प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - Printable Version

+- Sex Baba (//ht.mupsaharovo.ru)
+-- Forum: Indian Stories (//ht.mupsaharovo.ru/filmepornoxnxx/Forum-indian-stories)
+--- Forum: Hindi Sex Stories (//ht.mupsaharovo.ru/filmepornoxnxx/Forum-hindi-sex-stories)
+--- Thread: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ (/Thread-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81)

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

लिफ्ट से नीचे आते मैं सोच रहा था कि ये औरतें भी कितनी जल्दी आपस में खुल कर एक दूसरे से अपने अंतरंग क्षणों की सारी बातें बता देती हैं। मधु मेरे सामने तो लंड, चूत और चुदाई का नाम लेते भी कितना शर्माती है और इस जीत रानी (रूपल) को सब कुछ बता दिया। ओह … मधु मेरे मन की बात जानती तो है। चलो कोई अच्छा मौका देख कर इस बाबत बात करूंगा। जब मैं बाज़ार से लौट कर आया तो हाल में इक्का दुक्का आदमी ही थे। एक मेज़ पर एक फिरंगी लड़की और काला हब्शी बैठे कोल्ड ड्रिंक पी रहे थे। फिरंगन ने पतली गोल गले की शर्ट और लाल रंग की पैंटी डाल रखी थी जिस में उसकी चूत का उभार और कटाव साफ़ नज़र आ रहा था उसकी गोरी गोरी पुष्ट जांघें इतनी कातिलाना थी कि मैं उनको देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। साले इस काले हब्शी ने भी क्या किस्मत पाई है मैंने मन में सोचा। जीत कई बार कहता है गोरी की गांड और काली की चूत बड़ी मजेदार होती है। साली ये फिरंगी लड़कियां तो गांड भी आसानी से मरवा लेती हैं इस 6.5 फुट के लम्बे चौड़े काले दैत्य की तो पौ बारह ही हो गई होगी। अब आप मेरी हालत का अंदाजा अच्छी तरह लगा सकते हैं। थोड़ी दूर एक 40-42 साल का लम्बे बालों वाला दुबला पतला सा बढ़ऊ बैठा कॉफ़ी पी रहा था। उसने अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहना था। माथे पर तिलक लगा था और सिर पर हिमाचली टोपी पहन रखी थी। मुझे भी चाय की तलब हो रही थी। सच पूछो तो चाय तो बहाना था मैं तो उस फिरंगन की गोरी गोरी जांघें और भरे नितम्बों को देखने के चक्कर में रुका था। मैं उस बढ़ऊ के साथ वाली मेज पर बैठ गया। यहाँ से उसे अच्छी तरह देखा जा सकता था। बढ़ऊ मुझे ही घूरे जा रहा था। उसकी आँखों में अजीब सा आकर्षण था। जब मेरी आँखें दुबारा उस से मिली तो मैंने पता नहीं क्यों उसे अभिवादन कर दिया। उसने मुस्कुराते हुए अपने पास ही बैठ जाने का इशारा किया तो मैं उठ कर उसके पास ही आ बैठा। मैंने पास आकर उसका अभिवादन किया,"मुझे प्रेम चन्द्र माथुर कहते हैं।" "मैं नील चन्द्र राणा हूँ भौतिक विज्ञान का प्रोफ़ेसर हूँ। पहले पठानकोट में था, आजकल अहमदाबाद आ गया हूँ। हमारे पूर्वज राजस्थान से पलायन करके हिमाचल में आ कर बस गए थे।" बढ़ऊ ने एक ही सांस में सब बता दिया। "धन्यवाद प्रोफ़ेसर साहब !" "क्या आप यहाँ पहली बार आये हैं ?" उसने पूछा। उसकी संतुलित भाषा और सभ्य लहजा सुनकर मैं बड़ा प्रभावित हुआ। मैंने कहा "जी हाँ मैं और मेरी पत्नी पहली बार ही आये हैं।" "ओह... अति उत्तम … यह नव विवाहित युगलों के लिए बहुत दर्शनीय स्थल है। मैं भी अपनी धर्म पत्नी और पुत्री के साथ पहली बार ही आया हूँ पर आपकी तरह नव विवाहित नहीं हूँ।" हम दोनों ही हंस पड़े। ओह... यह प्रोफ़ेसर तो रोमांटिक बातें भी कर लेता है? मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने बात जारी रखी "खजुराहो के मंदिरों के अलावा यहाँ से कोई 40-50 की.मी. दूर एक बहुत अच्छा स्थान और भी है।" "हूँ ?" "लिंगेश्वर और काल भैरवी मंदिर और साथ ही बने रंगमहल (जयगढ़) के बारे में तो आपने सुना होगा ?" "नहीं… मैंने बताया ना कि हम यहाँ पहली बार आये हैं, मुझे यहाँ के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। मैंने अजयगढ़ और कालिंजर दुर्ग के बारे में इन्टरनेट पर कुछ जानकारी देखी थी। पर लिंगेश्वर के बारे में तो …... नहीं सुना ? आपने तो देखा होगा कृपया बता दें।" "ओह …" बढ़ऊ इतना बोल कर कुछ सोच में पड़ गया। मैं बेचैनी से पहलू बदल रहा था। थोड़ी देर बाद उसने अपनी चुप्पी तोड़ी "क्या तुम परा-भौतिक विज्ञान पर विश्वास करते हो ?" अजीब सवाल था। "प ... परा ... वि ... ज्ञान... जी नहीं मैंने इसके बारे में नहीं सुना ?" मैंने कहा। "हूँ …" उसके मुँह से केवल इतना ही निकला। यह बढ़ऊ तो रहस्यमयी लगने लगा था। "देखो विज्ञान की तीन शाखाएं होती हैं- रसायन, जैव और भौतिक विज्ञान। भौतिक विज्ञान में पदार्थ, ब्रह्माण्ड और खगोल विज्ञान शामिल हैं। जैव और भौतिक विज्ञान दोनों को मिला कर एक और विज्ञान है जिसे प्रचलित भाषा में अध्यात्म कहा जाता है। अधिकतर लोगों तो यही सोचते और समझते हैं कि अध्यात्म और विज्ञान विरोधाभासी हैं और दोनों अलग अलग धाराएं हैं। पर वास्तव में ये एक ही हैं। भौतिक विज्ञान कहता है कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसी एक ही पदार्थ से बना है अध्यात्म के अनुसार इस पूरी सृष्टि को परमात्मा ने रचा है। भौतिक विज्ञान कहता है कि कोई भी पदार्थ या अपदार्थ कभी नष्ट नहीं हो सकता बस उसका स्वरुप या स्थान परिवर्तित हो जाता है। जब कि अध्यात्म में इसे आत्मा कहा जाता है जो अजर, अमर और अविनाशी है जो कभी नहीं मरती। वैज्ञानिक शोध कार्य और परीक्षण द्वारा खोज करते हैं जबकि योगी साधना और तपस्या से सिद्धि प्राप्त करते हैं। दोनों एक ही कार्य करते हैं बस माध्यम और ढंग अलग होता है।" "हम परा-विज्ञान की बात कर रहे थे। चलो एक बात बताओ ? कई बार तुमने देखा होगी कि हम किसी व्यक्ति को जब पहली बार मिलते हैं तो वो पता नहीं हमें क्यों अच्छा लगता है। हम उससे बात करना चाहते हैं, उसकी निकटता चाहते हैं और दूसरी ओर किसी व्यक्ति को देख कर हमें क्षोभ और चिढ़ सी होती है जबकि उस बेचारे ने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा होता। ऐसा क्यों होता है ? अच्छा एक बात और बताओ तुम मुझे नहीं जानते थे, ना कभी पहले मिले थे फिर भी तुमने मुझे अभिवादन किया ? क्यों ?" "वो... वो... मैं ... ?" मुझे तो कोई जवाब ही नहीं सूझा। "मैं समझाता हूँ !" प्रोफ़ेसर ने गला खंखारते हुए कहा,"हमारे इस शरीर से कुछ अदृश्य किरणें निकलती रहती हैं जो हमारे शरीर के चारों ओर एक चक्र (औरा) बनाये रहती हैं। यदि दोनों व्यक्तियों की ये अदृश्य किरणें धनात्मक हुई तो वो एक दूसरे को अच्छे लगेंगे अन्यथा नहीं। जिसका यह चक्र जितना अधिक विस्तृत होगा उसका व्यक्तित्व उतना ही विशेष होगा और वह सभी को प्रभावित कर लेगा।" "भौतिक विज्ञान के अनुसार जब कोई पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता तो फिर हमारी स्मृतियाँ और विचार कैसे नष्ट हो सकते हैं। वास्तव में मृत्यु के बाद हमारे भौतिक शरीर के पञ्च तत्वों में मिल जाने के बाद भी हमारी स्मृतियाँ और आत्मा किसी विद्युत और चुम्बकीय तरंगों या अणुओं के रूप में इसी अनंत ब्रह्माण्ड में विद्यमान रहती हैं। श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार भी वही अपदार्थ, अणु या अदृश्य तरंगें (आत्मा) अपने अनुकूल और उपयुक्त शरीर ढूंढ कर नया जन्म ले लेता है। हम सबका पता नहीं कितनी बार जन्म और मृत्यु हुई है।" "हमारे इस भौतिक शरीर के इतर (परे) भी एक और शरीर और संसार होता है जिसे सूक्ष्म शरीर और परलोक कहते हैं। पुनर्जन्म, परा विज्ञान और अपदार्थ (एंटी मैटर) की अवधारणाएं भी इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित हैं।" "एक और बात बताता हूँ।" बढ़ऊ ने कहना जारी रखा। "अपना पिछला जन्म और भविष्य जानने की सभी की उत्कट इच्छा रहती है। पुरातन काल से ही इस विषय पर लोग शोध कार्य (तपस्या) करते रहे हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ सत्य हुई हैं। आपने भारतीय धर्मशास्त्रों में श्राप और वरदानों के बारे में अवश्य सुना होगा। वास्तव में यह भविष्यवाणियाँ ही थी। उन लोगों ने अपनी तपस्या के बल पर यह सिद्धियाँ (खोज) प्राप्त की थी। यह सब हमारी मानसिक स्थिति और उसकी किसी संकेत या तरंग को ग्रहण करने की क्षमता पर निर्भर करता है। आध्यात्म में इसे ध्यान, योग या समाधी भी कहा जाता है। इसके द्वारा कोई योगी (साधक) अपने सूक्ष्म शरीर को भूत या भविष्य के किसी कालखंड या स्थान पर ले जा सकता है और उन घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में जान सकता है। आपने फ्रांस के नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों के बारे में तो अवश्य सुना होगा। आज भी ऐसा संभव हो सकता है।" "क्या आप भी इनके बारे में जानते हैं ?" मैंने डरते डरते पूछा कहीं बढ़ऊ बुरा ना मान जाए। प्रोफ़ेसर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराया और फिर बोला "देखो तुम शायद सोच रहे होंगे कि यह प्रोफ़ेसर भी भांग के नशे में गप्प मार रहा होगा पर इस सम्बन्ध में तो महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने (जिसका सापेक्षवाद का सिद्धांत विज्ञान की दुनिया में मील का पत्थर है) अपने जीवन के अंतिम दिनों में (पिछली शताब्दी के 40 के दशक में) एक अविश्वसनीय और चमत्कारी खोज की थी ‘यूनिफाइड फ़ील्ड थ्योरी’। यह किसी पदार्थ को अदृश्य (अपदार्थ बना देना) कर देने का सूत्र था। उसे डर था कि कुछ लोग इसका गलत लाभ उठा सकते हैं इसलिए उसने इस सूत्र को गुप्त रखा। पर सन 1943 में जब हिटलर विश्व विजय का सपना देख रहा था तब यह सूत्र अमेरिकी सरकार को देना पड़ा। लगभग उन्हीं दिनों उसने समय की गति को आगे पीछे करने का सूत्र भी खोज लिया था। यह इतनी रहस्यमयी खोज थी कि इसके द्वारा भूत या भविष्य के किसी भी काल खंड में पहुंचा जा सकता था। यह अवधारणा गप्प नहीं वैज्ञानिक तथ्य है। यह सूत्र (फ़ॉर्मूला) भी उसने बहुत गोपनीय रखा था। अमेरिका के गृह मंत्रालय की फाइलों में आज भी उस खोज से सम्बंधित दस्तावेज पड़े हैं। अमेरिका सरकार ने उसे गुप्त और सुरक्षित रखा है। तुमने टाइम मशीन के बारे में तो अवश्य सुना और फिल्मों में देखा होगा। यह सब उसी सूत्र पर आधारित है।" "गीता में बहुत से योगों के बारे में बताया गया है पर इन में कर्म, भक्ति और ज्ञान योग को विशेष रूप से बताया गया है। ज्ञान योग में ही एक शाखा ध्यान, समाधि, सम्मोहन और त्राटक की भी है। मैं तुम्हें एक अनुभूत प्रयोग करके दिखाता हूँ। तुम अपनी आँखें बंद करो और मैं जो कहूं उसे ध्यान से सुनो और वैसा ही विचार करो।" प्रोफ़ेसर के कहे अनुसार तो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली तो वो बोला,"प्रेम ! तुम एक नदी के किनारे खड़े हो। दूर पहाड़ों से आती इस नदी का जल देखो कितना निर्मल लग रहा है। इसकी बल खाती लहरें देखो ऐसे लग रही हैं जैसे कोई नवयुवती अपनी कमर लचका कर चल रही हो !" मुझे लगा जैसे मैं सचमुच किसी नदी के किनारे ही खड़ा हूँ और मधु सफ़ेद पैंट पहने अपने नितम्बों को