kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
08-17-2018, 02:46 PM,
#91
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--26

गतान्क से आगे…………………………………..

मेने उन रात की लड़ाई के निशानो को ऐसे ही छोड़ दिया और सम्हाल के बस आँचल ठीक से टक कर लिया. ननदो के आने का टाइम भी हो रहा था.

जैसे मैं बाहर निकली तैयार होके दरवाजे पे खाट खाट हुई. आ गयी थी वो...

जब मेने दरवाजा खोला तो आज गुड्डी और रजनी थी. गुड्डी एक छोटी सी फ्रॉक मे और रजनी एक टाइट टॉप और जीन्स मे. मैं धीमे धीमे चल रही थी और वो दोनो जान बुझ के लगता है तेज. रजनी रुकी और मेरा हाथ अपने कंधे पे रख के बोली,


"भाभी, लगता है आप को चलने मे तकलीफ़ हो रही है, कही चोट लग गयी क्या, आप मेरा सहारा ले लीजिए."

"अच्छा तो ये गौरैया भी चोच खोलने लगी." उसके कंधे पे रखे हाथ को मेने थोड़ा और नीचे कर, उसके छोटे छोटे उभारो को हल्के से टिप के पूछा,

"क्यो कल जीजू ने सिर्फ़ यहाँ सहलाया था कि दबाया भी था." ये कह के मेने कस के उस के किशोर, उभरते हुए जोबन दबा दिए.

"अरे भाभी जीजू ने छुआ भी था और बहुत हल्के से दबाया भी था लेकिन आपकी तरह नही. ये तो लगता है रात भर भैया से जैसा अपने दब्वाया है, उसी तरह से"

तब तक अंजलि दिखी. उसके हाथ मे 'वो गिफ्ट पॅक था' जो मेरे नेंदोई और ननदो ने कल रात दिया था.

"ये भाभी कल नीचे ही रह गया था, आपके कमरे मे छोड़ के आती हू. कही इसके बिना आपका कोई काम रुका तो नही." वो हंस के बोली और कहा, आप लोग रुकिये, मैं अभी आती हू.

"अरे मेरा तो कोई काम नही रुका, हाँ तुम्हे किसी काम के लिए इस्तेमाल करना हो तो करवा लेना. और हाँ ज़रा सम्हाल के जाना. कही मेरे धोखे मे तुम्ही को ना पकड़ ले वो और, भरतपुर लूट जाए."

अब मेरी भी धड़क खुल गयी थी. गुड्डी चुप चाप हम लोगो की बाते सुन रही थी और मुस्करा रही थी. जब अंजलि लौट के आई तो मैं ध्यान से उसके टॉप और स्कर्ट की घूर के देख रही थी. मेने हल्के से पूछा " क्यो, कही कुछ गड़बड़ तो नही हुआ."

"अरे भाभी आप ने सारा रस चूस लिया. वो बेचारे थके मम्दे बैठे है" हंस के वो बोली.

"च च मिस्टेक हो गया, आगे से ध्यान रखूँगी. कल से ही थोड़ा सा रस तुम्हारे लिए छोड़ दूँगी" मेने ठिठोली की.

पर वो दोनो और आज तो रजनी के भी पर निकल रहे थे. मेरी साड़ी ठीक करने के बहाने, उन्होने मेरा आँचल लुढ़का दिया, और फिर तो मेरे लो लो कट ब्लाउस से, न सिर्फ़ मेरी गोलाइयाँ बल्कि, गहरे निशान..और फिर तो उन दोनो को मौका मिल गया.

"अरे भाभी, आज तो और ज़्यादा मच्छर ने काटा है, लगता है उसे आप का खून बहुत पसंद आ गया है.' " अरे मच्छर बेचारे की क्या ग़लती, खाने खेलने की चीज़ो को ढक के रखना चाहिए.

"कहीं और तो नहीं..कच कचा के काटा है" रजनी बोली.

"मुझे लगता है जाँघो के आस पास भी तभी चलने मे तकलीफ़ हो रही है." अंजलि ने जोड़ा.

तब तक हम लोग बरांडे मे पहुँच गये थे जहाँ मेरी सास और बाकी औरते बैठी थी.

मेने झुक कर सास के फिर बाकी औरतो के पैर छुए.

ज़्यादातर मेहमान चले गये थे. सिर्फ़ घर के या बहुत क्लोज़ रिश्तेदार बचे थे,

इसलिए माहौल भी आज ज़्यादा खुला था.


और मेरी सास भी 'मूड मे' थी. पहले तो उन्होने आशीष दी और फिर अर्थ पूर्ण ढंग से पूछा,

"क्यो लगता है बहू, तुमको आज भी रात भर नींद नही आई, तेरी आँखे" मैं क्या बोलती चुप रही. 'इनकी' मौसी मेरे चेहरे पे हाथ फेरते हुए कहा,

"दो दिन मे चेहरा पीला पड़ गया है लगता है बहुत मेहनत पड़ रही है." तब तक मेरी ननद ने घूँघट ठीक करने के बहाने, मेरा आँचल फिर से ढलका दिया और अब मेरी सास देख मेरी ओर रही थी लेकिन उनकी निगाहे एक दम वही " अरे तुम रात मे टांगे फैला के आराम से सो पाती हो कि नही.कोई तुम्हे रात मे तंग तो नही करता." वो बोली " अरे सोने का तो पता नही पर टांगे ज़रूर फैली रहती है" एक ननद ने छेड़ा.

"अरे सुनो तुम अपनी देवरानी के सोने का इंतज़ाम कही और करो. बिचारी कितनी रात ऐसे जागेगी." सासू जी ने मुस्करा के मेरी जेठानी से कहा.

"अरे नही ऐसी कोई परेशानी मुझे नही है" घबडा के जल्दी से मेने कहा. और सब लोग एक साथ हंस दिए.

"अरे मेरी देवरानी तो सो जाएगी, लेकिन फिर मेरे देवर को कौन लोरी सुनेएगा." जेठानी जी ने मुस्करा के जवाब दिया. तब मेरी एक ननद और रजनी मुझे छेड़ने मे लग गयी.

वो सवाल करती और रजनी मेरी ओर से जवाब देती.

"क्यो बहुत तंग करता है." ननद ने अदा से पूछा " उहूँ" सर दाए से बाए हिला कर रजनी ने मना किया.

"सताता है."

"उँहू..उँहू" रजनी ने फिर मना किया.

"छेड़ता है."

"उँहू..उँहू" रजनी ने फिर वही इशारा किया.

"मज़े करवाता है" ननद ने पूछा.

"हाँ हम" सर उपर नीचे कर के, अब के मूह खोल के खुशी से वो बोली.
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08-17-2018, 02:46 PM,
#92
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
"अरे तो ये नही कहती कि रात भर गपगाप घोंटति है." ननद ने हंस के कहा.सब लोग हँसने लगे और मैं भी अपनी मुस्कराहट नही रोक पाई.

"अरे तो साफ साफ कहो ना कि रात भर चुदवाति हो. इसमे कौन सी शरम" चमेली भाभी चालू हो गई.

"अरे ये आई ही इसी लिए है, इसकी अम्मा ने भेजा ही है, चुद्वाने के लिए , तो इसमे कौन सी बात है." मेरी मौसीया सास बोली. मैं कहना चाहती थी कि गाजे बाजे के साथ गये थे आप लोग लेने आए थे.ऐसे नही आई मैं, लेकिन चुप रही.

"कैसी ननद हो तुम लोग चुप हो, अरे अपनी भौजी से पूछो तो सही. रात कैसे घचा घच चुदाई हुई. कैसा मज़ा आया लंड घोंटने मे, तुम लोग तो मूस भूडुक हो के बैठी हो. भौजी से रात का हाल चाल तो पूछो." अब दुलारी चालू हो गयी. मैं एक उंगली मे आँचल का पल्लू बार बार लपेट रही थी, और घूँघट मे नीचे देख रही थी.

"अरे देखो बिचारी बहू कितनी शरमा रही है." मेरी एक चाचिया सास बोली.

"अरे सरमा नही रही, रात के बारे मे सोच रही है कि कितना मज़ा आया रात की चुदाई मे. " दुलारी फिर बोली.

"अरे मेरी बहू ऐसी नही है जो शरमाये,अरे जिसने की शरम उसके फूटे करम.ये तो उमर ही है मज़ा करने की, खुल के खेलने खाने की." मेरी सास ने मेरा सर सहलाते हुए प्यार से कहा. फिर मेरी ननदो से बोली, अरे ले जाओ बिचारी को कमरे मे थोड़ा आराम वारम करे. ज़रा नाश्ता वाष्ता कराओ."

मैं ज़रा धीमे धीमे सम्हल के, खड़ी हुई. तो अंजलि ने छेड़ा, " क्यो भाभी बहुत दर्द हो रहा है क्या भैया ने बहुत ज़ोर से."

"अरे, रात भर तुम्हारा भाई चढ़ा रहता है और दिन भर तुम लोग तंग करती हो बेचारी को थोड़ी देर तो आराम करने दो बहू को, जाओ बहू जाओ." मेरी सास ने उन सबको लताड़ा.

जैसे ही मैं कमरे मे पहुँची, आराम तो दूर सब एक साथ वहाँ सिर्फ़ लड़किया और बहुए थी, यानी मेरी ननदे और जेठनिया. इसलिए अब जो थोड़ी बहुत झिझक थी वो भी दूर हो गयी. एक ने मेरा घूँघट सरका के मेरा मूह खोल दिया. जब मेने उसे ठीक करने की कोशिश की तो मेरी एक जेठानी ने झिड़क दिया कि अरे अब तुम्हारी सास यहा कोई नही है आराम से बैठो. एक ननद ने छेड़ा, अरे भाभी उपर वाला मूह खोलने की बात हो रही है नीचे वाला नही. दूसरी बोली, अरी चुप वो मूह तो सिर्फ़ भैया के आगे खुलता है. अंजलि ने जोड़ा, अरे वो तो वैसे ही सारी रात खुला रहता है. सारी ननदे मेरे पीछे पड़ी थी कि मैं 'सब हाल' बताऊ'.

