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Hindi Porn Stories संघर्ष - sexstories - 09-28-2017

संघर्ष --1

सावित्री एक 18 साल की गाओं की लड़की है जिसका बाप बहुत पहले ही मर चुका था और एक मा और एक छोटा भाई घर मे था. ग़रीबी के चलते मा दूसरों के घरों मे बर्तन झाड़ू करती और किसी तरह से अपना और बचों का पेट भर लेती. आख़िर ग़रीबी तो सबसे बड़ा पाप है,,, यही उसके मन मे आता और कभी -2 बड़बड़ाती .. गाओं का माहौल भी कोई बहुत अच्छा नही था और इसी के चलते सावित्री बेटी की पड़ाई केवल आठवीं दर्ज़े तक हो सकी. अवारों और गुन्दो की कमी नहीं थी. बस इज़्ज़त बची रहे एसी बात की चिंता सावित्री की मा सीता को सताती थी. क्योंकि सीता जो 38 साल की हो चुकी थी करीब दस साल पहले ही विधवा हो चुकी थी..... ज़िम्मेदारियाँ और परेशानियो के बीच किसी तरह जीवन की गाड़ी चलती रहे यही रात दिन सोचती और अपने तकदीर को कोस्ती. सावित्री के सयाने होने से ये मुश्किले और बढ़ती लग रही थी क्योंकि उसका छोटा एक ही बेटा केवल बारह साल का ही था क्या करता कैसे कमाता... केवल सीता को ही सब कुछ करना पड़ता. गाओं मे औरतों का जीवन काफ़ी डरावना होता जा रहा था क्योंकि आए दिन कोई ना कोई शरारत और छेड़ छाड़ हो जाता.. एसी लिए तो सावित्री को आठवीं के बाद आगे पढ़ाना मुनासिब नहीं समझा. सीता जो कुछ करती काफ़ी सोच समझ कर.. लोग बहुत गंदे हो गये हैं " यही उसके मन मे आता. कभी सोचती आख़िर क्यों लोग इतने गंदे और खराब होते जा रहें है.. एक शराब की दुकान भी गाओं के नुक्कड़ पर खुल कर तो आग मे घी का काम कर रही है. क्या लड़के क्या बूढ़े सब के सब दारू पी कर मस्त हो जाते हैं और गंदी गलियाँ और अश्लील हरकत लड़ाई झगड़ा सब कुछ शुरू हो जाता.. वैसे भी दारू की दुकान अवारों का बहुत बढ़ियाँ अड्डा हो गया था. रोज़ कोई ना कोई नयी बात हो ही जाती बस देर इसी बात की रहती कि दारू किसी तरह गले के नीचे उतर जाए...फिर क्या कहना गालिया और गंदी बातों का सिलसिला शुरू होता की ख़त्म होने का नाम ही नही लेता . चार साल पहले सावित्री ने आठवीं दर्ज़े के बाद स्कूल छोड़ दिया .. वो भी मा के कहने पर क्योंकि गाओं मे आवारा और गुन्दो की नज़र सावित्री के उपर पड़ने का डर था. ए भी बात बहुत हद तक सही थी. ऐसा कुछ नही था कि सीता अपने लड़की को पढ़ाना नहीं चाहती पर क्या करे डर इस बात का था कि कहीं कोई उनहोनी हो ना जाए. चार साल हो गये तबसे सावित्री केवल घर का काम करती और इधेर उधेर नही जाती. कुछ औरतों ने सीता को सलाह भी दिया कि सावित्री को भी कहीं किसी के घर झाड़ू बर्तन के काम पे लगा दे पर सीता दुनिया के सच्चाई से भली भाँति वाकिफ़ थी. वह खुद दूसरों के यहाँ काम करती तो मर्दो के रुख़ से परिचित थी.. ये बात उसके बेटी सावित्री के साथ हो यह उसे पसंद नहीं थी. मुहल्ले की कुछ औरतें कभी पीठ पीछे ताने भी मारती " राजकुमारी बना के रखी है लगता है कभी बाहर की दुनिया ही नही देखेगी...बस इसी की एक लड़की है और किसी की तो लड़की ही नहीं है.." धन्नो जो 44 वर्ष की पड़ोस मे रहने वाली तपाक से बोल देती.. धन्नो चाची कुछ मूहफट किस्म की औरत थी और सीता के करीब ही रहने के वजह से सबकुछ जानती भी थी. अट्ठारह साल होते होते सावित्री का शरीर काफ़ी बदल चुका था , वह अब एक जवान लड़की थी, माहवारी तो 15 वर्ष की थी तभी से आना शुरू हो गया था. वह भी शरीर और मर्द के बारे मे अपने सहेलिओं और पड़ोसिओं से काफ़ी कुछ जान चुकी थी. वैसे भी जिस गाँव का माहौल इतना गंदा हो और जिस मुहल्ले मे रोज झगड़े होते हों तो बच्चे और लड़कियाँ तो गालिओं से बहुत कुछ समझने लगते हैं. धन्नो चाची के बारे मे भी सावित्री की कुछ सहेलियाँ बताती हैं को वो कई लोगो से फासी है. वैसे धन्नो चाची की बातें सावित्री को भी बड़ा मज़ेदार लगता. वो मौका मिलते ही सुनना चाहती. धन्नो चाची किसी से भी नही डरती और आए दिन किसी ना किसी से लड़ाई कर लेती. एक दिन सावित्री को देख बोल ही पड़ी " क्या रे तेरे को तो तेरी मा ने क़ैद कर के रख दिया है. थोड़ा बाहर भी निकल के देख, घर मे पड़े पड़े तेरा दीमाग सुस्त हो जाएगा; मा से क्यो इतना डरती है " सावित्री ने अपने शर्मीले स्वभाव के चलते कुछ जबाब देने के बजाय चुप रह एक हल्की मुस्कुराहट और सर झुका लेना ही सही समझा. वह अपने मा को बहुत मानती और मा भी अपनी ज़िम्मेदारीओं को पूरी तरीके से निर्वहन करती. वाश्तव मे सावित्री का चरित्र मा सीता के ही वजह से एस गंदे माहौल मे भी सुरच्छित था. सावित्री एक सामानया कद काठी की शरीर से भरी पूरी मांसल नितंबो और भारी भारी छातियो और काले घने बाल रंग गेहुआन और चहेरे पर कुछ मुहाँसे थे. दिखने मे गदराई जवान लड़की लगती. सोलह साल मे शरीर के उन अंगो पर जहाँ रोएँ उगे थे अब वहाँ काफ़ी काले बात उग आए थे. सावित्री का शरीर सामान्य कद 5'2 '' का लेकिन चौड़ा और मांसल होने के वजह से चूतड़ काफ़ी बड़ा बड़ा लगता था. एक दम अपनी मा सीता की तरह. घर पर पहले तो फ्रॉक पहनती लेकिन जबसे जंघे मांसल और जवानी चढ़ने लगी मा ने सलवार समीज़ ला कर दे दिया. दुपट्टा के हटने पर सावित्री के दोनो चुचियाँ काफ़ी गोल गोल और कसे कसे दिखते जो पड़ोसिओं के मूह मे पानी लाने के लिए काफ़ी था ये बात सच थी की इन अनारों को अभी तक किसी ने हाथ नही लगाया था. लेकिन खिली जवानी कब तक छुपी रहेगी , शरीर के पूरे विकास के बाद अब सावित्री के मन का भी विकास होने लगा. जहाँ मा का आदेश की घर के बाहर ना जाना और इधेर उधर ना घूमना सही लगता वहीं धन्नो चाची की बात की घर मे पड़े पड़े दीमाग सुस्त हो जाएगा " कुछ ज़्यादा सही लगने लगा. फिर भी वो अपने मा की बातों पर ज़्यादा गौर करती सीता के मन मे सावित्री के शादी की बात आने लगी और अपने कुछ रिश्तेदारों से चर्चा भी करती, आख़िर एस ग़रीबी मैं कैसे लड़की की शादी हो पाएगी. जो भी कमाई मज़दूरी करने से होती वह खाने और पहनने मैं ही ख़त्म हो जाता. सीता को तो नीद ही नही आती चिंता के मारे इधेर छोटे लड़के कालू की भी पढ़ाई करानी थी रिश्तेदारों से कोई आशा की किरण ना मिलने से सीता और परेशान रहने लगी रात दिन यही सोचती कि आख़िर कौन है जो मदद कर सकता है सीता कुछ क़र्ज़ लेने के बारे मे सोचती तो उस अयाश मंगतराम का चेहरा याद आता जो गाओं का पैसे वाला सूदखोर बुद्धा था और अपने गंदी हरक़त के लिए प्रषिध्ह था तभी उसे याद आया कि जब उसके पति की मौत हुई थी तब पति का एक पुराना दोस्त आया था जिसका नाम सुरतलाल था, वह पैसे वाला था और उसके सोने चाँदी की दुकान थी और जात का सुनार था उसका घर सीता के गाओं से कुछ 50 मील दूर एक छोटे शहर मे था, बहुत पहले सीता अपने पति के साथ उसकी दुकान पर गयी थी जो एक बड़े मंदिर के पास थी सीता की आँखे चमक गयी की हो सकता है सुरतलाल से कुछ क़र्ज़ मिल जाए जो वह धीरे धीरे चुकता कर देगी क्रमशः......................
संघर्ष


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संघर्ष --2

गतांक से आगे..........

एक दिन समय निकाल कर सीता उस सुरतलाल के दुकान पर गयी तो निराशा ही हाथ लगी क्योंकि सुरतलाल को इस बात का यकीन नहीं था कि सीता उसका क़र्ज़ कैसे वापस करसकेगी..... सीता की परेशानियाँ और बढ़ती नज़र आ रही थी कभी इन उलज़हनो मे यह सोचती कि यदि सावित्री भी कुछ कम करे तो आमदनी बढ़ जाए और शादी के लिए पैसे भी बचा लिया जाए चौतरफ़ा समस्याओं से घिरता देख सीता ने लगभग हथियार डालना शुरू कर दिया.. अपनी ज़िद , सावित्री काम करने के बज़ाय घर मे ही सुरक्ष्हित रखेगी को वापस लेने लगी उसकी सोच मे सावित्री के शादी के लिए पैसे का इंतज़ाम ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा. गाओं के मंगतराम से क़र्ज़ लेने का मतलब कि वह सूद भी ज़्यादा लेता और लोग यह भी सोचते की मंगतराम मज़ा भी लेता होगा, इज़्ज़त भी खराब होती सो अलग. सीता की एक सहेली लक्ष्मी ने एक सलाह दी कि "सावित्री को क्यो ना एक चूड़ी के दुकान पर काम करने के लिए लगा देती " यह सुनकर की सावित्री गाओं के पास छोटे से कस्बे मे कॉसमेटिक चूड़ी लिपीसटिक की दुकान पर रहना होगा, गहरी सांस ली और सोचने लगी. सहेली उसकी सोच को समझते बोली " अरी चिंता की कोई बात नही है वहाँ तो केवल औरतें ही तो आती हैं, बस चूड़ी, कंगन, और सौंदर्या का समान ही तो बेचना है मालिक के साथ, बहुत सारी लड़कियाँ तो ऐसे दुकान पर काम करती हैं " इस बात को सुन कर सीता को संतुष्टि तो हुई पर पूछा " मालिक कौन हैं दुकान का यानी सावित्री किसके साथ दुकान पर रहेगी" इस पर सहेली लक्ष्मी जो खुद एक सौंदर्या के दुकान पर काम कर चुकी थी और कुछ दुकानो के बारे मे जानती थी ने सीता की चिंता को महसूस करते कहा " अरे सीता तू चिंता मत कर , दुकान पर चाहे जो कोई हो समान तो औरतों को ही बेचना है , बस सीधे घर आ जाना है, वैसे मैं एक बहुत अच्छे आदमी के सौंदर्या के दुकान पर सावित्री को रखवा दूँगी और वो है भोला पंडित की दुकान, वह बहुत शरीफ आदमी हैं , बस उनके साथ दुकान मे औरतों को समान बेचना है, उनकी उम्र भी 50 साल है बाप के समान हैं मैं उनको बहुत दीनो से जानती हूँ, इस कस्बे मे उनकी दुकान बहुत पुरानी है, वे शरीफ ना होते तो उनकी दुकान इतने दीनो तक चलती क्या?" सीता को भोला पंडित की बुढ़ापे की उम्र और पुराना दुकानदार होने से काफ़ी राहत महसूस कर, सोच रही थी कि उसकी बेटी सावित्री को कोई परेशानी नही होगी. लक्ष्मी की राय सीता को पसंद आ गयी , आखिर कोई तो कोई रास्ता निकालना ही था क्योंकि सावित्री की शादी समय से करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी. दुसरे दिन लक्ष्मी के साथ सावित्री भोला पंडित के सौंदर्य प्रसाधन के दुकान के लिए चली. कस्बे के एक संकरी गली में उनकी दुकान थी. दुकान एक लम्बे कमरे में थी जिसमे आगे दुकान और पिछले हिस्से में पंडित भोला रहते थे. उनका परिवार दुसरे गाँव में रहता था. लक्ष्मी ने सीता को भोला पंडित से परिचय कराया , स्वभाव से शर्मीली सीता ने सिर नीचे कर हल्की सी मुस्कराई. प्रणाम करने में भी लजा रही थी कारण भी था की वह एक गाँव की काफी शरीफ औरत थी और भोला पंडित से पहली बार मुलाकात हो रही थी. " अरे कैसी हो लक्ष्मी , बहुत दिनों बाद दिखाई दी , मैंने बहुत ईन्तजार किया तुम्हारा , मेरी दुकान पर तुम्हारी बहुत जरूरत है भाई" भोला पंडित ने अपनी बड़ी बड़ी आँखों को नाचते हुए पूछा. " अरे क्या करूँ पंडित जी मेरे ऊपर भी बहुत जिम्मेदारिया है उसी में उलझी रहती हूँ फुर्सत ही नहीं मिलती" लक्ष्मी ने सीता की ओर देखते मुस्कुराते हुए जवाबदिया "जिम्मेदारियो में तो सबकी जिंदगी है लक्ष्मी कम से कम खबर क्र देती , मैं तो तुम्हारे इस आश्वाशन पर की जल्दी मेरे दुकान पर काम करोगी मैंने किसी और लड़की या औरत को ढूंढा भी नहीं" भोला पंडित ने सीता की ओर देखते हुए लक्ष्मी से कुछ शिकायती लहजे में कहा, " मुझे तो फुर्सत अभी नहीं है लेकिन आपके ही काम के लिए आई हूँ और मेरी जगह इनकी लड़की को रख लीजिये . " सीता की ओर लक्ष्मी ने इशारा करते हुए कहा. भोला पंडित कुछ पल शांत रहे फिर पूछे "कौन लड़की है कहाँ , किस दुकान पर काम की है" शायद वह अनुभव जानना चाहते थे "अभी तो कही काम नहीं की है कहीं पर आपके दुकान की जिम्मेदारी बखूबी निभा लेगी " लक्ष्मी ने जबाव दिया लेकिन भोला पंडित के चेहरे पर असंतुष्टि का भाव साफ झलक रहा था शायद वह चाहते थे की लक्ष्मी या कोई पहले से सौन्दर्य प्रसाधन की दुकान पर काम कर चुकी औरत या लड़की को ही रखें . भोला पंडित के रुख़ को देखकर सीता मे माथे पर सिलवटें पड़ गयीं. क्योंकि सीता काफ़ी उम्मीद के साथ आई थी कि उसकी लड़की दुकान पर काम करेगी तब आमदनी अच्छी होगी जो उसके शादी के लिए ज़रूरी था. सीता और लक्ष्मी दोनो की नज़रें भोला पंडित के चेहरे पर एक टक लगी रही कि अंतिम तौर पर क्या कहतें हैं. लक्ष्मी ने कुछ ज़ोर लगाया "पंडित जी लड़की काफ़ी होशियार और समझदार है आपके ग्राहको को समान बखूबी बेच लेगी , एक बार मौका तो दे कर देख लेने मैं क्या हर्ज़ है" पंडित जी माथे पर हाथ फेरते हुए सोचने लगे. एक लंबी सांस छोड़ने के बाद बोले "अरे लक्ष्मी मेरे ग्राहक को एक अनुभवी की ज़रूरत है जो चूड़ी, कंगन, बिंदिया के तमाम वरीटीएस को जानती हो और ग्राहको के नस को टटोलते हुए आराम से बेच सके, तुम्हारी लड़की तो एक दम अनाड़ी है ना, और तुम तो जानती हो कि आजकल समान बेचना कितना मुश्किल होता जा रहा है." सीता चुपचाप एक तक दोनो के बीच के बातों को सुन रही थी. तभी भोला पंडित ने काफ़ी गंभीरता से बोले " लक्ष्मी मुश्किल है मेरे लिए" सीता के मन मे एक निराशा की लहर दौर गयी. थोड़ी देर बाद कुछ और बातें हुई और भोला पंडित के ना तैयार होने की दशा मे दोनो वापस गाओं की ओर चल दी. रास्ते मे लक्ष्मी ने सीता से बोला "तुमने तो लड़की को ना तो पढ़ाया और ना ही कुछ सिखाया और बस घर मैं बैठाए ही रखा तो परेशानी तो होगी ही ना; कहीं पर भी जाओ तो लोग अनुभव या काम करने की हुनर के बारे मे तो पूछेनएगे ही " सीता भी कुछ सोचती रही और रास्ते चलती रही, फिर बोली "अरे तुम तो जानती हो ना की गाओं का कितना गंदा माहौल है कि लड़की का बाहर निकलना ही मुश्किल है, हर जगह हरामी कमीने घूमते रहते हैं, और मेरे तो आगे और पीछे कोई भी नही है कि कल कुछ हो जाए ऐसा वैसा तो" लक्ष्मी फिर जबाव दी पर कुछ खीझ कर " तुम तो बेवजह डरती रहती हो, अरे हर जगह का माहौल तो एसी तरह का है तो इसका यह मतलब तो नही कि लोग अपने काम धंधा छोड़ कर घर मे तेरी बेटी की तरह बैठ जाए. लोग चाहे जैसा हो बाहर निकले बगैर तो कम चलने वाला कहा है. सब लोग जैसे रहेंगे वैसा ही तो हमे भी रहना होगा; " सीता कुछ चुपचाप ही थी और रास्ते पर पैदल चलती जा रही थी. लक्ष्मी कुछ और बोलना सुरू किया "देखो मेरे को मैं भी तो दुकान मैं नौकरी कर लेती इसका ये मतलब तो नही की मेरा कोई चरित्र ही नही या मैं ग़लत हूँ ; ऐसा कुछ नही है बस तुमहरे मन मे भ्रम है कि बाहर निकलते ही चरित्र ख़तम हो जाएगा" सीता ने अपना पच्छ को मजबूत करने की कोशिस मे तर्क दे डाला "तुम तो देखती हो ना की रास्ते मैं यदि ये दारूबाज़ लोफर, लफंगे मिलते हैं तो किस तरह से गंदी बोलियाँ बोलते है, आख़िर मेरी बेटी तो अभी बहुत कच्ची है क्या असर पड़ेगा उसपर" लक्ष्मी के पास भी एसका जबाव तैयार था "मर्दों का तो काम ही यही होता है कि औरत लड़की देखे तो सीटी मार देंगे या कोई छेड़छाड़ शरारत भरी अश्लील बात या बोली बोल देंगे; लेकिन वी बस एससे ज़्यादा और कुछ नही करते, ; और इन सबको को सुनना ही पड़ता है इस दुनिया मे सीता" आगे और बोली "इन बातों को सुन कर नज़रअंदाज कर के अपने काम मे लग जाना ही समझदारी है सीता, तुम तो बाहर कभी निकली नही एसीलिए तुम इतना डरती हो" सीता को ये बाते पसंद नही थी लेकिन एन बातों को मानना जैसे उसकी मज़बूरी दिखी और यही सोच कर सीता ने पलट कर जबाव देना उचित नहीं समझा सीता एक निराश, उदास, और परेशान मन से घर मे घुसी और सावित्री की ओर देखा तभी सावित्री ने जानना चाहा तब सीता ने बताया कि भोला पंडित काम जानने वाली लड़की को रखना चाहता है. वैसे सावित्री के मन मे सीखने की ललक बहुत पहले से ही थी पर मा के बंदिशो से वह सारी ललक और उमंग मर ही गयी थी. सारी रात सीता को नीद नही आ रही थी वो यही सोचती कि आख़िर सावित्री को कहाँ और कैसे काम पर लगाया जाए. भोला पंडित की वो बात जिसमे उन्होने अनुभव और लक्ष्मी की बात जिसमे 'सुनना ही पड़ता है और बिना बाहर निकले कुछ सीखना मुस्किल है' मानो कान मे गूँज रहे थे और कह रहे थे कि सीता अब हिम्मत से काम लो . बेबस सीता के दुखी मन मे अचानक एक रास्ता दिखा पर कुछ मुस्किल ज़रूर था, वो ये की भोला पंडित लक्ष्मी को अपने यहाँ काम पर रखना चाहता था पर लक्ष्मी अभी तैयार नहीं थी और दूसरी बात की सावित्री को काम सीखना जो लक्ष्मी सिखा सकती थी. सीता अपने मन मे ये भी सोचती कि यदि पंडित पैसा कुछ काम भी दे तो चलेगा . बस कुछ दीनो मे सावित्री काम सिख लेगी तो कहीं पर काम करके पैसा कमा सकेगी. इसमे मुस्किल इस बात की थी कि लक्ष्मी को तैयार करना और भोला पंडित का राज़ी होना. यही सब सोचते अचानक नीद लगी तो सुबह हो गयी. सुबह सुबह ही वो लक्ष्मी के घर पर पहुँच अपनी बात को काफ़ी विनम्रता और मजबूरी को उजागर करते हुए कहा. शायद भगवान की कृपा ही थी कि लक्ष्मी तैयार हो गयी फिर क्या था दिन मे दोनो फिर भोला पंडित के दुकान पर पहुँचे. भोला पंडित जो लक्ष्मी को तो दुकान मे रखना चाहता था पर सावित्री को बहुत काम पैसे मे ही रखने के लिए राज़ी हुआ. सीता खुस इस बात से ज़्यादा थी कि सावित्री कुछ सीख लेगी , क्योंकि की पैसा तो भोला पंडित बहुत काम दे रहा था सावित्री को . "आख़िर भगवान ने सुन ही लिया" सीता लगभग खुश ही थी और रास्ते मे लक्ष्मी से कहा और लक्ष्मी का अपने उपर एहसान जताया