मटकाती नदी के किनारे चल रही है। ओह... यह तो कमाल था। "अब अपनी आँखें खोल लो !" मैंने अपनी आँखें खोल ली तो प्रोफ़ेसर ने पूछा,"तुमने कुछ देखा ?" "हाँ सचमुच मुझे ऐसा लगा जैसे मैं नदी के किनारे खड़ा हूँ और उसकी बल खाती लहरों और साफ़ पानी को देख रहा हूँ। उस में चलती नाव और मछलियाँ भी मैंने देखी !" मैंने मधु वाली बात को जानबूझ कर गोल कर दिया। "मेरे अनुमान है तुम इस सिद्धांत से सहमत हो गए हो ! वास्तव में हम जब अपनी सभी इन्द्रियों को नियंत्रित करके ध्यान पूर्वक किसी व्यक्ति, स्थान, घटना या कालखंड के बारे में सोचते हैं तो हमारे मस्तिष्क में वही सब अपने आप सजीव हो उठता है और हम वहीं पहुँच कर उसे देखने लग जाते हैं। इसे दिवा स्वप्न भी कहते हैं। वास्तव में हम जो रात्रि में सपने देखते हैं या जो तुमने आँखें बंद करके अभी देखा या अनुभव किया वह सब कहाँ से आया था और अब कहाँ चला गया ? वास्तव में वह ‘अपदार्थ’ (एंटी मैटर) के रूप में कहीं ना कहीं पहले से विद्यमान था, अब भी है और भविष्य में भी रहेगा। यही ‘परा-विज्ञान’ है।" "ओह … अद्भुत !..." मैं तो अवाक सुनता ही रहा। मैं अपने भविष्य के बारे में कुछ जानना चाहता था। मैंने पूछा "प्रोफ़ेसर साहब एक बात बताइये- क्या आप हस्त रेखाओं के बारे में भी जानते हैं ?" उसने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे मैं कोई शुतुरमुर्ग या चिड़िया घर से छूटा जानवर हूँ। ओह … मुझे अब अपनी गलती का अहसास हुआ था। मैं बेतुका और बेहूदा सवाल पूछ बैठा हूँ। प्रोफ़ेसर मुस्कुराते हुए बोला,"हाँ मैं हस्त रेखा और शरीर विज्ञान के बारे में भी जानता हूँ।" "ओह … मुझे क्षमा करें मैंने व्यर्थ का प्रश्न पूछ लिया !" "नहीं प्रेम कोई भी प्रश्न व्यर्थ नहीं होता। यह सब अवचेतन मन के कारण होता है। तुम संभवतः नहीं जानते हमें रात्रि में जो स्वप्न आते हैं वो सब हमारे अवचेतन मन में दबी-छिपी इच्छाओं का ही रूपांतरण होता है। तुमने हस्त रेखाओं के बारे में पूछा है तो तुम्हारे में कहीं ना कहीं कुछ पाने की अदम इच्छा बलवती हो रही है और तुम इन हस्त रेखाओं के माध्यम से यह जानने का प्रयास कर रहे हो कि वो कभी फलीभूत होंगी या नहीं ?" ओह … यह प्रोफ़ेसर तो कमाल का आदमी है। यह सौ फ़ीसदी सत्य था कि उस समय मैं यही सोच रहा था कि क्या कभी मैं मधु के साथ वो सब कर पाऊंगा जो अभी थोड़ी देर पहले सत्यजीत अपनी पत्नी के साथ कर रहा था। "वैसे तो प्रकृति ने किसी विशेष कारण से मानव की भविष्य को जानने की क्षमता (शक्ति) भुला दी है पर फिर भी बहुत कुछ बताया जा सकता है। वास्तव में तो हमारे वर्तमान के कर्म ही हमारे भाग्य या भविष्य का निर्माण करते हैं और उन्हीं कर्मों का प्रतिरूपण होते हैं। ओह … छोड़ो … लाओ तुम अपना दायाँ हाथ दिखाओ ?" प्रोफ़ेसर ने कहा तो मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया। प्रोफ़ेसर ने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ लिया और उसे थोड़ा सा फैला लिया और रेखाएं देखने लगा। कुछ देर वो देखता रहा और फिर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराया। "प्रेम एक बात बताओ क्या तुम्हारे किसी अंग विशेष पर कोई तिल है ?" अजीब सवाल था। हस्त रेखाओं की बात चल रही थी और यह पट्ठा तिल के बारे में पूछ रहा है। मैंने कहा "मेरे दाहिने होंठ पर तिल है और एक तिल पेट पर नाभि के पास भी है। और हाँ एक… और …" कहते कहते मैं रुक गया। "संकोच मत करो बताओ और कहाँ पर है ?" "मेरे गुप्तांग पर भी एक तिल है !" "सही जगह बताओ ... झिझको नहीं !" "ओह … वो... दरअसल मेरे शिश्न के अग्र भाग (शिश्नमुंड) पर भी एक तिल है !" मैंने संकुचाते हुए कहा। "अति उत्तम … क्या तुम्हारी धर्म पत्नी के भी किसी अंग पर कोई तिल है ?" "मैंने ध्यान नहीं दिया ! क्यों ?" मैंने पूछा।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मुझे पता है कि मधु की दाईं जांघ पर अन्दर की तरफ एक काला सा तिल है। मधु ने अपनी मुनिया के नीचे दोनों जाँघों पर मेहंदी से फूल बूंटे से बना रखे थे इसलिए पहले तो मेरा ध्यान नहीं गया पर परसों रात में मैंने जब उसकी मुनिया को जम कर चूसा था तब मेरी निगाह उस पर पड़ी थी। पर मैंने गोल मोल जवाब देना ही ठीक समझा। "चलो कोई बात नहीं। तुम्हारे होंठ पर जो तिल है वो इस बात को दर्शाता है कि तुम्हें बहुत सी स्त्रियों का प्रेम तो मिलेगा पर वो सभी तुमसे बिछुड़ जायेंगी। तुम्हारे शिश्न के अग्र भाग पर जो तिल है वो इस बात का द्योतक है कि तुम बहुत रंगीन और स्वछन्द प्रवृति के व्यक्ति हो। इसे अन्यथा मत लेना मित्र। तुम ध्यान से देखना तुम्हारी पत्नी के जनन अंगों के आस पास भी इस तरह का तिल अवश्य होगा। प्रकृति ने सभी चीजें बड़ी रहस्यमयी ढंग से बनाई हैं।" "ओह.." मैं तो हैरान हुआ मुँह बाए बस उसे देखता ही रह गया। उसने मेरी अनामिका और तर्जनी अंगुली की ओर आती एक पतली सी रेखा की ओर इशारा करते हुए बताया कि यह जो रेखा बृहस्पति पर्वत से मिल रही है विद्या या ज्ञान की रेखा है। इसका अर्थ है कि तुम्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का योग है। तुम जिस क्षेत्र में भी कार्य करोगे सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचोगे। बड़े लेखक या कलाकार भी बन कर भी प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हो। हाँ तुम्हारा शुक्र पर्वत तो बहुत ही उभरा हुआ है। मुझे क्षमा करना तुम्हारे अपनी पत्नी के अलावा भी अन्य स्त्रियों से सम्बन्ध बनाने का योग है।" हालांकि प्रोफ़ेसर धीरे धीरे बोल रहा था पर मैंने अपनी नज़रें इधर उधर दौड़ाई कोई और तो नहीं सुन रहा। "मैंने देखा नहीं है पर मुझे विश्वास है कि तुम्हारी पत्नी भी बहुत सुन्दर होगी क्योंकि तुम्हारी हृदय रेखा जिस तरह से चाँद (अर्क) बना रही है उस से तो यही पता चलता है। तुम्हें दो पुत्रों का भी योग है।" कहते हुए प्रोफ़ेसर हंसने लगा। मेरे पुराने पाठक जिन्होंने "मेरी अनारकली" और "नन्दोईजी नहीं लन्दोईजी" नामक कहानियां पढ़ी हैं वो इन पुत्रों के बारे में जानते हैं। ओह... यह तो बाद की बात थी पर उस समय मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। पर आज जब सोचता हूँ तो मुझे बड़ी हैरानी होती है कि उस प्रोफ़ेसर ने इतना सब कैसे जान लिया था। उसने अन्य रेखाओं के बारे में भी बताया था पर वो सब मुझे याद नहीं है। "ओह... तुस्सी इत्थे बैठे हो, मैं कदों दी तुहानू उडीक रई सी?" एक कर्कश और भारी सी आवाज ने हम दोनों का ध्यान भंग किया। एक 35-36 साल की मोटी ताज़ी महिला हमारे सामने खड़ी थी। रंग गोरा था और चेहरा गोल मटोल सा था। गाल इस कदर भरे भरे थे कि आँखें कंजी (छोटी) लग रही थी। आँखों के नीचे की त्वचा सांवली सी हो रही थी और सूजी हुई भी लग रही थी। मैंने कहीं पढ़ा था कि सेक्स में असंतुष्ट रहने के कारण ऐसा हो जाता है। मुझे लगा बढ़ऊ के पल्ले कुछ नहीं है या रात में इस मोटी के साथ कुछ नहीं कर पाता होगा। अपनी जवानी में तो यह मोटी भी जरूर खूबसूरत रही ही होगी। खंडहर बता रहे हैं कि इमारत कभी ना कभी तो जरूर बुलंद रही होगी। "ओह... कनिका, यह मेरे मित्र हैं प्रेम माथुर … अपना मधुमास मनाने खजुराहो आये हैं !" प्रोफ़ेसर ने परिचय कराया। "ओह... बोहत चंगा जी ! किन्ने दिनां दा प्रोग्राम हैगा जी तुहाडा ?" उसने पंजाबी भाषा में कहते हुए अपना हाथ मिलाने मेरी ओर बढ़ा दिया। "तुहानू मिल के बोहत ख़ुशी होई जी !" मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा। मैं भी पंजाबी बोल और समझ लेता हूँ। मेरे साथ पढ़ने वाले गोटी (गुरमीत सिंह) ने मुझे काम चलाऊ पंजाबी सिखा दी थी। "ओह... तुस्सी वी पंजाबी जाणदे ओ ?" "हाँ जी !" "फेर ते बहोत ही चंगा है जी, कोई ते अपने पंजाब दा मिलया !" मोटी ने अब तो मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया। वह तो पीछा ही नहीं छोड़ रही थी। वो तो जैसे आँखों ही आँखों में मुझे निचोड़ लेना चाहती थी। उसकी कामुक निगाहें मैं अच्छी तरह पहचानता था। उसके दायें होंठ के ऊपर भी मेरी तरह तिल जो बना था। साली की दोनों जाँघों पर भी जरूर तिल होगा। मैं तो किसी तरह उससे पीछा छुड़ाने की सोच ही रहा था कि इतने में एक 17-18 साल की लौंडिया पास आ कर बैठ गई। उसने स्कर्ट और टॉप पहना था। सिर पर नाइके की टोपी और स्पोर्ट्स शूज पहने थी। कानों में मधु की तरह छोटी छोटी सोने की बालियाँ, मोटी मोटी बिल्लोरी आँखें, कसे हुए गोल मटोल नितम्ब, नागपुरी संतरों जैसे बूब्स, गोरा रंग और छछहरा बदन। उसके घुंघराले बाल देख कर तो मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि उसकी पिक्की पर भी ऐसे ही घुंघराले रोयें आने शुरू हो गए होंगे। मैं तो उस फुलझड़ी को देखता ही रह गया। उसकी जांघें देख कर तो मैं बेहोश होते होते बचा। यह तो मधु की जैसे छोटी बहन ही लग रही थी। ओह … जैसे सिमरन या मिक्की ही मेरे सामने बैठी हो। (सिमरन मेरी पहली प्रेयसी थी। सिमरन और मिक्की की कहानी आप क्रमशः "काली टोपी लाल रुमाल" और "तीन चुम्बन" के नाम से पढ़ सकते हैं) "पापा चलो ना मुझे आइस क्रीम खानी है !" उसकी आवाज तो मिक्की और सिमरन से भी ज्यादा सुरीली थी। मैं तो उसे देखता ही रह गया। हे लिंगेश्वर ! अगर यह चिड़िया मुझे मिल जाए तो बस मैं तो मधु के बजाय इसी के साथ अपना हनीमून मना लूं। इतनी छोटी उम्र में ही इतनी कातिल बन गई है तो जब और थोड़ी बड़ी होगी तो पता नहीं कितने घर बरबाद करेगी। मैं तो कुछ देर और बैठना चाहता था पर मोटी और प्रोफ़ेसर को कोई शक ना हो जाए मैं डर रहा था। "ओह्हो … सोणी रुक थोड़ी देर ! साह्नू गल्ल करण दे !" मोटी ने उसे टोका तो वो मुँह फुला कर बैठ गई। या … अल्लाह….. तुनकते हुए तो वो निरी सिमरन या मधु ही लग रही थी। "सलोनी बेटा ! बस अभी चलते हैं !" प्रोफ़ेसर ने उसे पुचकारते हुए कहा। ओह … इस चिड़िया का नाम सलोनी है। इसकी आँखें और चेहरा देख कर तो यही नाम जंचता है। मैंने अपने मन में ही कहा,"अति उत्तम मेरी सोहनी !" "अच्छा प्रेम, कल मिलेंगे, शुभ रात्रि !" प्रोफ़ेसर ने उठते हुए कहा। "प्रोफ़ेसर साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद !" मैंने हाथ मिलाते हुए कहा। मोटी ने भी मेरा हाथ अपने हाथ में फिर से लेते हुए कहा,"प्रेम जी, कल कित्थे कित्थे जाण दा प्रोग्राम है ?" "ओह... कल तो हम लोग यहाँ के मंदिर ही देखने जायेंगे !" "असी वी नाल ही चलांगे ?" "ठीक है जी !" मैंने कहा। ख़ुशी के मारे मेरी तो बांछें ही खिल गई। कल पूरे दिन इस सलोनी सोनचिड़ी का साथ मिलेगा। हे भगवान् ! तू कितना रहनुमा और अपने भक्तों पर कितना दयालु है ! मेरे लिए एक और तितली का जुगाड़ कर दिया। अब तो हनीमून का मज़ा दुगना क्या तिगुना हो जाएगा। रात को मैंने इसी तितली की याद में मधु को तीन बार कस कस कर रगड़ा और उसे अधमरा करके रात को दो बजे सोने दिया।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