जब उन्होने बहुत तंग किया, तो मुझसे नही रहा गया, तो मेने हल्के से वोला,

"अच्छा बताओ क्या बताऊ" अब तो उन लड़कियो की खुशी का ठिकाना नही रहा, एक बोली.

"भाभी सब कुछ, कल रात क्या हुआ,पहली रात क्या हुआ, भैया ने कैसे" मेरे जुड़वा कजरारे नयन उठे, लजाए, सकूचाए और फिर हल्के से बोले.

"पहली रात, आप लोग हम लोगो को छोड़ के चले गये थे. हम लोगो ने दूध पिया,

पान खाया, थोड़ी देर बात की" कुँवारी ननदो को छोड़िए, सारी औरते कान लगा कर सुन रही थी. मेने धीमे धीमे बोलना जारी रखा,

"थोड़ी देर बात करते रहे और फिर हम लोग थके थे. सो गये. सुबह उठे तो"

मेरी बात पूरी होने के पहले ही सब ननदो ने चिल्ल्लाना शुरू कर दिया, झूठ, झूठ,

झूठ. एक ने तो ये भी बोला कि, दूध पीने के बाद भी ..और फिर पान भी. उसी समय मुझे पता चला कि वो पलंग तोड़ पान था और उसके साथ दूध मे भी 'काफ़ी कुछ पड़ा' था. फिर तो सारी ननदो मे एक मुस्काराकर बोली,

"रात मे जब आप सोने गयी थी तो लाल कामदनी चूड़िया पहन रखी थी और जब नीचे आई तो सादी लाल"

"वोव मेने साड़ी से मैंच करने के लिए चेंज" मेने बहाना बनाया.

"और कल रात भर भाभी आप के कमरे से बिछुए और पायल की झनेकार सुनाई दे रही थी." रजनी ने पूछा.

"वोव असल मे रात भरसोते समय मुझे पाँव चलाने की आदत है."

"तो अगर मैं इसके...बारे मे पूछूंगी तो आप कहेंगी कि भैया को नींद मे हाथ चलाने की आदत है." लो काट ब्लाउस से झाँकते मेरे उरोजो पे 'इनके' नखुनो के निशान की ओर इशारा करके अंजलि ने हँसते हुए पूछा."
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08-17-2018, 02:46 PM,
#93
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"वोआप्के भैया ने नाख़ून नही काटे थे ना इसलिए" मैं बोली.

"अच्छा चलिए ये तो आपने कबूला. तो भैया के नाख़ून यहाँ लगे कैसे. आख़िर आप की चोली तो खुली होगी. और फिर उन्होने हाथ से इसे पकड़ा होगा, दबाया होगा तो नाख़ून लगे होंगे. क्यो भाभी बोलिए.."

"और ये होंठो पे,किसी तोते ने काटा क्या.गालो पे ये कैसे निशान होंठ किसी के मेहरबान" रजनी भी बोलने लगी थी. मैं अब खुल के उस चोर की तरह मुस्करा रही थी,

जिसकी चोरी पकड़ी गयी हो.

मेरी जेठानी ने भी कहा अरे बता दो कुछ बिचारी तरस रही है. कुछ ये भी **** जाएँगी. अब उनकी बात तो मैं नही टाल सकती थी. अच्छा बताओ, क्या क्या बताऊ तुम लोग साफ साफ पूछो तो बताउन्गि, मेने कहा " भाभी शुरू से जब घूँघट उठा" रजनी बोली.

"और फिर जब चोली खुली," दूसरी ननद बोली.

"जब लहंगा खुला" ये अंजलि थी.

"जब टांगे उठी..और जांघे फैली" मझली ननद भी आ गयी थी मैदान मे.

"अरे सीधे असली बात पे आओ ना क्या इधर उधर. अरे भौजी, जब चूत फटी, जब चूंची पकड़ के कचकचा के उन्होने लंड पेला तुम्हारी बुर मे, कैसे कैसे चोदा और चूतड़ उठा उठा चुदवाया." अब दुलारी भी और वो तो सीधे खुल के.

मेने सोचा अब मैं बोलने शुरू करू वारना, फिर मेने थोड़ा बहुत जो कुछ था और कुछ अपनी कल्पना से,

"अच्छा ठीक है लेकिन ना कोई बीच मे बोलेगा ना चिढ़ाएगा मुझे" मंजूर है, सब लड़किया एक साथ बोली.

"सबसे पहले उन्होने दरवाजा बंद किया. फिर वो बिस्तर पे आए. मैं सर झुका के बैठी थी."

"फिर" एक ननद बोली.

"उन्होने मेरा घूँघट हल्के से उठाया. मैं ना नुकुर करती रही. शरमाती रही.

शरम से मेने आँखे बंद कर ली."

"फिर " सब ननदे इंतजार कर रही थी. उनकी साँसे रुकी हुई थी.

"उन्होने मेरे गले मे हार पहना दिया और मेने आँखे खोल दी. मैं हर को देख रही थी और उन्होने मेरे कंधे पे हाथ रख दिया. वो मेरे एक दम करीब आ गये थे.

उनके होंठ"

"फिर फिर क्या हुआ भाभी." सब ननदे एक साथ बोल पड़ी.

"फिर .फिर अपने होंठ उन्होने मेरी पलको पे. लाज से मेरी आँखे बंद हो गयी."

कमरे मे पिन ड्रॉप साइलेन्स छा गया.

"फिर थोड़ी देर मे उनेके होंठ मेरे होंठो पे लाज से मेने कहा..कि लाइट बंद कर दीजिए."

"फिर भाभी सिर्फ़ रजनी की आवाज़ सुनाई दी. बाकी सब चुप चाप. सब के सीनो की धड़कन सुनाई दे रही थी. सीने उठ गिर रहे थे और इंतजार कर रहे थे " लाइट बंद हो गयी. एकदम अंधेरा था, उनका एक हाथ मेरे कंधे पे था, होंठ मेरे होंठो पे, मैं बिस्तर पे लेटी वो" सब की साँसे, सीने की धड़कन, उत्तेजना साफ था. मैं भी फिर से उस रात मे लौट गयी " फिरफिर..उनके हाथ मेरी कलाई पे और चरमरा के मेरी चूड़िया आधी रह गयी.

क्रमशः……………………….
शादी सुहागरात और हनीमून--26
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08-17-2018, 02:46 PM,
#94
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शादी सुहागरात और हनीमून--27

गतान्क से आगे…………………………………..

बसबस जब मेरी आँखे खुली तो सुबह हो गयी थी."

कुछ देर तक सब लोग चुप बैठे रहे, खास तौर से मेरी कुँवारी ननदे लग रहा था कि उनके तन मन को कोई मथ रहा है. मेने जेठानी जी को देखा. वो हल्के से मुस्करा रही थी. उन्होने ननदो को छेड़ा,

"क्यो सोच के ही गीली हो गयी क्या"

तब तक मेरी एक जेठानी और एक शादी शुदा ननद सामने आ के बैठ गयी और लड़कियो को थोड़ा पीछे हटा दिया.

"चल हट, हम लोग पूछते है. तुम सबो को क्या मालूम पहली रात का हाल, हम लोग तो गुजर चुके है"और फिर मुझसे कहा कि सुनो हाँ नही मे या एक दो शब्द मे बता देने और हमसे शरमाने की कोई बात नही हम लोग भी तो" और मेरी उन मे से जो जेठानी लगती थी, उन्होने बहुत प्यार से, हल्के से पूछा,

"ये बता कि जब उन्होने अंदर पहली बार पुश किया, अंदर पेला. जब तुम्हे कली से फूल बाना तो उनका हाथ कहाँ था. तेरी पतली कमर पे, या तेरे चूतड़ पे या तेरे जोबन पे या तेरी कलाई पे. अभी तुम कह रही थी ना कि चुदि.."

"मेरी मेरी कलाई पे" थूक गटाकते हुए मेने कहा.

"अरे तो ये कहो ना साफ साफ कि तेरी दोनो कलाई पकड़ के हचक से उसने कुँवारी चूत मे एक धक्के मे लंड पेल दिया.इसमे शरमाने की क्या बात. शादी शुदा, सभी लड़किया औरते जानती है कि क्यो होती है." मेरी उन जेठानी के साथ बैठी, उन शादी शुदा ननद ने कहा.

"अरे ऐसे क्यो बोलती हो. इस बेचारी से पूछो कितना दर्द हुआ होगा जब उस की 17 साल की कुँवारी चूत फटी होगी. अरे ये उन मेरी ननदो की तरह थोड़ी है जो मायके से ही सील तुड़वा के आती है और झूठ मूठ के ऐसा चिल्लाति है जैसे चूत मे कभी उंगली भी ना गयी हो, लंड तो दूर." मेरी जेठानी ने बात सम्हाली.

"अरे चीखी तो ये भी थी बहुत कस के, नीचे तक हम लोगो को सुनाई दिया, क्यो है ना अंजलि." और अंजलि ने इतनी कस के सर हिलाया, कि जैसे वो हमारे कमरे के बाहर ही कान लगाए बैठी रही हो.

"झूठ, झूठ मैं चीख सकती ही नही थी. उन्होने अपने होंठो से मेरे होंठो को सील कर दिया था." मैं बोली.

"सिर्फ़ होंठ पे होंठ रखे थे या तुम सर हिला के उन्हे हटा भी तो सकती थी." प्यार से जेठानी बोली " कैसे हटाती, उन्होने मेरे मूह मे अपनी जीभ भी डाल रखी थी." लेकिन जब तक मेने ये बात कही, मुझे अहसास हुआ कि मैं तो सारी बाते बोल गयी. लेकिन अब कर भी क्या सकती थी.

