Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना - Printable Version

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RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

तभी उसकी मम्मी आ गई..! हमने खड़े होके नमस्ते की, उन्होने हमारे बारे मे रिंकी से पुछा..!

मम्मी- ये कॉन हैं रिंकी..?

रिंकी- मम्मी, ये अरुण है, एक्सवाई गाँव का है, आपको याद है, हमारे कॉलेज का फंक्षन..?

मम्मी- हां..! याद है, मैने तो वो पूरा प्रोग्राम देखा था..

रिंकी- मेरे साथ जो डुयेट गया था… पहचाना नही…?

मम्मी- ओह्ह..अच्छा वो अरुण है…! कैसे हो बेटा, क्या कर रहे हो आजकल..?

मे- मे ठीक हूँ आंटीजी, आजकल इंजिनियरिंग कर रहा हूँ, 

रिंकी- वो न्यूज़ याद है मम्मी आपको, दो महीने पहले एक ड्रग माफिया का सफ़ाया वाली..!

मम्मी- हां.. हां वो *** शहर की..?

रिंकी- हां, वो इन्होने ही किया था उस गॅंग का सफ़ाया…

मम्मी- क्याअ..? सच में..? तुम तो बड़े बहादुर हो..? और ये कॉन है बेटा..?

मे- ये मेरा दोस्त है, हम दोनो और भी 6 दोस्त थे सबने मिलके किया था ये काम.

ऐसे ही कुछ देर और बात-चीत होती रही, फिर हम उठके चलने लगे.. तो रिंकी बोली, मम्मी मे इन्हें बाहर तक छोड़ के आती हूँ..!

मम्मी- हम.. ठीक है, जल्दी आना..

धनंजय को मैने इशारा कर दिया तो वो थोड़ा पहले गेट से बाहर आगया, और फिर जैसे ही हम मेन गेट तक पहुँचे, मैने मूड के पीछे देखा कि उसकी मम्मी तो नही आरहि.

फिर उसको पकड़ के एक लंबी सी किस… कि, अपने लौटने का डेट/ टाइम दिया और बाइ बोलके निकल आया..!

वो बहुत देर तक गेट से हमें देखती रही, जबतक उसकी नज़रों से ओझल नही हो गये….!

रास्ते में- अरुण भाभी तो बहुत सुंदर ढूढ़ ली यार, मानना पड़ेगा, हर काम तेरा पर्फेक्षन से होता है कैसे मिली ? बोला धनंजय..

मे- हंसते हुए..! ऐसा कुछ नही है यार.., पता नही हम एक हो पाएगे या नही..? अपने यहाँ जात-पात का बड़ा लोचा रहता है यार.. ये जैन है, मे पंडित तो पता नही आगे क्या होगा..?

और मैने गाँव तक उसको अपने मिलन का पूरा किस्सा सुना दिया, वो बड़ा इंप्रेस हुआ हमारी प्रेम कहानी सुन कर.

कुछ दिन और हमने मेरे गाँव मे निकाले खेत वग़ैरह घूमे.. उसको बताया कैसे मेहनत करके मैने पढ़ाई की, कितने मुश्किल दौर से गुजरा था मेरा बचपन…!

धनंजय- अब पता लगा साले तू इतना टफ क्यों है, और हमारी भी मारके रखता है..!

मे- क्यों तुझे पसंद नही है मेरा बिहेवियर ..?

धनंजय- साले पसंद नही होता तो साथ रहता क्या..? तेरी एक आवाज़ पर मर-खपने को तैयार रहता..? मेरे गले लगते हुए.. अब मत करना ऐसी बात वारना तेरी गान्ड मार लूँगा.. समझा...!!

और फिर एक दिन निकल लिए धनंजय के गाँव..

उसका घर एक हवेली नुमा काफ़ी बड़ा था, घर के सामने बड़ी सी चौपाल जिस पर ज़्यादा तर समय गाँव के बहुत से लोग बैठे रहते थे, हुक्का गुडगुडाते हुए..!

उसके पिता जी इस गाँव के मुखिया थे और लोग भी उन्हें इसी नाम से बुलाते थे..!
जब हम शाम के समय वहाँ पहुँचे तब भी वहाँ गाँव के बड़े-छोटे कम-से-कम 20-25 लोग बैठे थे..!

हमें देखते ही उसके पिता जी खुशी से चीख ही पड़े…धन्नु… मेरा धन्नु आ गया रे.. आ..आजा.. मेरे शेर..!

धनंजय ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए.. तो उन्होने उसे गले से लगा लिया..मेरे बारे में पुचछा, तो उसने सब बताया..मे जब उनके पैर लगने लगा तो उन्होने मेरे कंधे पकड़ के रोक लिया, और कहा..

नही बेटा… ये पाप हम पर ना चढ़ो.. तुम ब्राह्मण पुत्र हो, और ब्राह्मण सदैव हमारे पूज्य,नीय रहे हैं, 

मे- अरे अंकल आप मेरे पिता समान हैं, तो मेरा फ़र्ज़ ज़्यादा बनता है..

वो- वो सब शहरों मे ठीक है बेटा, हमें गाँव की परंपरा निभाने दो..!