आज हमारा खजुराहो के मंदिर देखने का प्रोग्राम था। रात के घमासान के बाद सुबह उठने में देर तो होनी ही थी। सत्यजीत का जब फ़ोन आया तब आँख खुली। वो बोल रहा था "ओह … क्या बात है गुरु ? रात में ज्यादा स्कोर कर लिया था क्या ?" "अरे नहीं यार कल रात को अच्छे से नींद नहीं आई थी !" "नींद नहीं आई थी या भाभी ने सोने नहीं दिया था ?" "ओह... यार देर हो रही है ! हम जल्दी से तैयार होकर आते हैं !" "यार स्कोर तो बता दो कल का ?" "ओह... तुम भी... भाई मैंने तिहरा शतक लगाया था… और तुमने ?" "यार मैंने तो 2*2 किया था !" "क्या मतलब ?" "तुम भी बावली बूच ही हो…. अमां यार। दो बार चूत मारी और दो बार जम कर गांड मारी थी !" "ओह …" मैंने फ़ोन काट दिया नहीं तो वो फिर अपना भाषण शुरू कर देता कि मैं मधु कि गांड क्यों नहीं मारता। अब मैं उसे क्या समझाता। मैं सोती हुई मधु की प्यारी सी चूत पर एक पुच्ची लेकर उसे जगाने के लिए जैसे ही उसकी ओर बढ़ा उसने आँखें खोलते हुए पूछा,"कौन था ?" "वो… वो सत्यजीत हमारा नीचे इंतज़ार कर रहा है... तुम जल्दी तैयार हो जाओ !" मुझे कहना पड़ा। मधु चादर से अपना नंगा शरीर ढांपते हुए बाथरूम में घुस गई। हम जल्दी से तैयार होकर नीचे आये तो सत्यजीत और रूपल बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहे थे। मोटी और सलोनी भी एक मेज़ पर बैठी नाश्ता कर रही थी। प्रोफ़ेसर कहीं नज़र नहीं आ रहा था। मुझे उससे कुछ और बातें भी पूछनी थी। बाद में मोटी ने बताया था कि उनकी तबीयत नरम है हमारे साथ नहीं जाएगा। मैंने अपने मन में कहा- अति उत्तम ! खजुराहो के मंदिर अपनी आकृति सौन्दर्य के लिए ही नहीं बल्कि अपनी सजावट की सजीवता के लिये भी जाने जाते हैं। खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा खजुराहो किसी जमाने में चंदेल वंश के राजाओं की राजधानी हुआ करता था पर अब तो सिमट कर एक छोटा सा गाँव ही रह गया है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पड़ता है। चंदेल वंश के राजा चन्द्र वर्मन ने यहाँ तालाबों और उद्यानों से आच्छदित 85 मंदिरों का निर्माण 950 से 1050 ईस्वी में करवाया था। ये हिन्दू और जैन मंदिर मध्ययुगीन भारत की वास्तु शिल्पकला के अद्भुत नमूने हैं। अब तो इन में 20-22 ही बचे हैं। शायद यहाँ पर खजूर के बहुत पेड़ हुआ करते थे इसलिए इस जगह का नाम खजुराहो पड़ गया? यहाँ के प्रसिद्ध मैन्दिरों में कंदरिया महादेव, चौसठ योगिनी, पार्श्वनाथ, देवी जगदम्बा मंदिर और चतुर्भुज मंदिर प्रमुख हैं। रति क्रीड़ा (सम्भोग) की विभिन्न कलाओं को पत्थरों पर बेहद ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। मैथुनरत मूर्तियाँ पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध को दर्शाती हैं। कई जगह मुखमैथुन, समलैंगिक व पशु मैथुन के भी चित्र हैं। कामसूत्र से प्रेरित रतिक्रीड़ा करती मूर्तियाँ तो ऐसे लगती हैं जैसे वो अभी सजीव हो उठेंगी। बिना परकोटा के सभी मंदिर ऊंचे चबूतरे पर निर्मित हैं। दैनिक उल्लास, पीड़ा, व्यथा, संगीत, गायन और नृत्य की मुद्राओं में ये पाषाण प्रतिमाएं तत्कालीन शिल्पियों के कला कौशल का चिर स्मारक हैं। पाषाण जैसे कठोर फलक पर उत्कीर्ण खजुराहो कला की जान अप्सराओं और सुर सुंदरियों की मूर्तियाँ, कोमल भावनाओं की कोमलतम अभीव्यक्तियाँ हैं । जूड़ों को संवारते, गेंद से क्रीड़ाएं करते, ललाट पर तिलक लगाते, नेत्रों में अंजन लगाते, अधरों पर लाली और पैरों में महावर रचाते हुए नारी-मूर्तियों को देख कर मन मंत्र मुग्ध हो जाता है। उन्नत वक्ष, नितम्ब और पतली कटी वाली नारी मूर्तियों के अंग प्रत्यंग की रचना देखते ही बनती है। बेहद पतली कमर, कोमल और लचीली कमर यौवन के भार को संभालने में असमर्थ सी लगती हैं। प्रेम की चाह में लीन युवती, आँखों में अंजन शलाका का स्पर्श देती हुई सुलोचना, बालक को स्तनपान कराती स्नेहमयी जननी और नुपूर बांधती नृत्योंदत्त किन्नर बाला की प्रतिमाएं अपनी जीवंत कला को समाहृत कर रही हैं । मैं तो ललचाई आँखों से उन मूर्तियों को देखता ही रह गया। मैंने मधु से जब उस मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि देखो इसके नितम्ब कितने सुडौल और भारी हैं ! काश इस तरह की कोई सुन्दर कन्या मुझे मिल जाए या ये मूर्तियाँ ही सजीव हो उठें तो बस इस मानव जीवन का मज़ा ही आ जाए। मधु ने मेरी ओर घूर कर देखा तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अनजाने में क्या बोल बैठा हूँ। मधु ने तो मुँह ही फुला लिया। फिर तो उसने सारे दिन मुझ से बात ही नहीं की। पूरा दिन तो इन मंदिरों को देखने में ही बीत गया। शाम को इन मंदिरों को बंद कर दिया जाता है। मोटी हमारे साथ ही चिपकी रही। उस सोनचिड़ी के साथ की मजबूरी नहीं होती तो मैं भला इस मोटी को क्या भाव देता। लौंडिया ने सफ़ेद पेंट और शोर्ट (छोटी शर्ट) डाल रखी थी। हे भगवान् ! कसी हुई पेंट में दोनों जाँघों के बीच फसी उसकी पिक्की का भूगोल साफ़ नज़र आ रहा था। मैं तो दिन भर यही सोच रहा था इसने अन्दर कच्छी (पेंटी) डाली होगी या नहीं। और अगर डाली है तो गुलाबी रंग की है या काले रंग की। सच पूछो तो मैं तो इसी फिराक में लगा रहा था कि किसी तरह इस सोनचिड़ी की चूचियाँ दबा सकूं या गालों पर हाथ फिरा सकूं, पर मोटी जरा दूर हटे तब ना। शाम को लौटते समय जब हम उस रेस्तरां में चाय पी रहे थे तब मधु वाशरूम जाने उठी। साली वो सोनचिड़ी भी साथ ही चली गई। मेरी रही सही आस भी जाती रही। मोटी ने अच्छा मौका जानकर बात शुरू की। "हाय प्रेमजी... तुहाडी वाइफ ते बड़ी ई सोहनी है ?" उसने एक ठंडी आह भरी। "हाँ जी … थैक्यू !" "ओह... जदों मेरी शादी होई सी मैं वी इन्नी ही सोहनी ते पतली सी !" "ओह … आप तो अभी भी बहुत खूबसूरत हैं !" "हाये मैं मर जावां !" वो तो किसी नवविवाहिता की तरह शरमा गई। ऐसे तो मधु शरमाया करती है जब मैं उसे अपना लंड हाथ में पकड़ने को कहता हूँ। "पर वेखो ना प्रोफ़ेसर साहब ते मेरी कदर ही नई करदे !" उसने बुरा सा मुँह बनाया। इतने में मधु वाश रूम वापस आती दिखाई दी। शुक्र है इस मोटी से पीछा छूटा। उधर सत्यजीत उस फिरंगन पर डोरे डाल रहा था। किसी बात पर वो सभी (सत्यजीत, रूपल, कालू और फिरंगन) हंस रहे थे। मुझे मोटी से बतियाते हुए देख कर उसने मेरी ओर आँख मार दी। इसका मतलब मैं अच्छी तरह जानता था, उसने कहा था ‘लगे रहो मुन्ना भाई’। बाद में मुझे उसने बताया था कि बित्रिस और कालू आज शाम की फ्लाईट से आगरा जा रहे हैं। उसने सत्यजीत से उसका मोबाइल नंबर ले लिया है और वो बाद में उस से बात करेगी। रात में मधु को मनाने में मुझे कम से कम 2 घंटे तो जरूर लगे होंगे। और फिर जब वो राजी हुई तो आज पहली बार उसने मेरे लंड को जम कर चूसा और फिर मुझे नीचे करके मेरे ऊपर आ गई और अपने नितम्बों से वो झटके लगाये कि मैं तो इस्स्स्स …… कर उठा। रोज़ मीठा खाने के बाद कभी कभी अगर नमकीन खाने को मिल जाए तो स्वाद और मज़ा दुगना हो जाता है। और फिर सारी रात मुझे उन भारी नितम्बों वाली मूर्तियों के ही सपने आते रहे जैसे वो सजीव हो उठी हैं और मुझे अपनी बाहें पसारे रति-क्रिया के लिए आमंत्रित कर रही हैं। पता नहीं क्यों उन सभी की शक्लें सलोनी और सिमरन से ही मिल रही थी। आज हमारा लिंगेश्वर और काल भैरवी मंदिर देखने जाने का प्रोग्राम था। लिंगेश्वर मंदिर में एक चबूतरे पर 11-12 फुट ऊंची एक विशालकाय कामदेव की नग्न मूर्ति बनी है। जिसका लिंग अश्व (घोड़ा) की तरह डेढ़ फुट लम्बा और 4-5 इंच (व्यास) मोटा है। कुंवारी लड़कियों को बड़ी चाह होती है कि उनके पति का लिंग मोटा और लम्बा हो। यहाँ पर वो इस मूर्ति का लिंग पकड़ कर मन्नत मांगती हैं कि उन्हें भी ऐसे ही लिंग वाला पति मिले। विवाहित स्त्रियाँ भी इसे अपने हाथों में पकड़ कर कामना करती हैं कि उनके पति को भी अश्व जैसी काम-शक्ति मिले। उसके साथ ही थोड़ी दूर काल भैरवी का मंदिर बना है जिसमें भैरवी (योगिनी) की बहुत सुन्दर नग्न मूर्ति बनी है। पर इसके बारे में मैं नहीं बताऊंगा।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मेरे प्रबुद्ध पाठक और पाठिकाएं जिन्होंने यह मंदिर और मूर्ति भले ही ना देखी हो, बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि मूर्ति कैसी होगी। काश ! आज सलोनी (मेरी नई चिड़िया) साथ होती तो बस मज़ा ही आ जाता। वो जब अपनी नाज़ुक सी अँगुलियों से उस मूर्ति के लिंग को पकड़ कर मन्नत मांगती तो उसके गालों की रंगत देख कर तो मैं इस्स्स्सस … कर उठता। पर पता नहीं आज मोटी और उस सलोनी का कोई अता पता नहीं था। मैं होटल के क्लर्क से पता करना चाहता था पर मधु जल्दी करने लग गई तो नहीं पूछ पाया। मधु ने अपनी पसंदीदा सफ़ेद जीन पेंट, टॉप और उसके ऊपर काली जाकेट पहनी थी। खुले बाल, आँखों पर काला चश्मा और हाथों में लाल रुमाल। उसके नितम्ब तो आज कमाल के लग रहे थे। मैंने आज चूड़ीदार पाजामा और लम्बी सी अचकन जैसा कढ़ाई किया कुरता और पैरों में जोधपुरी जूते पहने थे। रूपल ने भारी लहंगा और चोली पहनी थी। ऊपर चुनरी गले में मोतियों की माला। उसके पुष्ट और मोटे मोटे सुडौल उरोज तो ऐसे लग रहे थे जैसे उस पतली सी चोली को फाड़ कर बाहर ही आ जायेंगे। वो अपनी टांगें कुछ चौड़ी करके चल रही थी। मैं समझ गया कल रात भी जीत ने 2*2 जरूर किया होगा। सच कहूं तो मेरा लंड उसे देखते ही खड़ा हो गया था। वो तो जोधा अकबर वाली ऐश्वर्या ही लग रही थी। मैं तो उसे जोधा बाई कह कर छेड़ने ही वाला था पर बाद में मुझे कल वाली बात याद आ गई कहीं आज मधु बुरा मान गई तो मेरा पूरा दिन और रात ही पानीपत का मैदान बन जाएगी। मैं तो बस उसे देखता ही रह गया। पता नहीं सत्यजीत को क्या सूझा था उसने घुटनों तक के जूते और सैनिकों जैसे खाखी कपड़े पहने थे। 40 कि.मी. की दूरी तय करने में ही दो घंटे लग गए। अब गाड़ी आगे तो जा नहीं सकती थी ड्राईवर ने गाड़ी एक पेड़ के नीचे पार्क कर दी। आस पास कुछ दुकानें बनी थी जिन पर प्रसाद और फूल मालाएं बिक रही थी। भीड़ ज्यादा नहीं थी। हम सभी ने दो दो फूल मालाएं ले ली। 3-4 फर्लांग दूरी पर थोड़ी ऊंचाई पर लिंगेश्वर मंदिर दिखाई दे रहा था। जैसे ही हम आगे बढ़े, गाइड से दिखने वाले 3-4 आदमी हमारी ओर लपके। अरे… यह होटल वाला जयभान यहाँ क्या कर रहा है ? मैंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया। "श्रीमान, मैं गाइड हूँ और यहाँ पिछले 10 सालों से सैलानियों की सेवा कर रहा हूँ। मैं इस मंदिर का पूरा इतिहास जानता हूँ। अगर आप कहें तो मैं साथ चलूँ ? मैं आपको सारी बातें विस्तार से बताऊंगा" "ओह... पर वो जय ... ?" "हाँ... श्रीमान आप मेरे छोटे भाई जयभान की बात कर रहे हैं। हमारा चेहरा आपस में मिलता है इसलिए कई बार धोखा हो जाता है ! मेरा नाम वीरभान है।" उसने बताया। बाकी सभी तो आगे चले गए थे मैंने उसे अपने साथ ले लिया। रास्ते में उसने बताना चालू किया : खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के राजाओं ने बनाए थे। ऐसा माना जाता है जब जैन और बौद्ध दर्शन के वैराग्य से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में युवा सन्यासी बनाने लगे थे तब उन्हें रोकने के लिए यह तरीका अपनाया गया था। इनका उद्देश्य संभवतया यह रहा होगा कि मानव जाति कहीं इस काम रहस्य को भूल ही ना जाए। यह लिंगेश्वर और काल भैरवी मंदिर तो महाराज नील विक्रमादित्य चतुर्थ ने अपने एक मित्र राजा चित्र सेन की याद में बनवाया था। इसका वास्तविक नाम अश्वलिंग (घोड़े का लिंग) मंदिर था जो बाद में लिंगेश्वर बन गया। इसकी भी बड़ी रोचक कथा है। यहाँ का राजा चित्र सेन बहुत कामुक प्रवृति का राजा था। उसकी रानी भी एक युवा राजकुमार के प्रेम में पड़ी थी जो उसकी सौतेली युवा पुत्री से प्रेम करता था। अपने यौवन काल में राजा प्रतिदिन नई नई कुंवारी कन्याओं के साथ कई कई बार सम्भोग किया करता था। कुछ विशेष पर्वों या अवसरों पर वह अपने सामंतों और मंत्रियों के साथ सामूहिक सम्भोग भी किया करता था जिस में प्राकृतिक और अप्राकृतिक दोनों मैथुन शामिल होते थे। यह जो सामने पहाड़ी पर जयगढ़ बना है इसके अन्दर एक रंगमहल का निर्माण इसी प्रयोजन हेतु किया गया था। इसी रंगमहल में वह अपनी रासलीला किया करता था। कुछ दिनों बाद रानी ने षड्यंत्र रचा जिसके तहत एक विष कन्या के साथ सम्भोग करने के कारण वह अपनी पौरुष (काम) शक्ति खो बैठा। तब किसी सामंत या राज वैद्य ने कामशक्ति पुनः प्राप्त करने हेतु एक उपाय सुझाया कि इस रंगमहल में एक सौ किशोरवय अक्षत-यौवन कन्याएं रखी जाएँ जो हर समय नग्न अवस्था में राजन की सेवा में प्रस्तुत रहें। साथ ही उन्हें कुछ औषधियों के सेवन की भी सलाह दी। तीन माह तक ऐसा करने से राजा को खोई हुई काम शक्ति पुनः प्राप्त हो जाएगी और उनका लिंग भी अश्व जैसा हो जाएगा। फिर काम देव को प्रसन्न करने के लिए उस विष कन्या की बलि दे दी जाएगी। कुछ दिनों बाद रजा की काम शक्ति में कुछ सुधार आरम्भ हो गया। पर राजन के दुर्भाग्य ने अभी उसका पीछा नहीं छोड़ा था। उसकी रानी ने एक और षड़यंत्र रचा और उस विष कन्या को अमावस्या की रात को किसी तरह तरह कारागृह से बाहर निकाल दिया। उसने रात्रि में सोये हुए राजा का शीश अपने हाथ में पकड़े खांडे (एक छोटी पर भारी सी तलवार) से एक ही वार में धड़ से पृथक कर दिया। और उस रंगमहल को भी जाते जाते अग्नि को समर्पित कर दिया। सभी अन्दर जल कर भस्म हो गए।" "ओह …" मेरे मुँह से बस इतना ही निकला। बाकी सभी तो आगे निकल गए थे। मैं और वीरभान ही पीछे छूट गए थे। "फिर क्या हुआ ?" मैंने पूछा। "इस रंगमहल के बारे में बहुत सी किम्वदंतियां हैं। कुछ लोग तो अब भी इसे भूतिया महल कहते हैं। लोगों से सुना है कि आज भी अमावस्या की रात्रि में रंगमहल में बनी मूर्तियाँ सजीव हो उठती हैं और आपस में सामूहिक नृत्य और मैथुन करती हैं। रात को आस पास के रहने वाले लोगों ने कई बार यहाँ पर घुन्घरुओं और पायल की झंकार, कामुक सीत्कारें, चीखें और विचित्र आवाजें सुनी हैं। लोगों की मान्यता है कि वो भटकती आत्माएं हैं। इनकी शान्ति के लिए बाद में लिंगेश्वर और भैरवी मंदिर बनवाये थे और इस रंगमहल का भी जीर्णोद्धार उसी समय किया गया था। रंगमहल में लगभग 100 सुन्दर कन्याओं की रति-क्रीड़ा करते नग्न मूर्तियाँ भी इस मंदिर के निर्माण के समय ही बनाई गई थीं।" पता नहीं क्या और कितना सत्य था पर उसने कहानी बड़े रोचक अंदाज़ में सुनाई थी। वीरभान ने रहस्ययी ढंग से मुस्कुराते हुए जब यह बताया कि संयोगवश आज अमावस्या है तो मेरी हंसी निकल गई। मैं तो यही सोच रहा था काश ! सलोनी आज हमारे साथ होती तो इस रंगमहल में विभिन्न आसनों में मैथुन रत मूर्तियाँ इतने निकट से देख कर मस्त ही हो जाती और मेरा काम बन जाता। चलो सलोनी ना सही मधु तो इन अप्राकृतिक मैथुन रत मूर्तियों को देख कर शायद खुश हो जाए और मुझे उस स्वर्ग के दूसरे द्वार (गांड मारने) का मज़ा ले लेने दे ! मेरी प्यारी पाठिकाओं आप तो "आमीन" (खुदा करे ऐसा ही हो) बोल दो प्लीज।