RE: Hindi Porn Stories संघर्ष - sexstories - 09-28-2017

संघर्ष --3

gtaank se aage.......... घर पहुँचने के बाद सीता ने सावित्री को इस बात की जानकारी दी की कल से लक्ष्मी के साथ भोला पंडित के दुकान पर जा कर कम करना है . सावित्री मन ही मन खुस थी , उसे ऐसे लगा की वह अब अपने माँ पर बहुत भर नहीं है उम्र १८ की पूरी हो चुकी थी शरीर से काफी विकसित, मांसल जांघ, गोल और चौड़े चुतड, गोल और अनार की तरह कसी चुचिया काफी आकर्षक लगती थी. सलवार समीज और चुचिया बड़ी आकार के होने के वजह से ब्रा भी पहनती और नीचे सूती की सस्ती वाली चड्डी पहनती जिसकी सीवन अक्सर उभाड जाता. सावित्री के पास कुल दो ब्रा और तीन चड्ढी थी एक लाल एक बैगनी और एक काली रंग की, सावित्री ने इन सबको एक मेले में से जा कर खरीदी धी. सावित्री के पास कपड़ो की संख्या कोई ज्यादा नहीं थी कारण गरीबी. जांघों काफी सुडौल और मोती होने के वजह से चड्डी , जो की एक ही साइज़ की थी, काफी कसी होती थी. रानो की मोटाई चड्ढी में कस उठती मानो थोडा और जोर लगे तो फट जाये. रानो का रंग कुछ गेहुआं था और जन्घो की पट्टी कुछ काले रंग लिए था लेकिन झांट के बाल काफी काले और मोटे थे. बुर की उभार एकदम गोल पावरोटी के तरह थी. कद भले ही कुछ छोटा था लेकिन शरीर काफी कसी होने के कारण दोनों रानो के बीच बुर एकदम खरबूज के फांक की तरह थी. कभी न चुदी होने के नाते बुर की दोनों फलके एकदम सटी थी रंग तो एकदम काला था . झांटो की सफाई न होने और काफी घने होने के कारण बुर के ऊपर किसी जंगल की तरह फ़ैल कर ढक रखे थे. जब भी पेशाब करने बैठती तो पेशाब की धार झांटो को चीरता हुआ आता इस वजह से जब भी पेशाब कर के उठती झांटो में मूत के कुछ बूंद तो जरूर लग जाते जो चड्डी पहने पर चड्डी में लगजाते. गोल गोल चूतडों पर चड्ढी एकदम चिपक ही जाती और जब सावित्री को पेशाब करने के लिए सलवार के बाद चड्ढी सरकाना होता तो कमर के पास से उंगलिओं को चड्ढी के किनारे में फंसा कर चड्ढी को जब सरकाती तो लगता की कोई पतली परत चुतद पर से निकल रही है. चड्ढी सरकते ही चुतड को एक अजीब सी ठंढी हवा की अनुभूति होती. चड्ढी सरकने के बाद गोल गोल कसे हुए जांघो में जा कर लगभग फंस ही जाती, पेशाब करने के लिए सावधानी से बैठती जिससे चड्ढी पर ज्यादे खिंचाव न हो और जन्घो के बीच कुछ इतना जगह बन जाय की पेशाब की धार बुर से सीधे जमीन पर गिरे . कभी कभी थोडा भी बैठने में गड़बड़ी होती तो पेशाब की गर्म धार सीधे जमीन के बजाय नीचे पैर में फंसे सलवार पर गिरने लगती लिहाज़ा सावित्री को पेशाब तुरंत रोक कर चौड़े चुतड को हवा में उठा कर फिर से चड्ढी सलवार और जांघो को कुछ इतना फैलाना पड़ता की पेशाब पैर या सलवार पर न पडके सीधे जमीन पर गिरे. फिर भी सावित्री को मूतते समय मूत की धार को भी देखना पड़ता की दोनों पंजों के बीच खाली जगह पर गिरे. इसके साथ साथ सिर घुमा कर इर्द गिर्द भी नज़र रखनी पड़ती कि कहीं कोई देख न ले. खुले में पेशाब करने में गाँव कि औरतों को इस समस्या से जूझनापड़ता. सावित्री जब भी पेशाब करती तो अपने घर के दीवाल के पीछे एक खाली पतली गली जो कुछ आड़ कर देती और उधर किसी के आने जाने का भी डर न होता . माँ सीता के भी मुतने का वही स्थान था. और मूतने के वजह से वहां मूत का गंध हमेशा रहता. मूतने के बाद सावित्री सीधा कड़ी होती और पहले दोनों जांघों कि गोल मोटे रानो में फंसे चड्ढी को उंगलिओं के सहारे ऊपरचढ़ाती चड्ढी के पहले अगले भाग को ऊपर चड़ा कर झांटों के जंगल से ढके बुर को ढक लेती फिर एक एक करके दोनों मांसल गोल चूतडो पर चड्ढी को चढ़ाती. फिर भी सावित्री को यह महसूस होता की चड्ढी या तो छोटी है या उसका शरीर कुछ ज्यादा गदरा गया है. पहनने के बाद बड़ी मुश्किल से चुतड और झांटों से ढकी बुर चड्ढी में किसी तरीके से आ पाती , फिर भी ऐसा लगता की कभी भी चड्ढी फट जाएगी. बुर के ऊपर घनी और मोटे बालो वाली झांटे देखने से मालूम देती जैसे किसी साधू की घनी दाढ़ी है और चड्डी के अगले भाग जो झांटों के साथ साथ बुर की सटी फांको को , जो झांटो के नीचे भले ही छुपी थी पर फांको का बनावट और उभार इतना सुडौल और कसा था की झांटों के नीचे एक ढंग का उभार तैयार करती और कसी हुई सस्ती चड्डी को बड़ी मुस्किल से छुपाना पड़ता फिर भी दोनों फांको पर पूरी तरह चड्डी का फैलाव कम पड़ जाता , लिहाज़ा फांके तो किसी तरह ढँक जाती पर बुर के फांको पर उगे काले मोटे घने झांट के बाल चड्डी के अगल बगल से काफी बाहर निकल आते और उनके ढकने के जिम्मेदारी सलवार की हो जाती. इसका दूसरा कारण यह भी था की सावित्री एक गाँव की काफी सीधी साधी लड़की थी जो झांट के रख रखाव पर कोई ध्यान नहीं देती और शारीरिक रूप से गदराई और कसी होने के साथ साथ झांट के बाल कुछ ज्यादा ही लम्बे और घना होना भी था. सावित्री की दोनों चुचिया अपना पूरा आकार ले चुकी थी और ब्रेसरी में उनका रहना लगभग मुस्किल ही था, फिर भी दो ब्रेस्रियो में किसी तरह उन्हें सम्हाल कर रख लेती. जब भी ब्रेसरी को बंद करना पड़ता तो सावित्री को काफी दिक्कत होती. सावित्री ब्रा या ब्रेसरी को देहाती भाषा में "चुचिकस" कहती क्योंकि गाँव की कुछ औरते उसे इसी नाम से पुकारती वैसे इसका काम तो चुचिओ को कस के रखना ही था. बाह के कांख में बाल काफी उग आये थे झांट की तरह उनका भी ख्याल सावित्री नहीं रखती नतीजा यह की वे भी काफी संख्या में जमने से कांख में कुछ कुछ भरा भरा सा लगता. सावित्री जब भी चलती तो आगे चुचिया और पीछे चौड़ा चुतड खूब हिलोर मारते. सावित्री के गाँव में आवारों और उचक्कों की बाढ़ सी आई थी. सावित्री के उम्र की लगभग सारी लडकिया किसी ना किसी से चुदती थी कोई साकपाक नहीं थी जिसे कुवारी कहा जा सके . ऐसा होगा भी क्यों नहीं क्योंकि गाँव में जैसे लगता को शरीफ कम और ऐयास, गुंडे, आवारे, लोफर, शराबी, नशेडी ज्यादे रहते तो लड़किओं का इनसे कहाँ तक बचाया जा सकता था. लड़किओं के घर वाले भी पूरी कोसिस करते की इन गंदे लोगो से उनकी लडकिया बची रहे पर चौबीसों घंटे उनपर पहरा देना भी तो संभव नहीं था, और जवानी चढ़ने की देरी भर थी कि आवारे उसके पीछे हाथ धो कर पद जाते. क्योंकि उनके पास कोई और काम तो था नहीं. इसके लिए लड़ाई झगडा गाली गलौज चाहे जो भी हो सब के लिए तैयार होते . नतीजा यही होते कि शरीफ से शरीफ लड़की भी गाँव में भागते बचते ज्यादा दिन तक नहीं रह पाती और किसी दिन किसी गली, खंडहर या बगीचे में, अँधेरे, दोपहर में किसी आवारे के नीचे दबी हुई स्थिति में आ ही जातीं बस क्या था बुर की सील टूटने कि देर भर रहती और एक दबी चीख में टूट भी जाती. और आवारे अपने लन्ड को खून से नहाई बुर में ऐसे दबाते जैसे कोई चाकू मांस में घुस रहा हो. लड़की पहले भले ही ना नुकुर करे पर इन चोदुओं की रगड़दार गहरी चोदाई के बाद ढेर सारा वीर्यपात जो लन्ड को जड़ तक चांप कर बुर की तह उड़ेल कर अपने को अनुभवी आवारा और चोदु साबित कर देते और लड़की भी आवारे लन्ड के स्वाद की शौक़ीन हो जातीं. फिर उन्हें भी ये गंदे लोगो के पास असीम मज़ा होने काअनुभव हो जाता . फिर ऐसी लड़की जयादा दिन तक शरीफ नहीं रह पाती और कुतिया की तरह घूम घूम कर चुदती रहती . घर वाले भी किसी हद तक डरा धमका कर सुधारने की कोशिस करते लेकिन जब लड़की को एक बार लन्ड का पानी चढ़ जाता तो उसका वापस सुधारना बहुत मुश्किल होता. और इन आवारों गुंडों से लड़ाई लेना घर वालों को मुनासिब नहीं था क्योंकि वे खतरनाक भी होते. लिहाज़ा लड़की की जल्दी से शादी कर ससुराल भेजना ही एक मात्र रास्ता दीखता और इस जल्दबाजी में लग भी जाते . शादी जल्दी से तय करना इतना आसान भी ना होता और तब तक लडकिया अपनी इच्छा से इन आवारो से चुदती पिटती रहती. आवारो के संपर्क में आने के वजह से इनका मनोबल काफी ऊँचा हो जाता और वे अपने शादी करने या ना करने और किससे करने के बारे में खुद सोचने और बात करने लगती. और घरवालो के लिए मुश्किल बढ़ जाती . एक बार लड़की आवारो के संपर्क में आई कि उनका हिम्मत यहाँ तक हो जाता कि माँ बाप और घरवालो से खुलकर झगडा करने में भी न हिचकिचाती. यदि मारपीट करने कि कोसिस कोई करे तो लड़की से भागजाने कि धमकी मिलती और चोदु आवारो द्वारा बदले का भी डर रहता. और कई मामलो में घरवाले यदि ज्यादे हिम्मत दिखाए तो घरवालो को ये गुंडे पीट भी देते क्योंकि वे लड़की के तरफ से रहते और कभी कभी लड़की को भगा ले जाते. सबकुछ देखते हुए घरवाले लडकियो और आवारो से ज्यादे पंगा ना लेना ही सही समझते और जल्द से जल्द शादी करके ससुराल भेजने के फिराक में रहते. ऐसे माहौल में घरवाले यह देखते कि लड़की समय बे समय किसी ना किसी बहाने घुमने निकल पड़ती जैसे दोपहर में शौच के लिए तो शाम को बाज़ार और अँधेरा होने के बाद करीब नौ दस बजे तक वापस आना और यही नहीं बल्कि अधि रात को भी उठकर कभी गली या किसी नजदीक बगीचे में जा कर चुद लेना. इनकी भनक घरवालो को खूब रहती पर शोरशराबा और इज्जत के डर से चुप रहते कि ज्याने दो हंगामा ना हो बस . यही कारन था कि लडकिया जो एक बार भी चुद जाती फिर सुधरने का नाम नहीं लेती. आवारो से चुदी पिटी लडकियो में निडरता और आत्मविश्वास ज्यादा ही रहता और इस स्वभाव कि लडकियो कि आपस में दोस्ती भी खूब होती और चुदाई में एक दुसरे कि मदद भी करती. गाँव में जो लडकिया ज्यादे दिनों से चुद रही है या जो छिनार स्वभाव कि औरते नयी चुदैल लडकियो के लिए प्रेरणा और मुसीबत में मार्गदर्शक के साथ साथ मुसीबत से उबरने का भी काम करती थी. जैसे कभी कभी कोई नई छोकरी चुद तो जाती किसी लेकिन गर्भनिरोधक का उपाय किये बगैर नतीजा गर्भ ठहर जाता. इस हालत में लड़की के घर वालो से पहले यही इन चुदैलो को पता चल जाता तो वे बगल के कसबे में चोरी से गर्भ गिरवा भी देती.


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संघर्ष --4

gtaank se aage.......... ऐसे माहौल में घरवाले चाहे जितनी जल्दी शादी करते पर तब तक उनके लडकियो की बुरो को आवारे चोद चोद कर एक नया आकार के डालते जिसे बुर या चूत नहीं बल्कि भोसड़ा ही कह सकते है. यानि शादी का बाद लड़की की विदाई होती तो अपने ससुराल कुवारी बुर के जगह खूब चुदी पिटी भोसड़ा ही ले जाती और सुहागरात में उसका मर्द अपने दुल्हन के बुर या चुदैल के भोसड़ा में भले ही अंतर समझे या न समझे लड़की या दुल्हन उसके लन्ड की ताकत की तुलना अपने गाँव के आवारो के दमदार लंडों से खूब भली भाती कर लेती. जो लड़की गाँव में घुमघुम कर कई लंडो का स्वाद ले चुकी रहती है उसे अपने ससुराल में एक मर्द से भूख मिटता नज़र नहीं आता. वैसे भी आवारे जितनी जोश और ताकत से चोदते उतनी चुदाई की उमंग शादी के बाद पति में न मिलता. नतीजा अपने गाँव के आवारो के लंडो की याद और प्यास बनी रहती और ससुराल से अपने मायका वापस आने का मन करनेलगता. ऐसे माहौल में सावित्री का बचे रहना केवल उसकी माँ के समझदारी और चौकन्ना रहने के कारण था . सावित्री के बगल में ही एक पुरानी चुड़ैल धन्नो चाची का घर था जिसके यहाँ कुछ चोदु लोग आते जाते रहते , सावित्री की माँ सीता इस बात से सजग रहती और सावित्री को धन्नो चाची के घर न जाने और उससे बात न करने के लिए बहुत पहले ही चेतावनी दे डाली थी. सीता कभी कभी यही सोचती की इस गाँव में इज्जत से रह पाना कितना मुश्किल हो गया है. उसकी चिंता काफी जायज थी. सावित्री के जवान होने से उसकी चिंता का गहराना स्वाभाविक ही था. आमदनी बदने के लिए सावित्री को दुकान पर काम करने के लिए भेजना और गाँव के आवारो से बचाना एक नयी परेशानी थी. वैसे सुरुआत में लक्ष्मी के साथ ही दुकान पर जाना और काम करना था तो कुछ मन को तसल्ली थी कि चलो कोई उतना डर नहीं है कोई ऐसी वैसी बात होने की. भोला पंडित जो ५० साल के करीब थे उनपर सीता को कुछ विश्वास था की वह अधेड़ लड़की सावित्री के साथ कुछ गड़बड़ नहीं करेगे. दुसरे दिन सावित्री लक्ष्मी के साथ दुकान पर चल दी . पहला दिन होने के कारण वह अपनी सबसे अच्छी कपडे पहनी और लक्ष्मी के साथ चल दी , रात में माँ ने खूब समझाया था की बाहर बहुत समझदारी सेरहना चाहिए. दुसरे लोगो और मर्दों से कोई बात बेवजह नहीं करनी चाहिए. दोनों पैदल ही चल पड़ी. रास्ते में लक्ष्मी ने सावित्री से कहा की "तुम्हारी माँ बहुत डरती है कि तुम्हारे साथ कोई गलत बात न हो जाए, खैर डरने कि वजह भी कुछ हद तक सही है पर कोई अपना काम कैसे छोड़ दे." इस पर सावित्री ने सहमती में सिर हिलाया. गाँव से कस्बे का रास्ता कोई दो किलोमीटर का था और ठीक बीच में एक खंडहर पड़ता जो अंग्रेजो के ज़माने का पुरानी हवेली की तरह थी जिसके छत तो कभी के गिर चुके थे पर जर्जर दीवाले सात आठ फुट तक की उचाई तक खड़ी थी. कई बीघे में फैले इस खंडहर आवारो को एक बहुत मजेदार जगह देता जहा वे नशा करते, जुआ खेलते, या लडकियो और औरतो की चुदाई भी करते. क्योंकि इस खंडहर में कोई ही शरीफ लोग नहीं जाते. हाँ ठीक रास्ते में पड़ने के वजह से इसकी दीवाल के आड़ में औरते पेशाब वगैरह कर लेती. फिर भी यह आवारो, नशेडियो, और ऐयाशो का मनपसंद अड्डा था. गाँव की शरीफ औरते इस खंडहर के पास से गुजरना अच्छा नहीं समझती लेकिन कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था कस्बे में या कही जाने के लिए. दोनों चलते चलते खंडहर के पास पहुँचने वाले थे की लक्ष्मी ने सावित्री को आगाह करने के अंदाज में कहा " देखो आगे जो रास्ते से सटे खंडहर है इसमें कभी भूल कर मत जाना क्योंकि इसमें अक्सर गाँव के आवारे लोफ़र रहते हैं " इस पर सावित्री के मन में जिज्ञासा उठी और पुछ बैठी "वे यहाँ क्या करते?" "अरे नशा और जुआ खेलते और क्या करेंगे ये नालायक , क्या करने लायक भी हैं ये समाज के कीड़े " लक्ष्मी बोली. लक्ष्मी ने सावित्री को सचेत और समझदार बनाने के अंदाज में कहा" देखो ये गुंडे कभी कभी औरतो को अकेले देख कर गन्दी बाते भी बोलते हैं उनपर कभी ध्यान मत देना, और कुछ भी बोले तुम चुप चाप रास्ते पर चलना और उनके तरफ देखना भी मत, इसी में समझदारी है और इन के चक्कर में कैसे भी पड़ने लायक नहीं होते. " कुछ रुक कर लक्ष्मी फिर बोली "बहुत डरने की बात नहीं है ये मर्दों की आदत होती है औरतो लडकियो को बोलना और छेड़ना, " सावित्री इन बातो को सुनकर कुछ सहम सी गयी पर लक्ष्मी के साथ होने के वजह से डरने की कोई जरूरत नहीं समझी..आगे खंडहर आ गया और करीब सौ मीटर तक खंडहर की जर्जर दीवाले रास्ते से सटी थी. ऐसा लगता जैसे कोई जब चाहे रास्ते पर के आदमी को अंदर खंडहर में खींच ले तो बहर किसी को कुछ पता न चले , रास्ते पर से खंडहर के अंदर तक देख पाना मुस्किल था क्योंकि पुराने कमरों की दीवारे जगह जगह पर आड़ कर देती और खंडहर काफी अंदर तक था, दोनों जब खंडहर के पास से गुजर रहे थे तब एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था. खंडहर में कोई दिख नहीं रहा था वैसे सावित्री पहले भी कभी कभार बाज़ार जाती तो इसी रस्ते से लेकिन तब उसके साथ उसकी माँ और गाँव की कई औरते भी साथ होने से दर उतना नहीं लगता. इसबार वह केवल लक्ष्मी के साथ थी और कुछ समय बाद उसे अकेले भी आना जाना पड़ सकता था. जो सबसे अलग बात यह थी की वह अब भरपूर जवान हो चुकी थी और आवारो से उसके जवानी को खतरा भी था जो वह महसूस कर सकती थी. सावित्री अब यह अच्छी तरह जानती थी की यदि आवारे उसे या किसी औरत को इस सुनसान खंडहर में पा जाएँ तो क्या करेंगे. शायद यह बात मन में आते ही उसके बदन में अजीब सी सिहरन उठी जो वह कुछ महसूस तो कर सकती थी लेकिन समझ नहीं पा रही थी. शायद खंडहर की शांत और एकांत का सन्नाटा सावित्री के मन के भीतर कुछ अलग सी गुदगुदी कर रही थी जिसमे एक अजीब सा सनसनाहट और सिहरन थी और यह सब उसके जवान होने के वजह से ही थी. खंडहर के पास से गुजरते इन पलो में उसके मन में एक कल्पना उभरी की यदि कोई आवारा उसे इस खंडहर में अकेला पा जाये तो क्या होगा..इस कल्पना के दुसरे ही पल सावित्री के बदन में कुछ ऐसा झनझनाहट हुआ जो उसे लगा की पुरे बदन से उठ कर सनसनाता हुआ उसकी दोनों झांघो के बीच पहुँचगया हो खंडहर में से कुछ लोगो के बात करने की आवाज आ रही थी. सावित्री का ध्यान उन आवाजो के तरफ ही था. ऐसा लग रहा था कुछ लोग शराब पी रहे थे और बड़ी गन्दी बात कर रहे थे पार कोई कही दिख नहीं रहा था. अचानक उसमे से एक आदमी जो 3२ -3५ साल का था बाहर आया और दोनों को रास्ते पार जाते देखने लगा तभी अन्दर वाले ने उस आदमी से पुछा "कौन है" जबाब में आदमी ने तुरंत तो कुछ नहीं कहा पर कुछ पल बाद में धीरे से बोला " दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए" उसके बाद सब खंडहर में हसने लगे. सावित्री के कान में तो जाने बम फट गया उस आदमी की बात सुनकर. चलते हुए खंडहर पार हो गया लक्ष्मी भी चुपचाप थी फिर बोली "देखो जब औरत घर से बाहर निकलती हैं तो बहुत कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है. यह मर्दों की दुनिया है वे जो चाहे बोलते हैं और जो चाहे करते हैं. हम औरतो को तो उनसे बहुत परेशानी होती है पर उन्हें किसी से कोई परेशानी नहीं होती." सावित्री कुछ न बोली पर खंडहर के पास उस आदमी की बात बार बार उसके दिमाग में गूंज रही थी "दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए" . तभी भोला पंडित की दुकान पर दोनों पहुँचीं . भोला पंडित पहली बार सावित्री को देखा तो उसकी चुचिया और चूतडो पर नज़र चिपक सी गई और सावित्री ने भोला पंडित का नमस्कार किया तो उन्होंने कुछ कहा नहीं बल्कि दोनों को दुकान के अंदर आने के लिए कहे. भोला पंडित ४४ साल के सामान्य कद के गोरे और कसरती शरीर के मालिक थे . उनके शरीर पर काफी बाल उगे थे . वे अक्सर धोती कुरता पहनते और अंदर एक निगोट पहनने की आदत थी. क्योंकि जवानी में वे पहलवानी भी करते थे. स्वाभाव से वे कुछ कड़े थे लेकिन औरतो को सामान बेचने के वजह से कुछ ऊपर से मीठापन दिखाते थे. दोनों दुकान में रखी बेंच पर बैठ गयीं. भोला पंडित ने एक सरसरी नजर से सावित्री को सर से पावं तक देखा और पुछा "क्या नाम है तेरा? " सावित्री ने जबाव दिया "जी सावित्री " लक्ष्मी सावित्री का मुह देख रही थी. उसके चेहरे पर मासूमियत और एक दबी हुई घबराहट साफ दिख रही थी. क्योंकि घर के बाहर पहली बार किसी मर्द से बात कर रही थी भोला पंडित ने दूसरा प्रश्न किया "kitne साल की हो गयी है" "जी अट्ठारह " सावित्री ने जबाव में कहा. आगे फिर पुछा "कितने दिनों में दुकान सम्हालना सीख लेगी" "जी " और इसके आगे सावित्री कुछ न बोली बल्कि बगल में बैठी लक्ष्मी का मुंह ताकने लगी तो लक्ष्मी ने सावित्री के घबराहट को समझते तपाक से बोली "पंडित जी अभी तो नयी है मई इसे बहुत जल्दी दुकान और सामानों के बारे में बता और सिखा दूंगी इसकी चिंता मेरे ऊपर छोड़ दीजिये " "ठीक है पर जल्दी करना , और कब तक तुम मेरे दुकान पर रहोगी " भोला पंडित ने लक्ष्मी से पुछा तो लक्ष्मी ने कुछ सोचने के बाद कहा "ज्यादे दिन तो नहीं पर जैसे ही सावित्री आपके दुकान की जिम्मेदारी सम्हालने लगेगी, क्योंकि मुझे कहीं और जाना है और फुर्सत एक दम नहीं है पंडित जी." आगे बोली "यही कोई दस दिन क्योंकि इससे ज्यादा मैं आपकी दुकान नहीं सम्हाल पाऊँगी , मुझे कुछ अपना भी कम करना है इसलिए" " ठीक है पर इसको दुकान के बारे में ठीक से बता देना" भोला पंडित सावित्री के तरफ देखते कहा.