फिर घर के अंदर गये, धनंजय की माँ से मिले, उसके एक बड़े भाई थे कोई 6 साल बड़े.. शादी हो चुकी थी.. भाभी बड़ी सुंदर और सुशील लगी, हल्के से घूँघट मे, 

लंबा कद, 34 के बूबे, कमर एकदम पतली, पर ताजी-ताजी भैया की रातों की मेहनत का असर उसके गोल-मटोल कुल्हों पर सॉफ दिख रहा था. 

हो सकता है घोड़ी बनके चोदने मे ज़्यादा शौक रखते होंगे, कसी हुई शादी में कुछ ज़्यादा ही मस्त लग रहे थे.

वैसे भी गाँव देहात और उपर से ठाकुरों के घर की परंपरा.. तो थोड़ा लाज-परदा होता ही है.

एक बेहन जो अरुण से 2 साल बड़ी, उसकी शादी होनी थी अभी.. गोरी चिटी, अच्छे नैन नक्श, गोल चेहरा, लंबे बाल सलवार सूट मे कसी हुई गोल-गोल चुचियाँ ना ज़्यादा छोटी, ना ज़्यादा बड़ी.

एकदम सपाट पेट, पतली कमर, हल्के पीछे को उभरे हुए कूल्हे, कुल मिलकर देसी माल लगती थी वो.

मेरी तरह धनंजय भी अपने बेहन भाइयों मे सबसे छोटा था.

चाइ नाश्ता करने के बाद, हम गाँव घूमने निकल गये, गाँव ज़्यादा बड़ा तो नही था पर ठीक तक था, जैसे गाँव होते थे उस जमाने में.


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

दूसरे दिन सुबह ही धनंजय और उसके पिता जी नज़दीक के शहर निकल गये कुछ काम होगा, बड़े भाई खेतों में थे, रह गया मे अकेला मर्द घर पर..! 

भाभी और धनंजय की बेहन रेखा को मंदिर जाना था, सोमवार का दिन था भोलेनाथ की पूजा करनी थी उन दोनो को.

मंदिर गाँव से बाहर कोई 400-500 मीटर की दूरी पर एक नहर के किनारे था.

उसकी माँ बोली, बेटा अरुण, तुम थोड़ा बहू और रेखा के साथ मंदिर तक चले जाओगे…?

मे- क्यों नही आंटी जी, और पड़े-2 करूँगा ही क्या, मेरा भी टाइम पास हो जाएगा.. चलिए भाभ जी, दीदी..!

हम तीनो मंदिर पहुँचे, उन्होने पूजा की, मैने भी भगवान के आगे डंडवत किया, थोड़ी देर वहाँ बैठे.

बड़ा ही मनोरम दृश्य था वहाँ, बड़ी शांति महसूस हुई मुझे तो.

नहर के किनारे बना मंदिर चरों ओर घने उँचे पेड़ों से घिरा, नहर का किनारा, ठंडी-2 हवा बड़ा सुकून दे रही थी, ज़्यादा लोग नही थे वहाँ.

में संगेमरमर के ठंडे फार्स पर लेट गया, अपने आप आँखें बंद हो गयी, और सुकून में लेटा रहा..!

रेखा और भाभी पूजा करके नहर की ओर निकल गयी..! 

थोड़ी देर बाद मुझे नहर की तरफ शोर सा सुनाई पड़ा, जैसे कोई औरत चीख रही हो..!

मैने उठके थोड़ा आगे बढ़के देखा तो… ओ तेरी का…!! मेरा तो यहाँ आना ही बेकार हो गया..!

वहाँ चार लड़के रेखा और भाभी को छेड़ रहे थे, छेड़ क्या रहे थे एक तरह से जबर्जस्ती ही कर रहे थे उनके साथ.

एक ने रेखा का हाथ ही पकड़ रहा था, और वो उसे छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, दूसरे ने भाभी की कमर में हाथ डालके पीछे से जकड रखा था.

दो लड़के सामने से उन दोनो के साथ छेड़ खानी कर रहे थे..!

मे लपक के वहाँ पहुँचा, और उन दो लड़कों को जो सामने से छेड़-छाड़ कर रहे थे, पीछे से उन दोनो की गुद्दि पकड़ के उनके सर एक दूसरे से टकरा के दे मारे…कड़क..!

अनायास का हमला वो भी सर पे, चक्कर ख़ाके गिर ही पड़े दोनो साले.

फिर मैने भाभी के पीछे वाले का गला पकड़ के उसे पीछे को धकेला और जोरदार किक उसके थोबडे पे पड़ी, पट्ठा सीधा नहर में.

रेखा का हाथ पकड़ने वाला लड़का तो डर के मारे पहले ही हाथ छोड़ के निकलने की तैयारी कर ही रहा था कि लपक लिया मैने…! 

अबे साले…घोनचू ! जाता कहाँ है ? मज़े नही लेने क्या..?

वो ..मिमियाने लगा.. म..मुझे छोड़ दो..म.मुझे म.माफ़ करदो..