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मंदिर आ गया था। बाहर लम्बा चौड़ा प्रांगण सा बना था। थोड़ी दूर एक काले रंग के पत्थर की आदमकद मूर्ति बनी थी। हाथ में खांडा पकड़े हुए और शक्ल से तो यह कोई दैत्य जैसा सैनिक लग रहा था। उसकी मुंडी नीचे लटकी थी जैसे किसी ने काट दी हो पर धड़ से अलग नहीं हुई थी। ओह … इसकी शक्ल तो उस कालू हब्शी से मिल रही थी जो उस फिरंगन के पीछे लट्टू की तरह घूम रहा था। उसके निकट ही एक चोकोर सी वेदी बनी थी जिसके पास पत्थर की एक मोटी सी शिला पड़ी थी जो बीच में से अंग्रेजी के यू आकार की बनी थी। वीरभान ने बताया कि यह वध स्थल है। अपराधियों और राजाज्ञा का उल्लंघन करने वालों को यहीं मृत्यु दंड दिया जाता था। "ओह …" मेरे मुँह से तो बस इतना ही निकला। "और वो सामने थोड़ी ऊंचाई पर रंगमहल बना है मैंने आपको बताया था ना ?" वीर भान ने उस गढ़ी की ओर इशारा करते हुए कहा। "हूँ …" मैंने कहा। सामने ही कुछ सीढ़ियां सी बनी थी जो नीचे जा रही थी। मुझे उसकी ओर देखता पाकर वीरभान बोला "श्रीमान यह नीचे बने कारागृह की सीढियां हैं।" बाकी सभी तो आगे मंदिर में चले गए थे मैं उन सीढियों की ओर बढ़ गया। नीचे खंडहर सा बना था। घास फूस और झाड झंखाड़ से उगे थे। मैं अपने आप को नहीं रोक पाया और सीढ़ियों से नीचे उतर गया। सामने कारागृह का मुख्य द्वार बना था। अन्दर छोटे छोटे कक्ष बने थे जिन में लोहे के जंगले लगे थे। मुझे लगा कुछ अँधेरा सा होने लगा है। पर अभी तो दिन के 2 ही बजे हैं दोपहर के समय इतना अँधेरा कैसे हो सकता है ? विचित्र सा सन्नाटा पसरा है यहाँ। मैंने वीरभान को आवाज दी "वीरभान ?" मैं सोच रहा था वो भी मेरे पीछे पीछे नीचे आ गया होगा पर उसका तो कोई अता पता ही नहीं था। मैंने उसे इधर उधर देखा। वो तो नहीं मिला पर सामने से सैनिकों जैसी वेश भूषा पहने एक व्यक्ति कमर पर तलवार बांधे आता दिखाई दिया। उसने सिर पर पगड़ी सी पहन रखी थी। हो सकता है यहाँ का चौकीदार या सेवक हो। वो मेरे पास आ गया और उसने 3 बार झुक कर हाथ से कोर्निश की। मैं हैरान हुआ उसे देखते ही रह गया। अरे इसकी शक्ल तो उस होटल वाले चश्मू क्लर्क से मिलती जुलती लग रही थी ! इसका चश्मा कहाँ गया ? यह यहाँ कैसे पहुँच गया ? इससे पहले कि मैं उसे कुछ पूछता वो उसी तरह सिर झुकाए बोला "कुमार आपको महारानी कनिष्क ने स्मरण किया है !" पहले तो मैं कुछ समझा नहीं। मैंने इधर उधर देखा शायद यह किसी और को बुला रहा होगा पर वहाँ तो मेरे अलावा कोई नहीं था। "महारानी बड़ी देर से आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं आप शीघ्रता पूर्वक चलें !" वो तो मुझे ही पुनः संबोधित कर रहा था। मैं बिना कुछ समझे और बोले उसके पीछे चल पड़ा। वो मेरे आगे चल कर रास्ता दिखा रहा था। थोड़ी दूर चलने पर देखा तो सामने रंगमहल दूधिया रोशनी में जगमगा रहा था। दिन में इतनी रोशनी ? ओह… यह तो रात का समय हो चला है। दो गलियारे पार करने के उपरान्त रंगमहल का मुख्य द्वार दृष्टिगोचर हुआ। इस से पहले कि मैं उस सेवक से कुछ पूछूं वह मुख्य द्वार की सांकल (कुण्डी) खटखटाने लगा। "प्रतिहारी कुमार चन्द्र रंगमहल में प्रवेश की अनुमति चाहते हैं !" "उदय सिंह तुम इन्हें छोड़ कर जा सकते हो !" अन्दर से कोई नारी स्वर सुनाई दिया। उदय सिंह मुझे वहीं छोड़ कर चला गया। अब मैंने आस पास अपनी दृष्टि दौड़ाई, वहाँ कोई नहीं था। अब मेरी दृष्टि अपने पहने वस्त्रों पर पड़ी। वो तो अब राजसी लग रहे थे। सिर पर पगड़ी पता नहीं कहाँ से आ गई थी। गले में मोतियों की माला। अँगुलियों में रत्नजडित अंगूठियाँ। बड़े विस्मय की बात थी। अचानक मुख्य द्वार के एक किवाड़ में बना एक झरोखा सा आधा खुला और उसी युवती का मधुर स्वर पुनः सुनाई पड़ा,"कुमार चन्द्र आपका स्वागत है ! आप अन्दर आ सकते हैं !" मैं अचंभित हुआ अपना सिर झुका कर अन्दर प्रवेश कर गया। गुलाब और चमेली की भीनी सुगंध मेरे नथुनों में समा गई। अन्दर घुंघरुओं की झंकार के साथ मधुर संगीत गूँज रहा था। फर्श कालीन बिछे थे और उन पर गुलाब की पत्तियां बिखरी थी। सामने एक प्रतिहारी नग्न अवस्था में खड़ी थी। इसका चहरे को देख कर तो इस कि आयु 14-15 साल ही लग रही थी पर उसके उन्नत और पुष्ट वक्ष और नितम्बों को देख कर तो लगता था यह किशोरी नहीं पूर्ण युवती है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि यह नग्न अवस्था में क्यों खड़ी है। प्रतिहारी मुझे महारानी के शयन कक्ष की ओर ले आई। उसने बाहर से कक्ष का द्वार खटखटाते हुए कहा,"कुमार चन्द्र आ गए हैं ! द्वार खोलिए !" अन्दर का दृश्य तो और भी चकित कर देने वाला ही था। महारानी कनिष्क मात्र एक झीना और ढीला सा रेशमी चोगा (गाउन) पहने खड़ी थी जिसमें उसके सारे अंग प्रत्यंग स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। उन्होंने अन्दर कोई अधोवस्त्र नहीं पहना था पर कमर में नाभि के थोड़ा नीचे सोने का एक भारी कमरबंद पहना था जिसकी लटकती झालरों ने उसके गुप्तांग को मात्र ढक रखा था वर्ना तो वो नितांत नग्नावस्था में ही थी। सिर पर मुकुट, गले में रत्नजड़ित हार, सभी अँगुलियों में अंगूठियाँ और पैरों में पायल पहनी थी। उनके निकट ही 4-5 शोडषियाँ अपना सिर झुकाए नग्न अवस्था में चुप खड़ी थीं। थोड़ी दूरी पर ही राजशी वस्त्र पहने एक कृषकाय सा एक व्यक्ति खड़ा था जिसे दो सैनिकों ने बाजुओं से पकड़ रखा था। अरे ... इसका चेहरा तो प्रोफ़ेसर नील चन्द्र राणा से मिलता जुलता लग रहा था। "सत्यव्रत ! महाराज चित्रसेन को इनके शयन कक्ष में ले जाओ। आज से ये राज बंदी हैं !" महारानी ने कड़कते स्वर में कहा। पास में एक घुटनों तक लम्बे जूते और सैनिकों जैसी पोशाक पहने एक और सैनिक खड़ा था जो इनका प्रमुख लग रहा था उसने सिर झुकाए ही कहा,"जो आज्ञा महारानी !" उसकी बोली सुनकर मैं चोंका ? अरे... यह सत्यजीत यहाँ कैसे आ गया ? उसका चेहरा तो सत्यजीत से हूबहू मिल रहा था। इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, सैनिक महाराज को ले गए। महारानी ने अपने हाथों से ताली बजाई और एक बार पुनः कड़कते स्वर में कहा,"एकांत …!" जब सभी सेविकाएं सिर झुकाए कक्ष से बाहर चली गईं तो महारानी मेरी ओर मुखातिब हुई। मैं तो अचंभित खड़ा या सब देखता ही रह गया। मेरे मुँह से अस्फुट सा स्वर निकला "अ ... अरे … कनिका ... तुम ?" आज यह मोटी कुछ पतली सी लग रही थी। "कुमार आप राजकीय शिष्टाचार भूल रहे हैं ! और आप यह उज्जड़ और गंवारु भाषा कैसे बोल रहे हैं ?" "ओह … म ... …" "चलिए आप इन व्यर्थ बातों को छोड़ें … आइये … कुमार चन्द्र। अपनी इस प्रेयसी को अपनी बाहों में भर लीजिए। मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रही हूँ !" उसने अपनी बाहें मेरी ओर बढ़ा दी। "ओह... पर आ... आप …?" "कुमार चन्द्र व्यर्थ समय मत गंवाओ ! मैं जन्म-जन्मान्तर की तुम्हारे प्रेम की प्यासी हूँ। मुझे अपनी बाहों में भर लो मेरे चन्द्र ! मैं सदियों से पत्थर की मूर्ति बनी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ … आओ मेरे प्रेम … देव …!" उसकी आँखों में तो जैसे काम का ज्वार ही आया था। उसकी साँसें तेज हो रही थी और अधर काँप रहे थे।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मैं हतप्रभ उसे देखता ही रह गया। मैं तो जैसे जड़ ही हो गया था कुछ भी करने और कहने की स्थिति में नहीं था। इतने में कक्ष के बाहर से प्रतिहारी का स्वर सुनाई दिया,"महारानीजी ! महाराज चित्रसेन ने उपद्रव मचा दिया है।" "यह महाराज ... भी !" महारानी पैर पटकते हुए जैसे चीखी,"ओह … प्रतिहारी, तुम वहीं ठहरो मैं अभी आती हूँ !" महारानी कनिष्क की आँखों से तो जैसे चिंगारियां ही निकलने लगी थी। वह तत्काल कक्ष से बाहर चली गई। मैं भी उनके पीछे पीछे कक्ष से बाहर आ गया। निकट ही एक और कक्ष बना था जिसका द्वार खुला था। बाहर खड़ी नग्न सेविका से मैंने इस कक्ष के बारे में पूछा तो उसने सिर झुकाए हुए ही उत्तर दिया "कुमार ! यह राज कुमारी स्वर्ण नैना (सुनैना) का शयन कक्ष है। वो भी आप ही को स्मरण कर रही थी ! आपका स्वागत है कुमार आप अन्दर प्रवेश करें, आइये !" मैं कक्ष के अन्दर आ गया। कक्ष में एक बड़ा सा पलंग पड़ा था जिस पर पर रेशमी गद्दे, चद्दर और कामदार सिरहाने पड़े थे। झरोखों पर सुन्दर कढ़ाई किये रत्नजड़ित परदे लगे थे। पलंग पर नग्न अवस्था में सुनैना बैठी जैसे मेरी ही राह देख रही थी। उसके पास ही 3-4 और नग्न युवतियां बैठी एक दूसरे के काम अंगों को छेड़ती हुई परिहास और अठखेलियाँ कर रही थी। अरे… यह मधु और रूपल जैसी सूरत वाली युवतियां यहाँ कैसे आ गई ? मैं तो उनके रूप सौन्दर्य को निहारता ही रह गया। अरे यह सुनैना तो सलोनी जैसी … नहीं … सिमरन जैसी … नहीं मधु जैसी … ओह उसका दमकता चेहरा तो जैसे इन तीनों में ही गडमड हो गया था। सलोनी तो 14-15 वर्ष की आयु की रही होगी पर यह तो पूरी युवती ही लग रही थी। कमान सी तनी पतली भोहें और मोटी मोटी नील स्वर्ण जैसी (बिल्लोरी) आँखों के कारण ही संभवतया इसका नाम स्वर्ण नैना (सुनैना) रखा गया होगा। गुलाब के फूलों जैसे कपोल, अधरों का रंग गहरा लाल, सुराहीदार गर्दन, लम्बी केश राशि वाली चोटी उसके उन्नत वक्ष स्थलों के बीच झूल रही थी। पतला कटि-प्रदेश (कमर), भारी नितम्ब, गहरी नाभि, उभरा श्रोणी प्रदेश (पेडू), मोटी मोटी केले के तने जैसी पुष्ट और कोमल जांघें और रोम विहीन गुलाबी रंग का मदनमंदिर जिसे स्वर्ण के कमरबंद से ललकते रत्नजड़ित लोलक (पैंडुलम) ने थोड़ा सा ढक रखा था। कानों में सोने के कर्ण फूल, गले में रत्नजड़ित हार, बाजुओं पर बाजूबंद, पांवों में पायल, हाथों में स्वर्ण वलय और सभी अँगुलियों में रत्नजड़ित अंगूठियाँ। जैसी रति (कामदेव की पत्नी) ही मेरे सम्मुख निर्वस्त्र खड़ी थी। मैं तो उस रूप की देवी जैसी देहयष्टि को अपलक निहारता ही रह गया। वह दौड़ती हुई आई और मेरे गले में अपनी बाहें डाल कर लिपट गई। मैं तो उसके स्पर्श मात्र से ही रोमांचित और उत्तेजित हो गया। जब उसने अपने शुष्क अधरों को मेरे कांपते होंठों पर रखा तो मुझे भी उसे अपनी बाहों में भर लेने के अतिरिक्त कुछ सूझा ही नहीं। मैं तो जैसे किसी जादू से बंधा उसे अपने बाहुपाश में जकड़े खड़ा ही रह गया। आह… उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे रसीले और कोमल अधर तो ऐसे लग रहे थे कि अगर मैंने इन्हें जरा भी चूमा तो इन से रक्त ही निकलने लगेगा। उसके कठोर कुच (स्तन) मेरी छाती से लग कर जैसे पिस ही रहे थे। उनके स्तनाग्र तो किसी भाले की नोक की तरह मेरे सीने से चुभ रहे प्रतीत हो रहे थे। उसकी स्निग्ध त्वचा का स्पर्श और आभास पाते ही मेरे कामदण्ड में रक्त संचार बढ़ने लगा और वो फूलने सा लगा। "ओह … कुमार अपने वस्त्र उतारिये ना ?" कामरस में डूबे मधुर स्वर में सुनैना बोली। मैंने जब उन युवतियों की ओर देखा तो उसने आँखों से उन्हें बाहर प्रस्थान करने का संकेत कर दिया। वो सभी सिर झुकाए कोर्निश करती हुई शीघ्रता से कक्ष से बाहर प्रस्थान कर गईं। हम दोनों पलंग की ओर आ गए। मैंने झट से अपने वस्त्र उतार दिए और सुनैना को अपनी बाहों में भर लिया। वह तो मेरे साथ इस प्रकार चिपक गई जैसे कोई लता किसी पेड़ से लिपटी हो। उसके कमनीय शरीर से आती सुगंध उसके अक्षत-यौवना होने की साक्षी थी। मैंने उसके कटि-प्रदेश, पीठ और नितम्बों को सहलाना आरम्भ कर दिया। उसकी मीठी और कामुक सीत्कार अब कक्ष में गूंजने लगी थी। उसके स्तनाग्र (चूचक) तो इतने कठोर हो चले थे जैसे कोई लाल रंग का मूंगा (मोती) ही हो। मैंने अपने शुष्क होंठ उन पर लगा दिए और उन्हें चूमना और चूसना प्रारम्भ कर दिया। आह… इतने उन्नत और पुष्ट वक्ष तो मैंने आज तक अपने जीवन में नहीं देखे थे। मैं तो उसके कपोलों, अधरों, नासिका, कंठ और दोनों अमृत कलशों के बीच की घाटी को चूमता ही चला गया। वो मुझे अपनी कोमल बाहों में भरे नीचे होकर पलंग पर लेट सी गई। उसके रोम रोम में फूटते काम आनंद से उसकी पलकें जैसे बंद ही होती जा रही थी। मैं उसके ऊपर था और मेरा पूरा शरीर भी कामवेग से रोमांचित और तरंगित सा हो रहा था। उसने अपनी जांघें चौड़ी कर दी। इससे आगे की कहानी अगले और अन्तिम भाग में !