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संघर्ष --5

गतांक से आगे.......... सावित्री भोला पंडित के रूअब्दार कड़क मिज़ाज और तेवर को देखकेर कुछ डर सी जाती. क्योंकि वे कोई ज़्यादे बात चीत नही करते. और उनकी आवाज़ मोटी भी थी, बस दुकान पर आने वाली औरतो को समान बेचने के लालच से कुछ चेहरे पर मीठापन दीखाते. रोजाना दोपहेर को वे एक या दो घंटे के लिए दुकान बंद कर खाना खा कर दुकान के पिछले हिस्से मे बने कमरे मे आराम करते. यह दुकान को ही दो भागो मे बाँट कर बना था जिसके बीच मे केवल एक दीवार थी और दुकान से इस कमरे मे आने के लिए एक छोटा सा दरवाजा था जिस पर एक परदा लटका रहता. अंदर एक चौकी थी और पिछले कोने मे शौचालय और स्नानघर भी था . यह कमरा दुकान के तुलना मे काफ़ी बड़ा था. कमरे मे एक चौकी थी जिसपर पर भोला पंडित सांड की तरह लेट गये और नीचे एक चटाई पर लक्ष्मी लेट कर आराम करने लगी, सावित्री को भी लेटने के लिए कहा पर पंडितजी की चौकी के ठीक सामने ही बिछी चटाई पर लेटने मे काफ़ी शर्म महसूस कर रही थी लक्ष्मी यह भाँप गयी कि सावित्री भोला पंडित से शर्मा रही है इस वजह से चटाई पर लेट नही रही है. लक्ष्मी ने चटाई उठाया और दुकान वाले हिस्से मे जिसमे की बाहर का दरवाजा बंद था, चली गयी. पीछे पीछे सावित्री भी आई और फिर दोनो एक ही चटाई पर लेट गये, लक्ष्मी तो थोड़ी देर के लिए सो गयी पर सावित्री लेट लेट दुकान की छत को निहारती रही और करीब दो घंटे बाद फिर सभी उठे और दुकान फिर से खुल गई. करीब दस ही दीनो मे लक्ष्मी ने सावित्री को बहुत कुछ बता और समझा दिया था आगे उसके पास समय और नही था कि वह सावित्री की सहयता करे. फिर सावित्री को अकेले ही आना पड़ा. पहले दिन आते समय खंडहेर के पास काफ़ी डर लगता मानो जैसे प्राण ही निकल जाए. कब कोई गुंडा खंडहेर मे खेन्च ले जाए कुछ पता नही था. लेकिन मजबूरी थी दुकान पर जाना. जब पहली बार खंडहेर के पास से गुज़री तो सन्नाटा था लेकिन संयोग से कोई आवारा से कोई अश्लील बातें सुनने को नही मिला. किसी तरह दुकान पर पहुँची और भोला पंडित को नमस्कार किया और वो रोज़ की तरह कुछ भी ना बोले और दुकान के अंदर आने का इशारा बस किया. खंडहेर के पास से गुज़रते हुए लग रहा डर मानो अभी भी सावित्री के मन मे था. आज वह दुकान मे भोला पंडित के साथ अकेली थी क्योंकि लक्ष्मी अब नही आने वाली थी. दस दिन तो केवल मा के कहने पर आई थी. यही सोच रही थी और दुकान मे एक तरफ भोला पंडित और दूसरी तरफ एक स्टूल पे सावित्री सलवार समीज़ मे बैठी थी. दुकान एक पतली गली मे एकदम किनारे होने के वजह से भीड़ भाड़ बहुत कम होती और जो भी ग्राहक आते वो शाम के समय ही आते. दुकान के दूसरी तरफ एक उँची चहारदीवारी थी जिसके वजह से दुकान मे कही से कोई नही देख सकता था तबतक की वह दुकान के ठीक सामने ना हो. इस पतली गली मे यह अंतिम दुकान थी और इसके ठीक बगल वाली दुकान बहुत दीनो से बंद पड़ी थी. शायद यही बात स्टूल पर बैठी सावित्री के मन मे थी कि दुकान भी तो काफ़ी एकांत मे है, पंडित जी अपने कुर्सी पे बैठे बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, करीब एक घंटा बीत गया लेकिन वो सावित्री से कुछ भी नही बोले. सावित्री को पता नही क्यो यह अक्चा नही लग रहा था. उनके कड़क और रोबीले मिज़ाज़ के वजह से उसके पास कहाँ इतनी हिम्मत थी कि भोला पंडित से कुछ बात की शुरुआत करे. दुकान मे एक अज़ीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी भोला पंडित ने स्टूल पर नज़रे झुकाए बैठी सावित्री के तरफ देखा और बोला " देखो एक कपड़ा स्नानघर मे है उसे धो कर अंदर ही फैला देना" मोटी आवाज़ मे आदेश सुनकर सावित्री लगभग हड़बड़ा सी गयी और उसके हलक के बस जी शब्द ही निकला और वह उठी और स्नानघर मे चल दी. स्नानघर मे पहुँच कर वह पीछे पलट कर देखी कि कहीं पंडित जी तो नही आ रहे क्योंकि सावित्री आज अकेले थी और दुकान भी सन्नाटे मे था और पंडित जी भी एक नये आदमी थे. फिर भी पंडित जी के उपर विश्वास था जैसा कि लक्ष्मी ने बताया था. सावित्री को लगा कि पंडित जी वहीं बैठे अख़बार पढ़ रहे हैं. फिर सावित्री ने स्नानघर मे कपड़े तलाशने लगी तो केवल फर्श पर एक सफेद रंग की लंगोट रखी थी जिसे पहलवान लोग पहनते हैं. यह भोला पंडित का ही था. सावित्री के मन मे अचानक एक घबराहट होने लगी क्योंकि वह किसी मर्द का लंगोट धोना ठीक नही लगता. स्नानघर के दरवाजे पर खड़ी हो कर यही सोच रही थी कि अचानक भोला पंडित की मोटी कड़क दार आवाज़ आई "कपड़ा मिला की नही" वे दुकान मे बैठे ही बोल रहे थे. सावित्री पूरी तरह से डर गयी और तुरंत बोली "जी मिला" सावित्री के पास इतनी हिम्मत नही थी कि भोला पंडित से यह कहे कि वह एक लड़की है और उनकी लंगोट को कैसे धो सकती है. आख़िर हाथ बढाई और लंगोट को ढोने के लिए जैसे ही पकड़ी उसे लगा जैसे ये लंगोट नही बल्कि कोई साँप है. फिर किसी तरह से लंगोट को धोने लगी. फिर जैसे ही लंगोट पर साबुन लगाने के लिए लंगोट को फैलाया उसे लगा कि उसमे कुछ काला काला लगा है फिर ध्यान से देख तो एकद्ूम सकपका कर रह गयी. यह काला कला कुछ और नही बल्कि झांट के बॉल थे जो भोला पंडित के ही थे. जो की काफ़ी मोटे मोटे थे. वह उन्हे छूना बिल्कुल ही नही चाहती थी लेकिन लंगोट साफ कैसे होगी बिना उसे साफ किए. फिर सावित्री ने पानी की धार गिराया कि झांट के बाल लंगोट से बह जाए लेकिन फिर भी कुछ बॉल नही बह सके क्योंकि वो लंगोट के धागो मे बुरी तरह से फँसे थे. यह सावित्री के लिए चुनौती ही थी क्योंकि वह भोला पंडित के झांट के बालो को छूना नही चाहती थी. अचानक बाहर से आवाज़ आई "सॉफ हुआ की नही" और इस मोटे आवाज़ ने मानो सावित्री की हड्डियाँ तक कपा दी और बोल पड़ी "जी कर रही हूँ" और घबराहट मे अपने उंगलिओ से जैसे ही लंगोट मे फँसे झांट के बालो को निकालने के लिए पकड़ी कि सिर से पाव तक गन्गना गयी , उसे ऐसे लगा जैसे ये झांट के बाल नही बल्कि बिजली का कुर्रेंट है, आख़िर किसी तरह एक एक बाल को लंगोट से निकाल कर फर्श पर फेंकी और पानी की धार फेंक कर उसे बहाया जो स्नानघर के नाली के तरफ तैरते हुए जा रहे थे और सावित्री की नज़रे उन्हे देख कर सनसना रही थी. किसी ढंग से लंगोट साफ कर के वह अंदर ही बँधे रस्सी पर फैला कर अपना हाथ धो ली और वापस दुकान मे आई तो चेहरे पर पसीना और लालपान छा गया था. उसने देखा कि भोला पंडित अभी भी बैठे अख़बार पढ़ रहे थे. सावित्री जा कर फिर से स्टूल पर बैठ गयी और नज़रे झुका ली. कुछ देर बाद दोपहर हो चली थी और भोला पंडित के खाना खाने और आराम करने का समय हो चला था. समय देख कर भोला पंडित ने दुकान का बाहरी दरवाजा बंद किया और खाना खाने के लिए अंदर वाले कमरे मे चले आए. दुकान का बाहरी दरवाजा बंद होने का सीधा मतलब था कि कोई भी अंदर नही आ सकता था. भोला पंडित खाना खाने लगे और सावित्री तो घर से ही खाना खा कर आती इस लिए उसे बस आराम ही करना होता. सावित्री ने चटाई लेकर दुकान वाले हिस्से मे आ गयी और चटाई बिछा कर लेटने के बजाय बैठ कर आज की घटना के बारे मे सोचने लगी. उसे लगता जैसे भोला पंडित की झांट को छू कर बहुत ग़लत किया, लेकिन डरी सहमी और क्या करती. बार बार उसके मन मे डर लगता. दुकान का बाहरी दरवाजा बंद होने के कारण वह अपने आप को सुरक्षित नही महसूस कर रही थी. यही सोचती रही कि अंदर के कमरे से खर्राटे की आवाज़ आने लगी. फिर यह जान कर की भोला पंडित सो गये है वह भी लेट गयी पर उनके लंगोट वाली झांतो की याद बार बार दिमाग़ मे घूमता रहता. यही सब सोचते सोचते करीब एक घंटा बीत गया. फिर भोला पंडित उठे तो उनके उठने के आहट सुन कर सावित्री भी चटाई पर उठ कर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद शौचालय से पेशाब करने की आवाज़ आने लगी , वो भोला पंडित कर रहे थे.अभी दुकान खुलने मे लगभग एक घंटे का और समय था और भोला पंडित शायद एक घंटे और आराम करेंगे' यही बात सावित्री सोच रही थी की अंदर से पंडित जी ने सावित्री को पुकारा. "सुनो" सावित्री लगभग घबड़ाई हुई उठी और अपना समीज़ पर दुपट्टे को ठीक कर अंदर आए तो देखी की भोला पंडित चौकी पर बैठे हैं. सावित्री उनके चौकी से कुछ दूर पर खड़ी हो गयी और नज़रे झुका ली और पंडित जी क्या कहने वाले हैं इस बात का इंतज़ार करने लगी. तभी भोला पंडित ने पुचछा "महीना तुम्हारा कब आया था" अचानक ऐसे सवाल को सुन कर सावित्री की आँखे फटी की फटी रह गई वह मानो अगले पल गिरकर मर जाएगी उसे ऐसा लग रहा था. उसका गले मे मानो लकवा मार दिया हो, दिमाग़ की सारी नसे सूख गयी हो. सावित्री के रोवे रोवे को कंपा देने वाले इस सवाल ने सावित्री को इस कदर झकझोर दिया कि मानो उसके आँखो के सामने कुछ दीखाई ही नही दे रहा था. आख़िर वह कुछ बोल ना सकी और एक पत्थेर की तरह खड़ी रह गई. दुबारा भोला पंडित ने वही सवाल दुहरेया "महीना कब बैठी थी" सावित्री के सिर से पाँव तक पसीना छूट गया. उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि ये क्या हो रहा है और वह क्या करे लेकिन दूसरी बार पूछने पर वह काफ़ी दबाव मे आ गयी और सूखे गले से काफ़ी धीमी आवाज़ ही निकल पाई "दस दिन प..." और आवाज़ दब्ति चली गयी कि बाद के शब्द सुनाई ही नही पड़े. फिर भोला पंडित ने कुछ और कड़े आवाज़ मे कुछ धमकी भरे लहजे मे आदेश दिया "जाओ पेशाब कर के आओ" इसे सुनते ही सावित्री कांप सी गयी और शौचालय के तरफ चल पड़ी. अंदर जा कर सीत्कनी बंद करने मे लगताथा जैसे उसके हाथ मे जान ही नही है. भोला पंडित का पेशाब कराने का मतलब सावित्री समझ रही थी लेकिन डर के मारे उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो अब क्या करे . शौचालय के अंदर सावित्री के हाथ जरवंद खोलने मे कांप रहे थे और किसी तरह से जरवंद खोल कर सलवार को नीचे की और फिर चड्धि को सर्काई और पेशाब करने बैठी लेकिन काफ़ी मेहनत के बाद पेशाब की धार निकलना शुरू हुई. पेशाब करने के बाद सावित्री अपने कपड़ो को सही की दुपट्टा से चुचियो को ढाकी फिर उसकी हिम्मत शौचालय से बाहर आने की नही हो रही थी और वह उसी मे चुपचाप खड़ी थी. तभी फिर डरावनी आवाज़ कानो मे बम की तरह फट पड़ा "जल्दी आओ बाहर" बाहर आने के बाद वह नज़ारे झुकाए खड़ी थी और उसका सीना धक धक ऐसे कर रहा था मानो फट कर बाहर आ जाएगा . सावित्री ने देखा की भोला पंडित चौकी पर दोनो पैर नीचे लटका कर बैठे हैं. फिर पंडित जी चौकी पर बैठे ही सावित्री को नीचे से उपर तक घूरा और फिर चौकी पर लेट गये. चौकी पर एक बिस्तर बिछा था और भोला पंडित के सिर के नीचे एक तकिया लगा था. भोला पंडित लेते लेते छत की ओर देख रहे थे और चित लेट कर दोनो पैर सीधा फैला रखा था. वे धोती और बनियान पहने थे. धोती घुटने तक थी और घुटने के नीचे का पैर सॉफ दीख रहा था जो गोरे रंग का काफ़ी मजबूत था जिसपे काफ़ी घने बाल उगे थे. सावित्री चुपचाप अपने जगह पर ऐसे खड़ी थी मानो कोई मूर्ति हो. वह अपने शरीर मे डर के मारे धक धक की आवाज़ साफ महसूस कर रही थी. यह उसके जीवन का बहुत डरावना पल था. शायद अगले पल मे क्या होगा इस बात को सोच कर काँप सी जाती. इतने पॅलो मे उसे महसूस हुआ कि उसका पैर का तलवा जो बिना चप्पल के कमरे के फर्श पर थे, पसीने से भीग गये थे. उसकी साँसे तेज़ चल रही थी. उसे लग रहा था की सांस लेने के लिए उसे काफ़ी ताक़त लगानी पड़ रही थी. ऐसा जैसे उसके फेफड़ों मे हवा जा ही नही रही हो. उसके दिल और दिमाग़ दोनो मे लकवा सा मार दिया था. तभी पंडित जी कमरे के छत के तरफ देखते हुए बोले "पैर दबा" सावित्री जो की इस दयनीय हालत मे थी और शर्म से पानी पानी हो चुकी थी, ठीक अपने सामने नीचे फर्श पर देख रही थी, क्योंकि उसकी भोला पंडित की तरफ देखने की हिम्मत अब ख़त्म हो चुकी थी, आवाज़ सुनकर फिर से कांप सी गयी और अपने नज़रो को बड़ी ताक़त से उठा कर चौकी के तरफ की और भोला पंडित को जब कनखियों से देखी कि वे धोती और बनियान मे सिर के नीचे तकिया लगाए लेते थे और अब सावित्री के तरफ ही देख रहे थे. सावित्री फिर से नज़रे नीचे गढ़ा ली. वह चौकी से कुछ ही दूरी पर ही खड़ी थी उसे लग रहा था कि उसके पैर के दोनो तलवे फर्श से ऐसे चिपक गये हो की अब छूटेंगे ही नही. भोला पंडित को अपनी तरफ देखते हुए वह फिर से घबरा गयी और डर के मारे उनके पैर दबाने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे चक्केर आ गया हो और अगले पल गिर ना जाए. शायद काफ़ी डर और घबराहट के वजह से ही ऐसा महसूस की. ज्यों ही सावित्री ने अपना पैर फर्श पर आगे बढ़ाई तो पैर के तलवे के पसीना का गीलापन फर्श पर सॉफ दीख रहा था. अब चौकी के ठीक करीब आ गयी और खड़ी खड़ी यही सोच रही थी कि अब उनके पैर को कैसे दबाए. भोला पंडित ने सावित्री से केवल पैर दबाने के लिए बोला था और ये कुछ नही कहा कि चौकी पर बैठ कर दबाए या केवल चौकी के किनारे खड़ी होकर की दबाए. क्योंकि सावित्री यह जानती थी कि पंडित जी को यह मालूम है कि सावित्री एक छ्होटी जात की है और लक्ष्मी ने सावित्री को पहले ही यह बताया था कि दुकान मे केवल अपने काम से काम रखना कभी भी पंडित जी का कोई समान या चौकी को मत छूना क्योंकि वो एक ब्राह्मण जाती के हैं और वो छ्होटी जाती के लोगो से अपने सामानो को छूना बर्दाश्त नही करते, और दुकान मे रखी स्टूल पर ही बैठना और आराम करने के लिए चटाई का इस्तेमाल करना. शायद इसी बात के मन मे आने से वह चौकी से ऐसे खड़ी थी कि कहीं चौकी से सॅट ना जाए. भोला पंडित ने यह देखते ही की वह चौकी से सटना नही चाहती है उन्हे याद आया कि सावित्री एक छोटे जाती की है और अगले ही पल उठकर बैठे और बोले "जा चटाई ला" सावित्री का डर बहुत सही निकला वह यह सोचते हुए कि भला चौकी को उसने छूआ नही. दुकान वाले हिस्से मे जहाँ वो आराम करने के लिए चटाई बिछाई थी, लेने चली गयी. इधेर भोला पंडित चौकी पर फिर से पैर लटका कर बैठ गये, सावित्री ज्यों ही चटाई ले कर आई उन्होने उसे चौकी के बगल मे नीचे बिछाने के लिए उंगली से इशारा किया. सावित्री की डरी हुई आँखे इशारा देखते ही समझ गयी कि कहाँ बिछाना है और बिछा कर एक तरफ खड़ी हो गयी और अपने दुपट्टे को ठीक करने लगी, उसका दुपट्टा पहले से ही काफ़ी ठीक था और उसके दोनो चूचियो को अच्छी तरह से ढके था फिर भी अपने संतुष्टि के लिए उसके हाथ दुपट्टे के किनारों पर चले ही जाते. भोला पंडित चौकी पर से उतर कर नीचे बिछी हुई चटाई पर लेट गये. लेकिन चौकी पर रखे तकिया को सिर के नीचे नही लगाया शायद चटाई का इस्तेमाल छ्होटी जाती के लिए ही था इस लिए ही चौकी के बिस्तर पर रखे तकिया को चटाई पर लाना मुनासिब नही समझे. भोला पंडित लेटने के बाद अपने पैरों को सीधा कर दिया जैसा की चौकी के उपर लेते थे. फिर से धोती उनके घुटनो तक के हिस्से को ढक रखा था. उनके पैर के तरफ सावित्री चुपचाप खड़ी अपने नज़रों को फर्श पर टिकाई थी. सीने का धड़कना अब और तेज हो गया था. तभी पंडित जी के आदेश की आवाज़ सावित्री के कानो मे पड़ी "अब दबा" . सावित्री को ऐसा लग रहा था कि घबराहट से उसे उल्टी हो जायगि. अब सावित्री के सामने यह चुनौती थी कि वह पंडित जी के सामने किस तरह से बैठे की पंडित जी को उसका शरीर कम से कम दीखे. जैसा की वह सलवार समीज़ पहनी और दुपट्टा से अपने उपरी हिस्से को काफ़ी ढंग से ढक रखा था. फिर उसने अपने पैर के घुटने को मोदकर बैठी और यही सोचने लगी कि अब पैर दबाना कहाँ से सुरू करे. उसके मन मे विरोध के भी भाव थे कि ऐसा करने से वो मना कर दे लेकिन गाओं की अट्ठारह साल की सीधी साधी ग़रीब लड़की जिसने अपना ज़्यादा समय घर मे ही बिताया था, और शर्मीली होने के साथ साथ वह एक डरपोक किस्म की भी हो गयी थी. और वह अपने घर से बाहर दूसरे जगह यानी भोला पंडित के दुकान मे थी जिसका दरवाजा बंद था और दोपहर के समय एकांत और शांत माहौल मे उसका मन और डर से भर गया था. उसके उपर से भोला पंडित जो उँची जाती के थे और उनका रोबीला कड़क आवाज़ और उससे बहुत कम बातें करने का स्वाभाव ने सावित्री के मन मे बचे खुचे आत्मविश्वास और मनोबल को तो लगभग ख़त्म ही कर दिया था. वैसे वह पहले से ही काफ़ी डरी हुई थी और आज उसका पहला दिन था जब वह दुकान मे भोला पंडित के साथ अकेली थी.