मे- क्यों ! मुफ़्त का माल समझा था क्या.. साले.. तेरी तो मे..माँ..

गाली देना चाहता था, पर बेहन और भाभी की वजह से दे नही पाया..और मैने उसे भी नहर में फेंक दिया..

फिर मैने उन दो के जिनके सर टकराए थे उन्हें उठाया और उनके गले पकड़ लिए, रेखा और भाभी से कहा-

अपने-अपने सॅंडल उतारो और लगाओ इन हरमियों थोबड़ों पर..!

उन दोनो ने सॅंडल उतार के दे-दबादब जो लगाए 4-6, सख़्त हील की सॅंडल की मार से उनकी चीखे गूंजने लगी, थोबडे लाल कर दिए सालों के.

उन चारों को अच्छा ख़ासा सबक सिखाने के बाद हम तीनों घर की ओर चल दिए…!

मे भाबी के बगल में चल रहा था, रेखा उनके दूसरे साइड मे थी, 

देवर्जी.. इस उमर में ये तेवर..? क्या यही काम करते हो वहाँ कॉलेज में या पढ़ाई भी करते हो…?

मे- थोड़ा हंसते हुए ! नही.. वो पार्ट टाइम ये भी काम कर लेते हैं.. अपने देवर को नही देखा अभी आपने…? वैसे ये लड़के थे कॉन..?

रेखा – अपने गाँव के तो नही लगते, वैसे भी हमारे गाँव के लड़कों की हिम्मत नही कि हमें कुछ कह सकें.

मैने भाभी के कान में फुसफुसा के कहा- वैसे भाभी इन बेचारे लड़कों की फालतू मे ही पिटाई हो गयी..! अब आप लग ही इतनी पटाखा रही हो कि कोई भी छेड़ना चाहेगा.

भाभी शर्मीली स्माइल के साथ तिर्छि नज़र से मेरी ओर देखते हुए- अच्छा जी तो तुम्हें भी मे पटाखा लग रही हूँ..? 

मे- पटाखा ही नही, एकदम कड़क माल लग रही हो भाभी सच कह रहा हूँ, अगर आपकी शादी भैया से नही हुई होती ना.. तो मे यहीं आपको किस कर लेता..!

रेखा भी नज़र तिर्छि करके हमारी बताओं को सुनने की कोशिश कर रही थी.

भाभी- क्या बात है..? तुम तो बड़े चालू निकले..! लगते तो नही हो ऐसे..? घर वालों को बोलके जल्दी शादी करनी पड़ेगी लगता है.

ऐसी ही देवर-भाभी के रिश्ते की छेड़-छाड़ भरी बातें करते-2 हम घर आ गये.

रेखा ने जो वहाँ हुआ, उसको अपनी माँ को बताया, शाम को सभी जब घर में मजूद थे, तभी आंटी ने बात चला दी.

धनंजय के पिता जी और भाई ने मुझे धन्यवाद किया, कि उसने उनके घर की इज़्ज़त पर आँच नही आने दी.

भाई- लेकिन अरुण तुमने अकेले ही उन चारों को पीट डाला, कैसे..? तुम तो अभी इतने छोटे हो..?

धनंजय- अरे भैया, ये दिखता छोटा है, अभी आपने इसके कारनामे नही देखे, वरना आप ऐसा कभी नही कहते..!

मे- और तू कम है..! 

धनंजय के पिता जी- तुम लोग क्या बात कर रहे हो..?

फिर धनंजय ने कॉलेज मे हुई दो साल की घटनाए डीटेल मे बताई.. सभी मुँह बाए मेरी ओर देख रहे थे. रेखा तो मानो कोई मूरत बन गयी हो, वो एक तक मुझे ही घूर रही थी, उसकी नज़रों में एक अजीब सी चाहत थी.

रात का खाना ख़ाके, सभी जान अपने-अपने कमरों में सोने चले गये, 


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

धनंजय और मे थोड़ी देर तक मेरे बिस्तर पर बैठे बातें करते रहे और फिर वो भी अपने कमरे में सोने चला गया.

मेरी आदत है, कभी गेट बंद नही करता रूम का, तो धनंजय जाते समय मेरा गेट हल्का सा भिड़ा गया, मैने भी सोने की कोशिश की, थोड़ी देर में मे नीद में चला गया.

सुबह भाभी चाइ लेके मेरे रूम में आई, मुझे सोता हुआ देख कर वापस मुड़ने लगी, लेकिन फिर कुछ सोच कर मेरे बॅड पर बैठ गयी, और धीरे से मेरी जाँघ पर हाथ रख के सहलाने लगी, 

सुबह-2 का थोड़ा एरेक्षन की वजह से मेरे पाजामे में उठान सा बना हुआ था, मे अपनी आँखों के बीच हल्की सी झिरी बना कर उनकी हरकत देख रहा था.

भाभी कुछ देर तक मेरे उठान को देखती रही और जाँघ सहलाती भी रही.. मेरा मन मचलने लगा था, पर जी कड़ा करके पड़ा रहा, और अपने लंड को भी काबू में रखने की कोशिश की.