"अरे फिर तो जब फटी होगी, पहली बार घुसा होगा, तो बहुत दर्द हुआ होगा है ना,

सिर्फ़ सूपड़ा घुसा के रोक दिया था कि एक बार मे ही पूरा लंड पेल के चोदा था." ननद ने पूछा.

"हाँ" मेने अब की सम्हाल के जवाब दिया.

"अरे ठीक तो कह रही है ये. इतना बेरहम थोड़ा ही है वो. अच्छा ये बताओ, पहले सीधे तुम्हारी चूत मे लंड ही पेल दिया था या पहले चूत मे उंगली डाल के प्यार से वैसलीन लगाई थी. जो प्यार करता है वो इतना तो ध्यान रखता ही है. एक उंगली डाल के लगाई थी या दो" मेरा सर सहलाते , प्यार से मेरी जेठानी ने पूछा.

"पहले पहले वैसलीन पहले एक उंगली डाल के लगाई थी, फिर दो. खूब देर तक मेरी "

"हा हा बोलो ना, "जेठानी बोली " दो उंगली मेरी चूत मे डाल केफिर मुझे लगा कि मैं क्या बोल गयी, लेकिन जेठानी ने मेरा हौसला बढ़ाया कि यहाँ सिर्फ़ लड़किया और बहुए ही तो है, फिर दरवाजा बंद है, क्या शरमाना. हिम्मत कर के मेने आगे बोला.." मेरी चूत मे डाल के पहले वैसलीन लगाई."

"देखा मेरा देवर कितना नवल रसिया है सब कुछ मालूम है.और अपनी दुल्हन का कितना ख़याल भी है, ये नही कि दुल्हन देखी और टाँग उठा के पेल दिया, लगे चोद्ने, चाहे वो चिल्लाति रही, चाहे उसे मज़ा मिला हो या ना." वो बोली.

"तुझे मज़ा मिला था या नही जब उसने तेरी बुर मे पेला था." मेरी ननद ने बोला. मैं क्या बोलती चुप रही.

"अरे पहली बार मे तो जब कसी कुँवारी चूत मे लंड जाता है तो लगता ही है. फिर तो इस की उमर भी अभी बड़ी है. पहली बार की बात नही, लेकिन उस के बाद एक बार भी, उस दिन न सही कल सही थोड़ा तो मज़ा आया होगा."

"हॅमेयैया." मेने स्वीकारोक्ति मे सर हिलाया.

"तो खूब मज़े ले ले के चुद्वाया तुमने. कितनी बार टाँग उठा के चोदा उसने"

ननद ने पूछा. मैं चुप रही.

"अरे ये कैसी बाते करती हो. इस तरह की बात किसी नई नेवेली से पूछी जाती है. जेठानी ने उन्हे चुप कराया और मुझेसे पूछा, बस एक बात याद कर कल हम देवर जी को चिढ़ा रहे थे कि उनके माथे मे महावर लगा था. मेरी एक बाजी लग गयी तुम्हारी एक ननद से.

मेने कहा कि मेरा देवर इतना वो नही कि हर बार टांगे कंधे पे ही रख के चोदे.

उसने अलग अलग तरीके से पहले दिन चोदा होगा. तो बस ये बता दो,कि हर बार टाँग कंधे पे ही रख के उसने चोदा या किसी और तरीके से भी चोदा."

"एक बार एक बार उन्होने मेरी टांगे फैला के भी, नीचे तकिया रख के भी" मेने माना.

"लो सुनो, मैं कह रही थी ना की मेरा देवर पक्का रसिया है. उसने दुल्हन को तरह तरह से खुश किया होगा. अच्छा ये बता," अपनी उन ननद से अपनी जीत की घोषणा कर के वो फिर मेरी ओर मुखातिब हुई," सच सच बताना, मुझे लगता है मेरा देवर तेरे इस रसीले जोबन का रसिया है. है हर बार जब वो इसे पाता है तो पहले हल्के से छूता है, सहलाता है, दबाता है तब रगड़ता, मसलता है या"

"पहले दिन तो ऐसे ही लेकिन" मेरी बात काट के मेरी ननद बोली,

"अरे ये क्यो नही कहती साफ साफ कि अब वो इतना मतवाला हो जाता है तेरी चूंचिया देख के कि देखते ही दबोच लेता है, दबा देता है, मसल देता है. कच कचा के काट लेता है. ये तो देख के ही लग रहा है" और ये कह के उन्होने मेरा आँचल मेरे ब्लाउस पर से हटा दिया. मेरे लो काट ब्लाउस से मेर गोलाइयाँ छलक पड़ी और साथ ही मेरे उभारो पे उनके दाँत और नखुनो के निशान सबके सामने थे. उन्होने उस ओर इशारा करते हुए बोलना जारी रखा," अरे ऐसी रसीली चूंचिया होंगी तो वो तो बेसबरा होई जाएगा. चलो तो तुमने ये बताया अपनी पहली चुदाई के बारे मे कि पहले तेरे दूल्हे ने, तेरी कसी कुँवारी बुर मे पहले एक उंगली और फिर दो उंगली डाल के चोदा और वैसलीन लगाई. और फिर जब तुम चुद्वाने के लिए बेचैन होके अपने चूतड़ पटकने लगी तो तुम्हारी टांगे उसने अपने कंधे पे रख के, तुम्हारी दोनो कलाई कस के पकड़ के, तुम्हारे होंठो को अपने होंठ से दबा के तुम्हारे मूह मे जीभ घुसेड के तुम्हारी कच्ची चूत मे अपना मोटा लंड पेल तुम्हे चोद दिया और तुम्हारी चूत फॅट गई. साथ ही पहले तो तुम्हारी चूंचिया वो सहलाता रहा और फिर कस के खूब रगड़ाई मसलाई की. एक बार तुम्हारी तुमने खुद अपनी टांगे फैला के उसे बुला के चुदवाया. है ना," मैं क्या बोलती. फिर तो उन दोनो ने मिल के जैसे पुलिस वाले कबुल वाते है जो जुर्म किया हो और जो ना किया हो वो सबसब कुछ कबूलवा लिया.

लेकिन उससे मेरी रही सही झिझक भी ख़तम हो गई. और उसके साथ तो जैसे 'चुदाई पूराण' चालू हो गया. और ननदे भी क्योकि अंदर सिर्फ़ उनकी भाभीया ही तो थी,

खूब खुल केओर उस के साथ ही एक नया ग्रुप बन गया शादी शुदा और कुँवारीयो का.
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08-17-2018, 02:46 PM,
#95
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
अंजलि ने जब कुछ कहा तो मेरी जेठनियो को तो छोड़िए, मेरी शादीशुदा ननदे भिलेकिन वो भी चुप होने वाली कहाँ,उसने मुझे छेड़ते हुए कहा, कि अरे भाभी की तो बुरी.. उसकी बात काट के मेरी एक जेठानी बोली,

"अरे साफ साफ क्यो नही कहती, कि भाभी की बर की बुरी हालत हो गयी, लेकिन ज़रा अपनी बुर की हालत सोच ना. अब तुम्हारी भाभी को तो चुदाई का लाइसेन्स मिल गया, अपने सैया से जब चाहे जितनी बार चाहें, जहा चाहे चुदवाये,

"अरे सिर्फ़ सैयाँ का ही नाम थोड़े उस लाइसेन्स पे लिखा है. सेया तो खाने का मेन कोर्स है साथ मे चटनी और आचार भी तो है, नेंदोई और देवर.." किसी ने जोड़ा और सब लोग हँसने लगे. मेरी उन जेठानी ने बात जारी रखी,

"अरे और क्या, सलहज पे तो नंदोई का पूरा हक है, जिस साले की बेहन ना चोदि, उस की बीबी पे थोड़ा बहुत तो, लेकिन तुम अपनी सोचो. तुम्हारी भाभी की बुर मे तो जब भी खु.जली मचेगी, वो कुछ बहाने बना के उपर कमरे मे और वहाँ उन्हे वो खड़ा तैयार मिलेगा.लेकिन अब ये सब हाल सुन के तुम्हारी बुर तो गीली हो गयी होगी, तो फिर अब बाथ रूम मे जा के उंगली या मोटी कॅंडल."

"अरे आज कल बेगन का भी सीज़न चल रहा है. लंबे मोटे चिकने" और सब लोग हंस पड़े लेकिन अंजलि का साथ देती हुई बहुत सीरियस्ली मैं बोली,

"अरे इन सब चीज़ो की ज़रूरत नही है, मेरी प्यारी ननदो को. आख़िर इनका ख्याल अगर इनकी भाभी नही रखेंगी तो कौन रखेगा. कल चौथी लेके मेरे दोनो भाई आ रहे है, संजय और सोनू जिनसे इसकी पक्की यारी है. अब बस24 घंटे इंतजार कर लो, फिर तो इसमे से किसी चीज़ की ज़रूरत नही पड़ेगी. जितनी बार चाहे उतनी बार,

"सच मे भाभी," उस के चेहरे पे तो 1000 वाट का बल्ब जल गया और सब लोग मुस्कराने लगे.

"और क्या एक दम सच. तुम जितनी बार चाहो, मेरे भाइयो से उतनी बार क़रवाओ ना एक बार भी मना नही करेंगे. किसके साथ कराओगी संजय के साथ या सोनू के साथ या चाहो तो दोनो के साथ." बिचारी की हालत खराब हो गयी, लेकिन उसका साथ देने केलिए दुलारी मैदान मे आ गयी. वो चालू हो गयी,

"..भौजी, अरे अपने भाई की बात छोड़िए. अरे हमारे भैया ने तो चोद चोद के तुम्हारी बुर का हलुवा बना दिया है, टाँग फैला के चल रही हो. मसल मसल के काट काट के तुम्हारी ई चूंचियो की लेकिन हम अपने भाई को क्यो बुरा कहे. तुम्हार ई चीक्कन गोर गोर गालवा देख के मन तो लालचाई जाई, और फिर ये गुलाबी रसीले होंठ.

