मिनट बाद उसकी चूत ने भी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी थी| अब वो भी नीचे से रह-रह के झटके दे रही थी| तभी अचानक वो एक बार मुझसे फिर लिपट गई और फिर से अपनी टांगों के LOCK से मुझे जकड लिया और जल्दी बाजी में उसने मेरी टी-शर्ट उतार फेंकी| अब उसका नंगा जिस्म मेरे नंगे जिस्म से एक दम से चिपका हुआ था| मुझे उसके तोतापरी स्तन अपनी छाती पे चुभते हुए महसूस हो रहे थे ... उसके निप्पल बिलकुल सख्त हो चुके थे! वो मेरे कान को अपने मुंह में ले के चूसने लगी| वो शुक्र था की अँधेरा हो गया जिसके कारन उसे मेरी छाती बने LOVE BITES नहीं दिखे! वो झड़ चुकी थी !!! अंदर से उसकी चूत बिलकुल गीली थी.... और अब आसानी से मेरा लंड अंदर और बहार आ जा सकता था| शॉट तेज होते गए और अब मैं भी झड़ने को था| अब भी मुझे अपने ऊपर काबू था और मैंने खुद को उसके चुंगल से छुड़ाया और लंड बहार निकाल के उसके स्तनों पे वीर्य की धार छोड़ दी| गहरी सांस लेते हुए मैं झट से खड़ा हुआ क्योंकि मैं और समय नहीं बर्बाद करना चाहता था| घडी में देखा तो करीब छः बज रहे थे| इतनी जल्दी समय कैसे बीता समझ नहीं आया| तभी अचानक से झड़-झड़ करके पानी बरसने लगा| मानो ये सब देख के किसी के आंसूं गिरने लगे, और मुझे ग्लानि महसूस होने लगी|

माधुरी भी उठ के बैठ गई और बारिश इ बूंदों से अपने को साफ़ करने लगी| अँधेरा बढ़ने लगा था और अब हमें वहां से निकलना था| मैंने माधुरी से कहा;

"जल्दी से कपडे पहनो हमें निकलना होगा|"

माधुरी: जी ....

इसके आगे वो कुछ नहीं बोली, शायद बोलने की हालत में भी नहीं थी| हमने कपडे पहने और बहार निकल गए| मैंने माधुरी से और कोई बात नहीं की और चुप-चाप ताला लगा के निकल आया ... मैंने पीछे मुड़ के भी नहीं देखा| मैं जानबूझ के लम्बा चक्कर लगा के स्कूल की तरफ से घर आया... बारिश होने के कारन मैं पूरा भीग चूका था| घर पहुंचा तो अजय भैया छाता ले के दौड़े आये;

अजय भैया: अरे मानु भैया आप कहाँ गए थे?

मैं: यहीं टहलते-टहलते आगे निकल गया वापस आते-आते बारिश शुरू हो गई तो स्कूल के पास रूक गया| पर बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, मुझे लगा आप लोग परेशान ना हो तो ऐसे ही भीगता चला आया|

अजय भैया: चलो जल्दी से कपडे बदल लो नहीं तो बुखार हो जायेगा|

अजय भैया ने मुझे बड़े घर तक छाते के नीचे लिफ्ट दी| घर पहुँच के मैंने कपडे बदले ... पर अब भी मुझे अपने जिस्म से माधुरी के जिस्म की महक आ रही थी| मैं नहाना चाहता था.. इसलिए मैं स्नानघर गया और वहीँ नहाना चालु कर दिया| स्नानघर ऊपर से खुला था मतलब एक तरह से मैं बारिश के पानी से ही नह रहा था| साबुन रगड़-रगड़ के नहाया ... मैंने सोचा की साबुन की खुशबु से माधुरी के देह (शरीर) की खुशबु निकल ही जाएगी|जैसे ही नहाना समाप्त हुआ मैंने तुरंत कपडे बदले पर अब तक देर हो चुकी थी... सर्दी छाती में बैठ चुकी थी क्योंकि मुझे छींकें आना शुरू हो गई थीं| कंप-काँपि शुरू हो गई और मैं एक कमरे में बिस्तर पे लेट गया| पास ही कम्बल टांगा हुआ था उसे ले के उसकी गर्मी में मैं सो गया| करीब एक घंट बाद अजय भैया मुझे ढूंढते हुए आये और मुझे जगाया ... बारिश थम चुकी थी और मैं उनके साथ रसोई घर के पास छप्पर के नीचे आके बैठ गया| दरअसल भोजन तैयार था... और मुझे लगा जैसे भौजी जानती हों की मैं कहाँ था और किस के साथ था| शायद यही कारन था की वो मुझसे बात नहीं कर रही थी और अब तो नेहा को भी मेरे पास नहीं आने दे रहीं थी|

मन ख़राब हो गया और मैं वहां से वापस बड़े घर की ओर चल पड़ा| पीछे से पिताजी ने मुझे भोजन के लिए पुकारा पर मैंने झूठ बोल दिया की पेट ख़राब है| मैं वापस आके अपने कमरे (जिसमें हमारा सामान पड़ा था) में कम्बल ओढ़ के सो गया| उसके बाद मुझे होश नहीं था.... जब सुबह आँख खुली तो माँ मुझे जगाने आई थी ओर परेशान लग रही थी|

बड़ी मुश्किल से मेरी आँख खुली;

मैं: क्या हुआ?