फिर उन्होने मुझे हाथ से हिलाने की कोशिश की और धीरे से आवाज़ भी दी..

देवर्जी …देवर्जी.. अरुण… उठो.. लो चाइ पीलो..!

मे यूँही मक्कड़ बनाए पड़ा रहा.. जैसे गहरी नीद में हूँ.

अनायास उनका हाथ जाँघ को सहलाते हुए मेरे लंड पे आ गया, और सहलाने लगी..! अब मुझसे कंट्रोल कर पाना नामुमकिन होता जा रहा था.. 

मेरा लंड अकड़ने लगा, उसकी अकड़न महसूस करके भाभी ने अपना हाथ हटा लिया और फिर आवाज़ दी..

मे फिर भी नही उठा.. उन्होने सोचा मे गहरी नींद में हूँ.. तो फिर से उन्होने मेरे लंड को पकड़ लिया और पाजामे के उपर से ही धीरे-2 मुठियाने लगी..

मैने अब सीन से परदा उठाने की सोची, और झट से अपनी आखें खोल दी, उनका ध्यान मेरे खड़े लंड पर ही था,

मे- भाभी इसे बाहर निकाल के करो ना…!

वो एकदम चोंक के गर्दन नीची कर के खड़ी हो गयी, 

मे- क्या हुआ भाभी खड़ी क्यों हो गयी..? 

भाभी- बदमाश कहीं के…? तो तुम सोने का नाटक कर रहे थे..हां..!

मे – अरे भाभी ! सीन इतना अच्छा चल रहा था, तो सोचा थोड़ा और देख लेते हैं, पिक्चर कहाँ तक चलती है..

लेकिन सच में भाभी, आपके हाथों में जादू है.. 

भाभी- वऊू.. तूओ.. बॅस.. ऐसे ही .. , फिर थोड़ा तड़कर.. लो ये चाइ पीलो.. 

मे खड़ा हो गया और उनके हाथ से चाइ लेके स्टूल पे रख दी और अपना एक हाथ उनके कूल्हे पर रख कर उसे मसल्ते हुए बोला—

सच में भाभी आप बहुत ही सुंदर हो.. भैया की तो लॉटरी लग गयी..

छोड़ो मुझे, कोई आजाएगा.. वैसे ये सब तुम्हारे लिए नही है.. और आगे बढ़ने की कोशिश भी मत करना.. वो बोली पर उनके लहजे मे विरोध नही था.

एक किस की तो पर्मिशन मिल ही सकती है, 

अब आपने इतना कुछ कर लिया, तो मेरा भी तो कुछ फर्ज़ बनता ही है.. और दूसरे हाथ से उनका सर पकड़ के उनके रसीले होठों का रस चूसने लगा..

दो मिनट. ही चल पाया किसिंग सीन, कि उसने मेरे सीने पे हाथ रख के धक्का दिया और खिल-खिलाती हुई चंचल हिरनी सी, कूल्हे मटकाते हुए, तेज कदमों से भाग गयी..

में मुस्कुराता हुआ, थोड़ी देर ऐसे ही खड़ा रहा फिर फ्रेश होकर चाइ पी और बाहर आ गया..!

बाहर आकर धनंजय के साथ कुछ देर चौपाल पर बैठे, कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे, वहाँ से उठके सुबह-2 के खुशनुमा वातावरण का मज़ा लेने खेतों की ओर निकल गये..!

थोड़ी धूप तेज होते ही घर वापस आ गये, चाइ नाश्ता किया और बैठक में आके बैठ गया, धनंजय अपने गाँव के स्कूल फ्रेंड्स से मिलने चला गया.

बैठक में रेखा भी बैठी थी, हम दोनो आपस में बात-चीत करने लगे. बातों के दौरान मैने नोटीस किया कि वो मुझे बड़ी गहरी नज़रों से देख रही थी.

मे- दीदी और क्या चल रहा है आजकल, पढ़ाई वाढ़ाई कर रही हो या नही..

वो- अरे अब कहाँ.. प्राइवेट बीए कर लिया, गाँव के लिए तो इतना ही काफ़ी है.

मे- हुउंम.. तो अब बस शादी का इंतजार है, क्यों..?

वो शरमा गयी… और नज़र नीची करके हस्ती हुई वहाँ से चली गयी..

मे- साला ये क्या किया मैने ? ऐसा सवाल कर दिया कि वो भाग गयी..फिर अकेला रह गया.

आंटी अपने पूजा पाठ में लगी थी, थोड़ी देर में भाभी वहाँ आ गई और मेरे बगल मे सोफे पर बैठ गयी.

भाभी- अकेले-2 बैठे हो, बोर नही हो रहे..?

मे- हाँ हो तो रहा हूँ, लेकिन कर भी क्या सकता हूँ..? आप तो नाराज़ ही हो तो किसके साथ बात करूँ ?

भाभी- तुमसे किसने कहा कि मे नाराज़ हूँ..?

मे- वो सुबह मेरे पास से भागी थी तो … मुझे लगा…कि…

भाभी- भागती नही तो पता नही तुम और कहाँ-2 तक पहुँच जाते..?