RE: Hindi Porn Stories संघर्ष - sexstories - 09-28-2017

संघर्ष --6

गतांक से आगे..........

इन सब हालातों मे विरोध ना कर सकने वाली सावित्री को अब पंडित जी के पैर पर हाथ लगाना ही पड़ा. जैसे ही उसने उनके पैर पर हाथ रखा सारा बदन सनसनाहट से गन्गना गया क्योंकि यह एक मर्द का पैर था. जो कि काफ़ी ताकतवर और गाथा हुआ था और जिस पर घने बॉल उगे थे. वैसे सावित्री कभी कभी अपनी मा का पैर दबा देती थी जब वो काफ़ी थॅकी होती और उसे पैर दबाना मा ने ही सिखाया था. इसलिए मा के पैर की बनावट की तुलना मे भोला पंडित का पैर काफ़ी कड़ा और गाथा हुआ था. जहाँ मा के पैर पर बाल एकदम ना थे वहीं भोला पंडित के पैर पर काफ़ी घने बाल उगे थे. बालो को देखकर और छूकर उसे लंगोट मे लगे झांट के बालों की याद आ गयी और फिर से सनसना सी गयी. वह अपने हाथो से भोला पंडित के पैर को घुटने के नीचे तक ही दबाती थी. साथ साथ पंडित जी के बालिश्ट शरीर को भी महसूस करने लगी. जवान सावित्री के लिए किसी मर्द का पैर दबाना पहली बार पड़ा था और सावित्री को लगने लगा था कि किसी मर्द को छूने से उसके शरीर मैं कैसी सनसनाहट होती है. कुछ देर तक सावित्री वैसे ही पैर दबाती रही और पंडित जी के पैर के घने मोटे बालों को अपने हाथों मे गड़ता महसूस करती रही. तभी पंडित जी ने अपने पैर के घुटनो को मोदकर थोड़ा उपर कर दिया जिससे धोती घुटनो और झंघो से कुछ सरक गयी और उनकी पहलवान जैसी गठीली जांघे धोती से बाहर आ गयी. भोला पंडित के पैरों की नयी स्थिति के अनुसार सावित्री को भी थोड़ा पंडित जी की तरफ ऐसे खिसकना पड़ा ताकि उनके पैरो को अपने हाथों से दबा सके. फिर सावित्री पंडित जी के पैर को दबाने लगी लेकिन केवल घुटनो के नीचे वाले हिस्से को ही. कुछ देर तक केवल एक पैर को दबाने के बाद जब सावित्री दूसरे पैर को दबाने के लिए आगे बढ़ी तभी पंडित जी कड़ी आवाज़ मे बोल पड़े "उपर भी" सावित्री के उपर मानो पहाड़ ही गिर पड़ा. वह समझ गयी कि वो जाँघो को दबाने के लिए कह रहे हैं. पंडित जी की बालिश्ट जाँघो पर बाल कुछ और ही ज़्यादा थे. जाँघो पर हाथ लगाते हुए सावित्री अपनी इज़्ज़त को लगभग लूटते देख रही थी. कही पंडित जी क्रोधित ना हो जाए इस डर से जाँघो को दबाने मे ज़्यादा देर करना ठीक नही समझ रही थी. अब उसके हाथ मे कंपन लगभग साफ पता चल रहा था. क्योंकि सावित्री पंडित जी के जेंघो को छूने और दबाने के लिए मानसिक रूप से अपने को तैयार नही कर पा रही थी. जो कुछ भी कर रही थी बस डर और घबराहट मे काफ़ी बेबस होने के वजह से. उसे ऐसा महसूस होता था की अभी वह गिर कर तुरंत मर जाएगी. शायद इसी लिए उसे सांस लेने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ रही थी. उसके घबराए हुए मन मे यह भी विचार आता था कि उसकी मा ने उसके इज़्ज़त को गाओं के अवारों से बचाने के लिए उसे स्कूल की पड़ाई आठवीं क्लास के बाद बंद करवा दिया और केवल घर मे ही रखी. इसके लिए उसकी विधवा मा को काफ़ी संघर्ष भी करना पड़ा. अकेले घर को चलाने के लिए उसे काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी और इसी लिए कई लोगो के घर जा कर बर्तन झाड़ू पोच्छा के काम करती. आख़िर यह संघर्ष वह अब भी कर रही थी. इसीलिए वह सावित्री को गाओं मे कम करने के बजाय वह अधेड़ पंडित जी के दुकान पर काम करने के लिए भेजा था. यही सोचकर की बाप के उमर के अधेड़ भोला पंडित के दुकान पर उसकी लड़की पूरी सुरक्षित रहेगी जैसा की लक्ष्मी ने बताया था कि पंडित जी काफ़ी शरीफ आदमी हैं. लेकिन सीता की यह कदम की सावित्री भी काम कर के इस ग़रीबी मे इज़्ज़त के लिए इस संघर्ष मे उसका साथ दे जिससे कुछ आमदनी बढ़ जाए और सावित्री की जल्दी शादी के लिए पैसे का इंतेज़ाम हो जाए, सावित्री को अब ग़लत लगने लगा था. लेकिन सावित्री अपने मा को बहुत अच्छी तरीके से जानती थी. सीता को इज़्ज़त से बहुत प्यार था और वह कहती भी थी की मैं ग़रीब भले हूँ और मेरे पास पैसे भले ना हो पर मेरे पास इज़्ज़त तो है. यह बात सही भी थी क्योंकि सावित्री को याद था कि उसके बाप के मरने के बाद सीता ने इस ग़रीबी मे अपनी इज़्ज़त मर्यादा को कैसे बचा कर रखने के लिए कैसे कैसे संघर्ष की. जब वह सयानी हुई तब किस तरह से स्कूल की पड़ाई बंद कराके सावित्री को घर मे ही रहने देने की पूरी कोशिस की ताकि गाओं के गंदे माहौल के वजह से उसके इज़्ज़त पर कोई आँच ना आए. और इज़्ज़त के लिए ही गाओं के गंदे माहौल से डरी सीता यह चाहती थी कि सावित्री की बहुत जल्दी शादी कर के ससुराल भेज दिया जे और इसी लिए वह अपने इस संघर्ष मे सावित्री को भी हाथ बताने के लिए आगे आने के लिए कही.वो भी इस उम्मीद से की कुछ पैसे का इंतेज़ाम हो जाए, पंडित जी के दुकान पर काम के लिए मजबूरी मे भेजी थी इन्ही बातों को सोचते हुए सावित्री को लगा की उसके आँख से आँसू गिर जाएँगे और आँखे लगभग दबदबा गयी. और ज्यो ही सावित्री ने अपना काँपता हाथ पंडित जी के घने उगे बालो वाले बालिश्ट जाँघ पर रखी उसे लगा कि उसकी मा और वह दोनो ही इज़्ज़त के लिए कर रहे अंतिम शंघर्ष मे अब हार सी गयी हो. यही सोचते उसके दबदबाई आँखो से आँसू उसके गालों पर लकीर बनाते हुए टपक पड़े. अपने चेहरे पर आँसुओं के आते ही सावित्री ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि पंडित जी की नज़र आँसुओं पर ना पड़ जाए. तभी उसे लगा की पंडित जी उसके आँसुओं को देख लिया हो और दूसरे पल वह उठकर लगभग बैठ गये. सावित्री को लगा की शायद भगवान ने ग़रीब की सुन ली हो और अब इज़्ज़त बच जाय क्योंकि पंडित जी उसके रोने पर तरस खा कर उससे जाँघ ना दब्वाये. ऐसी सोच ने सावित्री के शरीर मे आशा की एक लहर दौड़ा दी. लेकिन अगले पलों मे ऐसा कुछ भी ना हुआ और पंडित जी बगल मे चौकी पर बिछे बिस्तेर के नीचे से एक किताब निकाली और फिर बिना कुछ कहे वैसे ही लेट गये और उस किताब को पढ़ने लगे. सावित्री को लगा कि वो आसमान से गिर गयी हो. नतीज़ा यह की सावित्री अपने आँखो मे आँसू लिए हुए उनके बालिश्ट झांग को दबाने लगी. जो कि बहुत कड़ा था और काफ़ी घने बाल होने के कारण सावित्री के हाथ मे लगभग चुभ से रहे थे. और ऐसा लगता मानो ये बाल सावित्री के हथेली मे गुदगुदी कर रहे हों क्योंकि काफ़ी मोटे और कड़े भी थे. जब भी सावित्री पंडित जी के जाँघ को दबाती उसे महसूस होता की उनके झांग और उसके हाथों के बीच मे उनके कड़े मोटे बाल एक परत सी बना ले रही हों. सावित्री के हथेलिओं को पंडित जी की जाँघ की मांसपेशियो के काफ़ी कड़े और गातीलेपन का आभास हर दबाव पर हो रहा था जैसे की कोई चट्टान के बने हों. पंडित जी किताब को दोनो हाथो मे लेकर लेटे लेटे पढ़ रहे थे और किताब उनके मुँह के ठीक सामने होने के कारण अब पंडित जी सावित्री को नही देख सकते थे. पंडित जी का मुँह अब किताब के आड़ मे पा कर सावित्री की हिम्मत हुई और वह पंडित जी के कमर वाले हिस्से के तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा की धोती जो केवल जाँघो पर से हटी थी लेकिन कमर के हिस्से को अच्छी तरह से ढक रखा था और कहीं से भी लंगोट भी दिखाई नही दे रही थी.

धोती से उनके निचले हिस्से का ठीक से ढके होने से सावित्री को कुछ राहत सी महसूस हुई. और उसके आँखो के आँसू लगभग सूखने लगा ही था कि उसकी नज़र किताब के उपर पड़ी. आठवीं क्लास तक पड़ी होने के वजह से उसे पड़ना तो आता ही था. पंडित जी के हाथ मे जो किताब थी उसका नाम पढ़ कर सावित्री ऐसे सकपकाई जैसे अभी उसके बुर से मूत निकल जाएगी. ऐसी नाम की कोई किताब भी हो सकती है यही सोचकर सिहर ही गयी. ये नाम अक्सर वो गाओं मे झगड़े के समय औरतों को गाली देने के लिए प्रयोग होते हैं. उस किताब का नाम उसके उपर हिन्दी के बड़े अक्षरो मे "हरजाई" लिखा था. यह देखते ही सावित्री के अंदर फिर से घबराहट की लहरें उठने लगी. अब पंडित जी के चरित्र और नियत दोनो सॉफ होती नज़र आ रही थी. उसे अब लगने लगा था कि उसके शरीर मे जान है ही नही और किसी ढंग से वह पंडित जी के जाँघ को दबा पा रही थी. जब जब उस किताब पर नज़र पड़ती तो सावित्री ऐसे सनसना जाती मानो वह किताब नही बल्कि पंडित जी का मोटा खड़ा लंड हो. अब सावित्री के मन को यह यकीन हो गया कि आज उसकी इज़्ज़त को भगवान भी नही बचा पाएँगे. इसी के साथ उसे लगा की उसका मन हताशा की हालत मे डूबता जा रहा था. वह एकदम कमजोर महसूस कर रही थी मानो कई सालों से बीमार हो और मरने के कगार पर हा गयी हो. तभी पंडित जी को लगा की उनके कसरती जाँघ पर सावित्री के हाथों से उतना दबाव नही मिल पा रहा हो और यही सोच कर उन्होने सावित्री को जाँघो को हाथ के बजाय पैर से दबाने के लिए कहा. घबराई सावित्री के सामने एक बड़ी परेशानी थी की उनके पैर और जाँघो पर कैसे चढ़ कर दबाए. आख़िर मजबूर सावित्री उनके पैर और जांघों पर पैर रख कर खड़ी होने लगी तो ऐसा लगने लगा मानो संतुलन ना बनाने के वजह से गिर जाएगी. तभी पंडित जी ने उसे कहा "दुपट्टा हटा दे नही तो उसमे उलझ कर गिर जाएगी" सावित्री को भी कुछ यह बात सही लगी क्योंकि जब वह पंडित जी के पैर और जाँघो पर खड़ी होने की कोशिस करती तब उसका उपरी शरीर हवा मे इधेर उधेर लहराने लगता और दुपट्टा मे उसके हाथ फँसने से लगता. लेकिन दुपट्टा से उसकी दोनो बड़ी बड़ी गोल चुचियाँ धकि थी जो कि समीज़ मे काफ़ी तन कर खड़ी थी. हर हाल मे पैर तो दबाना ही था इसलिए सावित्री दुपट्टा को उतारने लगी और उसे लगा कि उसके उपर आकाश की बिजली गिर पड़ी हो. दुपट्टा उतार कर बगल मे फर्श पर रख दिया और जब सीधी खड़ी हुई तब उसे दुपट्टे की कीमत समझ मे आने लगी. दोनो चुचियाँ एक दम बाहर निकली दिख रही थी मानो समीज़ अभी फट जाएगा और दोनो बड़े बड़े गोल गोल चुचियाँ आज़ाद हो जाएँगी. अब फिर सावित्री पंडित जी के जाँघ पर अपने पैर रख कर चाड़ने की कोशिस करने लगी तो संतुलन बनाने लिए फिर उसका कमर के उपर का शरीर हवा मे लहराया और साथ मे दोनो चुचियाँ भी और उसके शरीर मे सनसनाहट भर सी गयी.लेकिन गनीमत यह थी की पंडित जी का ध्यान उस किताब मे ही था और वी सावित्री के चुचिओ को नही देख रहे थे. सावित्री जब किसी तरह से उनके जाँघ पर खड़ी हो कर उनके जाँघ को अपने पैरों से दबाव बना कर दबाती उनके जाँघ पर उगे घने काले मोटे बालों से उसके पैर के तलवे मे चुभन सी महसूस होती. सावित्री उनके जाँघ पर जब खड़ी हो कर दबा रही थी तभी उसे उनके कसरती शरीर के गातीलेपन का आभास भी होने लगा और जाँघ लग रहा था कि पत्थर का बना हों. थोड़ी देर तक दोनो जांघों को पैर से दबाने के बाद पंडित जी ने उस किताब को एक किनारे रख दिया और फिर अपने जाँघो पर चड़ी सावित्री को घूर्ने लगे मानो दोनो चुचिओ को ही देख रहे हो. अब यह सावित्री के उपर नया हमला था. कुछ पल तक वो चुचिओ को ही निहारने के बाद बोले "उतरो" और सावित्री उनके जाँघो पर से अपने पैर नीचे चटाई पर उतार ली और अपनी पीठ पंडित जी के तरफ कर ली ताकि अपनी दोनो चुचिओ को उनके नज़रों से बचा सके और अगले पल ज्यों ही अपना दुपट्टा लेने के लिए आगे बड़ी के कड़क आवाज़ उसके कानो मे गोली की तरह लगी "कमर भी अपने पैर से" और उसने पलट कर पंडित जी की ओर देखा तो वे पेट के बगल लेट गये थे और उनका पीठ अब उपर की ओर था. उनके शरीर पर बनियान और धोती थी और अब इस हालत मे जब पैर से कमर दबाने के लिए पैर को कमर पर रखने का मतलब उनका सफेद रंग की बनियान और धोती दोनो ही सावित्री के पैर से खराब होती. पंडित जी के कपड़े इतने सॉफ और सफेद थे कि ग़रीब सावित्री की हिम्मत ना होती उनके इन कपड़ो पर पैर रखे. कुछ पल हिचकिचाहट मे बीते ही थे की पंडित जी मे दिमाग़ मे फिर ये बात गूँजी की सावित्री एक छोटी जाती की है और उसके पैर से दबाने पर उनके कपड़े लगभग अशुद्ध हो जाएँगे. फिर अगले पल बोले "रूको कपड़े तो उतार लूँ" और बैठ कर बनियान को निकाल कर चौकी पर रख दिया और धोती को कमर से खोलकर ज्योन्हि अलग किया की उनके शरीर पर केवल एक लाल रंग की लंगोट ही रह गयी.