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मैं उसे चूमता हुआ नीचे मदनमंदिर की ओर आने लगा। पहले उसके सपाट पेट को उसके पश्चात उसकी नाभि और श्रोणी प्रदेश को चूमता चला गया। उसके योनि प्रदेश तक पहुंचते पहुँचते मेरा कामदण्ड (लिंग) तनकर जैसे खूंटा ही बन गया था। रोम विहीन रतिद्वार देख कर तो मैं मंत्र मुग्ध हुआ देखता ही रह गया। काम रस से लबालब भरी उसकी योनि तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई मधुरस (शहद) की छोटी सी कुप्पी ही हो। बीच में दो पतली सी गहरे गुलाबी रंग की रेखाएं। मैं उसके तितली के पंखों जैसी छोटी छोटी गुलाबी कलिकाओं को चूमने से अपने आप को नहीं रोक पाया। सुनैना की मीठी सीत्कार निकल गई और उसने मेरा सिर अपने कोमल हाथों में पकड़ कर अपने मदनमंदिर (योनि) की ओर दबा दिया। एक मीठी और कामुक महक से मेरा सारा स्नायु तंत्र भर उठा। अब मैंने अपनी काम प्रेरित जिह्वा उसके रतिद्वार पर लगा दी। उसके पश्चात उसे अपने मुँह में भर लिया। पूरी योनि ही मेरे मुँह में समा गई। उसकी योनि में तो जैसे काम द्रव्य का उबाल ही आया था। सुनैना की मीठी किलकारी निकल गई। मैंने 3-4 बार चुस्की लगाई और पुनः अपनी जिव्हा का घर्षण उसकी कलिकाओं पर करना प्रारम्भ कर दिया। कुछ पलों तक उसे चुभलाने और चूसने के उपरान्त मैंने अपना मुँह वहाँ से हटा लिया। अब मेरी दृष्टि उसकी पुष्ट जंघाओं पर गई। उसकी जाँघों पर भी मेहंदी के फू्ल-बूटे बने थे जैसे उसकी हथेलियों पर बने थे। मेरे लिए तो यह स्वप्न जैसा और कल्पनातीत ही था। जब मैंने उसकी जाँघों को चूमना प्रारम्भ किया तो सुनैना बोली,"मेरे प्रियतम अब और प्रतीक्षा ना करवाओ ! मुझे एक बार पुनः अपनी बाहों में ले लो ! मेरा अंग अंग काम वेग की मीठी जलन से फड़क रहा है इनका मर्दन करो मेरे प्रियतम !" मैंने उसके ऊपर आते हुए कस कर अपनी बाहों में भर लिया। अब उसने मेरे खड़े कामदण्ड को पकड़ लिया और सहलाने लगी। इसके पश्चात उसने अपने एक हाथ से अपनी योनि की कलिकाओं को खोल कर मेरा तना हुआ कामदण्ड अपने रतिद्वार के छोटे से छिद्र पर लगा लिया। मैंने धीरे से एक प्रहार किया तो मेरा कामदण्ड उसकी अक्षत योनि में आधे से अधिक प्रविष्ट हो गया। सुनैना की मीठी चीत्कार निकल गई। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई कोसा (थोड़ा गर्म) सा द्रव्य मेरे कामदण्ड के चारों ओर लग गया है। संभवतया प्रथम सम्भोग में यह उसके कुंवारे और अक्षत योनि पटल (कौमार्य झिल्ली) के टूटने से निकला रक्त था। कुछ पलों तक हम दोनों इसी अवस्था में पड़े रहे। उसके चेहरे पर वेदना झलक रही थी। पर वह आँखें बंद किये उसी प्रकार लेटी रही। कुछ क्षणों के उपरान्त मैंने पुनः उसके अधरों और कपोलों को चूमना और उसके कठोर होते रस कूपों का मर्दन प्रारम्भ कर दिया। अब उसकी भी मीठी और कामुक सीत्कार निकलने लगी थी। अब ऐसा प्रतीत होने लगा था जैसे उसकी वेदना कुछ कम हो रही थी। उसने अब मेरे तेज होते लिंग प्रहारों का प्रत्युत्तर अपने नितम्बों को उचका कर देना प्रारम्भ कर दिया था। मैं उसे अधरों और तने हुए स्तानाग्रों को चूमता जा रहा था। सुनैना मेरे लगातार लिंग प्रहारों से उत्तेजना के शिखर पर पहुँचने लगी थी। वह अप्रत्याशित रूप से मेरा साथ दे रही थी। उसका सहयोग पाकर मैंने भी अपने प्रहारों की गति तीव्र कर दी। मेरे लिंग के घर्षण से उसके अंग प्रत्यंग में जैसे नई ऊर्जा का संचार हो गया था। मेरा लिंग उसकी मदनमणि को भी छूने लगा था। इस नए अनुभव से तो उसकी मीठी किलकारियां ही गूंजने लगी थी। उसका तो जैसे रोम रोम ही पुलकित और स्पंदित हो रहा था। उसकी आँखें मुंदी थी, अधर कंपकंपा रहे थे और साँसें तेज चल रही थी। वह तो आत्मविभोर हुई जैसे स्वर्ग लोक में ही विचरण कर रही थी। मुझे लगा उसकी योनि का संकुचन बढ़ने लगा है और पूरा शरीर अकड़ने सा लगा है। उसकी कोमल बाहों की जकड़न कदाचित अब बढ़ गई थी। उसके मुँह से अस्फुट सा स्वर निकला,"कुमार मुझे यह क्या होता जा रहा है ? विचित्र सी अनुभूति हो रही है। मेरा रोम रोम फड़क रहा है, मेरा अंग अंग तरंगित सा हो रहा है …ओह … आह…" "हाँ... प्रिय … मेरी भी यही स्थिति है… मैं भी काम आनंद में डूबा हूँ … आह…" "ओह … कुमार ...आपने तो मुझे तृप्त ही कर दिया। इस मीठी चुभन और पीड़ा में भी कितना आनंद समाया है … आह... !" उसके मुँह से एक कामरस में डूबी मधुर किलकारी सी निकल गई। मुझे लगा उसकी योनि के अन्दर कुछ चिकनापन और आर्द्रता बढ़ गई है। संभवतया वह रोमांच के चरम शिखर पर पहुँच कर तृप्त हो गई थी। "हाँ प्रिय मैं भी आपको पाकर तृप्त और धन्य हो गया हूँ !" मैंने अपने धीमे प्रहारों को चालू रखा। कुछ क्षणों के उपरान्त वह बोली,"कुमार आपको स्मरण है ना हम कैसे उस पहाड़ी के पीछे और कभी उस उद्यान और झील के किनारे छुप छुप कर किलोल किया करते थे। आपने तो मुझे विस्मृत (भुला) ही कर दिया। आपने आने में इतना विलम्ब क्यों किया ? क्या आपको कभी मेरा स्मरण ही नहीं आया ?" "नहीं ... मेरी प्रियतमा मुझे सब याद आ है पर मैं क्या करता आपकी यह विमाता (सौतेली माँ) ही मुझे अपने रूप जाल में उलझा लेना चाहती थी। मैं डर के मारे आप से से मिल नहीं पा रहा था।" "ओह... कुमार अब समय व्यर्थ ना गंवाइए मुझे इसी प्रकार प्रेम करते रहिये … आह... कदाचित हमारे जीवन में ये पल पुनः ना लौटें !" मैंने एक बार पुनः उसे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया और अपने लिंग के प्रहारों की गति तीव्र कर दी। उसने अपने पाँव थोड़े से ऊपर कर लिए तो उसकी पायल की झंकार जैसे हमारे प्रहारों के साथ ही लयबद्ध ढंग से बजने लगी। सुनैना ने लाज के मारे अपनी आँखें बंद कर ली और अपने पाँव भी नीचे कर लिए। मैंने अपने धक्कों को गतिशील रखते हुए पुनः उसके अधरों को चूमना प्रारम्भ कर दिया। अब मुझे लगने लगा था कि मेरे लिंग का तनाव कुछ और बढ़ गया है। मैंने शीघ्रता से 3-4 धक्के और लगा दिए। कुछ ही क्षणों में मेरा वीर्य निकल कर उसकी योनि में भर गया। हम दोनों की ही मीठी सीत्कारें गूंजने लगी थी। एक दूसरे की बाहों में जकड़े हम पता नहीं कितने समय तक उसी अवस्था में पड़े रहे। अब बाहर कुछ आहट सी सुनाई दी। पहले प्रतिहारी आई और उसके पश्चात महारानी कनिष्क ने कक्ष में प्रवेश किया। उसका मुँह क्रोधाग्नि से मानो धधक रहा था। "कुमार … तुमने राज कन्या से दुष्कर्म किया है… तुम राज अपराधी हो … तुमने मेरी भावनाओं का रत्ती भर भी सम्मान नहीं किया ? अब तुम्हें मृत्यु दंड से कोई नहीं बचा सकता !" महारानी क्रोध से काँप रही थी। उसने ताली बजाते हुए आवाज लगाई,"सत्यव्रत !" "जी महारानी ?" "कुमार को यहाँ से ले जाओ और कारागृह में डाल दो !" "जो आज्ञा महारानी !" "और हाँ उस काल भैरवी को तैयार करो, आज सूर्योदय से पहले इस दुष्ट कुमार की बलि देनी है !" महारानी कुछ पलों के लिए रुकीं। उसने क्रोधित नेत्रों से सुनैना को घूरा और पुनः बोली,"और हाँ सुनो ! कुमारी स्वर्ण नैना के लिए भी अब यह राज कक्ष नहीं कारावास का कक्ष उपयुक्त रहेगा !"