मे- उनकी आँखों में झाँकते हुए..! वैसे रास्ता तो आपने ही दिखाया है, फिर उसे बंद क्यों करना चाहती हैं ?

भाभी- डर लगता है अरुण…! किसी को पता लग गया, तो पता नही क्या होगा ?


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

मे- तो फिर मुझे उकसाया क्यों..?

भाभी- तुम्हारी मर्दानगी पर फिदा हो गयी हूँ में…! जो तुमने हमारे लिए किया, उतना तो कोई सगा भी नही करता..!

मे- तो अब पीछे मत हटिए, और अपने दिल की सुनिए.. वो क्या कहता है..?

भाभी- दिल के हाथों ही तो मजबूर होती जा रही हूँ, ये कम्बख़्त तुम्हारी ओर खिचा चला जा रहा है..

मे- उसके कान की लौ को जीभ से टच करते हुए.. तो फिर भूल जाओ सबको..और उसके गाल को काट लिया…!

भाभी- उ…माआ.. क्या करते हो ..? अभी नही, आज रात को आती हूँ तुम्हारे पास..!

मे- तो अभी के लिए स्टार्ट-अप ही हो जाए..! और उसके होठों को चूम लिया..एक हाथ से उसकी गोल-मटोल नेविया बॉल को मसल दिया..

भाभी- ससिईई… आयईयीई.. अब्भी छोड़ो…प्लस्सस.. समझा करो.. कोई भी आ सकता है यहाँ.. और वो उठके चली गयी..!

में खुश हो गया कि चलो आज रात को इसकी जम के बजाता हूँ..! उसकी चौड़ी गान्ड मेरी आँखों के सामने घूमने लगी..!

रात को सभी खाना खा पीकर, सोने चले गये, में थोड़ी देर वहीं बैठा रहा, धनंजय ने कहा, सोना नही है, मे बोला तू जा मुझे अभी नींद नही आरहि, थोड़ी देर में आता हूँ.

वो भी चला गया, मौका देख कर किचन की तरफ गया, वहाँ भाभी बरतन सॉफ कर रही थी, चुपके से जाके उसे अपनी बाहों मे कस लिया पीछे से… !

आअहह…! मेरे लौडे का कनेक्षन जैसे ही उसकी गद्देदार गान्ड से हुआ.. पुछो मत….?

सला कपड़ों के उपर से ही इतना मज़ा है इसकी गान्ड का, तो बिना कपड़ों के क्या होगा..? सोचा मन में.

मेरे अचानक इस तरह पीछे से पकड़ लेने से वो चिंहूक गयी…! और बोली.. अरे बेसबरे, थोड़ा तो इंतजार करो.. ये काम निपटा कर, थोड़ी देर तुम्हारे भैया का मन बहला दूं, फिर आती हूँ, जो जी मे आए कर लेना.. अब जाओ यहाँ से… प्लस्सस..

उसके गाल पे पप्पी लेके मे अपने कमरे में आ गया, और आने वाले हसीन पलों में खो गया..!

रात करीब 1 बजे को वो मेरे रूम में आई.. तबतक मे सो चुका था, काफ़ी देर तक वो मेरे पलंग के साइड में खड़ी होकेर मुझे देखती रही, फिर धीरे से मेरे साइड में घुटने मोड़ कर बैठ गयी.

आहिस्ते से पाजामे को खींचकर निकाल दिया, और मेरे सोए पड़े लल्लू के उपर हाथ रख कर प्यार से उसे सहलाने लगी.

लंड महाराज को अपने स्वामी की नींद से कोई वास्ता नही, उन्हें तो जो प्यार से दुलार दे बस, उठ खड़े होते हैं, सीना चौड़ा के.

जैसे ही साहिब बहादुर तन्तनाये…! मेरा अंडरवेर भी गायब हो गया, अब नीचे से बिल्कुल नंगा था. थोड़ी देर हाथ से सहलाने के बाद उसने लंड की खाल खींच कर सुपाडे को भी नंगा कर दिया.

टमाटर जैसे लाल-लाल सुपाडे को देख कर उसको सब्र नही हुआ और उसे चूम लिया.. धीरे-2 वो उसे चाटने लगी..

जब मुझे कुछ-2 गीले होने का एहसास हुआ, तो मेरी नींद खुल गयी, थोड़ा सर उठाके देखा तो मेरे… मेरे मुँह से किल्कारी निकल गयी..!

ळौडे को छोड़, उसने अपने होठों पे उंगली रख के मुझे चुप रहने का इशारा किया..!

मैने उसे कंधों से खिच कर अपने उपर कर लिया,, अब वो आधी मेरे उपर थी और आधी पलंग पर. 

पेट के बल लेटी, कमर के नीचे वो पलंग पर थी, उसकी एक चुचि मेरे सीने से दबी थी, दूसरी मेरे बगल में दब गयी, उसके होंठ मेरे होठों पर.

मेरा एक हाथ उसकी पीठ पर था, दूसरा उसके नितंबों के उपर, उसकी पहाड़ियों की चढ़ाई-उतराई चेक कर रहा था.