धोती को भी पंडित जे ने बनियान की तरह चौकी पर रख कर केवल लाल रंग के लंगोट मे फिर पेट के बगल लेट गये. सावित्री धोती हटने के बाद लाल लंगोट मे पंडित जी को देखकर अपनी आँखे दूसरी तरफ दीवार की ओर कर लिया. उसके पास अब इतनी हिम्मत नही थी की अधेड़ उम्र के पंडित जी को केवल लंगोट मे देखे. सावित्री जो की दीवार की तरफ नज़रें की थी, जब उसे लगा कि अब पंडित जे पेट के बगल लेट गये है तब वापस मूडी और उनके कमर पर पैर रख कर चढ़ गयी. अपना संतुलन बनाए रखने के लिए सावित्री को पंडित जी के कमर की तरफ देखना मजबूरी थी और ज्यों ही उसने पंडित जी की कमर की तरफ नज़रें किया वैसे ही पतले लंगोट मे उनका कसा हुआ गातीला चूतड़ दिखाई दिया. सावित्री फिर से सिहर गयी. आज जीवन मे पहली बार सावित्री किसी मर्द का चूतड़ इतने नज़दीक से देख रही थी. उनके चूतदों पर भी बॉल उगे थे. लंगोट दोनो चूतदों के बीच मे फँसा हुआ था. गनीमत यह थी की पंडित जे की नज़रें सावित्री के तरफ नहीं थी क्योंकि पेट के बगल लेटे होने के वजह से उनका मुँहे दूसरी तरफ था इसी कारण सावित्री की कुछ हिम्मत बढ़ी और वह पंडित जी के कमर और पीठ पर चढ़ कर अपने पैरों से दबाते हुए पंडित जे के पूरे शरीर को भी देख ले रही थी. उनका गाथा हुआ कसरती पहलवानो वाला शरीर देख कर सावित्री को लगता था कि वह किसी आदमी पर नही बल्कि किसी शैतान के उपर खड़ी हो जो पत्थर के चट्टान का बना हो. सावित्री अपने पूरे वजन से खड़ी थी लेकिन पंडित जी का शरीर टस से मास नही हो रहा था. जैसा की सावित्री उनके शरीर को देखते हुए उनके कमर को दबा ही रही थी की उसे ऐसा लगा मानो पंडित जी के दोनो जाँघो के बीच मे कुछ जगह बनती जा रही हो. पंडित जी पेट के बगल लेटे लेटे अपने दोनो पैरो के बीच मे कुछ जगह बनाते जा रहें थे. सावित्री की नज़रें पंडित जी के इस नये हरकत पर पड़ने लगी. तभी उसने कुछ ऐसा देखा की देखते ही उसे लगा की चक्कर आ जाएगा और पंडित जी के उपर ही गिर पड़ेगी. अट्ठारह साल की सावित्री उस ख़तरनाक चीज़ को देखते ही समझ गयी थी की इसी से पंडित जी उसके चरित्र का नाश कर हमेसा के लिए चरित्रहीं बना देंगे. यह वही चीज़ थी जिससे उसकी मा के सपनो को तार तार कर उसके संघर्ष को पंडित जी ख़त्म कर देंगे. और आगे उसकी मा अपनी इज़्ज़त पर नाज़ नही कर सकेगी. यह पंडित जी के ढीले लंगोट मे से धीरे धीरे बढ़ता हुआ लंड था जो अभी पूरी तरीके से खड़ा नही हुआ था और कुछ फुलाव लेने के वजह से ढीले हुए लंगोट के किनारे से बाहर आ कर चटाई पर साँप की तरह रेंगता हुआ अपनी लम्बाई बढ़ा रहा था. फिर भी हल्के फुलाव मे भी वह लंड ऐसा लग रहा था की कोई मोटा साँप हो. उसका रॅंड एकदम पंडित जी के रंग का यानी गोरा था. पेट के बगल लेटने के वजह से जो चूतड़ उपर था उसकी दरार मे लंगोट फाँसी हुई और ढीली हो गयी थी जिससे आलू के आकर के दोनो अनदुओं मे से एक ही दिखाई पड़ने लगा था. उसके अगाल बगल काफ़ी बॉल उगे थे. तभी सावित्री को याद आया की जब वह लंगोट साफ कर रही थी तभी यही झांट के बॉल लंगोट मे फँसे थे. अनदुओं के पास झांट के बॉल इतने घने और मोटे थे की सावित्री को विश्वास नही होता था की इतने भी घने और मोटे झांट के बाल हो सकते हैं. सावित्री अपने उपर होने वाले हमले मे प्रयोग होने वाले हथियार को देख कर सिहर सी जा रही थी. उसके पैर मे मानो कमज़ोरी होती जा रही थी और उसकी साँसे अब काफ़ी तेज होने लगी थी जिसे पंडित जी भी सुन और समझ रहे थे. कुछ पल बाद ज्योन्हि सावित्री का नज़र उस लंड पर पड़ी तो उसे लगा की मानो उसकी बुर से मूत छलक जाएगी और खड़ी खड़ी पंडित जी के पीठ पर ही मूत देगी, क्योंकि अब पहले से ज़्यादा खड़ा हो कर काफ़ी लंबा हो गया था. पंडित जी वैसे ही लेटे अपना कमर दबावा रहे थे और उनका खड़ा लंड दोनो जाँघो के बीच मे चटाई पर अपनी मोटाई बढ़ा रहा था और सावित्री को मानो देखकर बेहोशी छाने लगी थी. शायद यह सब उस लंड के तरफ देखने से हो रही थी. अब सावित्री की हिम्मत टूट गयी और उसने अपनी नज़र चटाई पर लेटे हुए पंडित जी के लंड से दूसरी ओर करने लगी तभी उसने देखा की पंडित जी लेटे हुए ही गर्दन घुमा कर उसे ही देख रहे थे. ऐसी हालत मे सावित्री की नज़र जैसे ही पंडित जी के नज़र से लड़ी की उसके मुँह से चीख ही निकल पड़ी और " अरी माई" चीखते हुए पंडित जी के कमर पर से चटाई पर लगभग कूद गयी और सामने फर्श पर पड़े दुपट्टे को ले कर अपने समीज़ को पूरी तरह से ढक ली. लाज़ से बहाल होने के कारण अब उसका दिमाग़ काम करना एकदम से बंद ही कर दिया था. नतीजा दो कदम आगे बढ़ी और चटाई से कुछ ही दूरी पर घुटनो को मोदते हुए और अपने शरीर दोनो बाहों से लपेट कर बैठ गई और अपने चेहरे को दोनो घुटनो के बीच ऐसे छुपा ली मानो वह किसी को अपना मुँह नही दिखाना चाहती हो. अब वह लगभग हाँफ रही थी. फर्श पर ऐसे बैठी थी की वह अब वान्हा से हिलना भी नही चाह रही हो. उसकी घुटना के बीच मे चेहरा छुपाते हुए सावित्री ने दोनो आँखे पूरी ताक़त से बंद कर ली थी. सावित्री का पीठ पंडित जी के तरफ था जो कुछ ही फुट की दूरी पर बिछे चटाई पर अब उठ कर बैठ गये थे. लेकिन उनकी लंगोट अब काफ़ी ढीली हो चली थी और लंगोट के बगल से पंडित जी का गोरा और तननाया हुया टमाटर जैसे लाल सूपड़ा चमकाता हुआ लंड लगभग फुंफ़कार रहा था मानो अब उसे अपना शिकार ऐसे दिखाई दे रहा हो जैसे जंगल मे शेर अपने सामने बैठे शिकार को देख रहा हो.

संघर्ष --6

गतांक से आगे..........


RE: Hindi Porn Stories संघर्ष - sexstories - 09-28-2017

संघर्ष--7

अब पंडित जी उठकर खड़े हुए और अपने कमर मे ढीली लंगोट को खोलकर चौकी पर रख दिए. अब उनके शरीर पर एक भी कपड़ा नही था. एकदम नंगे हो चुके पंडित जी का लंड अब पूरी तरीके से खड़ा था. जहाँ पंडित जी पूरे नंगे थे वहीं ग़रीब सावित्री अपने पूरे कपड़े मे थी और लाज़ का चदडार भी उसके पूरे जवान शरीर पर था. पंडित जी अपने पूरे आत्मविश्वासमे थे और उनका उद्देश्या उनको सॉफ दिख रहा था. अब वह सावित्री पर अंतिम हमले के तरफ बढ़ रहे थे. उन्होने देखा कि सावित्री लाज़ और डर से पूरी तरह दब गयी है और अब उन्हे अपना कदम काफ़ी मज़बूती से उठाना होगा. उन्होने एक लंबी सांस ली जिसकी आवाज़ सावित्री को भी सुनाई दी. वह समझ गयी कि अगले पल मे वह लूट जाएगी. क्योंकि पंडित जी अब उसके सपनो और इज़्ज़त को मिट्टी मे मिलाने के लिए तैयार हो गये हैं. उसके मन मे यह बात सॉफ थी कि वह आज अपनी इज़्ज़त नही बचा पाएगी. उसका मनोबल पंडित जी के प्रभावशाली और कड़क व्यक्तित्व के सामने घुटने टेक दिया था. अगले पल पंडित जी सामने बैठकर अपने चेहरे को घुटनों के बीच छुपाए सावित्री के पास आए और झुककर सावित्री के एक बाँह को अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर उपर खड़ा करने लगे. अब सावित्री के पास इतनी हिम्मत नही थी कि वह विरोध कर सके पूरी तरह से टूट चुकी सावित्री को आख़िर खड़ा होना पड़ा. खड़ी तो हो गयी लेकिन अपना सिर को झुकाए हुए अपने नज़रों को एकदम से बंद कर रखी थी. अपने दोनो हाथों से दोनो चुचिओ को छिपा रखी थी जो की समीज़ मे थी और उसके उपर एक दुपट्टा भी था. पंडित जी की नज़रे सावित्री को सर से पैर तक देखने और उसकी जवान शरीर को तौलने मे लगी थी. समन्य कद की सावित्री जो गेहुअन और सवाले रंग की थी और शरीर भरा पूरा होने के वजह से चुचियाँ और चूतड़ एकदम से निकले हुए थे. पंडित जी नेअपनी नज़रों से तौलते हुए पूछा "लक्ष्मी के दूसरे बच्चे को देखी है" सावित्री का दिमाग़ मे अचानक ऐसे सवाल के आते ही हैरानी हुई कि पंडित जी लक्ष्मी चाची के दो बच्चो जिसमे एक 13 साल की लड़की और 5 साल का लड़का था और उसके लड़के के बारे मे क्यों पूछ रहे हैं. फिर भी इस मुसीबत के पलो मे उसने और भी कुछ सोचे बगैर बोली "जी". फिर पंडित जी ने पूछा "कैसा दिखता है वो" सावित्री के मन मे यह सवाल और कयि सवालों को पैदा कर दिया. आख़िर पंडित जी क्या पूछना चाहते हैं या क्या जानना चाहते हैं. उसे कुछ समझ मे नही आया और चुप चाप खड़ी रही. फिर पंडित जी का हाथ आगे बढ़ा और खड़ी सावित्री के दोनो हाथों को जो की चूचियो को छुपाएँ थी हटाने लगे. सावित्री अब मजबूर थी पंडित जी के सामने और आख़िर दोनो चुचिओ पर से साथ हट गये और दुपट्टा के नीचे दोनो चुचियाँ हाँफने के वजह से उपर नीचे हो रहीं थी. अब दुपट्टे पर ज्योहीं पंडित जी का हाथ गया सावित्री के शरीर का सारा खून सुख सा गया और कुछ सकपकाते हुए एक हाथ से पंडित जी का हाथ पकड़नी चाही थी की पंडित जी ने उसके दुपट्टे को हटा ही दिया और दोनो बड़ी बड़ी चुचियाँ अब समीज़ मे एकदम सॉफ उभार लिए दिख रहीं थी. सावित्री का दुपट्टा फर्श पर गिर पड़ा. तभी पंडित जी ने सावित्री के दिमाग़ मे एक जबर्दाश्त विस्फोट किया "वह लड़का मेरे लंड से पैदा है समझी...!" यह सुनते ही सावित्री खड़े खड़े मानो लाश हो गयी थी. वह क्या सुनी उसे समझ नही आ रहा था. लक्ष्मी चाची को पंडित जी ने चोदा होगा. इन बातों को और सोचने का समय उसके पास अब नही था क्योंकि उसके उपर पंडित जी के हमले शुरू हो गये थे. अगले पल सावित्री के दिमाग़ मे लक्ष्मी चाची के चरित्रा पर एक प्रश्नचिन्ह्आ लगने ही लगे थे कि पंडित जी के हाथों मे सावित्री की गदराई चुचियाँ आ ही गयी और सावित्री को अपने चुचिओ पर समीज़ के उपर से ही पहली बार किसी मर्द का हाथ पड़ते ही उसे लगा की जांघों के बीच एक अज़ीब सी सनसनाहट फैल गयी हो. अचानक इस हमले से सावित्री का मुँहा खुल गया और एक "सी..सी" की आवाज़ निकली थी कि फिर पंडित जी ने दबाव बढ़ा कर मसलना शुरू कर दिया. चुचियाँ काफ़ी ठोस और कसी हुई थी. शरीर मांसल होने के वजह से काफ़ी गदरा भी गयी थी. पंडित जी ने एक एक कर दोनो चुचिओ को मसलना शुरू कर दिया. पंडित जी खड़े खड़े ही सावित्री की चुचिओ को मसल रहे थे और सावित्री भी जो चटाई के बगल मे फर्श पर खड़ी थी, उसे लगा की उसके पैर मे अब ताक़त ही नही है और गिर पड़ेगी. पंडित जी का एक हाथ तो चुचिओ को बारी बारी से मीस रहे थे और दूसरा हाथ खड़ी सावित्री के पीछे पीठ पर होते हुए उसे उसे पकड़ रखा था की चुचिओ वाले हाथ के दबाव से उसका सरीर इधेर उधेर ना हीले और एक जगह स्थिर रहे ताकि चुचिओ को ठीक से मीसा जा सके. पंडित जी ने खड़े खड़े ही सावित्री के शरीर को पूरी गिरफ़्त मे लेते हुए चुचिओ को इतना कस कस कर मीज रहे थे कि मानो समीज़ को ही फाड़ देंगे. तभी सावित्री की यह अहसास हुआ की उसके समीज़ जो उसके कसी हुई चुचिओ पर काफ़ी तंग थी लगभग फट जाएगी क्योंकि पंडित जी के हाथों से मीज़ रही चुचिओ के उपर का समीज़ का हिस्सा काफ़ी सिकुड और खीच जाता था. दूसरी बात ये भी थी की सावित्री का समीज़ काफ़ी पुराना था और पंडित जी के कस कस कर चुचिओ को मीजने से या तो समीज़ की सीवान उभड़ जाती या काफ़ी खींच जाने से फट भी सकती थी जो की सावित्री के लिए काफ़ी चिंता और डर पैदा करने वाली बात थी. यदि कहीं फट गयी तो वह घर कैसे जाएगी और दूसरी की मा यदि देख ली तो क्या जबाव देगी. यही सोचते उसने पंडित जी से हिम्मत कर के बोली "जी समीज़ फट जाएगी" तभी पंडित जी ने कहा "चल निकाल दे और आ चटाई पर बैठ, कब तक खड़ी रहेगी" इतना कह कर पंडित जी चटाई पर जा कर बैठ गये. उनका लंड पूरी तरह से खड़ा था जो सावित्री देख ही लेती और डर भी जाती उसकी मोटाई देख कर. समीज़ के फटने की डर जहाँ ख़त्म हुआ वहीं दूसरी परेशानी भी खड़ा कर दी कि समीज़ को उतरना था यानी अब नंगी होना था. सावित्री को अब यह विश्वास हो चुका था कि आज पंडित जी उसका इज़्ज़त को लूट कर ही दम लेंगे और उसकी इज़्ज़त अब बच भी नहीं सकती. यह सोच मानो सावित्री से बार बार यही कह रहे हों कि विरोध करने से कोई फ़ायदा नही है जो हो रहा है उसे होने दो. आख़िर सावित्री का मन यह स्वीकार ही कर लिया की पंडित जी जो चाहें अब उसे ही करना पड़ेगा. और उसके काँपते हाथ समीज़ के निचले हिस्से को पकड़ कर, पीठ को पंडित जी के तरफ करती हुई धीरे धीरे निकाल ही ली और कुछ देर तक उस समीज़ के कपड़े से अपनी दोनो चुचिओ को ढाकी रही जो की एक पुराने ब्रा मे कसी थी. फिर उसने उस समीज़ को नीचे फर्श पर फेंक दिए और अपनी बाहों से अपनी दोनो चुचीोन को जो की ब्रा मे थी धक ली और काफ़ी धीरे धीरे सर को नीचे झुकाए हुए पंडित जी के तरफ मूडी. पंडित जी ने समीज़ के उतारते ही सावित्री की पीठ को देखा और पुराने ब्रा को भी जो उसने पहन रखा था. लेकिन ज्योन्हि सावित्री ने अपना मुँह पंडित जी के तरफ की उसके हाथों मे छिपी चुचियाँ जो काफ़ी बड़ी थी दिखी और पंडित जी के खड़े लंड ने एक झटका लिया मानो सलामी कर रहा हो. "आओ" पंडित जी ने कड़क आवाज़ मे बुलाया और बेबस सावित्री धीरे धीरे कदमो से चटाई पर आई तो पंडित जी ने उसका हाथ पकड़ कर बैठने लगे ज्योन्हि सावित्री बैठने लगी पंडित जी तुरंत उसका बड़ा चूतड़ अपने एक जाँघ पर खींच लिया नतीज़ा सावित्री पंडित जी के जाँघ पर बैठ गयी. सावित्री जो लगभग अब समर्पण कर चुकी थी उसके चूतड़ मे पंडित जी के जाँघ के कड़े मोटे बालों का गड़ना महसूस होने लगा. फिर पंडित जी ने सावित्री के पीठ के तरफ से एक हाथ लगा उसे अपने जंघे पर कस कर पकड़ बनाते हुए बैठाए और ब्रा के उपर से ही चुचिओ को दूसरी हाथ से मीज़ना सुरू कर दिया. सावित्री पंडित जी के जाँघ पर अब पूरी तरीके से समर्पित होते हुए बैठी थी और अब उसके सरीर पर उपर ब्रा और नीचे सलवार थी अंदर उसने एक पुरानी चड्धि पहन रखी थी. पंडित जी के हाथ चुचिओ के आकार के साथ साथ इसके कसाव का भी मज़ा लेने लगे. सावित्री की साँसे बहुत तेज़ हो गयी थी और अब हाँफने लगी थी. लेकिन एक बात ज़रूर थी जो पंडित जी दो को सॉफ समझ आ रही थी कि सावित्री के तरफ से विरोध एकदम नही हो रहा था. यह देखते ही पंडित जी ने उसके ब्रा के स्ट्रीप को हाथ से सरकाना चाहा लेकिन काफ़ी कसा होने से थोड़ा सा भी सरकाना मुश्किल दीख रहा था फिर पंडित जी ने सावित्री के पीठ पर ब्रा के हुक को देखा जो ब्रा पुरानी होने के कारण हुक काफ़ी कमज़ोर और टेढ़ी हो चुकी थी, और उसे खोला ही था कि सावित्री की दोनो अट्टरह साल की काफ़ी बड़ी और कसी कसी चूचिया छलक कर बाहर आ गयी तो मानो पंडित जी का तो प्राण ही सुख गया.इस पुरानी ब्रा मे इतनी नयी और रसीली चुचियाँ हैं पंडित जी को विस्वास ही नही हो रहा था. ज्योहीं दोनो चुचियाँ छलक कर बाहर आईं की सावित्री के हाथ उन्हें ढकने के लिए आगे आईं लेकिन अब मनोबल ख़त्म हो चुका था, पूरी तरह से टूट जाने के कारण सावित्री ने अपने सारे हथियार डाल चुकी थी और पंडित जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व के सामने अब समर्पित हो चुकी सावित्री को अपनी नंगी हो चुकी चुचिओ को ढकने से कोई फ़ायदा नही दीख रहा था और यही सोच कर उसने अपना हाथ दोनो चुचिओ पर से स्वयम् ही हटा लिया नतीज़ा की दोनो चुचियाँ पंडित जी के सामने एकदम नंगी हो चुकी थी. पंडित जी इन्हे आँखे फाड़ फाड़ के देख रहे थे. सावित्री जो पंडित जी जांघों पर बैठी थी उसके एक कूल्हे से पंडित जी का लंड रगर खा रहा था जिसके वजह से वह लंड की गर्मी को महसूस कर रही थी और इसके साथ ही साथ उसके शरीर मे एक मदहोशी भी छा रही थी. पंडित जी की साँसे जो तेज़ चल रही थी खड़ी चुचिओ को देखकर मानो बढ़ सी गयी. फिर पंडित जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और सावित्री के नंगी चुचिओ पर रख ही दिया. सावित्री को लगा की उसकी बुर से कोई चीज़ निकल जाएगी. फिर दोनो चुचिओ को बैठे बैठे ही मीज़ना सुरू कर दिया. अब सावित्री जो अपनी आँखे शर्म से बंद की थी अब उसकी आँखे खुद ही बंद होने लगी मानो कोई नशा छाता जा रहा हो उसके उपर. अब उसे आँखे खोलकर देखना काफ़ी मुस्किल लग रहा था. इधेर पंडित जी दोनो चुचिओ को अपने दोनो हाथो से मीज़ना चालू कर दिया. सावित्री जो पूरी तरह से नंगे हो चुके पंडित जी की एक जाँघ मे बैठी थी अब धीरे धीरे उनकी गोद मे सरक्ति जा रही थी. सावित्री के सरीर मे केवल सलवार और चड्डी रह गयी थी. सावित्री का पीठ पंडित जी के सीने से सटने लगा था. सावित्री को उनके सीने पर उगे बॉल अपनी पीठ से रगड़ता साफ महसूस हो रहा था. इससे वह सिहर सी जाती थी लेकिन पंडित जी की चुचिओ के मीज़ने से एक नशा होने लगा था और आँखे बंद सी होने लगी थी. बस उसे यही मालूम देता की पंडित जी पूरी ताक़त से और जल्दी जल्दी उसकी चुचियाँ मीज़ रहे हैं और उनकी साँसे काफ़ी तेज चल रही हैं. अगले पल कुछ ऐसा हुआ जिससे सावित्री कुछ घबरा सी गयी क्योंकि उसे ऐसा महसूस हुआ कि उसकी बुर से कोई गीला चीज़ बाहर आना चाह रहा हो. जिसके बाहर आने का मतलब था कि उसकी चड्डी और सलवार दोनो ही खराब होना. उसने अपनी बंद हो रही आँखो को काफ़ी ज़ोर लगा कर खोली और फिर पंडित जी की गोद मे कसमसा कर रह गयी क्योंकि पंडित जी अब सावित्री को कस पकड़ चुके थे और चुचिओ को बुरी तरह से मीज़ रहे थे. अभी यही सावित्री सोच रही थी कि आख़िर वह पंडित जी से कैसे कहे की उसकी बुर मे कुछ निकलने वाला है और उससे उसकी चड्डी और सलवार खराब हो जाएगी. यह सावित्री के सामने एक नयी परेशानी थी. उसे कुछ समझ मे नही आ रहा था.पंडित जी का प्रभावशाली व्यक्तित्व और कड़क मिज़ाज़ के डर से उनसे कुछ बोलने की हिम्मत नही थी. सावित्री को आज यह भी मालूम हो गया था कि लक्ष्मी चाची भी उनसे बच नही पाई थी. वह यही अफ़सोस कर रही थी की पहले ही उसने सलवार और चड्डी निकाल दी होती तो उसके कपड़े खराब ना होते. लेकिन वह यह भी सोचने लगी की उसे क्या मालूम की उसकी बुर से कुछ गीला चीज़ निकलने लगेगा और दूसरी बात यह की उसे लाज़ भी लग रहा था पंडित जी से. इसी बातों मे उलझी ही थी की पंडित जी का एक हाथ सावित्री के नाभि के पास से फिसलता हुआ सलवार के नडे के पास से सलवार के अंदर जाने लगा. चुचिओ के बुरी तरह मसले जाने के वजह से हाँफ रही सावित्री घबरा सी गयी फिर वैसे ही पंडित जी के गोद मे बैठी रही. पंडित जी का ये हाथ मानो कुछ खोज रहा हो और सावित्री के दोनो जाँघो के बीच जाने की कोशिस कर रहा था. सलवार का जरवाँ के कसे होने के वजह से हाथ आसानी से सलवार के अंदर इधेर उधर घूम नहीं पा रहा था. पंडित जी के हाथ के कलाई के पास के घने बॉल सावित्री के नाभि पर रगड़ रहे थे. पंडित जी की उंगलियाँ सलवार के अंदर चड्डी के उपर ही कुछ टटोल रही थी लेकिन उन्हे चड्डी मे दबे सावित्री की घनी झांते ही महसूस हो सकी. लेकिन यह बात पंडित जी को चौंका दी क्योंकि उन्हे लगा कि सावित्री के चड्डी काफ़ी कसी है और उसकी झांते काफ़ी उगी है जिससे चड्डी मे एक फुलाव बना लिया है. सलवार का जरवाँ कसा होने के वजह से पंडित जी का हाथ और आगे ना जा सका फिर उन्होने हाथ को कुछ उपर की ओर खींचा और फिर सलवार के अंदर ही चड्डी मे घुसाने की कोसिस की और चड्डी के कमर वाली रबर कसी होने के बावजूद पंडित जी की कुछ उंगलियाँ सावित्री के चड्डी मे घुस गयी और आगे घनी झांतों मे जा कर फँस गयी. पंडित जी का अनुमान सही निकला कि चड्डी के उपर से जो झांटें घनी लग रही थी वह वास्तव मे काफ़ी घनी और मोटे होने के साथ साथ आपस मे बुरी तरह से उलझी हुई थी. पंडित जी की उंगलियाँ अब सावित्री के झांतो को सहलाते हुए फिर आगे की ओर बढ़ने की कोसिस की लेकिन कमर के पास सलवार का जरवाँ कसे होने के वजह से ऐसा नही हो पाया.