क्यो खूब चुसवाई हो ना होंठ के रस,और फिर ई जवानी के रस से छलकात, मस्त मस्त चूंची और कसी कसी बुर. खूब चूंची पकड़ के दबाए के चोदवाइ होगी, है ना.

चूतड़ उठा उठा के गपा गॅप लंड घोंटी होगी रात भर.हाल तो मुझे पूरा मालूम है,

लेकिन सब तुम्हारे मूह से सुन-ना चाह रहे है वरना मैं सुनेआ देती कि कैसी चुद्वासि हो तुम और कैसे हचक के चोदा भैया ने तुमको.. अरे लंड घोंटने मे नही सारम - खचाखच चुद्वाने मे नही सारम - तो फिर चुदाई बोलने मे कौन सी शरम लग रही है"

"अरे नेई दुल्हन है थोड़ा तो सरमाएगी ही, मूह से बोलने मे कुछ" मेरी एक जेठानी ने मेरा बचाव किया. लेकिन दुलारी फूल फार्म पे थी. वो चालू रही,

"अरे उही मूह सेक्यो अभी लौंडा चूसी हो की नही चूसी हो तो चूमोगी भी चतोगी भी और चुसोगी भी उसी मूह से तो बोलने मे का शरम. अरे बेचारी ननद पूछ रही है तो बाते दो ना खुल के कैसे कैसे मज़ा आया सैयाँ के संग चुद्वाने मे. अगर एक बार बोल दो ना भाभी तो "

"ठीक है रख दो बिचारी का मन, बोल दो ना" मेरी सारी जेठानियो ने एक साथ कहा और फिर वो गाने लगी,

"सैया के संग रजैईया मे बड़ा मज़ा आए, चू" और मैं भी साथ दे रही थी. लेकिन जैसे ही मेने चुदाया बोला सब की सब शांत हो गयी और सिर्फ़ मेरी आवाज़ मे चुदाया सुनाई दिया. सब औरते एक साथ ज़ोर से हंस के बोली कि अब ये भी शामिल हो गई हम लोगो की गोल मे. और फिर एक जेठानी ने दुलारी से कहा,

"अरे मान लो ई सरमा रही है, तो तुम तो बड़ी बियाहिता ननद हो तुम ही सुनाई दो इस के रात का हाल."

"सुनती हू. अरे गा के सुनाउन्गि ज़रा ढोलक तो उठा दो, " और गुड्डी ने उनको ढोलक पकड़ा दी. और उन्होने गाना शुरू कर दिया,

भिंसारे चिरिया के बोली अरे भिंसारे चिरैया के बोली,

अरे हमारे भैया ने भाभी की चोली खोली,

अरे चोली खोल के चूंची टटोली और फिर दुलारी ने गाने गाने मे सब कुछ, कैसे 'उन्होने' मेरी चोली खोल के कस के चूंचिया दबाई, कैसे मेरी कसी चूत मे पहले उंगली की फिर टांगे उठा के कैसे खचाखच चोदा, खूब देर तक सुनाती रही. जब उसने गाना ख़तम किया तो ग़लती से गुड्डी के मूह से निकल गया, कि तुम तो हमारी बुआ के पीछे ही पड़ गयी. बस क्या दुलारी अब उसके पीछे,

"अरे बुआ की भतीजी की चूत मारू, अरे अपनी बुआ के गाल तो देखो जैसे माल पुआ. खूब कचकच काटने लायक है और कटवाती भी है. अरे बुआ बुआ करती हो तुम्हारी बुआ को तुम्हारी कुछ फिकर नेई. जब एक बुआ थी तुम्हारी तो इतने फूफा थे कि गिनेती नही (मेरी जेठानी की ओर इशारा कर के वो बोली) और अब ये आ गयी है. इनका तो हाल तुमने सुन ही लिया कि जब से आई है, दिन रात खाली चुदवाय रही है, और तुम्हारी वो बुआ वो तो वो भी तुम्हारे फूफा के या क्या पता कही तुम्हारे पापा ने भी मौका देख के हाथ साफ कर लिया हो. कही बुआ ने सोचा कि ये भतीजी भी कब की चौदह पार कर के चुद्वाने लायक हो गयी है, इसकी चुचिया गदराने लगी है. अपना तो लंड घोंटने मे, ज़रा इसके लिए भी लंड का इंतज़ाम करे. मेने तो कल समझाया था ना, शादी बियाह का घर है, इतने लड़के मर्द है पटा लो किसी को. अरे कुछ दिन मे तो लौट जाओगी तो किस को क्या पता चलेगा कीबुआ के भरोसे रहोगी तो."

रजनी ने बात काट के बताया कि कल मेने गुड्डी का मेक अप भी किया था और होंठ पे लिपस्टिक भी.."

"अरे नीचे वाले होंठ पे भी तो लिपस्टिक पौडर लगाया करो, जो 'खड़ा' (वर्टिकल) होंठ है उसकी भूख का भी तो इंतज़ाम करो, खाली उपर वाले पड़े ( हरिजोटल) होंठ का सिंगार करती हो. ज़रा एक बार अपने खड़े होंठ की झाँकी तो दिखाय दो बन्नो" ये कह के दुलारी ने झटके से उसकी फ्रॉक उपर उठा दी. और उसकी पूरी जांघे दिख गयी.

गनीमत था कि उसने एक सफेद चड्धि पहन रखी थी. दुलारी का हाथ वहाँ भी पहुँच गया और उसको चिढ़ाते हुए बोली,

"अरे इस बुल बुल को ऐसे पिंजरे मे बंद किए रहोगी तो चारा वारा कैसे गटकेगी. ज़रा इसको हवा तो खिलाओ" और वो शायद और भी तंग करती, लेकिन चमेली भाभी बीच मे आ गयी. उन्होने दुलारी का हाथ पकड़ के कहा,

"तुम सबका हाल तो पूछ रही हो, लेकिन गौने के बाद महीने भर हुआ, आया अपना हाल तो सुनाया नही कि गौने की रात सैया ने क्या क्या किया. कैसे दो महीने चुदवाया, ज़रा नाच के तो दिखा हिम्मत हो तो." सेर को सवा सेर मिल गया था.

क्रमशः……………………………………
शादी सुहागरात और हनीमून--27
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08-17-2018, 02:46 PM,
#96
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--28

गतान्क से आगे…………………………………..

चमेली भाभी ने उसका हाथ खींच के खड़ा कर लिया, नाचने को. मेरी जेठानी ने ढोलक सम्हाली. दुलारी ने गाना शुरू किया लेकिन गाने के पहले बोली, ये गाना भौजी के हाल का है. और फिर गाना शुरू हो गया,

गौने की रात दुख दाई रे अबाहु ना भूले.

बारह बजे सुन सैयाँ की बोलिया,कौनो ननादिया खिड़किया ना खोले,

रात भर पेरैला हरजाई रे, अबहु ने भूले,

( अरे पेरेला की पेलैला, मेरी जेठानी ने छेड़ के पूछा) रह बेदर्दी चोली मोरा मसके, बाला जोबनेवा दबावे दूनो कस के.

मर गयी हे मोरी मैं रे, गौने की रात दुख दाई रे अबहु ने भूले.

लूट लिहाले हमारे नैहर के मालवा, सीने वा पे चढ़के दबावे दोनो गालवा

( अरे भाभी माल लुटवाना ही तो इतने साज संवर के आई थी अब क्या शिकायत, ननदे मेरे पीछे पद गयीं)

काट लहले जैसे नेन खटाई रे, अबहु ने भूले गौने की रात दुख दाई रे अबहु ने भूले.

और गाने के साथ साथ पूरा एक्शन, दोनो ने एक दूसरे की साड़ी साया सब उठा लिया, और फिर रगड़ रगड़ के, पॉज़ बदल बदल के पूरा ट्रिपल एक्स एकस्न था. वो तो बाहर से मेरी सास ने आवाज़ दी तो वो बंद हुआ और दरवाजा खुला. बाहर महारजिन खड़ी थी कि नाश्ता बन गया है. कुछ लोग बाहर गये लेकिन मेरे और जेठानी जी के लिए वही गुड्डी और रजनी ले के आई. हम लोग नाश्ता ख़तम ही कर रहे थे कि मेरे नंदोई अश्वनी,उनकी पत्नी, मझली ननद, और अंजलि आई.

वो बोले क्या खाया पिया जा रहा है अकेले अकेले. मेने उन्हे ओफर किया तो हंस के उन्होने मना कर दिया, कि रात भर की महनेट के बाद तुम्हे ताक़त की ज़्यादा ज़रूरत है. उसके साथ ही फिर हँसी मज़ाक शुरू हो गया. मैं देख रही थी कि कल के बाद रजनी मे एकदम फ़र्क आ गया है और वो उनसे चिपकी हुई है और उनके शुद्ध नोन वेज जोक्स का हम लोगो के साथ मज़ा ले रही है. मज़ाक मज़ाक मे उन्होने मेरी जेठानी से कहा,

"भाभी, आप को मेरे नाम का मतलब मालूम है."

"अरे कितनी बार तो आप बता चुके है" वो बोली.

"अरे साफ साफ कहिए ना कि नये माल को देख के अरे आप की सलहज है, इससे क्या परदा. नाम क्या सीधे 'वही' दिखा दीजिए." ननद ने उकसाया.

"अरे दिखा तो देता लेकिन बच्ची है कही भड़क ना जाए और वैसे भी अभी दिन रात साले का देख रही है."