उसके बाद उसने अपनी एक जाँघ मेरे लौडे के उपर रख कर उसे रगड़ने लगी.
5-6 मिनट की होठ चुसाइ के बाद मैने उसे पलट दिया, और अब मे उसके उपर चढ़ गया, उसके हाथों को दोनो साइड से फैला के अपनी उंगलियाँ उसकी उंगलियों में फँसा दी और उसखे होठों को चूसने लगा…

वो बहुत गरम हो चुकी थी, उसकी साँसें उखड़ने लगी, दोनो के बदन भट्टी की तरह तपने लगे…!

मेरे दोनों हाथों ने उसकी चुचियों को ब्लाउज के उपर से ही मसलना शुरू कर दिया…!

सीयी.. हीईिइ…ड्यूवर जी, खेले खाए लगते हो.. उउउऊहह.. आहह.. धीरे—
आहह.. एक दिन में ही इन्हें तरबूज बनाओगे क्या रजाअ…!

हेईए… राणिि.. तेरी.. ये आम.. बड़े रसीली..लग रहे… है.. बहुत रस भरा है इनमें…निकालने तो दो..!

आहह… मेरे रजाअ… सीयी..रस को चूसाआ…जाताअ.. है..मसलाअ.. नही..!

मैने फटाफट उसके ब्लाउस के बटन खोल दिए, कसी हुई ब्रा में उसके कबूतर बाहर निकलने को फड़फड़ाने लगे.. मे अब उसके ब्रा के बीच की घाटी को जीभ से चाटने लगा..

उसने अपनी पीठ उठा दी और ब्रा को भी निकलवा दिया.. अब उसके दोनो कबूतर चोंच उठाए गुटरगूं करने लगे, बोले तो चुसवाने को तैयार थे.

उसके निपल कंचे की तरह कड़क हो गये थे, मैने हल्के-2 अपनी जीभ से दोनो को बारी-2 से चाटा, तो उसकी छाती और उपर को उठ गयी, और मुँह से सिसकारी फुट पड़ी.

आहह…देवर्जी चूसो इन्हें… उऊहहू.. खा जाओ…ज़ोर-2 से… उहहुउऊ…ऐसी..हिी…हहानं… और ज़ोर से हाईए….नहिी…ज़ोर से मत कॅटू…!!

में अपने काम में बिज़ी था, वो सिसकारियों में डूबी थी.. कमरे का माहौल चुदाईमय हो चुका था……!!!

कुछ देर में हम दोनो जन्मजात नंगे थे, वो पलंग पर चित्त लेटी थी, थोड़ी देर तक में उसके बदन के कटाव देखता रहा, क्या फिगर थे उसके..?

एकदम परफेक्ट फिगर, 34-22-34..चुचियाँ एकदम उपर को मुँह उठाए हुए तनी हुई, लटकन नाम मात्र को भी नही.. गोल-गोल कसी हुई एक दम सॉफ्ट ..रूई के माफिक… 

मैने उसके पूरे शरीर को चुंबनों से गीला कर दिया, होंठो से शुरू करके, गले, चुचियाँ, उसके बाद पेट पर आकर उसकी गहरी नाभि में जीभ डाल दी..

वो सिसकार भर उठी, अब मेरी जीभ जांघों के बीच पहुच गयी थी, पहले मैने उसकी जांघों के अन्द्रुनि हिस्से को चाटना शुरू किया, उसकी टाँगे अपने आप खुल गयी, जैसे ही मेरी जीभ उसके बिना बालों वाली चिकनी चूत पर गयी, स्वतः ही उसकी कमर थिरकने लगी..

ससिईईयाअहह…. हाईएईई..ये सब कहाँ से सीखा..देवर्जी… मेरी तो जान ही निकाले दे रहे हो…हाईए.. राम इतना मज़ा मुझे आजतक नही आया..
ससुउउ…आह..पूरे कलाकार हो तुम तो…!

वो ना जाने क्या-2 बोले जारही और मे पूरे मन से उसकी चूत को चाट रहा था, 5 मिनट. में ही उसने पानी छोड़ दिया..!

उसने झट से मुझे अपने उपर खींच लिया और मेरे होठों पे टूट पड़ी..

बहुत मज़ा देते मेरे प्यारे देवरजिी.. आहह.. अब डाल भी दो अपना ये मूसल और कूट दो मेरी ओखली को..!

रानी ! थोड़ी हमारे बबुआ की भी तो सेवा करदो.. तभी तो वो तुम्हारी रामप्यारी को अच्छे से प्यार करेगा..!!

वो समझ गयी और मुझे नीचे करके मेरे लंड पर टूट पड़ी… आअहह.. क्या मस्त लॉडा चुस्ती थी वो..! कभी सुपाडे को मुँह मे लेके आइस्क्रीम की तरह चाटती, कभी पूरे लौडे को मुँह में भर लेती, साथ-2 में मेरे सिपाहियों को हाथ से दुलार्ती..

मज़े की अधिकता में मेरे मुँह से स्वतः ही आहह.. निकल रही थी, अपने हाथ से उसके सर को लंड पर दबाने लगा..