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संघर्ष--8

सलवार और चड्डी के अंदर पंडित जी के हाथों के हरकत ने सावित्री की परेशानी और बढ़ा दी क्योंकि जो गीला चीज़ बुर से निकलने वाला था अब बुर के मुँह पर लगभग आ गया था. तभी एक राहत सी हुई क्योंकि अब पंडित जी का हाथ चड्डी से बाहर आ कर सलवार के जरवाँ के गाँठ को खोलने लगा और जरवाँ के खुलते ही पंडित जी के हाथ जैसे ही सलवार निकालने के लिए सलवार को ढीला करने लगे सावित्री ने भी अपने चौड़े चूतड़ को पंडित जी के गोद मे बैठे ही बैठे कुछ हवा मे उठाई ताकि सलवार को चूतदों के नीचे से सरकया जा सके और जाँघो से सरकाते हुए निकाला जा सके. पंडित जी ने मौका पाते ही सलवार को सरकाते हुए निकाल कर फर्श पर फेंक दिया. अब सावित्री दुबारा जब पंडित जी की गोद मे बैठी तब केवल चड्डी मे थी और उसकी जंघे भी नगी हो चुकी थी. बैठे ही बैठे सावित्री ने अपने चड्डी के उपर से बुर वाले हिस्से को देखी तो चौंक गयी क्योंकि बुर से कुछ गीला चीज़ निकल कर बुर के ठीक सामने वाला चड्डी का हिस्से को भीगा दिया था. गोद मे बैठने के वजह से पंडित जी का फंफनता लंड भी सावित्री के कमर से रगड़ खा रहा था. सावित्री की नज़र ज्योन्हि लंड पर पड़ती उसे लगता कि अब मूत देगी. पंडित जी ने सावित्री के चड्डी के उपर से ही बुर को सहलाने लगे तभी उनकी उंगलियाँ चड्डी के उपर से ही बुर की दरार के तरफ ज्योही बढ़ी उनकी उंगली भीगे हुए चड्डी पर गयी और उंगली भीग गयी. पंडित जी ने भीगे उंगली के साथ सावित्री की चड्डी को भी देखा तो पाया कि बुर से कमरस निकल कर बुर से सटी हुई चड्डी को भीगा दिया है. अब पंडित जी समझ चुके थे कि तवा गरम हो गया है और रोटी सेंकने की बारी है. उन्हे लगा कि शायद गरम हो जाने के कारण ही सावित्री विरोध नही कर पा रही थी. सावित्री की आँखे फिर बंद होने लगी तभी पंडित जी ने सावित्री की चड्डी को निकालने की कोशिस की तो पाया की चड्डी काफ़ी तंग थी और काफ़ी कसी होने के कारण आसानी से सरकना मुस्किल दिख रहा था. फिर भी उंगली को चड्डी के कमर वाले हिस्से मे डालकर नीचे सरकाने की कोसिस की तो चड्डी थोड़ी से सरक कर रह गयी और अब पंडित जी की उंगली चड्डी और सावित्री के चूतड़ के माँस के बीच फँस सी गयी. फिर भी पंडित जी तो जानते ही थे कि सावित्री की चड्डी तो निकालनी ही पड़ेगी चाहे जैसे निकले. दुबारा उन्होने ने ज़ोर लगाया ही था कि सावित्री ने उनका हाथ पाकर ली क्योंकि सावित्री को लगा कि उसकी पुरानी चड्डी जो काफ़ी कसी हुई थी ज़ोर लगाने पर फट ज्एगी. चड्डी को पहनते और निकलते समय सावित्री को काफ़ी मेहनत करनी पड़ जाती थी. इसका कारण यह भी था कि उसके शरीर मे अब भराव भी हो जाने से उसके चूतड़ काफ़ी गोल और चौड़े हो गये थे. सावित्री समझ गयी कि चड्डी को फटने से बचने के लिए खुद ही निकालनी पड़ेगी और अगले पल पंडित जी के गोद से उठ कर खड़ी हुई तो पंडित जी के सामने सावित्री का बड़ा मांसल चूतड़ आ गया जिसपर चड्डी चिपकी हुई थी. सावित्री ने धीरे धीरे दोनो हाथों के उंगलिओं के सहारे चड्डी को थोड़ा थोड़ा सरकाना सुरू कर दी. जब चड्डी कमर से कुछ नीचे सरक गयी तो पंडित जी ने देखा की चूतड़ पर चड्डी वैसे ही चिपकी पड़ी है. फिर सावित्री ने अपने गुदज मांसल चूतड़ और चड्डी के बीच मे उंगली फँसैई और काफ़ी धीरे से नीचे की ओर सरकया ही था कि अचानक चूतर पर से चड्डी सात की आवाज़ के साथ सरक कर जाँघो मे आ गयी. दोनो चूतड़ पंडित जी के सामने आ गये. पंडित जी ने देखा कि ग़रीब सावित्री किस मुस्किल से अपनी तंग चड्डी को सरका रही थी की कहीं फट ना जाए. शायद उसकी भरी जवानी के वजह से पुरानी चड्डी अब काफ़ी कस गयी थी. चुतदो पर से चड्डी हट कर जाँघो मे आ गयी तब सावित्री ने फिर धीरे धीरे अपनी मांसल जांघों से नीचे सरकाना सुरू किया. चड्डी जैसे चूतदों पर कस कर फाँसी थी वैसे ही जांघों मे भी काफ़ी मेहनत करनी पड़ी. आख़िर रोज़ जिस मुस्की से सावित्री चड्डी पहनती और निकलती आज पंडित जी को भी मालूम चल गया. शायद पंडित जी इस चड्डी को निकालते तो निकाल नही पाते और ज़ोर लगाने का मतलब कि ग़रीब सावित्री की चड्डी फट जाती. पहले तो पंडित जी के दिमाग़ मे यह बात थी कि सावित्री की चड्डी छोटी है तभी इतनी परेशानी हो रही है इसे निकालने मे लेकिन जब सावित्री के चूतादो और जांघों को गौर से देखा तो समझ गये कि चड्डी से कही ज़्यादा कारण चूतादो और जांघों का बड़ा और मांसल होना था. इस परेशानी के लिए सावित्री के चुड़ाद और जंघें ही सीधे ज़िम्मेदार हैं. कसे चड्डी के सॅट के निशान कमर और जाँघो पर साफ दिख रहा था. सावित्री ने अपने पैरों से चड्डी निकाल कर फर्श पर रख दी और अब वह एकदम नगी हो चुकी थी और इस पल उसकी मा की याद आ रही थी, सावित्री को लग रहा था कि उसकी मा का संघर्ष जो वह इज़्ज़त के लिए लड़ रही थी, अब ख़त्म हो गया क्योंकि आज वह पंडित जी के सामने एकदम नगी हो गयी थी. अपने चूतदों को पंडित जी के तरफ करके यही सोच ही रही थी कि पंडित जी के हाथों ने उसके कमर को पकड़ कर फिर अपने गोद मे बैठने का इशारा किया तो सावित्री समझ गयी और पीछे एक नज़र बैठे पंडित जी के तरफ देखी जो बैठे थे लेकिन उनका लंड एक दम से खड़ा था. सावित्री फिर उनके गोद मे बैठने लेगी तो पहली बार पंडित जी के झांतो के बाल सावित्री के नंगे चौड़े चूतदों मे चुभने से लगे थे. पंडित जी फिर अपने हाथों को चुचिओ पर फेरते हुए मीज़ना सुरू कर दिया. सावित्री के चुचिओ की घुंडिया एकदम काली काली थी. उत्तेजना से खड़ी हो गयी थी. घुंडीओ को पंडित जी एक एक कर के मरोड़ कर मज़ा लूटना सुरू कर दिया. यही कारण था कि बुर से कमरस निकलना सुरू हो गया. अब पंडित जी झांतों मे भी उंगली चलाई तो दंग रह गये झांते काफ़ी घनी होने के कारण उंगलियाँ फँस सी जाती थी. फिर एक हाथ तो चुचिओ पर ही था और दूसरा झांतों से होते हुए ज्योहीं बुर के मुँह पर गया की सावित्री एकदम पागल सी हो गयी मानो बेहोश हो रही हो. पंडित जी के हाथ ने पवरोटी के समान फूली हुई बुर को सहलाते हुए टटोला तो पाया की काफ़ी काफ़ी गुदाज़ बुर थी. झांते तो ऐसे उगी थी मानो कोई जंगल हो और काफ़ी बड़ी होने के नाते बुर के ओठों को भी ढक रखी थी. पंडित जी ने बुर के ओठों के उपर लटके हुई झांतों को उंगलिओं से हटाया और बुर के दोनो फांको को उपर से ही सहलाया. फिर एक उंगली को फांको के बीच वाली कुवारि दरार के उपर चलाया तो कमरस से भीग गयीं. ये बुर से निकला कमरस मानो पंडित जी के हाथों को बुला रहा था. पंडित जी ने एक उंगली को फांको के बीच के दरार पर सरकया मानो उसके बीच कोई जगह तलाश रहे हों. दरार के सही स्थान पर उंगली के टिप से दबाव बनाया और कामयाब भी हो गये उंगली के अगला हिस्सा थोडा सा घुस गया लेकिन दरार काफ़ी सांकारी होने के वजह से उंगली को मानो बाहर की ओर धकेल रही हो. गीली हो चुकी बर की दरार मे उंगली के थोड़े से हिस्से के घुसते ही उंगली कमरस से भीग गयी. पंडित जी अपने इस उंगली को उसी दरार पर लगाए रखा और बार बार उंगली के अगले हिस्से को दरार के मुँह मे घुसाते और निकालते. मानो पंडित जी ऐसा कर के कुछ समझने की कोसिस कर रहे थे. दरार मे उंगली का आराम से ना घुस पाना शायद यह प्रमाणित कर रहा था कि सावित्री को उसके गाओं के अवारों ने चोद नही पाया हो. पंडित जी भी सावित्री के गाओं के बारे मे खूब आक्ची तरीके से जानते थे कि कितने आवारा और ऐयश किस्म के बदमाश वहाँ रहते हैं. शायद वह पहले यही सोचते थे कि सावित्री भी अब तक बच नही पाई होगी अन्या लड़कीो की तरह लेकिन उंगली का अगला हिस्सा बुर के मुँह पर फँस कर कस जाना उन्हे हैरान कर दी. उन्हे तो चुचिओ के कसाव और आकार देखकर ही कुछ शक हो गया था कि किसी ने इन अनारो पर हाथ नही फेरा हो. लेकिन फांको के बीच फाँसी उंगली ने पंडित जी को यह विश्वास दिला दिया कि सावित्री एकदम उन्चुइ है. सावित्री की आँखे एकदम बंद हो गयी थी और साँसे काफ़ी तेज़ चलराही थी. तभी पंडित जी ने जिस हाथ से चुचिओ को मीज़ रहे थे उससे सावित्री के चेहरे को अपने मुँह के तरफ मोड़ा और उसके निचले होंठ को अपनी मुँह मे लेने के बाद चूसना सुरू कर दिया. दूसरे हाथ की उंगली जो बुर के फांको मे फँस गयी थी उसे वहीं रहने दिया और बीच बीच मे उंगली को अंदर चंपने लगते. पहली बार किसी मर्द से ओठों की चुसाइ से सावित्री का शरीर सिहर सा गया और उसे नशा और छाने लगा. कुछ देर तक ऐसे ही होंठो को चूसने के बाद सावित्री को अपने गोद मे से उठाकर चटाई पर बैठा दिए और एक हाथ पीठ के ररफ़ करके सहारा देते हुए दूसरे हाथ से सावित्री के एक चुचि को मुँह मे लेकर घुंडीओ को दाँतों से दबा दबा कर चूसने लगे. सावित्री एकदम झंझणा उठी. उसके शरीर मे अब एक आग सी लग गयी थी. वह अब पंडित जी को रोकना नही चाहती थी. अब उसे ये सब अच्छा लगने लगा था. पंडित जी ने बारी बारी से दोनो चुचिओ को खूब चूसा और बीच बीच मे खाली हाथ से फांकों के बीच मे भी उंगली धंसा देते जिससे सावित्री कुछ उछल सी जाती. पंडित जी का लॅंड जो काफ़ी तननाया हुआ था उसको उन्होने सावित्री के हाथ मे देने लगे. चटाई पर बगल मे बैठी सावित्री कुछ लाज़ के बाद आख़िर लंड को एक हाथ मे थाम ही ली. लंड काफ़ी गरम था और सावित्री के जीवन का पहला लंड था जो रह रह कर झटके भी लेता था. सावित्री अब गरम हो चुकी थी और लंड को थामे अपनी दोनो चुचिओ को पंडित जी के मुँह मे चुसा रही थी. तभी पंडित जी ने सावित्री को लंड को आगे पीछे हिलाने के लिए अपने हाथ से इशारा किया लेकिन सावित्री लाज़ के मारे केवल लंड को थामे ही रह गयी. जब दुबारा उन्होने अपने हाथ से सावित्री के उस हाथ जो लंड थामे थी, को पकड़ कर आगे पीछे हिलाते हुए ऐसा करने के लिए इशारा किया तो डर के मारे हिलाने तो लगी लेकिन लंड को ठीक से हिला नही पा रही थी. वह केवल लंड को थोड़ा थोड़ा ही हिला पाती और लंड को अपनी डूबती आँखो से देख भी रही थी जो पंडित जी के घने झांतों से घिरा हुआ था लेकिन एकदम गोरा और लंबा और मोटा भी था. लंड के मुँह से हल्की लसलसता हुआ पानी निकल रहा था जो कभी कभी सावित्री के हाथ मे भी लग जाता. पंडित जी का दूसरा हाथ ज्योहीं खाली हुआ उन्होने फिर बुर के फांको के बीच गूसाने लगते. चुचिओ की चुसाइ से बुर अब और भी ज़्यादा गीला हो चुका था और पंडित जी की उंगली का कुछ हिस्सा बुर के सांकारी छेद मे घुसा लेकिन कमरस से भीग गया. पंडित जी ने उस उंगली को अगले पल फांको के बीच खूब नचाया और कमरस से भीगो कर तार कर लिया और फांकों से निकाल कर सीधे मुँह मे लेकर चाट गये. ऐसा देखकर सावित्री चौंक सी गयी उसे समझ मे नही आया कि जो पंडित जी छोटी जाती की लड़की को अपने बिस्तर को नही छूने देते वो कैसे उसके पेशाब वाले स्थान यानी बुर के अंदर की उंगली को चाट गये.