"देखो तुम अपने इस नेंदोई से बच नही पओगि, अभी बच भी गयी ना तो होली मे तो ये बिन चोली खोले मानेंगे नही"

मैं चुपचाप मुस्करा रही थी, फिक्क से हंस दी. अश्विन भी खुल के हँसते हुए बोले " अरे हँसी तो फाँसी मैं बता दू नाम का मतलब.." मेरी ननद, उनकी पत्नी बोली,

"मैं ही समझा देती हू अश्व का मतलब घोड़ा..तो तुम्हारे ननदोयि का ये कहना है कि अश्वनी का मतलब हुआ, घोड़े जैसा" जेठानी जी ने कहा उनकी बात पूरी होने के पहले ही मैं ननदोयि जी की हिमायत करती हुई बोली,

"अरे दीदी जी, इसमे बिचारे ननदोयि जी को क्यो दोष देती है. अपनी सासू जी को बोलिए ना. वो कभी अंधेरे मे घुड़साल चली गयी होंगी और किसी घोड़े का "

मेरी बात ख़तम होने के पहले ही हँसी से कमरा गूँज गया. मेने रात का हिसाब बराबर कर दिया था. थोड़ी देर के हँसी मज़ाक के बाद उन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया,

देखना कि नाम पे.

"अरे भाभी देखिए, जीजा हाथ पकड़ने के बहाने फिर कही कोहनी तक नही पहुँच जाएँ" अंजलि बोली.

"और फिर कोहनी से सीधे ज़ुबाने तक." ननद ने चिढ़ाया.

"अरे मेरी सलहज ऐसी डरने वाली नही है, और मैं तुम लोगो के फ़ायदे की बात देख रहा हू."

"क्या जीजू हम लोगो का क्या फ़ायदा होगा" अंजलि बोली.

"अरे नेग तो मिलेगा ना, तुम लोगो को बुआ बनाने पर. यही कि तुम लोग कब और कितनी बार बुआ बनोगी."

"तो क्या देखा आपने, अब तक." ननद जी ने पूछा.

"यही की चिड़िया ने चारा तो घोंटना शुरू कर दिया है, और अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही है." वो बोले " तो तो क्या 9 महीने मे खुश खबरी" एक और ननद ने बनावटी खुशी से मुझेसे पूछा.

"तो चिड़िया इतना चारा घोंट रही है, तो उसका पेट जल्द ही फूलेगा." अंजलि ने और पालिता लगाया.

"अरे नही यार ये चिड़िया बहुत चालाक है. आज कल ऐसी गोलिया आती है , ये दिन रात चारा घोंटेगी और पेट भी नही फूलेगा.

तो बताइए ना क्या होगा." ननद ने ननदोयि जी से पूछा.

"अरे वो तो पूछे जिसका पेट फूलना है, उसे बताउन्गा."

"कहिए तो पैर छू के पुच्छू" झुकने का नाटक करते हुए मैं हँसते हुए बोली.

"वो ठीक है लेकिन कौन सा पैर छुओगी." एक ननद बोली.

"अरे वो भी कोई पूछने वाली बात है. बीच वाला वही, घोड़े वाला. अरे सिर्फ़ छूने से प्रसाद नहीमिलेगा, उसे ठीक से पकडो, दबाओ, मसलो तब बाबा प्रसन्न होंगें" मेरी मझली ननद बोली.

तब तक वास्तव मे वो हाथ से कोहनी तक पहुँच गये थे, और मेरे चेहरे को देखते हुए बोले,

"मैं देख रहा हू कि तुम अपनी जेठानी के साथ एक बाबा के यहाँ हो. तुम्हारी जेठानी पूछ रही है बाबा, 6 महीने हो गये बताइए क्या होगा. बाबा ने तुम्हारा पेट छुआ,

फिर सीना टटोला और कहा पता नही चल पा रहा . जेठानी जी ने बाबा के सारे पैर छुए,

फिर बाबा ने इनका साया उठाया और ध्यान से अंदर झाँक कर कहा, खुश रहो लड़का होगा. जेठानी ने पूछा, बाबा आप धनी है. आप ने वहाँ क्या देखा. वो बोले, अरे मुझेसे कैसे कोई बच सकता है. वो झाँक रहा था मेने उसकी मूँछे देख ली."

और फिर मेरी ननदो की ओर देख के बोले, इसका मतलब भतीजा होगा, नेग बढ़िया मिलेगा."
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08-17-2018, 02:47 PM,
#97
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
सब लोग ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे. मैं झेंप गयी और झेंप मिटाने के लिए जल्दी से बोली,

"नही नही, मेरे तो , मेरा मतलब मेरे तो वहाँ बाल ही नही है." फिर दुबारा सब लोग हँसने लगे और मैं अपनी बात का मतलब समझ खुद शरमा गयी.

"अरे तो इसमे इतने शरमा क्यो रही हो, जैसे लड़कियो को मूँछ दाढ़ी से चुम्मा चाती मे झंझट होती है, वैसे लड़को को भी होती है, है ना. वैसे नीचे वाले होंठ पे अभी चुम्मा चाती शुरू हुई की नही." ननदोयि जी ने और छेड़ा.

वो तो और छेड़ते, लेकिन बाहर से मेरी सासू जी ने आवाज़ लगाई और उनकी पत्नी उन्हे हांक के बाहर लेगयि. अंदर सिर्फ़ मेरे साथ मेरी जेठानी, अंजलि, गुड्डी और रजनी बचे.

जेठानी जी ने अंजलि से कहा कि वो दरवाजा बंद कर ले जिससे हम लोग थोड़ी देर आराम कर सके. दरवाजा बंद कर के वो मेरे पास आई और मेरा हाथ अपने हाथ मे देखने लगी.

हम सब लोग अब आराम से बैठ थे. अंजलि मेरे हाथ को देखते हुए बोली,

"भाभी, आपका हाथ देख के जीजू ने कितनी मजेदार बाते बताई."

"हाथ तो मैं भी देख लेती हू, लेकिन मैं वो बात बताती हू जो अक्सर हाथ देखने वाले नही बताते."

"क्या, भाभी." सब एक साथ बोल पड़ी और उसमे गुड्डी भी शामिल थी."

"मैं हाथ देख के तिल बता सकती हू और ऐसी जगह का तिल जहाँ सब की निगाह नही पड़ती."

"ये कैसे हो सकता है, ये तो आज तक मेने सुना नही" रजनी आर्य से बोली.

"अरे मेरी बन्नो अब तुम उस उमर मे पहुँच गयी हो जहाँ रोज नई ने चीज़ देखने और सीखने को मिलेगी. अगर तुम्हे नही विश्वास है तो मैं ये 100 रूपरे का नोट जेठानी जी के पास रख देती हू. मैं हाथ देख के तिल बताउन्गि, तुम लोग दिखाना, अगर मैं ग़लत हुई तो 100 रूपरे हर ग़लती पे तुम्हारे. मंजूर? तीनो एक साथ बोली, मंजूर.

मेने 100 रूपरे का नोट जेठानी जी के पास रख दिया और उन्होने उसे पार्स मे रख लिया.

सबसे पहले मेने अंजलि का हाथ थामा. थोड़ी देर तक हाथ देखने का नाटक करने के बाद, मेने उससे कहा कि तेरे पैर के तालुए मे तिल है. उसने चप्पल उतार के दिखाया. वाकाई मे तिल था.सब कहने लगी कि भाभी ये तो मान गये लेकिन कही आपने इसके पैर ऐसे उठे हुए देख लिए होंगे. मेने रजनी को छेड़ा, हे किसके सामने टाँग उठाई तुमने, इतनी जल्दी यहाँ तक आओ बिचारी तो शर्मा गयी लेकिन बाकी दोनो चिल्लाने लगी ये नही चलेगा, आप दुबारा बताइए. खैर मेने फिर अंजलि का हाथ मेने फिर पकड़ा और फिर कुछ देर तक देखने के बाद, मैं बोली मैं बताउन्गि तो लेकिन तुम्हे कपड़ा खोलना पड़ेगा दिखाने के लिए. वो बोली, ठीक है 100 रूपरे का सवाल है. तुम्हारे बाए बुब्स के ठीक नीचे, उसके बेस पे. वो बोली, नही वहाँ कोई तिल नही है, मैं रोज शीशे मे देखती हू. अरे, अरे तो बन्नो रोज देखती है कि जौबन पे कितना उभार आया, कितने गदराए. बेचारी शरमा गयी. लेकिन अंजलि और गुड्डी बोली,

दिखाओ, दिखाओ. थोड़ा उसने टॉप उठाया, बाकी अंजलि और गुड्डी ने मिल के सरका दिया,

ब्रा तक. कोई तिल नही था. दोनो ज़ोर से चिल्लाई, भाभी हार गई. रजनी ने भी 100 रूपरे के लिए हाथ बढ़ाया. मेने उसकी ब्रा थोड़ा सा उपर सरका दी. खूब गोरे मुलायम उभार और बाए बुब्स के बेस के थोड़ा उपर, एक काला तिल. (असल मे कल शाम को जब मेने उसकी ब्रा के नीचे पुश अप पैड लगाए थे तो मेने ये तिल देख लिया था). अब उसके बाद गुड्डी का नेंबर था. पहले तो मेने उसकी पीठ पे एक तिल बताया, लेकिन फिर सब ने कहा ये कोई बड़ी बात नही है. फिर मेने देर तक उसका हाथ देखने का नाटक करती रही फिर मैं बोली, बताऊ. तीनो एक साथ चिल्लाई, बताइए. मेने कहा लेकिन दिखाना पड़ेगा. अब गुड्डी बेचारी थोड़ी झिझकी. "फ्रॉक के नीचे, जाँघ के उपर." वो बेचारी कस के फ्रॉक को दबाती रही लेकिन रजनी और अंजलि ने मिल के फ्रॉक उपर सरकानी शुरू कर दी. अंजलि हंस के बोली, "अरे यार दिखा दे हमी लोग तो है 100 रुपये का सवाल है". उसकी खूब भारी भारी गोरी जांघे दिख रही थी लेकिन तिल का कही अता पता नही था. अब तीनो बोलने लगी, 100 रुपये, 100 रुपये.
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08-17-2018, 02:47 PM,
#98
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
मैं बोली ठीक है मिल जाएँगें, लेकिन अभी थोड़ा और उपर और फिर तो रजनी और अंजलि ने मिल के पूरा कमर तक उठा दिया. मेने चड्धि ज़रा सी सरकई. जहाँ कस के चड्धि ने जाँघो को दबोच रखा था, वही पे तिल था. (और ये बुआ भतीजी की मिली भगत का नतीजा था, गुड्डी ने खुद ही मुझे बता दिया था.) और अब अंजलि का नंबर था. जैसे ही मेने उसका हाथ पकड़ा, वो बोली, तुम दोनो तो फेल हो गयी, देखना मैं भाभी से 100 रुपये जीत के ही रहूंगी. उसका हाथ मैं बड़े ध्यान से देख रही थी. मेने भी किरो और बेनेहम पढ़ रखा था. ये साफ हो गया कि उपर से तो वो थोड़ी बनाती रहेगी लेकिन अंदर से वो सेक्सी होगी और उसका सम्बंध शादी के पहले ही कयि लड़को से हो जाएगा, लेकिन इसमे किसी का हाथ भी होगा. वो बोली,