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

सुनैना और मैंने अपने वस्त्र पहन लिए और सत्यव्रत के पीछे चल पड़े। पीछे से महारानी का क्रोध और आंसुओं में डूबा स्वर सुनाई पड़ रहा था: "कुमार मैं सदियों से पत्थर की शिला बनी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। यही एक अवसर था मेरी मुक्ति का। तुमने मेरे साथ ऐसा छल क्यों किया ? नहीं… कुमार तुम्हें एक बार अब पुनः जन्म लेना ही !होगा। जब तक मैं तुम्हें नहीं पा लेती मेरी यह भटकती और शापित आत्मा कभी शांत नहीं होगी ?" महारानी की आवाज दूर होती चली गई। कारागृह में महाराज चित्रसेन, मैं और सुनैना तीनो पृथक-पृथक कक्षों में बंद थे। एक कक्ष में कोई युवती और बैठी थी जिसने श्वेत वस्त्र (साड़ी) पहन रखे थे। मैं उसका चेहरा नहीं देख पाया क्योंकि उसका चेहरा उसके खुले केशों से ढका था। इतने में सत्यव्रत की आवाज सुनाई दी,"भैरवी तुम तैयार हो जाना ! महारानी कनिष्क का आदेश है कि आज सूर्योदय से पहले अनुष्ठान करना है !" भैरवी ने ने अपनी मुंडी सत्यव्रत की ओर उठाई। "ओह... यह बित्रिस। अरे … ओह ?" मैं तो हक्का बक्का उसे देखता ही रह गया। यह तो निसंदेह बित्रिस (फिरंगन) ही है। पर इसकी आँखें इतनी मोटी मोटी और काली कैसे हो गई ? मैंने उसे पुकारना चाहा पर मेरे कंठ से तो स्वर ही नहीं निकल रहा था। मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। मुझे प्रतीत हुआ जैसे पूरे कारागृह में ही सन्नाटा सा छा गया है। पता नहीं कितनी देर मैं ऐसे ही अपनी आँखें बंद किये बैठा रहा। मुझे नहीं पता कितना समय बीता गया था। संभवतया रात्रि का अंतिम प्रहर चल रहा था, सूर्योदय होने में अधिक समय नहीं था। तभी सत्यव्रत दो सैनिकों के साथ पुनः आया। कालू ने मुझे बांह से पकड़ कर उठाया और उन दोनों ने भैरवी को आवाज लगाई,"भैरवी तुम भी स्नान कर के नए वस्त्र पहन लो !" मुझे भी स्नान करवाया गया और नए वस्त्र पहनने को दिए। एक सैनिक ने मेरे दोनों हाथों को एक पतली रस्सी से बाँध दिया और मुझे ऊपर वेदी के पास ले आये। वहाँ एक काले से रंग के बलिष्ठ व्यक्ति अपने हाथ में खांडा लिए खड़ा था। वेदी में अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। भैरवी श्वेत वस्त्र पहने आ वेदी के पास बैठी थी। उसने पहले अग्नि के आगे अपने हाथ जोड़े और फिर मेरे माथे पर तिलक लगा दिया और गले में पुष्प माला डाल दी। कालू ने मेरी गर्दन पकड़ी और नीचे झुका कर उस शिला पर लगा दी जहां से वो थोड़ी यू आकार की बनी थी। अब उसने अपने हाथ में पकड़ा खांडा भैरवी के हाथों पकड़ा दिया। भैरवी की आँखें लाल हो रही थे। मैं डर के मारे थर थर काँप रहा था। मैं जोर जोर से चीखना चाहता था पर मेरे कंठ से तो जैसे आवाज ही नहीं निकल रही थी। मुझे प्रतीत हुआ बस अब तो कुछ क्षणों की देर रह गई है यह सिर धड़ से अलग होने ही वाला है। मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। "आ... आ अ अ ……." एक भयंकर चीख जैसे हवा में गूंजी। मेरी गर्दन पर बना शिकंजा छूट गया। मैंने अपना सिर ऊपर उठा कर देखा। भैरवी रक्त से सने खांडे को दोनों हाथों में पकड़े खड़ी है और कालू की गर्दन कट कर उसके धड़ से लटकी है। भैरवी ने मुझे कहा,"कुमार … आप शीघ्रता पूर्वक यहाँ से भाग जाएँ !" "वो… वो… विष कन्या … भैरवी ?" मैंने कुछ बोलना चाहा। "कुमार शीघ्रता कीजीये यह प्रश्न पूछने का समय नहीं है… जाइए …!" मैं वहाँ से भागा। पता नहीं कितनी देर और दूर दौड़ता ही चला गया। कहीं वो सैनिक या कालू मुझे दुबारा ना पकड़ लें। मैं हांफ रहा था। मेरा सारा शरीर पसीने में भीग गया था। अचानक मुझे किसी पत्थर से ठोकर लगी और मैं गिरते गिरते बचा। इतने में सामने से मधु, सत्यजीत और रूपल आते दिखाई दिए। मेरी बदहवास हालत देख कर वो भी हैरान हो रहे थे। मधु चिंतित स्वर में बोली,"ओह … प्रेम ... तुम कहाँ थे इतनी देर हम लोग तो तुम्हें ढूंढ ढूंढ कर पिछले एक घंटे से परेशान हो रहे थे। तुम्हारा मोबाइल भी कवरेज क्षेत्र से बाहर आ रहा था ? तुम कहाँ थे इतनी देर ?" "वो वो... काल भैरवी ... वो कालू... सुनैना... विष कन्या ?" "ओह... क्या हो गया है तुम दिन में भी सपने देख रहे हो क्या..?" मधु बोली। "पर वो रंगमहल … वीरभान … महारानी ?" "कौन वीरभान ?" सत्यजीत ने पूछा। "वो... वो हमारा गाइड ?" "ओह... प्रेम … यार तुम भी कमाल कर रहे हो … तुम किस गाइड की बात कर रहे हो ? हमारे साथ तो कोई गाइड था ही नहीं ?" "ओह … पर वो … वेदी … विष कन्या... भैरवी … कालू …" मैं तो पता नहीं क्या क्या बड़बड़ा रहा था। "ओह... कहीं तुम उस पत्थर की बनी सिर कटी काली मूर्ति की बात तो नहीं कर रहे ?" "हाँ... हाँ... यही कालू" मैंने इधर उधर देखा। वहाँ तो ऐसी कोई मूर्ति दिखाई नहीं दे रही थी। "अरे अभी तो वो मूर्ति यहीं थी" सभी हंसने लगे "ओह … तुम शायद काल भैरवी मंदिर के बाहर बनी उस सिर कटी मूर्ति को देख कर डर गए होगे ?" सत्यजीत ने चुटकी ली। "लेकिन वो कालू की मूर्ति थोड़ी देर पहले यहीं पर थी …" मेरी समझ में नहीं आ रहा था यह क्या रहस्य था। हम लोग तो अभी भी उसी मंदिर के प्रांगण में खड़े थे। कालू की मूर्ति कहीं नज़र नहीं आ रही थी। हाँ नीचे जाती सीढ़ियां जरूर दिखाई दे रही थी पर अब मेरी इतनी हिम्मत कहाँ बची थी कि मैं सीढ़ियां उतर कर उस कारागृह को एक बार दुबारा देखूं। मैंने घड़ी देखी, वो तो दिन 3:45 बता रही थी और अच्छी खासी धूप खिली थी। मेरे हाथों में फूल माला लिपटी थी और एक माला गले में भी पड़ी थी। ओह … मैंने उन फूल मालाओं ऐसे दूर फैंका जैसे कि वो कोई जहरीली नागिन या सांप हों। "चलो उस रंगमहल को देखने चलते हैं !" सत्यजीत ने उस खंडहर सी बनी गढ़ी की ओर इशारा करते हुए कहा। "नहीं … नहीं... सत्यजीत मेरी तबीयत ठीक नहीं है यार … अब वापस ही चलते हैं !" हम सभी होटल आ गए। मैंने जयभान से बाद में पूछा था- तुम्हारा कोई बड़ा भाई है क्या ? तो उसने बताया था- है नहीं था। उसे तो मरे हुए कोई 10 साल का अरसा हो गया है। मैंने उस प्रोफ़ेसर के बारे में भी होटल के क्लर्क से पता किया था उसने बताया था कि आज तड़के ही उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी इसलिए वो कमर खाली कर के आज सुबह ही यहाँ से चले गए हैं। कालू और फिरंगन तो कल शाम को ही आगरा चले गए थे। हमने भी उसी शाम होटल छोड़ दिया। मधु और सत्यजीत ने बाद में कई बार उस घटना के बारे में मुझ से पूछा था पर मैं क्या बताता। मेरी उस बात पर वो विश्वास ही नहीं करते अलबत्ता वो दोनों ही मुझे या तो पागल समझते या फिर डरपोक बताते। पता नहीं वो क्या करिश्मा और रहस्य था? लिंगेश्वर या काल भैरवी ही जाने … अगर आप कुछ समझे हों तो मुझे जरूर लिखें। आपका प्रेम गुरु


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मेरी अनारकली



पहली बार चुदवाने में हर लड़की या औरत जरूर नखरा करती है लेकिन एक बार चुदने के बाद तो कहती है आ लंड मुझे चोद।

अब अनारकली को देखो, साली ने पूरे २ महीने से मुझे अपने पीछे शौदाई सलीम (पागल) बना कर रखा था। पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती थी। रगड़ने का तो दूर चूमा-चाटी का भी कोई मौका आता तो वो हर बार कुछ ऐसा करती कि गीली मछली की तरह मेरे हाथ से फिसल ही जाती थी।

अकेले में एक दो बार उसके अनारों को भींचने या गालों को छूने या चुम्मा लेने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर पाया था। पर मैंने भी सोच लिया था कि उसे प्रेम की अनारकली बना कर ही दम लूँगा। साली अपने आप को सलीम वाली अनारकली से कम नहीं समझती। मैंने भी सोच लिया था चूत मारूँ या न मारूं पर एक बार उसकी मटकती गांड जरूर मारूंगा।

आप सोच रहे होंगे अनारकली तो सलीम की थी फ़िर ये नई अनारकली कौन है। दर असल अनार हमारी नौकरानी गुलाबो की लड़की है। उसके घरवाले और मधु (मेरी पत्नी) उसे अनु और मैं अनारकली बुलाता हूँ। अनार के अनारकली बनने की कहानी आप जरूर सुनना चाहेंगे।

अनार नाम बड़ा अजीब सा है ना। दर असल जिस रात वो पैदा हुई थी उसके बाप ने उसकी अम्मा को खाने के लिए अनार लाकर दिए थे तो उसने उसका नाम ही अनार रख दिया।

अनु कोई १८-१९ साल की हुई है पर है एकदम बम्ब पटाखा पूरा ७.५ किलो आर डी एक्स। ढाई किलो ऊपर और उम्मीद से दुगना यानि ५ किलो नीचे। नहीं समझे अरे यार उसके स्तन और नितम्ब। क्या कयामत है साली। गोरा रंग मोटी मोटी आँखे, काले लंबे बाल, भरे पूरे उन्नत उरोज, भरी पर सुडोल जांघें पतली कमर। और सबसे बड़ी दौलत तो उसके मोटे मोटे मटकते कूल्हे हैं।

आप सोच रहे होंगे इसमे क्या खास बात है कई लड़कियों के नितम्ब मोटे भी होते है तो दोस्तों आप ग़लत सोच रहे हैं। अगर एक बार कोई देख ले तो मंत्रमुग्ध होकर उसे देखता ही रह जाए। खुजराहो के मंदिरों की मूर्तियों जैसी गांड तो ऐसे मटका कर चलती जैसे दीवानगी में ‘उर्मिला मातोंडकर’ चलती है। नखरे तो इतने कि पूछो मत।

अगर एक बार उसे देख लें तो ‘उर्मिला मातोंडकर’ या ‘शेफाली छाया’ को भूल जायेंगे। और फ़िर मैं तो नितम्बों का मुरीद (प्रेम पुजारी) हूँ।