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संघर्ष--9

अब पंडित जी और देर करना नही चाहते थे. वह जानते थे कि जो सावित्री अभी लंड को ढंग से हिला नही पा रही है वह लंड को कैसे चुसेगी. फिर ज़्यादा वक्त खराब ना करने के नियत से सावित्री को चटाई पर लेटने के लिए कहा और सावित्री चिट लेट गयी लेकिन आँखे बंद कर ली.पंडित जी अपनी उंगली को बुर मे घुसेड कर पहले ही समझ गये थे कि सावित्री कुँवारी है और उसकी सील को तोड़ने के लिए काफ़ी ताक़त से चोदना होगा. अट्ठारह साल की सावित्री को भी यह पता था की जब लड़की पहली बार मर्द से चुदति है तो थोड़ा दर्द होता है और कुछ खून भी बुर से निकलता है, जो कि उसने अपने सहेलिओं से सुन रखी था. अबतक पंडित जी ने जो कुछ सावित्री के शरीर के साथ किया उससे वह एकदम गरम हो कर बह रही थी. उसकी स्थिति एक चुदासि औरत की तरह हो चुकी थी. इसी वजह से वह विरोध के बजाय अब पंडित जी से अपनी बह रही गरम बुर को चुदाना चाह रही थी. पंडित जी बिना समय गवाए चटाई के बीच मे लेटी सावित्री के दोनो पैरों के बीच मे आ गये. पंडित जी ने सावित्री के दोनो मांसल और साँवले रंग के मोटी मोटी जाँघो को फैलाया तो कुँवारी बुर एकदम सामने थी. सावित्री के आँखे बंद थी और दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था लेकिन गरम हो जाने के वजह से वह खुद अपनी बुर मे लंड लेना चाह रही थी. इसी कारण वह पंडित जी का सहयोग कर रही थी. सावित्री की दोनो जाँघो को अलग करने पर पंडित जी ने देखा कि झांट के बॉल काफ़ी घने और बड़े होने के नाते बुर के होंठो के उपर भी आ गये थे. पंडित जी ने उन झांट के बालो को बुर के होंठो से उपर की ओर अपनी उंगलिओ से करने लगे. फिर बह रही बुर मे पंडित जी ने एक बार और उंगली घुसाइ तो कुछ हिस्सा घुसा और फिर उंगली फँस गयी. अब बुर से लिसलिसा पानी निकलना और तेज हो गया था. पंडित जी को लगा कि अब सही समय है सावित्री को चोद देने का. सावित्री के दोनो जांघों को अपने बालो से भरी जांघों पर चढ़ा कर उकड़ू हो कर बैठ गये और सावित्री चटाई पर सोए हुए अपनी आँखें एकदम से बंद कर ली थी. उसका दिल इतना ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था मानो उसका सीना फड़कर बाहर आ जाएगा.तभी पंडित जी नेअपने लंड को एक हाथ से पकड़ कर सुपादे के उपर वाली चमड़ी को पीछे सरकया तो सूपड़ा बाहर आ कर चमकने लगा. लंड के मुँह से लिसलिसा लार की तरह पानी थोडा थोडा चू रहा था. फिर उसी हाथ को पंडित जी अपने मुँह के पास ले गये और मुँह से थूक निकाल कर हाथ मे लेकर सूपदे और लंड पर लपेस कर काफ़ी चिकना कर लिए. अब सावित्री की बुर के साँकरी दरार को एक हाथ की दोनो उँगलिओ से चौड़ा कर के लंड का चमकता हुआ सूपड़ा दरार के ठीक बीचोबीच भिड़ाया. शायद सूपदे की गरमी सावित्री बर्दाश्त ना कर सकी और उसका चौड़ा और लगभग काले रंग का चूतड़ उच्छल सा गया और लंड दरार से सरक कर सावित्री के जाँघो से जा कर टकराया और पंडित जी ने जो थूक लंड और उसके सूपदे पर लगाया था वह सावित्री के जाँघ पर लग गया. फिर पंडित जी ने अपने मुँह से थूक निकाल कर दुबारा लंड और उसके सूपदे पर लपेस कर काफ़ी चिकना बना लिया. इस बार पंडित जी सावित्री के जांघों के बीच काफ़ी मजबूती के साथ बैठ कर एक हाथ से सावित्री के कमर के कूल्हे को पकड़ लिया ताकि उसे उछलने से रोका जा सके और दूसरी हाथ की उंगलिओ से बुर की दोनो फांको को अलग अलग किया लेकिन उंगलिओ के हटते ही फांके एकदम सिकुड जाती थी और सूपड़ा को लगाना काफ़ी मुश्किल हो जाता. फिर पंडित जी ने सावित्री को सोए सोए ही अपने दोनो हाथों से बुर को चौड़ा करने के लिए कहा. सावित्री भी चुदाई के गर्मी मे होने के नाते उसने अपने हाथ दोनो तरफ से लाकर अपने चूतड़ वाले हिस्से को खींच कर फैलाया तो बुर की दरार भी थोड़ी सी खुल गयी. सही मौका देखते ही पंडित जी ने थूक से लपेसे हुए चमकते सूपदे को दरार के ठीक बीचोबीच लगाते ही सावित्री के कूल्हे को कस के पकड़ा और सूपदे का दबाव दरार मे देना सुरू कर किया. गरम सूपड़ा को अपनी बुर मे पाते ही सावित्री एकदम से गन्गना गयी और इस बार फिर कुछ हरकत मे आने वाली थी कि पंडित जी ने सावित्री के कमर को एक हाथ से कस कर लपेटते हुए और दूसरे हाथ से लंड को पकड़ कर सांकारी बुर की दरार मे दबाए रखा ताकि लंड फिसल कर बाहर ना आ जाए. इसका कारण यह भी था कि बुर का छेद बहुत छोटा होने के कारण पंडित जी के लंड का चौड़ा सूपड़ा बुर मे घुसने के बजाय फिसल कर बाहर आ सकता था. पंडित जी ने सावित्री की कमर को एक हाथ से लपेटते हुए लगभग जाकड़ लिया ताकि सावित्री चाहकर भी कमर को हिला ना सके और दूसरे हाथ मे लंड को पकड़ कर जब बुर की दरार मे दबाव बनाया तो थूक से चिकना सूपड़ा और गीली बुर होने के बजाह से सूपड़ा बुर के दरार मे फिसल कर छेद के तरफ सरकते हुए घुसने लगा. जिससे सावित्री की बुर की सांकारी दीवारें फैलने लगी और सूपड़ा अपने आकार के बराबर फांको के दोनो दीवारों को फैलाने लगा. कभी ना चुदी होने के कारण सावित्री की बुर की दीवारे सूपदे को चारो ओर से कस कर पकड़ ली थी. इधेर पंडित जी काफ़ी ताक़त लगा कर सूपदे को बुर की दरार मे फाँसना चाहते थे. कुछ देर तक एक हाथ से सावित्री का कमर और दूसरी हाथ से अपना लंड पकड़ कर दरार मे अपना चमकता हुआ सूपड़ा धँसाने की कोशिस करते रहे और काफ़ी मेहनत के बाद बुर मे सूपड़ा फँस ही गया और सावित्री को दर्द भी हो रहा था क्योंकि पंडित जी केवल सूपदे को ही बुर मे धँसाने के लिए काफ़ी ज़ोर लगा रहे थे. दर्द की वजह से सावित्री अपने दोनो हाथों को अपने चूतादो से हटा ली थी. पंडित जी ने देखा कि किसी तरह से सूपड़ा घुस कर फँस गया है तब अगला कदम उठाने के लिए एक लंबी सांस ली. फिर उन्होने सावित्री को देखा कि केवल सूपड़ा के ही बुर के दीवारो मे फसने के वजह से कुछ दर्द हो रहा है और वह कुछ कराह रही थी तभी डाँटते हुए कहे "बुर को जैसे चौड़ा की थी वैसे कर तभी दर्द कम होगा" सावित्री फिर से अपने चूतादो को दोनो हाथो से चौड़ा किया तो फिर बुर के फाँक कुछ फैले लेकिन इससे पंडित जी को कोई फ़ायदा नही हुआ क्योंकि पंडित जी ने पहले ही एक हाथ से लंड को पकड़ कर सुपादे को बुर मे फँसाए हुए थे. वह जानते थे कि यदि लंड को हाथ से नही पकड़ेंगे तो सूपदे को बुर की साँकरी दीवारे बाहर की ओर धकेल देंगी और फिर से सूपड़ा धाँसने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. ************************************************* सूपदे का दबाव सावित्री की बुर के दीवारो पर बना रहा और केवल आधी इंच के लगभग ही सूपड़ा घुस कर रुक गया था. लेकिन कुछ फँस कर रह जाने से अब पंडित जी को यह आभास हो गया कि अब एक करारा धक्का देने पर लंड बुर की छेद मे ही जाएगा और फिसल कर बाहर नहीं आएगा. और अगले पल पंडित जी ने अपनी पकड़ काफ़ी मज़बूत कर ली और केवल सुपादे का दबाव पाकर सावित्री कराह रही थी की पंडित जी ने सावित्री की शरीर के सही तरह से चित लेटे होने और दोनो जंघें फैली हुई होने और अपने लंड को बुर के मुँह मे फँसा होना एक सही मौका था कि एक जबर्दाश्त करारा धक्का मार कर सावित्री की कुँवारी बुर की सील को ताड़ने के लिए. लेकिन यह बात सावित्री के मन मे नही था कि अगले पल मे पंडित जी उसे कितना दर्द देंगे. उसे तो केवल यही मालूम था कि जो दर्द सूपदे के घुसने से हुआ है उतना ही दर्द होगा जो वह किसी तरह बर्दाश्त कर ले रही थी. लेकिन पंडित जी अपने जीवन मे बहुत सी कुवारि लड़की को चोद कर औरत बना चुके थे इसलिए उन्हे बहुत अच्छा अनुभव था और वह यह जानते थे कि अगले पल मे जो कुछ होगा वह सावित्री के लिए काफ़ी दर्द भरा होगा और वह उच्छल कर छटपटाएगी और हो सकता है कि पकड़ से भागने की भी कोसिस करे. क्योंकि की कुछ लड़कीयो के सील की झिल्ली कुछ मोटी होने के कारण काफ़ी जोरदार धक्के मार कर तोड़ना पड़ता है और लड़की को दर्द भी बहुत होता है. लेकिन झिल्ली मोटी है या पतली ये तो लंड का दबाव बनाने पर ही पता चलेगा. यह सब पंडित जी के दिमाग़ मे चल ही रहा था कि उन्हे लगा कि अब एक सही समय आ गया है धक्का मारने का.उन्होने ने बुर के मुँह मे अपने फँसे हुए लंड के सूपदे को ठीक वैसे ही बनाए रखा और एक हाथ से लंड को भी पकड़े रखा और अपनी कमर और शरीर के हिस्सा को हल्का सा लहराते हुए एक धक्का बुर मे मारा. इस धक्के से लंड का सूपड़ा जो बुर मे ही फँसा था, पंडित जी के पूरे शरीर का वजन का दबाव पाते ही सावित्री के बुर के दीवारो को फैलाते हुए सांकरी बुर मे अंदर की ओर सरक गया. लेकिन सावित्री की कुवारि झिल्ली से जाकर टकराया और झिल्ली को अंदर की तरफ धकेलते हुए रुक गया. नतीज़ा यह हुआ कि लंड के सूपदे के दबाव से झिल्ली काफ़ी खींच तो गयी लेकिन फट नही पाई और सुपाड़ा वहीं पर रुक कर बुरी तरह से फँस गया. शायद यह इस वजह से भी हुआ क्योंकि बुर की छेद काफ़ी साँकरी थी और जब पंडित जी ने धक्का मारा तो लंड बुर के दीवारो को काफ़ी दबाव लगा कर फैलाते हुए झिल्ली तक आ सका था और झिल्ली पर सुपादे का जबर्दाश्त दबाव नही बन पाया कि वो फट जाए. दूसरा कारण यह भी था कि झिल्ली की परत कुछ मोटी भी थी. जब झिल्ली पर सुपादे के दबाव पड़ा और काफ़ी खींच गयी तो झिल्ली के खींचाव का दर्द सावित्री को बहुत तेज हुआ उसे लगा कि उसके शरीर का सारा खून बुर मे चला गया हो. बुर के अंदर उठे इस दर्द को वह बर्दाश्त नही कर पाई और छटपटा कर चिल्ला उठी " आईए आईए रे म्माई आई री बाप आरी बाहूत दराद होता ए ...आहही आही माई रे मे .. बाप रे ...आर बाप्प !...निकाला आई रे माइए. आहह...""सावित्री के छटपटाने की हरकत से अब एक नयी दिक्कत आने लगी क्योंकि सावित्री अपनी फैली हुई जांघों को सिकोड़ने और कमर को इधेर उधेर नचाने की कोशिस करने लगी. फिर भी पंडित जी ने उसके कमर को कस के पकड़ कर लंड का दबाव बुर मे धक्कों के रूप मे देने लगे लेकिन उन्हे महसूस हुआ कि उनका लंड जो बुर मे फँस गया था और आगे नही बढ़ पा रहा था बल्कि झिल्ली से टकरा कर उसे अंदर की ओर धकेल दे रहा था लेकिन झिल्ली को फाड़ नही पा रहा था और झिल्ली पर जा कर रुक जा रहा था. उपर से सावित्री के छटपटाने के वजह से पंडित जी को अब यह भी डर बन गया कि कहीं लंड फिसल कर बुर से बाहर ना आ जाए और फिर उसे चोदना बहुत मुश्किल हो जाएगा. पंडित जी ने जितनी ज़ोर लगा कर लंड का धक्का बुर मे मारे थे उतने मे उन्होने बहुत सी लड़कियो की कुवारि बुर की सील तोड़ चुके थे. इससे पंडित जी समझ गये कि सावित्री की बुर की झिल्ली कुच्छ मोटी है और अब वह अगला कदम ऐसा उठना चाह रहे थे कि इस बार कोई फिर से परेशानी ना हो. पंडित जी ने बिना समय गवाए अगले पल तक सावित्री को वैसे ही अपने पूरे शरीर के वजन से चटाई मे कस कर दबाए रखा और कमर को काफ़ी ताक़त से पकड़े रखा, लंड जो बुर मे जा कर बुरी तरह से फँस गया था उसे भी एक हाथ से पकड़े रखा. इधेर सावित्री जो की पंडित जी के पूरे शरीर के वजन से चटाई मे नीचे बुरी तरह से दबी हुई थी मानो उसका सांस ही रुक जाएगा और बुर के अंदर घुसे पंडित जी के मोटे और लंबे लंड के सुपादे के दबाव से उठे दर्द से अभी मर जाएगी. सावित्री जिस चटाई पर दबी हुई थी वह काफ़ी पतला था और इस वजह से नीचे से फर्श का कधोरपन से चूतड़ और पीठ मे भी दर्द होना सुरू कर दिया था. उसका यह भी कारण था की पंडित जी अपने पूरे शरीर का वजन सावित्री के उपर ही रख कर सावित्री के जंघें फैला कर चौड़ी कर के चढ़ गये थे और उसे चटाई मे बुरी तरह से दबोच कर सूपड़ा बुर मे पेल रखे थे जो झिल्ली तक जा कर फँस गया था. नतीज़ा यह कि सावित्री चाह कर भी कसमसा नही पा रही थी. और केवल सिर को इधेर उधेर कर पा रही थी. दर्द के वजह से आँखों मे आँसू आने लगे थे जो आँखों के किनारों से एक एक बूँद चटाई पर गिर रहे थे. सावित्री अब रो रही थी. जब पंडित जी को यह मालून हुआ कि उनके धक्के से झिल्ली अभी तक फट नही पाई है और सावित्री किसी भी वक्त उनके पकड़ से छूट सकती है तो कुछ हड़बड़ा से गये और दूसरा करारा धक्के की तैयारी मे लग गये. इस बार वो काफ़ी आवेश और ताक़त के साथ धक्का मारने के लिए अपनी पकड़ को इतना मजबूत कर लिए मानो वह सावित्री को अपने पकड़ से ही मार डालेंगे. अब सावित्री थोड़ी भी कसमसा नही पा रही थी और जबर्दाश्त पकड़ होने के बजाह से अब वह काफ़ी डर गयी थी उसे ऐसा लग रहा था मानो पंडित जी अब उसका जान ले लेंगे. तभी अचानक पंडित जी ने मौका देख कर अपने लंड को थोड़ा सा बाहर की ओर किया लेकिन बुर के बाहर नही निकाला तो सावित्री को लगा कि अब वह लंड निकाल रहे हैं क्योंकि ऐसा करने पर लंड के सूपदे का झिल्ली पर बना दबाव ख़त्म हो गया और सावित्री के बुर मे उठा दर्द भी कुछ कम हुआ ही था की अगले पल पंडित जी ने सावित्री के उपर बहुत बढ़ा ज़ुल्म ही ढा दिया. उन्होने ने अपने पहलवानी शरीर के कसरती ताक़त को इकट्ठा कर के अपने शरीर के पूरे वजन और पूरी ताक़त से चटाई मे लेटी सावित्री की बुर मे अपने खड़े लंड से एक बहुत ही करारा धक्का मारा. इस बार पंडित जी के पूरे शरीर का वजन के साथ पूरे ताक़त से मारे गये खड़े तननाए लंड के धक्के को सावित्री की बुर की कुवारि झिल्ली रोक नही पाई और झिल्ली काफ़ी खींचने के बाद आख़िर फट गयी और सुपाड़ा झिल्ली के फटे हिस्से को बुर की दीवारों मे दबाते हुए अंदर की तरफ घुस कर फिर से सांकरी बुर मे फँस गया.


RE: Hindi Porn Stories संघर्ष - sexstories - 09-28-2017

संघर्ष--10

झिल्ल्ली के फटते ही सावित्री के उपर मानो आसमान ही गिर पड़ा हो. इतना तेज दर्द हुआ कि वह एकदम बेहोश होने के कगार पर आ गयी. वह बिलबिला कर चिल्ला उठी "" अरी...ए माई रे मैं मर जाब ....आरे प आ न दी त जीए हम मर जाब .....अरे ई बाप हो बाप .... दा र आड़ आहह री मैं...." साथ साथ उसके शरीर मे काफ़ी तेज छटपटाहट भी होने लगी लेकिन पंडित जी भी बुरी ताक़त से सावित्री को चटाई मे दबोचे रखा. सावित्री कमर को इधेर उधेर हिलाने की कोशिस करने लगी लेकिन पंडित जी के शरीर के नीचे दबे होने और एक हाथ से कमर पकड़े होने के वजह से कुछ कर नही पा रही थी . फिर भी थोड़ा बहुत कमर ज्यो ही इधेर उधेर हिलता तो पंडित जी अपने लंड का दबाव बुर मे बना देते और हल्का सा लंड बुर मे सरक जाता. सावित्री की बुर की देवारें काफ़ी फैल कर पंडित जी के चौड़े सुपादे को निगलने की कोशिस कर रही थी. पंडित जी ने जिस हाथ से लंड को पकड़ा था उसे लंड से हटा लिए क्योंकि लंड अब लगभग आधा घुस चुका था और पंडित जी के शरीर का वजन सीधे लंड पर ही था जो बुर मे घुसता जा रहा था. लंड वाला हाथ सीधे चुचिओ पर गया और बड़ी बड़ी गोल और कसी चुचिओ को आटा की तरह गुथने लगे. दूसरा हाथ जो कमर मे था उसे पंडित जे ने वहीं रखा क्यों की सावित्री अभी भी छटपटा रही थी लेकिन उसके छटपटाने के वजह से जब कमर का हिस्सा हिलता तब बुरी तरह से बुर मे दबा हुआ लंड अंदर की ओर सरक जाता था. सावित्री के आँखों मे आँसू ही आँसू थे. वह पूरी तरह से रो रही थी. वह कई बार पंडित जी से गिड़गिदा कर लंड निकालने के लिए भी कही. लेकिन उसे ऐसा लग रहा था कि दर्द की वजह से अभी मर जाएगी. लेकिन पंडित जी अब उसके चुचिओ को दबा रहे थे फिर थोड़ी देर चुचिओ को मुँह मे लेकर चूसने लगे और लंड बुर मे वैसे ही झिल्ली तोड़कर आधा के करीब घुसा था और आधा लंड बुर के बाहर था. पंडित जी यह समझ गये थे कि झिल्ली फट गयी है और इसी वजह से कुछ लंड का हिस्सा अंदर की ओर घुस चुका है. अब वह जानते थे कि सावित्री आराम से चुद जाएगी. अब रास्ता सॉफ हो चुका है. दोनो चुचिओ को चूसने के बाद जब दर्द कुछ कम हुआ तब सावित्री रोना बंद कर के सिसकने लगी. फिर पंडित जी ने अपने कमर को हल्का सा उपर की ओर लहराया तो लंड भी हल्का सा बाहर को ओर खींचा ही था कि फिर ज़ोर से चंप दिए और लंड इस बार कुछ और अंदर सरक गया. इस बार सावित्री थोड़ी सी कसमसाई लेकिन ऐसा लगा कि कोई बहुत ज़्यादा दर्द नही हुआ. फिर पंडित जी ने वैसे ही अपने कमर को दुबारा उपर की ओर लहराते और ज्योन्हि लंड हल्का सा बाहर की ओर हुआ फिर कस के चंप दिए और इस बार लंड बहुत ज़्यादा ही अंदर घुस गया. फिर भी एक चौथाई हिसा बाहर ही रह गया. फिर पंडित जी ने चुचिओ को चूसना सुरू कर दिया जिससे सावित्री फिर गरम होने लगी. वैसे तो पहले भी गरम हो चुकी थी लेकिन दर्द के वजह से घबरा और डर गयी, लेकिन अब दर्द बहुत ही कम हो चुका था. चुचिओ के चुसाइ ने फिर ज्योन्हि सावित्री के शरीर मे गर्मी भरी की पंडित जी पूरा लंड घुसाने के फिराक मे लग गये. सावित्री के जांघों को और चौड़ा करके और उसके चौड़ा चूतड़ को हल्का सा उपर की ओर उठा कर बोले "चल पहले जैसे बुर को चुदवा तभी दर्द कम होगा और तुम्हे भी मर्द का मज़ा आएगा" सावित्री जो अब सिसक रही थी और आँख के आँसू सूखने के करीब थे, ने कुछ जबाब नही दिया लेकिन गरम हो जाने के कारण और पंडित जी से डर होने के वजह से अपने दोनो हाथों से अपने चौड़े चौड़े दोनो चूतदों को फैलाया. पंडित जी ने देखा की सावित्री ने अपने बुर को फैलाने के लिए अपने हाथ बड़ा कर चूतदों को चौड़ा कर लिया तो अब समय गवाना सही नही था. फिर उन्होने सावित्री के कमर को अपने दोनो हाथों से पकड़ कर एक के बाद एक धक्के मारने लगे. हर धक्के मे लंड थोड़ा थोड़ा अंदर घुसने लगा, हर धक्के मे सावित्री कराह उठती लेकिन सावित्री ने अपने हाथ को वैसे चूतड़ पे लगा कर बुर को फैलाए रखा. और पंडित जी का पूरा लंड सावित्री की बुर मे समा गया. ज्योन्हि लंड जड़ तक समाया कि सावित्री के चूतदों पर पंडित जी के दोनो लटक रहे अनदुओं से चाप छाप की आवाज़ के साथ चोट लगाने लगे. अब बुर एकदम से खुल चुका था. बुर की झिल्ली फटने के वजह से निकले खून से लंड बुरी तरह भीग चुका था. सावित्री का दर्द अब ख़त्म ही हो गया और अब उसे बहुत मज़ा आने लगा. इसी वजह से वह अपने दोनो हाथों से अपने चूतदों को खींच रखा था जिससे बुर के बाहरी होंठ कुछ फैले हुए थे. जब भी लंड बुर मे घुसता तो बुर एकदम कस उठती. सावित्री अब अपनी पूरी ताक़त से अपने दोनो जाँघो को फैला रखी थी ताकि पंडित जी उसे काफ़ी अंदर तक आराम से चोद सकें. पंडित जी यह समझ चुके थे कि अब सावित्री को बहुत मज़ा आ रहा है तो फिर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगे और हर धक्के मे लंड बुर की अंतिम गहराई तक घुस जाता और पंडित जी के दोनो अन्दुये सावित्री के चूतादो पर जा कर लड़ जाते. वैसे पंडित जी का लंड लंबा और मोटा भी था लेकिन सावित्री हश्तिनि नशल की लड़की थी और ऐसे नशल की औरतें और लड़कियो की बुर की गहराई काफ़ी होती है. इसी वजह से पंडित जी पूरी ताक़त से उसे चोद रहे थे और सावित्री आराम से चटाई मे लेटी अपने दोनो जांघों को चौड़ा कर के चुदवा रही थी. कमरे मे फॅक..फ़च्छ...फ़च्छ की आवाज़ आना सुरू हो गयी. सावित्री के जीवन मे इतना आनंद कभी नही मिला ना ही वो कभी कल्पना की थी कि चुदाई मे इतना मज़ा मिलता है. वह अपनी आँखे बंद कर के आराम से चुदवा रही थी और रह रह कर सिसक रही थी. क्योंकि कि अब उसे बहुत ही ज़यादा मज़ा आ रहा था. जब भी पंडित जी अपना लंड खेंच कर बाहर निकलता की सावित्री अपने बुर को उचका कर फर्श पर बिछे चटाई पर से अपने चौड़े और काले रंग के चूतड़ को कुछ उपर उठा देती और दूसरे पल पंडित जी हुमच कर अपना लंड बुर मे छोड़ते हुए कस कर चंप देते और सावित्री के चूतड़ का उठा हुया हिस्सा फिर से चटाई मे बुरी तरह से दब कर सॅट जाता और फिर अगले पल ज्योन्हि पंडित जी अपना लंड बुर से बाहर खींचते की सावित्री फिर अपने चूतादो को चटाई से उपर उठा देती और पंडित जी हुमच कर चोदते हुए चटाई मे वापस दबा देते. ******************************