उसके मुँह से लार बह-2 कर बाहर आ रही थी और अंडों को भी गीला कर रही थी,
में अपनी कमर चला कर उसके मुँह की चुदाई करने लगा.

अब मुझसे कंट्रोल करना मुश्किल होता जारहा था. 


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

झटपट उसे नीचे लिटाया, और उसकी टाँगों को फैलाक़े, अपने लंड को उसकी गीली चूत के उपर फिराने लगा, मज़े की वजह से भाभी की आँखें बंद हो गयी, और वो आनेवाले सुखद पलों का इंतजार करने लगी.

आहह…देवर्जी अब डाल भी दो ना… और कितनी घिसाई करोगे.. शिकायती लहजे में बोली वो..

में भी तो आतुर था परम सुख पाने के लिए, लंड को चूत के छेद पर रखा, और पेल दिया उसकी आँसू बहती चुन-मुनिया के अंदर..

आहह… ससिईईई.. हाईए… धीरे… रजाअ..! 

मे- क्यों भाभी क्या हुआ…? इतने दिनो से चुद रही हो फिर भी धीरे करने को बोल रही हो..!

असईईई..!! तुम्हारा लंड थोड़ा मोटा है… थोड़ा दर्द हुआ.. !

मे- क्यों भैया का इतना मोटा नही है…

भाभी- नही ना ! इसके लिए तो.. 

अभी मेरा आधा लंड ही गया था, फिरसे एक सुलेमानी धक्का दिया, पूरा साडे-साती लंड भाभी की चूत में समा गया…

हाईए… मारीी रईए.. जालिमम्म.. और कितना लंबा है,,?

बस पूरा हो गया भाभी.. अब बस मज़े लो..!

और धीरे-2 मैने स्ट्रोक लगाना शुरू किया.. 

2-4 धक्कों में ही भाभी की चूत लंड पे सेट हो गयी.. मुझे ऐसे लग रहा था मानो बिना किसी टॉलरेन्स के बोर में शाफ्ट ठोक दी हो.. एकदम कस गया था मेरा लंड चूत में.

जैसे-2 धक्के लग रहे थे उसके आहें अब मादक सिसकियों में तब्दील होती जा रही थी…

10 मिनट के ताबड़तोड़ चुदाई से भाभी की चूत पानी दे गयी, और वो कमर उचका-2 के लंड को अंदर और अंदर लेने की कोशिश करने लगी..

ढका-धक धक्के लग रहे थे,…जब उसकी चरम सीमा आई तो वो कमर उठाके चीख मारती हुई बुरी तरह से झड़ने लगी, उसके पैरों की एडियाँ मेरी गान्ड पे कसने लगी..

मेरा भी अब होने ही वाला था, सो 4-6 तगड़े शॉट मारके, मैने भी अपना कुलाबा उसकी चूत में खोल दिया…!

बहुत झडा…! जी लगाके झडा !! चूत लबालब उपर तक भर गयी, ओवरफ्लो होने लगा, लंड की साइड से हम दोनो का वीर्य, जहाँ से जगह मिली निकलने लगा..

2 मिनट. उसके उपर पड़े रहने के बाद मैने अपना लंड बाहर खींचा…भलल-भलाल करके ढेर सारा पानी चूत से निकला, और बहता हुआ गान्ड के छेद से होता हुआ बेड शीट को गीला करने लगा.

भाभी ने मुझे कस के चिपका लिया और बोली…!

जीवन में पहली बार इतना मज़ा मिला है मुझे.. तुम्हारे सुलेमानी लंड ने मेरी मुनिया की धुनाई सी कर दी.

मे- मज़ा तो आया ना…भाभी..?

वो- मज़ा..? पुछो मत.. ऐसी चुदाई मेरी अभी तक नही हुई..!

मे- और कितने लंड लिए हैं भाभी सच बताना..!

वो- शादी से पहले एक बाय्फ्रेंड था मेरा.. उससे कई बार हुआ था, पर ऐसा कभी नही..!

ऐसे ही थोड़ी देर बातें करते रहे, एक दूसरे की बगल में लिपटे हुए..!
मेरा हाथ, भाभी की गान्ड पे पहुँच गया, और उसके कल्शो को सहलाने लगा, और फिर एक उंगली उसकी गान्ड की दरार में डालके फिरने लगा.

मे- भाभी आपकी गान्ड बड़ी मस्त है.. एकदम गोल मटके जैसी लगती हैं.

भाभी- मुझे पता है, तुम्हारी नज़र मेरी गान्ड पे है..!

मे- तो दो ना..प्लस्सस.. भाभी .. बस एक बार.. फिर नही कहूँगा.. बच्चों जैसी ज़िद करते हुए कहा मैने.

भाभी- मैने अब तक कभी ट्राइ नही किया है, पता नही क्या होता होगा..!

मे- अरे कुछ नही होगा, चूत भी तो पहली बार मराई होगी.. ऐसे ही ये पहली बार… लेके देखो.. चूत में तो झिल्ली होती है जिसे टूटने में ज़्यादा दर्द होता है, इसमें तो वो भी नही होती, बस पहली बार थोड़ी टाइटनेस ज़्यादा होगी बस.