कभी कभी तो मुझे शक होता है इसकी माँ गुलाबो तो चलो ठीक ठाक है, हो सकता है जवानी में थोड़ी सुंदर भी रही होगी पर बाप तो काला कलूटा है। तो फ़िर ये इंतनी गोरी चिट्टी कैसे है। लगता है कहीं गुलाबो ने भी अपनी जवानी में मेरे जैसे किसी प्रेमी भंवरे से अपनी गुलाब की कली मसलवा ली होगी।

खैर छोड़ो इन बातों को हम तो अनु के अनारकली बनने की बात कर रहे थे।

अरे नए पाठकों को अपना परिचय तो दे दूँ। मैं प्रेम गुरु माथुर। उमर ३२ साल। जानने वाले और मेरे पाठक मुझे प्रेम गुरु बुलाते हैं। मैं एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करता हूँ।

मेरे लंड का आकार लगभग ७” है। सुपारा ज्यादा बड़ा नहीं है पर ऐसे सुपाड़े और लंड गांड मारने के लिए बड़े मुफीद (उपयुक्त) होते हैं। मेरे लंड के सुपाड़े पर एक तिल भी है। पता नहीं आप जानते हैं या नहीं ऐसे आदमी बड़े चुद्दकड़ होते हैं और गांड के शौकीन।

मेरी पत्नी मधुर (मधु ) आयु २८ साल बला की खूबसूरत ३६-२८-३६ मिश्री की डली ही समझो, चुदाई में बिल्कुल होशियार। पर आप तो हम भंवरों की कैफियत (आदत) जानते ही हैं कभी भी एक फूल से संतुष्ट नहीं होते।

एक बात समझ नहीं आती साली ये पत्नियाँ पता नहीं इतनी इर्ष्यालू क्यों होती हैं जहाँ भी कोई खूबसूरत लड़की या औरत देखी और अपने मर्द को उनकी और जरा सा भी उनपर नज़रें डालते हुए देख लिया तो यही सोचती रह्रती हैं कि जरूर ये उसे चोदना चाहते हैं।

कमोबेश मधु की भी यही हालत थी। अनार को अनारकली बनाने में मेरी सबसे बड़ी दिक्कत तो मधु ही थी। मुझे तो हैरत होती है पूरी छान बीन किए बिना उसने गुलाबो को कैसे काम पर रख लिया जिसके यहाँ आर डी एक्स जैसी चीज भी है जिसका नाम अनार है।

मुझे तो कई दिनों के बाद पता चला था कि अनु बहुत अच्छी डांसर है। आप तो जानते हैं मधु बहुत अच्छी डांसर है। शादी के बाद स्कूल कार्यक्रम को छोड़ कर उसे कोई कम्पीटीशन में तो नाचने का मौका नहीं मिला पर घर पर वो अभ्यास करती रहती और अनु भी साथ होती है।

अनु तो १०-१५ दिनों में ही उससे इतना घुलमिल गई थी कि अपनी सारी बातें मधु उससे करने लग गई थी। दो दो घंटे तक पता नहीं वो सर जोड़े क्या खुसर फुसर करती रहती हैं।

वैसे तो ये कभी कभार ही आती थी और मैंने पहले कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। आप ये जरूर सोच रहे होंगे ये कैसे हो सकता है। कोई खूबसूरत फूल आस पास हो और मेरी नज़र से बच जाए ये कैसे हो सकता है। दर असल उन दिनों मेरा चक्कर अपनी खूबसूरत सेक्रेटरी से चल रहा था।

लेकिन जबसे गुलाबो बीमार हुई है पिछले एक महीने से अनार ही हमारे यहाँ काम करने आ रही है। मुझे तो बाद में पता चाल जब मधु ने बताया कि गुलाबो के फ़िर लड़की हुई है।

कमाल है ३८-४० साल की उमर में ५-६ बच्चों के होते हुए भी एक और बच्चा ? अगर माँ इतनी चुद्दकड़ है तो बेटी कैसी होगी !

माँ पर बेटी नस्ल पर घोड़ी !

ज्यादा नहीं तो थोड़ी थोड़ी !!

एक दिन जब मैं बाथरूम से निकल रहा था तो अनु अपनी चोटी हाथ में पकड़े घुमाते हुए गाना गाते लगभग तेजी से अन्दर आ रही थी_

मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली !

मुझे रोके ना कोई मैं चली मैं चली !!

वो अपनी धुन में थी अचानक मैं सामने आ गया तो वो मुझसे टकरा गई। उसके गाल मेरे होंठो को छू गए और स्तन भी सीने से छू कर गए। मैंने उसकी चोटी पकड़ते हुए कहा “कहाँ चली मेरी अनु रानी कहीं सचमुच ससुराल तो नहीं जा रही थी?”

वो शरमा कर अन्दर भाग गई। हाय अल्लाह …. क्या कमायत है साली। मैं भी कितना गधा था इतने दिन इस आर डी एक्स पर ध्यान ही नहीं दिया।

उस दिन के बाद मैंने अनु को चोदने का जाल बुनना शुरू कर दिया। अनु ने तो मधु पर पता नहीं क्या जादू कर दिया था कि वो उसे अपनी छोटी बहन ही समझने लगी थी।

अनु भी लगभग सारे दिन हमारे घर में मंडराती रहती थी हलाँकि वो एक दो जगह पर और भी काम करती थी। मधु ने उसे अपनी पुरानी साड़ियां, चप्पल, सूट, मेक-अप का सामान आदि देना शुरू कर दिया। उसे अपनी पहनी पैंटी ब्रा और अल्लम-गल्लम चीजें भी देती रहती थी।

अनु हमारे यहाँ झाडू पोंछा बर्तन सफाई कपड़े आदि सब काम करती थी। कभी कभी रसोई में भी मदद करती थी। वो तो यही चाहती थी कि किसी तरह यहीं बनी रहे। मैं शुरूआत में जल्दी नहीं करना चाहता था।

जब वो ड्राइंग रूम में झाडू लगाती तो उसके रसभरे संतरे ब्लाउज के अन्दर से झांकते साफ़ दिख जाते थे। पर निप्पल और एरोला नहीं दिखते थे पर उसकी गोलाइयों के हिसाब से अंदाजा लगना कहाँ मुश्किल था। मेरा अंदाजा है कि एक रुपये के सिक्के से ज्यादा बड़ा उसका एरोला नहीं होगा। सुर्ख लाल या थोड़ा सा बादामी। उसकी घुंडी तो कमाल की होगी।

मधु के तो अब अंगूर बन गए है और चूसने में इतना मज़ा अब नहीं आता। पता नहीं इन रस भरे आमों को चूसने का मौका कब नसीब होगा। शुरू शुरू में मैं जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहता था। अनु इन सब से शायद बेखबर थी।

आज शायद उसने मधु की दी हुई ब्रा पहनी थी जो उसके के लिए ढीली थी। झाडू लगाते हुए जब वो झुकी तो मैंने देख लिया था। मेरी नज़रें तो बस उन कबूतरों पर टिकी रह गई। मुझे तो होश तब आया जब मेरे कानों में आवाज आई, “साहब अपने पैर उठाओ मुझे झाडू लगानी है।” अनु ने झुके हुए ही कहा।

“आंऽऽ हाँ ” मैंने झेंपते हुए कहा। मैं सोच रहा था कहीं उसने मुझे ऐसा करते पकड़ तो नहीं लिया। लेकिन उसके चेहरे से ऐसा कुछ नहीं लगा और अगर ऐसा हुआ भी है तो चलो आगाज तो अच्छा है। मेरा लंड तो पजामे के अन्दर उछल कूद मचाने लगा था। मैंने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी। पजामे के बाहर उसका उभार साफ़ नज़र आ रहा था।

मधु ने उसको समझा दिया था कि वो उसे (मधु को) दीदी बुलाया करेगी और मुझे भइया।

मै तो सोच रहा था कि जब मधु उसकी दीदी हुई तो वो मेरी साली हुई ना और मैं उसका जीजा, मुझे भइया की जगह सैयां नहीं तो कम से कम जीजू ही बुलाये। ताकि साली पर आधा हक, जो जीजू का होता ही है, मेरा भी हो जाए, पर मैं तो लड्डू पूरा खाने में विश्वास रखता हूँ। पर मधु के हिसाब से साहब ही कहलवाना ठीक था मैं मरता क्या करता।


RE: प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ - sexstories - 07-04-2017

मधु इस समय बाथरूम में थी। आज वो अकेले ही नहा रही थी। कोई बात नहीं कभी कभी अकेले नहाना भी सेहत के लिए अच्छा होता है। मेरा अनार से बात करने का मूड हो आया “अनु ! चाय तो पिला दो एक कप ”

“हाँ … बनाती हूँ ” अनु ने कोयल जैसी मीठी आवाज में कहते हुए मेरी और इस तरह से देखा जैसे कह रही हो चाय क्या पीनी है कुछ और भी पी लो। वो कमर पर हाथ रखे खड़ी थी चाय बनाने नहीं गई।

“अरे अनु ! आज ये तुमने ढीले ढीले कपड़े क्यों पहन रखे हैं?”

“नहीं ! ढीले कहाँ हैं? ठीक तो हैं! ” उसने अपना कुरता नीचे खींचते हुए कहा।

“अरे ये ब्रा कितनी ढीली है ! इसके स्ट्रेप्स दिख रहे हैं !” मैंने हँसते हुए कहा।

“धत … आप भी !” वो शरमा गई।

!! या अल्लाह … क्या अदा है !!

“क्यों मैंने झूठ कहा?”

“वो दीदी भी यही कह रही थी !” वो अपनी आँखें नीची किए बोली।

“तो अपने साइज़ की पहना करो न उनमें तुम बहुत सुंदर लगोगी। ”

“पर हमारे पास इतने पैसे कहाँ हैं नई ब्रा खरीदने के लिए ?”

“कोई बात नहीं इतनी सी बात मैं तुम्हारे लिए ला दूंगा म ऽऽ म् … मेरा मतलब मधु से कह दूंगा ”

“पर दीदी … पैसे .. ??”

“अरे तुम पैसों की क्यों चिंता करती हो बाद में दे देना ” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। मेरा कुतुबमीनार पजामे के अन्दर उफन रहा था और बाहर आने को मचलने लगा। मैंने जल्दी से अखबार गोद में रख लिया नहीं तो अनु जरूर देख लेती और मेरे इरादों की भनक उसे लग जाती तो आगाज (श्री गणेश) ही ख़राब हो जाता। पर मैं तो इस मामले में पूरा खिलाड़ी हूँ।

अनु रसोई में चली गई। मधु बाथरूम में थी। मेरा मन किया उसके साथ नहा ही लिया जाए। मौसम भी है, मौका भी अच्छा है और लंड भी कुतुबमीनार बना है। मैं जैसे ही उठा सामने से मधु अपने बाल तौलिए से रगड़ते हुए बाथरूम से निकल कर मेरी ओर ही आ रही थी। मैंने मधु की ओर आँख मारी और सीटी बजाने के अंदाज़ में ओये होए कहा।

मेरे इस इशारे को वो अच्छी तरह जानती थी। जब हम लोग कामातुर हैं मतलब चुदाई की इच्छा होती है इसी तरह सीटी बजाते हैं। मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो वो मुझे परे धकेलते हुए बोली,“हटो लाल बाई आ गई है।”

पहले तो मैं कुछ समझा नहीं मैंने सोचा कहीं वो गुलाबो की बात तो नहीं कर रही पर बाद में जब उसके माहवारी की और इशारे को समझा तो मेरा सारा उत्साह ही ठंडा पड़ गया। अब तो ५-६ दिन मुझे अपना हाथ जगन्नाथ ही करना पड़ेगा। मधु तो चूत और गांड पर हाथ भी नहीं फेरने देगी।

दूसरे दिन मैंने बाज़ार से २ स्टाइलिश ब्रा और काले रंग की पैंटी खरीदी। मधु सुबह जल्दी स्कूल चली जाती है। अनु रोज सुबह ८ बजे आ जाती है। हमारे लिए चाय नाश्ता बना देती है बाद में सफाई और बर्तन आदि साफ़ करती है। मैं ऑफिस के लिए कोई ९.३० बजे निकलता हूँ।

आज प्रोग्राम के मुताबिक मुझे ९.३० तक जाने की कोई जल्दी नहीं थी। मैं तो अपना जाल अच्छी तरह बुनता जा रहा था। मधु के जाते ही मैंने अनु को आवाज दी,“अरे मेरी अनारकली देखो वो मेज़ पर क्या रखा है !”

“साहब कोई पैकेट लगता है क्यों ?”

“देखो तो सही क्या है इसमें ?”

अनु ने पैकेट खोला तो उसमे से ब्रा , पैंटी और दो तीन खुशबू वाली फेस क्रीम देखकर वो खुश हो गई पर बोली कुछ नहीं।

वो कुछ नहीं बोली मेरी तरफ़ बस देखती रही। मैंने कहा- भई ये सब हमारी अनारकली के लिए है। कल मैंने तुमसे वादा किया था न।

उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।

“क्यों अच्छी है न ?”

“हाँ बहुत सुंदर है। मैं भी ऐसी ही चाहती थी ” अनजाने में उसके मुंह से निकल ही गया।

“देखो अपनी दीदी से मत कहना ”

“क्यों?”

“अरे वो तुम्हारे पैसे काट लेगी ”

“तो क्या आप नहीं काटोगे? छोड़ दोगे ?”

“तुम कहो तो नहीं काटूँगा … चोद दूंगा …पर ….?” मैंने जानबूझ कर छोड़ को चोद कहा था।

पर पता नहीं अनारकली ने ध्यान दिया या नहीं वो तो बस उन्हें देखने में ही लगी थी।

“पर एक शर्त है !” मैंने कहा।

“वो क्या ?”