********** अब पंडित जी का समूचा लंड सावित्री के बर मे समा जाता था और पंडित जी की घनी झांते सावित्री की झांतों मे जा कर सॅट जाता था. पंडित जी ने सावित्री को हुमच हुमच कर काफ़ी देर तक चोद्ते रहे. अचानक सावित्री को बहुत ज़्यादे आनंद आने लगा और उसे लगा की उसके बुर के अंदर कुछ निकलने वाला है. और यह आनंद उसे बर्दाश्त नही हो पा रहा था और उसने अपने चौड़े और काले रंग के चूतदों को काफ़ी उँचा उठा देती जिससे पवरोती की तरह झांतों से भरी चुद रही बुर काफ़ी उपर उठ जाता और वह बुर को ऐसे उचका कर पंडित जी से चुदाने लगती. तब पंडित जी समझ गये की सावित्री झड़ने वाली है और उसके उठाए हुए बुर को काफ़ी हुमच हुमच कर तेज़ी से चोदने लगे और अगले ही पल सावित्री के कमर मे कुछ झटके दार ऐंठन हुई और सावित्री के बुर के अंदर तेज़ी से झड़ने वाला पानी निकलने लगा और वह सीत्कार उठी. सावित्री झड़ने के बाद अपने उठे हुए चूतदों को वापस चटाई पर सटा ली और हाँफने लगी. लेकिन पंडित जी अभी झाडे नही थे. वे भी कुछ लंबी सांस ले रहे थे और अब धीरे धीरे चोद रहे थे. फिर सावित्री के निचले होंठ को मुँह मे लेकर कस कर चूसने लगे और चुचिओ को भी दबाने लगे. कुछ देर तक ऐसा करके चोदने ने फिर से सावित्री गरम होने लगी लेकिन इस बार पहले से बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो गयी थी और फिर अपने चौड़े चूतड़ को चटाई से उठा कर बुर को उचकाने लगी. अब पंडित जी सावित्री के दोनो होंठो को कस के मुँह मे लेकर चूस रहे थे और चोद रहे थे. सावित्री को पंडित जी का लंड बुर मे घुसना इतना अछा लग रहा था कि जब पंडित जी लंड बुर से बाहर की ओर खींचते तब लंड को वापस बुर मे लेने के लिए अपने बुर को काफ़ी उपर उठा देती और फिर पंडित जी हुमच कर चोद्ते हुए समूचे लंड को "घच.." आवाज़ के साथ जड़ तक बुर मे चंप देते और सावित्री का उठा हुआ चूतड़ पंडित जी के धक्के के दबाव से वापस चटाई मे दब कर सॅट जाता. ऐसा लगभग हर धक्के के साथ होता और सावित्री का चूतड़ मानो चटाई पर उपर नीचे हर चुदाई के साथ हो रहा था. सावित्री को जब जयदा आनंद आने लगा तब अपने चूतड़ को और उपर उठाने लगी और अपने बुर को लंड पर फेंकने लगी. बुर के रेशे अब काफ़ी ढीले हो चुके थे. बुर काफ़ी गीली हो चुकी थी. बुर के चुदाई का रस और खून दोनो मिलकर बुर से बाहर आ रहा था और सावित्री के गंद के छेद से होता हुआ चटाई पर छू रहा था. सावित्री को इतना आनंद आ रहा था की वह सातवें आसमान पर उड़ रही थी. उसे ऐसा लग रहा था की दुनिया का सबसे ज़यादा आनंद इसी चुदाई मे ही है. हर धक्के मे वह बहुत ज़्यादा मज़ा ले रही थी. इस कारण जब भी धक्का लगता वह सीत्कार कर रह जाती और तुरंत अपने चूतदों को उचका कर अगले धक्के की भीख माँगने लगती. सावित्री ग़रीब तो ज़रूर थी लेकिन भिखरीन नहीं. फिर भी आज वह एक भिखरीन की तरह चटाई मे छटपटा कर पंडित जी के धक्के की भीख माँग रही थी. इसी कारण से वह लंड के बाहर आते ही अपने काले चौड़े चूतादो को उठा देती की जल्दी से धक्का बुर मे मिले और काफ़ी गहराई तक लंड घुस जाए. चुदाई के आनंद ने मानो सावित्री के शरीर का लाज़ और शर्म को उसके रोवे रोवे से धो डाला था. इसी वजह से एक चुदैल की तरह अपने चूत को उपर की ओर फेंक फेंक कर लंड लील रही थी. सावित्री अब हर धक्के के लिए गिड़गिदा रही थी. उसे बस पंडित जी के धक्के की ज़रूरत थी. वह भी ज़ोर के धक्के जिससे उसकी बर की गहराई मे लंड जा सके. सावित्री के हाव भाव को देखते हुए पंडित जी ने किसी दयालु इंसान की तरह धक्के जोरे से लगाने के साथ धक्कों की रेफटार तेज करने लगे. सावित्री अब आँखें खोल कर चुदवा रही थी और उसकी आँखों मे भी धक्कों की भीख सॉफ दिख रहा था. मानो वह अब और धक्कों के लिए गिड़गिदाते हुए रो देगी.सावित्री का शरीर काफ़ी मांसल और कसा हुआ होने के कारण वह पंडित जी के कसरती बलिशट शरीर के धक्कों को बड़े आराम से ले पा रही थी. उसके चूतदों पर काफ़ी माँस था और चौड़े होने के वजह से जब भी पंडित जी धक्के मारते हुए लंड जड़ तक धँसते थे की उनका लंड बुर मे घुस जाता और पंडित जी के गोरे शरीर का वजन सावित्री के चौड़े और काले चूतदों पर पड़ता. वैसे बुर अब फैल कर एक नया रूप ले चुका था जिसे औरत का ही बुर कह सकते हैं. जो बर थोड़ी देर पहले कुवारि थी अब वह कुवारि नही रह गयी थी और चुदाई के आनंद ने उसके शरीर के लाज़ और शर्म को भी लगभग ख़त्म कर दिया था. सावित्री ने अपने जीवन मे किसी से कुछ माँगा नही था लेकिन आज वह पंडित जी से धक्कों की भीख माँग रही थी वो भी लग रहा था की माँगते माँगते रो देगी.जब पंडित जी ने देखा की चटाई मे चुद रही सावित्री की हरकत अब बहुत अश्लील और बेशर्म होती जा रही है तब वह समझ गये की सावित्री दूसरी बार झड़ने की तरफ बढ़ रही है. तब पंडित जी तेज़ी से चोदने के लिए अपने शरीर की सारी ताक़त को इकट्ठा कर लिए और सावित्री को चटाई मे कस कर दबोच लिए. फिर भी सावित्री अपने चूतदों को उछालना बंद नही किया तब पंडित जी ने काफ़ी कस कर उसे चोदने लगे और एक सांड की तरह हुंकार लेने लगे. पंडित जी अपने पूरे लंड को बुर से बाहर खींचते और दूसरे पल पूरा का पूरा लंड जड़ तक पेल देते. चुदाई की रफ़्तार इतनी तेज कर दिया की सावित्री को चूतड़ उठाने का मौका ही नही मिलता. एक के बाद एक धक्के ऐसे लगते मानो सावित्री को चोद कर पूरे शरीर को दो हिस्सों मे फाड़ देंगे. पूरे कमरे मे घाकच्छ घच की आवाज़ गूँज उठी. तेज चुदाई से सावित्री को इतना आनंद आया की वह काफ़ी अश्लील आवाज़ भी निकालने से अपने को रोक नही पाई और लगभग चिल्ला उठी "अया जी पंडित जी ....मुझे और....चोदियी जीई........बहुत अक्च्छा लग रहा है.....और और करिए.....अरे माई रे बाप बहुत माज़ा रे माई और चोदिए आऊ हह .." पंडित जी के कान मे ये गंदी आवाज़ जाते ही एक नया जोश भर गया और वह समझ गये की अगले कुछ पलों मे सावित्री झाड़ जाएगी. तभी उन्हे लगा कि सावित्री का पूरा बदन काँपने सा लगा और अपने पूरे शरीर को कुछ ऐंठने लगी है. वह अब झड़ने वाली है और दूसरे पल मे धक्के पे धक्के मारते हुए पंडित जी का भी शरीर मे बिजली दौड़ने लगी और वह किसी सांड या भैंसे की तरह हुंकारना सुरू कर दिया. और उनका भी शरीर काफ़ी झटके के साथ ऐंठने लगा और हर ऐंठन मे वह सावित्री को दबोचना तेज कर दिए उनके आंडवो से वीरया की धार अब चल पड़ी थी. और पंडित जी अपने लंड को ऐसे बुर की गहराई मे चंपने लगे मानो वीरया की गाढ़ी और मोटी धार सावित्री के बcचेदानि के मुँह मे ही गिरा कर दम लेंगे. आख़िर काफ़ी उत्तेजना का साथ सावित्री झड़ना सुरू कर दी और चटाई मे पूरी तरह से ऐंठने लगी और दूसरे पल ही पंडित जी का सुपाड़ा जो सावित्री की झाड़ रही बुर के तह मे घुसा था, काफ़ी तेज गति से, एक के बाद एक काफ़ी गाढ़े और मोटे वीरया की धार छ्छूटने लगा और किसी पीचकारी की तरह छूट छूट कर बछेदनि के मुँह पर पड़ने लगा. लंड भी हर वीरया की बौछार के साथ झटके ले रहा था जो सावित्री की बुर् की मांसपेशिया काफ़ी तेज महसूस कर रही थी. एक के बाद एक वीरया की बौछार बुर के तह मे किसी बंदूक की गोली की तरह पड़ने लगी. सावित्री को ऐसा लग रहा था मानो यह वीरया की बौच्हार बंद ही ना हो. पंडित जी कई दीनो बाद बुर चोद रहे थे इस कारण वीरया काफ़ी मात्रा मे निकल रहा था. वीरया की गर्मी से सावित्री पूरी तरह से हिल गयी और पंडित जी के कमर को कस कर अपने टाँगो से दबोच ली और अपने हाथों को पंडित जी के पीठ को लपेट ली. उसे ऐसा लगा रहा था मानो कोई काफ़ी गर्म चीज़ बुर के तह मे उडेल रहे हों. जो एक के बाद एक लंड की उल्टी से बुर की तह मे इकट्ठा होता जा रहा है और बुर अब भर गयी हो. सावित्री को इतना आनंद आया की वह पूरी दुनिया भूल गयी और उसके सीतकारीओं से कमरा गूँज उठा. अब दोनो पूरी तरह से झाड़ चुके थे. लंड भी कुछ हल्के झटके लेता हुआ बचा खुचा वीरया की आख़िरी बूँद को भी बुर की तह मे उडेल दिया. ************************************** दोनो झाड़ चुके थे, पंडित जी सावित्री के उपर वैसे ही कुछ देर पड़े रहने के बाद उठने लगे और अपने फँसे हुए लंड को बुर मे से खींच कर निकालने लगे. लंड अभी भी खड़ा था और पहले से कुछ ढीला हुआ था. लंड खींचते समय पंडित जी को ऐसे लगा मानो सावित्री की बुर ने उसे मुट्ठी मे पकड़ रखा हो. पंडित जी ने अपने कमर को ज्योन्हि पीछे की ओर किया लंड "पुउक्क" के आवाज़ के साथ बुर से बाहर आ गया. लंड के बाहर आते ही पंडित जी ने देखा की बुर का मुँह जिसपर खून और चुदाई का रस दोनो लगा था, सिकुड़ने लगा और बुर की दोनो फांके आपस मे सतने की कोशिस कर रही थी. लेकिन अब बुर की फांके पहले की तरह सिकुड कर एकदम से सॅट नही पा रही थी और बुर के मुँह पर थोड़ा सा फैलाव आ गया था. इसका यह भी कारण था कि पंडित जी का लंड मोटा था और काफ़ी देर तक सावित्री की कुवारि बुर को चोदा था. सावित्री वैसे ही लेटी थी और पंडित जी अपना लंड तो बुर से खींच के निकाल चुके थे लेकिन सावित्री के झंघो के बीच अभी भी बैठे थे इस वजह से सावित्री अपनी जांघों को आपस मे सता नही पा रही थी और पहली बार की चुदाई से थॅकी होने के कारण सावित्री भी वैसे ही लेटी थी और तुरंत उठ कर बैठने की हिम्मत नही हो पा रही थी. और जंघें फैली होने के नाते पंडित जी की नज़र बुर पर ही थी जिसका रूप अब बदल चुका था. घनी झांतों से घिरी हुई बुर एकदम ही काली थी और पवरोटी की तरह दिख रही थी. कुछ चुदाई की रस और खून झांतों मे भी लग गया था.सावित्री की आँखें थकान से लगभग बंद हो गयी थी और उसकी साँसे तेज चल रही थी. पंडित जी थोड़ी देर तक सावित्री की बुर की सुंदरता को देख रहे थे और काफ़ी खुशी महसूस कर रहे थे की इस उमरा मे भी उन्हे कुवारि गदराई चूत मिल गयी. फिर अगले पल उन्होने सावित्री की बुर के दोनो होंठो को अपने हाथ से ज्योहीं फैलाने की कोशिस किया कि सावित्री की धाप रहीं आँखें खुल गयी और मीठी दर्द से लेटे लेटे ही हल्की सी चौंक गयी और अपने हाथ से पंडित जी के हाथ को पकड़ ली. लेकिन तबतक तुरंत की चुदी हुई बुर के दोनो होंठ हल्की सी फैल गयी लेकिन अंदर का गुलाबी भाग सिकुड कर एक हल्की सी छेद बना कर रह गया था. पंडित जी समझ गये की सावित्री को कुछ दर्द हो रहा होगा. और कुछ पल बुर के अंदर के गुलाबी भाग को देखने के बाद बुर के होंठो से अपने हाथ हटा लिए और फिर पहले की तरह दोनो होंठ सताने को कोशिस करने लगे लेकिन कुछ हिस्सा खुला रह कर मानो यह बता रहा था की अब बुर कुवारि नही बल्कि अब औरत की बुर हो चुकी है. पंडित जी उठे और शौचालय मे जा कर पेशाब किए और अपने लंड और झांतों मे लगे चुदाई रस और खून को पानी से धोने लगे. पंडित जी ज्योन्हि उठे सावित्री ने अपने दोनो जांघों को आपस मे सताने की कॉसिश करने लगी तो उसे जांघों और बुर मे दर्द का आभास हुआ. फिर उठ कर चटाई पर बैठी. सावित्री ने देखा की पंडित जी शौचालय मे गये हैं तो मौका देखकर अपनी बुर की हालत देखने के लिए अपने दोनो जाँघो को कुछ फैला ली और देखने लगी. चुदी हुई बुर को देख कर सन्न रह गयी. झांटेन और बुर दोनो ही चुदाई रस और खून से भींगी हुई थी. लेकिन अपनी बुर पर सावित्री नज़र पड़ते ही सकपका गयी. ऐसा लग रहा था की वह उसकी बुर नही बल्कि किसी दूसरे की बुर है. बुर का शक्ल पहचान मे ही नही आ रही थी. जो बुर चुदाई से पहले थी वैसी एकदम ही नही थी. चुदाई के पहले बुर के दोनो फांको के सतने पर केवल एक लकीर ही दिखाई देती थी वह लकीर अब गायब हो गयी थी और लकीर के स्थान पर कुछ नही था क्योंकि बुर का मुँह अब कुछ खुला सा लग रहा था. बुर के दोनो होंठ आपस मे पूरी तरह से बंद नही हो पा रहे थे. सावित्री बैठे बैठे अपने बुर की बदली हुई शक्ल को देख कर बुर की पहले वाली शकल को याद कर रही थी. उसे ऐसा लग रहा था की अब उसकी बुर कभी भी पहले की तरह नही हो पाएगी और वह सोच रही थी की वह चुद चुकी है, लूट चुकी है, एक औरत हो चुकी है, पंडित जी को अपना कुवरापन दे चुकी है, और अब यह सब कुछ वापस नही आने वाला है क्योंकि जीवन मे यह केवल एक ही बार होता है.बदली हुई बुर की शक्ल पर नज़ारे गड़ाए यही सब सोच रही थी. की चटाई पर भी कुछ चुदाई रस और खून दिखाई दिया तो वह अपने चूतड़ को हल्का सा पीछे की ओर खिस्काई तो देखा की चूतड़ के नीचे भी हल्का सा खून लगा था जो चटाई मे अब सूख रहा था. उसके मन मे यही बात उठी की यह सामानया खून नही बल्कि यह उसकी इज़्ज़त, असमात, मान, मर्यादा और उसके मा सीता के काफ़ी संघर्ष से बचाया गया खून था जो किसी दुल्हन का सबसे बड़ा धर्म होता है और जिस पर केवल उसके पति का ही हक होता है और इसे आज पंडित जी ने लूट लिया और अब वह कभी भी कुवारि की तरह अपने ससुराल नही जाएगी बल्कि एक चुदी हुई औरत की तरह ही जा सकेगी. अगले पल सावित्री के मन मे एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ और एक नयी विचार की तरंगे उठने लगी कि आज सब कुछ लूटने के बाद भी एक ऐसा चीज़ मिला जो आज तक वह नही पा सकी थी और वह था चुदाई का आनंद. जो आनंद आज पंडित जी ने उसे चोद कर दिया वैसा आनंद उसे अट्ठारह साल की उमर तक कही से भी नसीब नही हुआ था. उसके मन मे एक नये विचार की स्थापना होने लगी. सावित्री का मन चिल्ला चिल्ला कर यह स्वीकारने लगा कि यह आनंद एक ऐसा आनंद है जो किसी चीज़ के खाने से या पहनने से या देखने से, या सुनने से या खेलने से कहीं से भी नही मिल सकता है और यह आनंद केवल और केवल चुदाई से ही मिल सकता है जो कि कोई मर्द ही कर सकता है जैसा कि पंडित जी ने किया और इस आनंद के आगे सब कुछ और सारी दुनिया बेकार है. चटाई मे बैठी यही सोच रही थी कि तभी पंडित जी शौचालय से अपने लंड और झांतों को धो कर वापस आ गये और चौकी पर लेट गये.

Sangharsh--10


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