क्यो भाभी नही दिखा ना. मेने बन के बोला, मुश्किल लग रहा है. उसका चेहरा चमक गया. कुछ और देख के मैं बोली, पीठ पे, उपर की ओर (ये मेरे आब्जर्वेशन का नतीजा था.) और उसने फ्रॉक थोड़ा नीचे किया, पीठ की ओर. वही था शोल्डर ब्लेड्स केनिचे ब्रा के स्ट्राइप्स के नीचे. देखते देखते छेड़खानी मे गुड्डी ने उसके ब्रा के स्ट्राइप्स खींच दिए. अंजलि बोली, पीठ का तो दिख भी सकता है, एक बार फिर से. और मैं दुबारा हाथ देखने का नाटक करने लगी. थोड़ी देर देख के मैं बोली, है तो लेकिन मैं बताउन्गि नही. बताइए बताइए, रजनी और गुड्डी हल्ला करने लगी. ये बुरा मान जाएगी,

मेने कहा. नही नही मैं बुरा नही मानने वाली, सच तो ये है कि कोई है ही नही और आप हारने के डर से बहाने बना रही है." अंजलि बोली. मेने फिर हाथ उपर उठा के एक दम आँख के पास ले जाके देखा, और फिर मूह बना के अपनी जेठानी से कहा, "ऐसा हाथ और ये तिल का निशान मेने आज तक नही देखा था, सिर्फ़ एक बार किताब मे पढ़ा था.

मुझे विश्वास नही हो रहा है." बताइए ना, रजनी और गुड्डी ने ज़िद की. "अरे कही होगा तो बताएँगी ना भाभी." अंजलि ने कहा. तो ठीक है मेने 100 रुपये और निकाल के जेठानी जी को देते हुए कहा, अगर कही भी होगा तो दिखाना पड़ेगा. अरे डरती थोड़ी हू दिखा दूँगी वो मुस्करा के बोली. मेने कहा कि ये एक दम सेजगह पे है इसलिए मेने बाजी बढ़ा के 200 की कर दी. ये तुम्हारे ठीक वहाँ, गुलाबी पंखुड़ियो के उपर है और पैंटी उतार के दिखाना पड़ेगा. अब वो बेचारी सहमी, लेकिन गुड्डी और रजनी उसके पीछे पड़ गयी कि हमारा तो फ्रॉक और टॉप उठाया था तो मैने भी समझाया कि ज़रा देर मे चेक हो जाएगा, 200 रुपये की बात है. अंत मे वो इस शर्त पे तैयार हुई कि वो दूसरी ओर मूह करके खुद उतारेगी, और खुद ही देखेगी. मैं इस पे भी राज़ी हो गयी.

झुक के उसने पैंटी उतार के रजनी को पकड़ाया और रजनी ने चुपके से मुझे दे दिया.

झट से मेने पार्स मे रख लिया. उधर वो अपने को निहार के बोली,

"कोई तिल विल नही है."

"अरे ठीक से देखो, झुरमुट मे छिपा होगा," मैं बोली और झटके से उसकी फ्रॉक उठा दी.

एक दम साफ सफाचट, चिकनी कसी कुँवारी गुलाबी पुत्तिया, उसने अपनी जांघे भींच ली और जल्दी से फ्रॉक नीचे गिरा दी लेकिन तब तो हमने दरशन कर ही लिया.

मेने जेठानी जी से कहा कि पहली बार मैं ग़लत हुई हू और उन्होने 200 रूपरे अंजलि को दे दिए. मुझे याद था कि जब कुहबार मे 'झलक' देखी थी तो 'घास फूस' थी. मेने उसे छेड़ा,

"हे कल मेरे भाई आ रहे है क्या इसी लिए, उनके स्वागत मे शेव करके चिक्कन मुक्कन कर लिया." वो क्या बोलती, थोड़ी नाराज़ थोड़ी मुस्कराती बैठी रही.

मेने अपने पार्स मे से 500 का एक नोट निकाल के बढ़ा दिया, उसे थाम के, उसकी सवाल भरी निगाहो ने पूछा.

"100 रुपये तुम्हारी पैंटी के. और 200 रुपये मे तुमने पैंटी उतार दी ना तो कल जब मेरे भाई आएँगे तो 200 रुपये पैंटी उतारने के और 200 टाँग उठाने के. एडवांस."

तब तक बाहर से बुलाहट हुई और जेठानी जी और सब जाने लगे. मेने उसका हाथ पकड़ के रोक लिया और समझाया, "हे बुरा मत मानना, ननद भाभी मे तो मज़ाक चलता ही रहता है. और हाँ ये देखो,"पार्स खोल के मेने दिखाया , उसकी दूसरी पैंटी ( वो जो कुहबार के पहले, मेरे भाइयो ने छेड़खानी मे अंधेरे मे उतार ली थी और जब संजय मुझे यहाँ छोड़ के जा रहा था तो उसने मेरे पार्स मे रख दिया था.) " ये तुम्हारी एक और पैंटी जो शायद तुम बारात मे आई थी तो वही छूट गयी थी. लेकिन घबडाओ नही, कल संजय आएगा ने, मैं उससे बोल के तुम्हारे लिए दो खूब सेक्सी पैंटी मँगवा दूँगी." वह मेरा हाथ छुड़ा के बाहर चली गयी.

क्रमशाह……………………………………
शादी सुहागरात और हनीमून--28
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08-17-2018, 02:47 PM,
#99
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
शादी सुहागरात और हनीमून--29

गतान्क से आगे…………………………………..

मुझे बाद मे लगा कि, मुझसे कितनी बड़ी ग़लती हो गयी.

कमरे मे सिर्फ़ मैं और रजनी बचे थे.

तब तक दरवाजे पे ये नज़र आए. सुबह से दो बार झाँक गये थे, लेकिन उनकी भाभीया बैठी थी इसलिए हिम्मत नही पड़ी. लेकिन अभी सिर्फ़ रजनी थी इसलिए,पहले तो उन्होने बाहर से ही इशारे किए एक दो बार , मुझे उपर कमरे मे आने के. और थोड़ी देर बाद उनकी और हिम्मत बढ़ी तो कमरे मे अंदर आ गये. लेकिन जैसे ही वो अंदर घुसने को हुए मेरी एक जेठानी, ( वही जिन्होने चालाक दारोगा की तरह मुझसे सब कुछ कबुल करवा लिया था). आ के मेरे पास बैठ गयी. बेचारे दरवाजे पे ही रफू चक्कर हो गये. थोड़ी देर तक तो मैं बैठी रही फिर मेने अपनी उन जेठानी जी से कहा कि मुझे कुछ काम याद आ गया है, ज़रा उपर अपने कमरे से हो के आती हू. मुस्करा के वो बोली जाओ.

मैं सीढ़ियो पे चढ़ि ही थी कि वो सामने सीढ़ियो पर ही उपर मेरे पास आते ही उन्होने मुझे बाहे भींच लिया और कस के अपने सीने से दबा के मेरे होंठो पे एक जबरदस्त पूच्छकयचपच्छाक तब तक नीचे से सीढ़ियो से रजनी की आवाज़ आई, " भाभी" वो तो ऐसे झटके जैसे किसी बिल्ले को मलाई पे मूह मारते पकड़ लिया गया हो. मेने ही बात बनाई और उन्हे पकड़े पकड़े कहा, आँख मे एक फुक और मारिए, अभी निकला नही. उन्होने इशारा समझ के मेरी पलको को खोल के एक बार फुका. आँख की किरकिरी निकालने के नाम पे आँख मे तो कुछ था नही. हाँ उन के फुक मारने से ज़रूर किरकिरी होने लगी. वो बेचारे निराश हो के उपर कमरे मे चले गये और मैं नीचे सीढ़ियो पे रजनी ने छेड़ कर पूछा,

"भाभी निकला कि नही." मेने भी उसी तरह द्विअर्थि ढंग से जवाब दिया, " डालने के तो तुमने पहले ही टोक दिया तो निकलेगा कैसे." और उसे कस के भींच लिया. उसने मेरा कम बिगाड़ा था तो मैं उसे कैसे छोड़ती, मेने उसके टॉप मे सीधे अंदर हाथ डाल दिया और ब्रा को उचका के सीधे उसके उरोजो को दबोच लिया. खूब मुलायम, रूई के फाहे जैसे, छोटी छोटी लेकिन उसके किशोर उभार, कस के उभर रहे थे. मसलते हुए मेने पूछा, बोल क्या बात है.

नीचे कुछ औरते आई थी, मुझे मूह दिखाई के लिए बुलाया था. लंबा घूँघट काढ़ के मैं पहुँच गयी.