माँ: तेरा बदन बुखार से टप रहा है ओर तू पूछ रह है की क्या हुआ? कल तू बारिश में भीग गया था इसीलिए ये हुआ... ओर तेरी आवाज इतनी भारी-भारी हो गई है| हे राम!!! .. रुक मैं अभी तेरे पिताजी को बताती हूँ|

मैं वापस सो गया, उसके बाद जब मैं उठा तो पिताजी मेरे पास बैठे थे;

पिताजी: तो लाड-साहब ले लिए पहली बारिश का मजा ? पड़ गए ना बीमार? चलो डॉक्टर के|

मैं: नहीं पिताजी बस थोड़ा सा बुखार ही है... क्रोसिन लूंगा ठीक हो जाऊँगा|

पिताजी: पर क्रोसिन तो ख़त्म हो गई... मैं अभी बाजार से ले के आता हूँ| तू तब तक आराम कर!

पिताजी चले गए ओर मैं वापस कम्बल सर तक ओढ़ के सो गया| 

जब नींद खुली तो लगा जैसे कोई सुबक रहा हो... मैंने कम्बल हटाया तो देखा सामने भौजी बैठी हैं| मैं उठ के बैठना चाहा तो वो चुप-चाप उठ के चलीं गई| एक तो कल से मैंने कुछ खाया नहीं था ओर ऊपर से मजदूरी भी करनी पड़ी (माधुरी के साथ)| खेर मैं उन्हें कुछ नहीं कह सकता था इसलिए मैं चुप-चाप लेट गया| भौजी का इस तरह से मुंह फेर के चले जाना अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था| मैं उनसे एक आखरी बार बात करना चाहता था .... मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता था बस उनसे माफ़ी माँगना चाहता था| मैं जैसे-तैसे हिम्मत बटोर के उठ के बैठा ... कल से खाना नहीं खाया था और ऊपर से बुखार ने मुझे कमजोर कर दिया था| तभी भौजी फिर से मेरे सामने आ गईं और इस बार उनके हाथ में दूध का गिलास था| उन्होंने वो गिलास टेबल पे रख दिया और पीछे होके खड़ी हो गईं.... क्योंकि टेबल चारपाई से कोई दो कदम की दूरी पे था तो मैं उठ के खड़ा हुआ और टेबल की ओर बढ़ा| मुझे अपने सामने खड़ा देख उनकी आँखों में आंसूं छलक आये ओर वो मुड़ के जाने लगीं| मैंने उनके कंधे पे हाथ रख के उन्हें रोलना चाहा तो उन्होंने बिना मूड ही मुझे जवाब दिया; "मुझे मत छुओ !!!" उनके मुंह से ये शब्द सुन के मैं टूट गया ओर वापस चारपाई पे जाके दूसरी ओर मुंह करके लेट गया|

करीब एक घंटे बाद भौजी दुबारा आईं...

भौजी: आपने दूध नहीं पिया?

मैं: नहीं

भौजी: क्यों?

मैं: वो इंसान जिससे मैं इतना प्यार करता हूँ वो मेरी बात ही ना सुन्ना चाहता हो तो मैं "जी" के क्या करूँ?

भौजी: ठीक है... मैं आपकी बात सुनने को तैयार हूँ पर उसके बाद आपको दूध पीना होगा|

मैं उठ के दिवार का सहारा लेटे हुए बैठ गया और अब भी अपने आप को कम्बल में छुपाये हुए था|

मैं: मैं जानता हूँ की जो मैंने किया वो गलत था... पर मैं मजबूर था! जिस हालत में मैंने माधुरी को देखा था उस हालत में आप देखती तो शायद आप मुझसे इतना नाराज नहीं होतीं| मानता हूँ जो मैंने किया वो बहुत गलत है ... उसकी कोई माफ़ी नहीं है पर मैं अपने सर पे किसी की मौत का कारन बनने का इल्जाम नहीं सह सकता| और आपकी कसम कल जो भी कुछ हुआ मैंने उसे रत्ती भर भी पसंद नहीं किया... सब मजबूरी में और हर दम आपका ही ख़याल आ रहा था मन में| मैंने कुछ भी दिल से नहीं किया... सच! प्लीज मेरी बात का यकीन करो और मुझे माफ़ कर दो!!!

भौजी: ठीक है.. मैंने आपकी बात सुन ली अब आप दूध पी लो|
(इतना कह के भौजी उठ के दूध का गिलास उठाने लगीं)

मैं: पहले आप जवाब तो दो?

भौजी: मुझे सोचना होगा...

मैं: फिर जवाब रहने दो... मेरी सब बात सुनने के बाद भी अगर आपको सोच के जवाब देना है तो जवाब मैं जानता हूँ|
(इतना कह के मैं फिर से लेट गया| पर भौजी नहीं मानी... और गिलास ले के मुझे उठाने के लिए उन्होंने सर से कम्बल खींच लिया|)

भौजी: आपको क्या लगता है की इस तरह अनशन करने से मैं आपको माफ़ कर दूंगी? आपमें और आपके भैया में सिर्फ इतना फर्क है की उन्होंने मेरी पीठ पे छुरा मार तो आपने सामने से बता के! अब चलो और ये दूध पियो|

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के मुझे उठाने की कोशिश की| तभी उनको पता चला की बुखार और भी बढ़ चूका है|
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