“ये पहन कर मुझे भी दिखानी होगी ”

“इस्स्स्स्स्स ………………. ” अनु शरमाकर पैकेट लेकर बाहर की और भाग गई।

मेरा दिल उछलने लगा। या अल्लाह ……

आज के लिए इतना ही काफी था। मैंने बाथरूम में चला गया और कोई दो साल के बाद आज जमकर मुठ मारी तब जाकर पप्पू महाराज कुछ शांत हुए और मुझे ऑफिस जाने दिया।

अगले दो दिनों पता नहीं अनारकली काम पर क्यों नहीं आई। मैं तो डर ही गया। पता नहीं क्या हो गया। कहीं उसने घरवालों या मधु को कुछ बता तो नहीं दिया ? पर मेरी आशंका ग़लत निकली। उसे तो घर पर ही कुछ काम था। अपनी माँ और नए बच्चे से सम्बंधित।

पिछले दो तीन दिनों से मधु की माहवारी चल रही थी और मुझे चोदने नहीं दिया था। सेक्रेटरी भी नौकरी छोड़ गई थी।

आप को तो पता ही है हम लोग शनिवार की रात बड़ी मस्ती करते हैं। यह दिन मेरे लिए तो बहुत ख़ास होता है पर मधु के लिया सन्डे ख़राब करने वाला होता है। ऐसा इसलिए कि शनिवार को मैं मधु की गांड मारता हूँ बाकी दिनों तो वो मुझे गांड के सुराख पर अंगुली भी नहीं धरने देती।

हम लोगों ने आपस में तय कर रखा है की स्वर्ग के इस दूसरे द्वार यानि कि मधु की चूत की प्यारी पडोसन की मस्ती सिर्फ़ शनिवार को या होली, दीवाली, जन्मदिन या फ़िर शादी की वर्षगांठ पर ही की जायेगी।

दूसरे दिन हम लोग बाथरूम में साथ साथ नहाते हैं और अलग मौज मस्ती करते हैं। रविवार के दिन मधु जिस तरीके से टांगें चौड़ी करके चलती है कई बार तो मुझे हँसी आ जाती है और फ़िर रात को मैं चूत से भी हाथ धो बैठता हूँ।

इन दिनों मैं अपना लंड हाथ में लिए किसी चूत की तलाश में था और मुठ मार कर ही गुजारा कर रहा था। भगवन ने छप्पर फाड़ कर जैसे अनारकली को मेरे लिए भेज तो दिया था, पर जाल अभी कच्चा था।

पिछले एक डेढ़ महीने से मैं अपना जाल बुन रहा था। जल्दबाजी में टूट सकता था। और मेरे जैसे खिलाड़ी के लिए ये शर्म की बात होती की कोई चिडिया कच्चे जाल को तोड़ कर भाग जाए, मैं जल्दी नहीं करना चाहता था। पहले लोहा पूरा गरम कर लूँ फ़िर हथोड़ा मारूंगा।

आप सोच रहे होंगे एक नौकरानी को चोदना क्या मुश्किल काम है। थोड़ा सा लालच दो बाथरूम में पेशाब करने के बहने लंड के दर्शन करवाओ और पटक कर चोद दो। घर में सम्भव ना हो तो किसी होटल में ले जाकर रगड़ दो।

आप ग़लत सोच रहे हैं। अगर कोई झुग्गी बस्ती में रहने वाला कोई लौंडा लापड़ा हो या अनु की सोसायटी में रहने वाला हो तो कोई बात नहीं है जानवरों की पुँछ की तरह कभी भी लहंगा या साड़ी पेटीकोट उठाओ और ठोक दो। अब गुलाबो को ही लो ३८-४० साल की उमर में ५-६ बच्चों के होते हुए भी एक और बच्चा ?

हम जैसे तथाकथित पढ़े लिखे समझदार लोग अपने आप को मिडल क्लास समझाने वालों के लिए भला इस तरीके से इतनी आसानी से किसी और लड़की को कैसे चोदा जा सकता है। खैर आप क्यों परेशान हो रहे हैं।

आज शनिवार था। रिवाज के मुताबिक तो आज हमें रात भर मस्ती करनी थी पर अभी मधु को चौथा दिन ही था और अगले दो दिन और मुझे मुठ मार कर ही काम चलाना था। अनारकली को चोदना अभी कहाँ सम्भव था।

मैंने मधु को जब अपने खड़े लंड को दिखाया तो वो बोली “ऑफ़ ओ !आप तो ३-४ दिन भी नहीं रह सकते !”

“अरे तुम क्या जानो तीन दिन मतलब ७२ घंटे ४३२० मिनट और ……”

“बस बस अब सेकंड्स रहने दो ” मधु मेरी बात काटते हुए बोली।

प्लीज़ मेरी शहद रानी (मधु) आज तो बस मुंह में लेकर ही चूस लो या फ़िर मुठ ही मार दो अपने नाज़ुक हाथों से। मधु कई बार जब बहुत मूड में होती है मेरा लंड भी चूसती है और मुठ भी मार देती है। पर आज उसने लंड तो नहीं चूसा पर अपने हाथों में अपनी नई कच्छी लेकर मुठ जरूर मार दी। मेरा सारा वीर्य उसकी पेंटी में लिपट गया।

मधु जब हाथ धोने बाथरूम गई तो मेरे दिमाग में एक योज़ना आई। मैंने वो पेंटी गेस्ट रूम से लगे कोमन बाथरूम में डाल दी। अनारकली इसी बाथरूम में कपड़े धोती है।

दूसरे दिन रविवार था। मधु और मैं देरी से उठे थे। अनारकली रसोई में चाय बना रही थी।

चाय पीकर मधु जब बाथरूम चली गई तो मैंने अनारकली से कहा, “अनारकली तुमने जो वादा किया था उसका क्या हुआ?”

“कौन सा वादा साहब?”

“अरे इतना जल्दी भूल गई वो पैंटी और ब्रा पहन कर नहीं दिखानी??”

“ओह … वो … इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स …………..” वो एक बार फिर शरमा गई। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

“उईई माँ ………….” वो जोर से चिल्लाई। अगर मधु बाथरूम में न होती तो जरूर सुन लेती। “वो … वो … मधु … दीदी …” मैंने इधर उधर देखा इतने में तो वो रसोई की और भाग चुकी थी।

मेरा आज का आधा काम हो गया था। बाकी का आधा काम कपड़े धोते समय अपने आप हो जाएगा।

नाश्ता आदि बनने के बाद जब अनारकली बाथरूम में कपड़े धोने जाने लगी तो मेरी आँखें उसका ही पीछा कर रही थी। वो जब बाथरूम में घुसी तो मैं जानता था उसकी नज़र सीधी पेंटी पर ही पड़ी होगी। उसने इधर उधर देखा। मैं अखबार में मुंह छिपाए उसे ही देख रहा था। जैसे ही उसने दरवाजा बंद किया मैं बाथरूम की ओर भागा।

मधु अभी बेडरूम में ही थी। मैं जानता था उसे अभी आधा घंटा और लगेगा। मैंने बाथरूम के की होल से देखा तो मेरी बांछे ही खिल गई। योजना के मुताबिक ही हुआ। अनारकली ने वोही पेंटी हाथ में पकड़ रखी थी और बड़े ध्यान से उस पर लगे कम को देख रही थी।

पता नहीं उसे क्या सूझा, एक उंगली कम में डुबोई और नाक के पास लेजा कर पहले तो सुंघा फ़िर उसे मुंह में लेकर चाटा।

अपनी आँखें बंद कर ली और एक सीत्कार सी लेने लगी। फ़िर उसने अपनी सलवार उतार दी। हे भगवन उस काली पैन्टी में उसकी भरपूर जांघे बिल्कुल मक्खन मलाई गोरी चिट्टी। और २ इंच की पट्टी के दोनों ओर झांटे छोटे छोटे काले बाल। डबल रोटी की तरह फूली हुई उसकी बुर।

वो रुकी नहीं उसने पेंटी नीचे सरकाई और उसकी काले रेशमी बालों से लकदक चूत नुमाया (प्रकट) हो गई। चूत के मोटे मोटे बाहरी होंठ। अन्दर के होंठ पतले थोड़े काले और कोफी रंग के आपस में चिपके हुए। चूत का चीरा कोई ४ इंच का तो होगा। संगमरमरी जांघों के बीच दबी उसकी चूत साफ़ दिख रही थी। लाजवाब जांघें और दांई जांघ पर काला तिल।

पूरी क़यामत।

उसने धीरे से अपनी अंगुलिओं से अपनी चूत की दोनों फांकों को खोला जैसे कोई तितली अपने छोटे छोटे पंख फैलाती है, अन्दर से लाल चट्ट उसकी चूत का छेद साफ़ नज़र आने लगा।

अनु ने एक अंगुली पर थूक लगाया और फ़िर गच से अपनी चूत के नाज़ुक छेद में अन्दर डाल दी और जोर से एक सीत्कार मारी। फ़िर उसने धड़ धड़ अपनी अंगुली अन्दर बाहर करनी शुरू कर दी।

उसकी काले झांटो से भरी चूत और मोटे मोटे नितम्बों को देखकर मेरा दिल तो गाना ही गाने लगा “ये काली काली झांटे ये गोरी गोरी गांड !”

कोई १० मिनट तक वो अपनी अंगुली अन्दर बाहर करती रही। फ़िर एक किलकारी मारते हुए वो झड़ गई। अपनी अंगुली भी उसने एक बार चाटी और अचार की तरह चटकारा लेते हुए अपनी पैंटी पहन ली।

अब वहां रुकने का कोई अर्थ नहीं था। मैं दौड़ कर वापस ड्राइंग रूम में आ गया। मेरा जाल पक्का बन गया था और शिकार ने चारे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था।

आज तो छठा दिन (माहवारी का छठा) दिन … नहीं रात थी और मैं मधु को कहाँ छोड़ने वाला था। मैंने पूरी तैयारी कर ली थी। आज मैंने कस कस कर २ बार उसकी चूत मारी और एक बार गांड। मधु तो जैसे बेहोश होते होते बची। पता नहीं ये औरतें गांड मरवाने में इतना नखरा क्यों करती हैं।

गुरूजी कहते हैं “औरत के तीन छेद होते हैं और तीनो ही छेदों का मज़ा लेना चाहिए। चूत, गांड और मुंह। इसीलिए उसने मनुष्य जन्म लिया है। क्या आपने कभी दूसरे प्राणियों को गुदा मैथुन करते हुए देखा है ये गुण तो भगवन ने सिर्फ़ मनुष्य जाति को ही दिया है।”

वो कहते हैं ना “जिस आदमी ने लाहौर नहीं देखा और अपनी बीवी की गांड नहीं मारी वो समझो जीया ही नहीं।”

चलो लाहौर देखने की तो मजबूरी हो सकती है गांड मारने में कैसी लापरवाही। जो औरतें गांड नहीं मरवाती वो अगले जन्म में किन्नर या खच्चर बनती हैं और सम्भोग नहीं कर पाती। आप तो जानते ही हैं कि खच्चर सम्भोग नहीं कर सकते और किन्नर सिर्फ़ गांड ही मरवा सकते हैं सम्भोग नहीं कर सकते।

अब ये आपके ऊपर है कि अगले जन्म में आप क्या बनाना चाहते हैं और ऊपर जाकर भगवान को क्या मुंह दिखाओगे या दिखाओगी ….”

उस दिन अनारकली ने तो जैसे बम्ब ही फोड़ दिया। मधु ने बताया कि घरवाले अनु का अगले महीने गौना करने वाले हैं। हे भगवन जाल में फंसी मछली क्या इतनी जल्दी निकल जायेगी। हाथ आया शिकार छिटक जाएगा।


This forum uses MyBB addons.

Online porn video at mobile phone


दोस्तके मम्मी को अजनबी अंकल ने चोदाकहाणीdesi fakes com page 25कुभ मोटी औरत सैकसी चोदाईEEsha rebba hot sexy photos nude fake assऔर सहेली सेक्सबाब site:mupsaharovo.ruDesi kudiyasex.comsax video xxx hinde जबर्दस्ती पकर कर पेलेsexcomnirodhsouth actores and side actores latest nude collection sexbabaHastens wife sex 2sal ka bachcha sathsexy video Hindi Jisme maal niklega chokh Kajol Hoye fuddi aur lund pura Gila hocache:X8l_i8ES5Q8J:https://mupsaharovo.ru/badporno/Thread-shikha-meri-pyaari-naukraniNet baba sex khanijanbhujke land dikhayaintiki vachina guest tho dhenginchukuna sex storiesMa ne बेटी को randi Sexbaba. Netsurveen chawala faked photo in sexbabamuhme dalne walaa bf sxisexstoreyghirlmarathi bhabhi brra nikarvar sexbhwoli chudai giral ki nagi fotobahu ko chudbaya sasne sasur se kahanianterwasna bhabhi ne nanand chuchi chuse ahh lesbian storiesmastram movie movieskiduniyasexbaba chut ki aggxxx bur chudai k waqt maal girate hue videoहचका के पेलो लाँडsharif ghrane ke ldko ka boobs sexजिंस पर पिशाब करते Girl xxx photoJhat sexbababiwi bra penty wali dukan me randi baniwww job ki majburisex pornHaseena nikalte Pasina sex film Daku ki Daku kifalaq naaz nude sex babawww xxx marati hyar rimuarSex Baba ಅಮ್ಮ-ಮಗhindeesexstoryBhosdi zavli sexdesi hotsex bigass khandasexdesi Hindidaadiवहिनीच्या मागून पकडून झवलोSex baba.Gul panang.xxx.photosXxx video Hindi deci muthi nokrani .k samne.pornsusar nachode xxx दुकान hindrhansikd nu dengedamghar me chhupkr chydai video hindi.co.in.Nathalia Kaur sex babaxnxn Asu tapak Ne wali videoGaand ki darar me lun fasa k khara raha shadi meAah aah aah common ya ya yah yes yes yes gui liv me xnxx.tv / antarvasna.comचूतजूहीbdi behen ne chote bhai k land chuskr shi kiya sex storyBeteko chodneko shikgaya kahani hindiगोकुलधाम सोसाइटी की सेक्स कहानी कॉमsonarika bhadoria sexbaba.commuslim aurat ki sardarji se chudaibahen ko saher bulaker choda incestअसल चाळे मामी जवलेsexyvideosadhaमम्मे टट्टे मर्दन चूचेporn lamba land soti sut videos downloadaunty ne sex k liye tarsayaxxx rep choti camsinJosili ladki gifsantarvasna केवल माँ और हिंदी में samdhi सेक्स कहानियाँshalwar khol garl deshi imagebarat me mere boob dabayeLadki ghum rahi thi ek aadmi land nikal kr soya tha tbhi ladki uska land chusne lagti hai sexxगांडू लड़के का चूची मिश्रा pornघडलेल्या सेक्स मराठि कहाणिpadhos ko rat me choda ghrpe sexy xxnx