मूह दिखाई के बाद दुबारा उपर जाने का सवाल ही नही था. अभी रसोई छूने की रसम होनी थी. इस रस्म मे दुल्हन खाना बनाती है, बल्कि बन रहे खाने मे कल्चूल चला देती है. इस तरह वो घर के काम काज मे हिस्सा लेना शुरू कर देती है और दुल्हन से बहू बनने की दिशा मे ये महत्वपूर्ण कदम होता है. जो भी खाना वो 'बनाती' है,

उसे उसको अपने दूल्हे के साथ साथ खाना होता है, जिससे माना जाता है कि उनका प्रेम पक्का होगा. उसकी 'बनाई' हर चीज़ दूल्हे के लिए खानी ज़रूरी है.

मेरी सास ने मुझे किचेन मे भेजा , ननदो के साथ. वहाँ अंजलि के साथ साथ मेरी मझली ननद भी थी. मेने सोचा कि शायद एक कड़ाही मे कल्चूल चलानी होगी, पर उन दोनो ने तो मुझसे हर बर्तन मे कल्चूल चलवाई और अंजलि ने आँख नचाके कहा भाभी आज आप को भैया को ये सब खिलाना होगा.

उस समय तो मैं नही समझी, पर जब दुलारी एक बड़े से थॉल मे खाना निकल के ले आई और उस के साथ मैं सीढ़ी पे चढ़ि तो मुझे सारा खेल समझ मे आ गया. पीछे पीछे अंजलि भी थी. ये मुझे मालूम था कि ये खाने के मामले मे थोड़े 'फिनिकि' है. लेकिन जब से मैं ससुराल मे आई थी मेरी हर ननद खास तौर पे अंजलि ये बताती रहती थी कि भैया को ये नही अच्छा लगता वो नही अच्छा लगता (प्योर् वेजिटेरियन, और टी टोटलर तो घर का हर आदमी बताता रहता था, मेरे मायके की आदतो से एकदम अलग). लेकिन कुछ चीज़े एकदम ' नो नो ' थी उनके लिए. अगर उनके खाने की कोई'निगेटिव विष लिस्ट' हो तो ये सारा खाना उसी तरह बनाया गया था और वो सारी ' नो नो' चीज़ें, मुझसे छुल्वाइ गयी थी. मेरे माथे पे तो जाड़े मे पसीने आ गया. ये सब चीज़े उन्हे खिलानी होंगी और न खिलाया तो मेरी आँखो मे आँसू नाच रहे थे.तब तक हम दरवाजे पे पहुँच गये थे. दरवाजा खुला तो वो टी वी पे कोई वीडियो देख रहे थे और उन्होने उसे झट से बंद कर दिया.मेने पहले तो बड़ी स्टाइल से अपने आँचल से,

उनके मूह पे एक झोका दिया और दुलारी से कहा कि थाली टेबल पे रख दो . खाने के बाद मैं बगल के किचेन मे रख दूँगी. बाहर का दरवाजा खुला रहेगा, तुम उसी ओर से आ के ले जाना. उसके निकलते ही मेने दरवाजा बंद कर दिया.

पहले तो उनको दिखाते हुए बड़ी अदा से मेने एक स्ट्रिपर की तरह अपनी साड़ी उतार दी.

फिर उनके पास जाके, उनकी गोद मे बैठ के मेने कहा कि आज मेने रसोई छुई है.

मैं आप को अपने हाथ से खिलाउन्गि. लेकिन मेरी एक शर्त है तुम को मतलब है आप को सब खाना पड़ेगा. हाँ मैं आपकी आँख बंद कर दूँगी. वो मुझे बाहो मे बाँध के बोले मंजूर, लेकिन मेरी भी एक शर्त बल्कि दो शर्त है. पहली तो आज से तुम,

मुझे 'तुम' कहोगी और दूसरी तुम मुझे अपने हाथ से ही नही अपने होंठो से भी खिलाओगी और मेरे हाथ एक दम आज़ाद होंगे चाहे जो भी कुछ करने के के लिए.

मंजूर, हंस के मेने कहा और उनकी भी टी शर्ट उतार दी और उनकी आँखो पे पट्टी बाँध दी. उन का हाथ पकड़ के मैं डाइनिंग टेबल पे ले आई और कुर्सी पे बैठा दिया. मैं भी उनकी गोद मे बैठ गयी और खाने का थॉल अपनी ओर खींच लिया.

पहले तो मेने अपने गुलाबी होंठ हल्के से उनके होंठो पे रख दिए और फिर कस के एक चुम्मि ले ली. फिर उनके होंठ खींच कर मेने अपने गालो पे रखे, फिर अपनी ठुड्डी पे और फिर ब्लाउस से बाहर छलकते रसीले जोबन पे. जब तक उनके होंठ मेरे जोबन का स्वाद चखने मे बिजी थे, मेने, अपने होंठो मे एक कौर बना के रखा और उनका सर उपर कर के सीधे उनके होंठो के बीच. पहले उन्होने होंठो का स्वाद चखा फिर खाने का. थोड़ी देर मे ही उनका लिंग भी खड़ा हो के लगा रहा था उनका शर्ट और मेरा पेटिकोट फाड़ के अंदर घुस जाएगा. कभी मेरे होंठ उनके होंठो को खाना थमा देते और कभी खुद उनके होंठ गपक लेते. इसी बीच जब उनके होंठ मेरे उरोजो का स्वाद चख रहे थे मेने ज़ोर से पूछा, क्यो कैसा लग रहा है, वो बोले बहुत अच्छा. और स्वाद मेने अपने जोबन उनके होंठो पे प्रेस कर के पूछा, (मेरे अंतर्मन को लग रहा था कि शायद कोई बाहर खड़ा हो हम लोगो का हाल चाल जानने के लिए और बाद मे पता चला कि मेरा शक सही था),

वो खूब खुश होके बोले बहुत अच्छा, बहुत स्वादिष्ट. उनके हाथ साथ मेरे उरोजो का स्वाद लेने मे व्यस्त थे.. इसी बीच लगता है कोई ऐसी चीज़ जो उन्हे सख़्त नापसंद हो मेरे होंठो से उनके मूह मे पहुँच गयी, और उनके चेहरे पे नापसंदगी का भाव एकदम पल भर के लिए गुजर गया और वो थोड़े ठिठक से गये (इस मामले मे वो बड़े उनके मन मे जो कुछ भी होता, वो उनके चेहरे पे झलक जाता.). मैं समझ गयी और थोड़ी देर लिए के खिलाना रोक के मेने कस के उन्हे अपनी बाहो मे भर लिया और लगी कस कस के चूमने, उनका हाथ खुद पकड़ के मेने अपने बुब्स पे दबा दिया. अगली बार जब मेने कौर लिया तो मेने चालाकी की ज़्यादा हिस्सा मेने खुद खाया और थोड़ा हिस्सा सिर्फ़ नाम करने को अपने होंठो से उनके मूह मे दिया. पर उनके आगे किसकी चालाकी चलती. उन्होने मेरे मूह मे जीभ डाल के मुस्कराते हुए वो भी निकाल लिया और गपक कर गये. इससे मुझे एक आइडिया सूझा, ननदो की चाल का मुकाबला करने का.

मेने तय किया कि जो मुझे चैलेंज दिया गया है, मैं उसे ईमानेदारी से ना सिर्फ़ पूरा करूँगी बल्कि उससे भी ज़्यादा करूँगी. मैं 'सब कुछ' उनेको खिलाउन्गि और आधे से भी ज़्यादा.

मैं ने उनके होंठो को अपने गाल का स्वाद दिया और वो ना सिर्फ़ चूम रहे थे बल्कि मेरा गाल अपने होंठो से दबा के कस के चूस भी रहे थे, चुभला भी रहे थे और हल्के से दाँत भी लगा देते. मैं उन का सर पकड़ के कान मे धीरे से कहती, अब दूसरा गाल लेकिन उनके मूह को अपने रस भरे मस्त किशोर उरोज के उपर लगा देती. वो तो बस मारे खुशी के कभी चूमत, कभी चुसते कभी कस के काट लेते.

इसी बीच मैं खाने के कौर को अपने दाँत से काटती, कुचलती, मूह मे चभालाटी,

अपने मुख रस मे लिसेड देती और फिर उनका चेहरा उठा के अपने हाथ से कस के उनका गाल दबाती जैसे ही उनके होंठ खुलते, मेरे होंठ उनके होंठो से चिपक जाते और मैं उनके होंठो के बीच कौर डाल देती या फिर कूचा, चुभालाया, मेरे मुख रस से लिथड़ा, लिसडा कौर अपनी जीभ के संग उनके मूह मे पूरी ताक़त से थेल देती. फिर तो वो खाने के साथ वो मेरी जीभ को भी कस के चुसते. अगर कभी उनकी जीभ मेरे मूह के पकड़ मे आ जाती तो मैं भी वही करती, जैसे मेरी योनि उनके मोटे सख़्त लिंग को कस के भींच लेती थी, वही सतकर मेरा मूह उनकी जीभ का करता. और खाने के साथ जब उनके हाथ मेरे जोबन छेड़ते तो वो भी उचक के उनका साथ देते और साथ मे उनके फनाफनाते लिंग पे मैं कस के अपने सेक्सी चूतड़ रगड़ देती. ज़्यादातर खाना तो उन्होने ही खाया और एक बार भी बिना ना नुकुर के. यहाँ तक कि जो कुछ बचा खुचा था, कटोरियो के किनारे पे लगा था, वो सब भी उंगली से पौंछ कर, उनके मूह मे अपनी उंगली डाल के चटा दिया. खाने मे उनका हाथ तो लगा नही था हाँ उनके होंठो को मेरे होंठो ने अच्छी तरह चाट चुट के साफ कर दिया.
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08-17-2018, 02:47 PM,
RE: kamukta kahani शादी सुहागरात और हनीमून
साथ जुड़े किचेन मे थाली रख के बाहर का दरवाजा खोल के जब मैं अंदर आकर फिर से उनके गोद मे बैठी तो मैं तब तक ब्रा पेटिकोट मे हो चुकी थी. मुझे इतना अच्छा लग रहा था कि मैं बता नही सकती.ससुराल मे एक तरह से ये मैं पहली बार लेकिन जिस तरह से इन्होने मेरा साथ दिया सच मे ऐसे पति के लिए मैं कुछ भी कर सकती थी. उनके आँखो पे से पट्टी खोलने के पहले, मेने कस कस के दो चुम्मि ली सीधे उनके होंठो पे. पट्टी खोलने के साथ मेने वो फिल्म भी आन कर दी जो वो देख रहे थे.

वो ब्लू फिल्म थी लेकिन एकदम अलग. एक हनी मून पे गये कपल की और एक दम रीयल लग रहा था होटेल मे किसी हिडेन कैमरे से खींची गयी थी क्यो कि सारे शॉट एक ही एगमल से लिए गये लगते थे. पति उसे छेड़ रहा था तंग कर था, लग रहा था दोनो कुछ देर से चालू थे. वो उसके मम्मे मसलता, लिंग लगा के रगड़ता और वो बहुत कहती तो थोड़ा सा डाल के रुक जाता. वो बेचारी व्याकुल थी, तड़प रही थी, चूतड़ पटक रही थी. वो बोलती करो ना, प्लीज़ और ना तड़पाओ, डाल दो पूरा अंदर तक. वो उसके निपल्स पिंच कर के पूछता क्या डाल दूं. वो बेचारी फिर अरज करती, अरे डाल दो ना अंदर तक वही वही.

वो और छेड़ता. बैठी हो के वो बोली,

"अरे डाल दो ना अपना लंड क्यो तड़पा रहे हो."

"कहाँ" उसने फिर भी नही शुरू किया.

"अरे क्यो तड़पाते हो आग लगा के अरे चोद दो मेरी बुर, पेल दो अपना लंड कस के मेरी चूत मे चोदो कस कस के." (वो मेरी ओर देख के मुस्काराए और कस के मेरी चूंची दबा दी. अब तक हम दोनो भी उसी हालत मे पहुँच गये थे जिस हालत मे पर्दे पर के कपल थे).

"ले ले ले मेरा मोटा मस्त लंड ले अपनी चूत मे, चुदा कस के" और ये कह के कस के उसने लंड पेल दिया.

"दे राजा दे चोद मुझे, चोद चोद कस कस के चोद दे मेरी बुर" मस्ती से अब उसकी भी हालत खराब थी और वो बोल बोल के, चूतड़ उछाल के चुदवा रही थी. इधर इन्होने भी अपनी उंगली मेरी चूत मे डाल उंगली से ही घचघाच चुदाई चालू कर दी थी.

उनका लंड भी कस के मेरे चूतड़ की दरारो के बीच दबा सर पटक रहा था.

मस्ती मे आ के अपनी पत्नी के जोबन उठा के, जैसे चैलेंज करते हुए बोला, ( जैसे कैमरे की ओर दिखा रहा हो) " अरे कितने मस्त मम्मे है मेरे माल के, किसी के हो नही सकते."

"अरे मेरे माल के मम्मो के आगे कुछ भी नही है तेरी वाली के." उसी तरह मेरे मम्मो को उसे दिखाते हुए वो बोले और अपने जोबन की ये तारीफ सुन खुशी से मेने अपनी रसीली चूंची उनकी ओर बढ़ा दी और उन्होने कच कचा के काट लिया. तब तक उधर टीवी पे, वो उपर हो गयी थी और अपने पति के लंड के उपर चढ़ के खचाखच चोद रही थी. और साथ मे बोल भी रही थी, हाँ चोद मुझे और कस के हाँ, पेल दे लंड अपना जड़ तक, और वो बी नीचे से कभी उसके मम्मे पकड़ के कभी कमर पकड़ के, अपने हिप्स उठा के चोद रहा था. कुछ देर बाद लेकिन उसको छेड़ते हुए टी वी मे उसके पति ने धक्के धीमे कर दिए बल्कि बीच बीच मे रोक ही देता था. उस औरत की तो हालत खराब हो रही थी. (और, हालत मेरी ही कौन सी अच्छी थी.

चूंचियो की कस के रगडन मसलन, मेरी कसी मस्त चूत मे घचघाच जाती उनकी उंगलिया और कभी कभी तो उनका अंगूठा मेरे क्लिट को कस के रगड़ देता था).

उतेज़ित हो के वो अपने पति की छाती पे अपनी चूंचिया रगड़ के बोली,

"अरे चोद ने पूरी ताक़त से. क्या बाकी ताक़त अपनी बहनो के लिए बचा रखी है."

इधर मेरी भी उंगलियो ने उनके लंड के टोपे पे से चमड़ा सरका दिया था. उनके सूपदे को भींच के अपने चूतड़ से उनके लंड को कस के दबा के रगड़ के मैं भी बोल उठी,

"अरे ये क्या उंगली से चोद रहे हो. चोदना है तो इससे चोदो. इसे क्या मेरी ननदो के लिए बचा रखा है." फिर क्या था अगले ही पल बाहो मे उठा के उन्होने मुझे पलंग पे लिटा दिया और रिमोट से फिल्म बंद करते बोले,

"बाकी फिल्म बाद मे रात मे. अभी हमारी फिल्म, मंजूर." हंस के मैं बोली मंजूर ,

लेकिन उनके लंड को दो तिहाई पे दबा के मैं बोली, अभी इतने ही, पूरा आज रात मे मंजूर. और हंस के वो बोले मंजूर.

अगले ही पल वो मेरे अंदर थे.

फिर तो मेरी चूंचियो को मसलते हुए, मेरी कमर पकड़ के कस कस के धक्के लगाते, उन्होने जबरदस्त चुदाई चालू कर दी. और नीचे से मैं भी साथ दे रही थी,

पूरे जोश से. जब वो कस के अपने मोटा लंड पेलते तो मैं भी नीचे से पूरी ताक़त से अपने चूतड़ उछालती, उनका लंड मेरी चूत के अंदर रगड़ता हुआ जाता तो मेरी चूत भी उसे कस के भींच लेती. आज मैं भी कस कस के शरम छोड़ उनके साथ बोल रही थी,

हाँ राजा हाँ और ज़ोर से पेलो ने कस के. और मेरी आवाज़ सुन के कस के वो मुझे दबोच लेते,

मेरी चूंचियो को मसल देते कचकचा के काट लेते. थोड़ी ही देर मे वो लंड,

सुपाडे तक निकाल लेते और जब मैं मस्ती से बिलबिलाने लगती तो वो फिर मेरे चूतड़ पकड़ एक बार मे ही पूरा का पूरा पेल देते और मैं दर्द से चीख उठती. कभी मैं चीखती,

कभी मैं सिसकती, कभी कस कस के चूतड़ पटकती. हम दोनो ने कस के एक दूसरे को अपनी बाहो मे बाँध रखा था, बाकी सारी दुनिया से बेख़बर. तभी मुझे याद आया कि किचेन का बाहर का दरवाजा तो मेने खोल दिया था, थाली ले जाने के लिए, लेकिन किचेन से बेड रूम का दरवाजा मेने सिर्फ़ भिड़ाया था. तभी मुझे लगा, शायद दरवाजे की फाँक खुली सी है और कोई झाँक रहा है. मुझे लगा शायद दुलारी है.

थाली उठाने आई होगी और तभी उन्होने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा और बोला, डालु.

मेने कस के उन्हे अपनी ओर खींचा और बोली हाँ राजा हाँ डाल दो अपने लंड, दो ना पूरा,

बहुत मज़ा आ रहा है और उन्होने कस के, मेरी चूंची पकड़, हचक के चोदना चालू कर दिया. और मैं भी चूतड़ उठा उठा के तभी मेरी कनेखियो ने देखा शायद अंजलि भी है दुलारी के साथ और मेरे पैर कैंची की तरह उनके हिप्स पे बँध गये .मेने कस के उनकी पीठ पे अपने नाख़ून गढ़ा दिए, और उनके कान मे बोली, डार्लिंग तुम बहुत अच्छे हो आई लव यू. उन्होने भी मेरा चेहरा उठा के खूब ज़ोर से कहा डार्लिंग आई लव यू डार्लिंग आई लव यू और सेकडो चुम्मि मेरे चेहरे पे ले डाले. इस दौरान भी उनका लंड अपना काम करता रहा और मैं भी उनका साथ चूतड़ उठा उठा के देती रही. एक पल रुक के कस के मेरी चुचिया मसलते हुए वो बोल रहे थे,

ज़ोर ज़ोर से मेरी जान तुम तुम बहुत अच्छी हो. तुम्हारी हर बात जो तुम कहो, जो तुम चाहो मैं सब करूँगा, डार्लिंग आइ लव यू, सो मच. मेने भी कस के उन्हे चूमते हुए कहा, देन लव मी हार्ड और फिर क्या था उन्होने दूने जोश से चोदना चालू कर दिया. तब तक किचेन से किसी बरतन के गिरने की आवाज़ आई. वो एक पल के लिए ठिठक से गये. मैं उन्हे फिर से अपनी ओर खींच कर नीचे से चूतड़ उचका कर बोली, "जाने दो डार्लीग कोई बिल्ली होगी. हमारी तुम्हारी झूठी थाली चाट रही होगी. करो ना और ओह ओह.." और फिर वो दुबारा. हम दोनो इस तरह गुथम गुथा थे कि अगर शायद कोई बगल मे भी खड़ा होता तो हमारे उपर कोई असर नही होता. कुछ देर बाद उन्होने मुंझे बहो मे बाँधे बाँधे, सेड पॉज़ मे कर लिया. मेरे दोनो पैर फैले हुए और वो तो खुद तो पूरी ताक़त से पेल ही रहे थे, मेरे चूतड़ पकड़ के मुझे भी कस कस के अपनी ओर खींच रहे थे. काफ़ी देर तक इसी तरह चुदाई करते हुए हम दोनो साथ साथ झाड़ गये और उसी पॉज़ मे एक दूसरे की बाहो मे सो भी गये.

क्रमशः……………………………………
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