भाभी- तुम्हें सब चीज़ का अनुभव है..? लगता है, कई तोड़ चुके हो..

मे- नही सच में भाभी.. आप दूसरी हो, झूठ नही बोलूँगा.

भाभी- कॉन है वो पहली..?

मे- है एक.. मेरा फर्स्ट लव… मेरी जानेजिगर.. जो मुझे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है..!

भाभी- ओह ! तो मजनू जी इश्क भी फरमाते हैं…क्यों..? सच मे तुम बड़े अच्छे हो वो बड़ी खुशकिस्मत है, जो तुम्हारा प्यार उसे मिला.. तो कब कर रहे हो शादी उससे..?

मे- पता नही भाभी, हो पाएगी भी या नही..?

भाभी- क्यों..?

मे- अपने-2 घरों के संस्कार.. ये जात-पात, रीति-रिवाज आड़े आ रहे हैं… फिर भी देखते हैं, क्या संभव हो सकता है..?

वो मेरे उपर लेटी हुई थी और मे उसकी चुचि पीने लगा, कुछ देर में वो गरम हो गयी, तो मैने उसे घोड़ी बनने को बोला और उसके पीछे आ गया.

वाह ! सच में उसकी गान्ड देखके मेरा शेर दहाड़ने लगा.. मैने उसके एक कूल्हे में दाँत गढ़ा दिए और काट लिया..

वो- अरईी.. दैयाअ… काटते क्यों हो,,? 

मैने अनसुनी करते हुए, दूसरे कूल्हे में भी काट लिया.. वो सिसकारी लेने लगी दर्द और मज़े में.

फिर मैने उसकी गान्ड को चूमा, और चाटने लगा.. गान्ड में मुँह डालके उसकी चूत चाटी और फिर उसकी गान्ड के छोटे से भूरे रंग के छेद पर जीभ की नोक लगाके अंदर करने की कोशिश करने लगा..

सुरसूराहट में उसकी गान्ड का छेद खुल-बंद हो रहा था.. बड़ी ही मनोहारी गान्ड थी भाभी की…!

मैने जैसे ही अपना मूसल हाथ में पकड़ के उसकी चूत और फिर गान्ड पे फिराया, तो वो बोली..

देवर्जी पहले एक बार चूत में डालना थोड़ी देर..! फिर बाद में गान्ड मारना..!!

मैने कहा ठीक है, और लंड एक ही झटके में उसकी चूत में पेल दिया.. उसकी आहह… निकल गयी.. !!

सीयी…आअहह… बहुत जालिमम्म.. हो तुम अरुण… सच में…, एक ही बार में डालने की क्या ज़रूरत थी.. हान्ं..! धीरे-2 नही डाल सकते थे..?

मे- सॉरी भाभी.. आपकी गान्ड देखके सब्र नही हुआ मुझसे.. झटका लग गया ज़ोर से.. आप कहो तो निकाल लूँ..?

नही अब करते रहो..लेकिन आराम से.. हां ..!, धीरे-2 उसको मज़ा आने लगा और वो अपनी गान्ड लंड पे पटाकने लगी..


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

इस पोज़िशन में चूत मारने में बहुत मज़ा आरहा था, बार-2 मेरी झंघें उसकी चौड़ी गान्ड पे थपकी सी देती..ठप्प-ठप्प.. बड़ा अच्छा लग रहा था..

मैने अपनी बीच की उंगली मुँह से गीली करके उसकी गान्ड के संकरे छेद में डाल दी, शुरू में तो उसको दर्द हुआ, पर बाद में मज़ा लेने लगी.

कुछ देर चुदाई के साथ-2 गान्ड में एक उंगली अंदर बाहर करता रहा, उसके बाद दो उंगली पेल दी.. 

भाभी मज़े में थी सो उसकी गान्ड दोनो उंगली खा गयी..

धक्कों की रफ़्तार तेज और तेज होती गयी.. दोनो छेदों में एक साथ अटॅक होने से, 10 मिनट. में ही उसकी चूत पानी छोड़ गयी.. और वो झड़ने लगी..

लंड चूत रस से सराबोर तो था ही, देर सारा थूक लेके और गान्ड पे लगा दिया, और अपने मूसल को हाथ मे लेके गान्ड पे सेट करके दबा दिया, थूक और चूत रस से चिकनी गान्ड आसानी से सुपाडे को निगल गयी.

फिर मैने थोड़ा ज़ोर लगाके लंड अंदर किया, तो वो दर्द से छटपताई और कराहते हुए बोली…

ओह्ह्ह.. माआ.. हाइईई.. मारीी.. निकालो अरुण… बाहर निकालो प्लस्सस… मुझसे नही होगा…बाद में कर लेना… हाईए… जल्दी निकालूओ..

मे थोड़ा रुक गया और अपने दोनो हाथ उसकी कमर से लपेटे हुए उसके दोनो आमों को थाम लिया और मसल्ने लगा.. फिर एक हाथ से उसकी चूत भी सहलाना शुरू कर दिया.

थोड़ी देर में ही उसको फिर से मज़ा आने लगा और अपनी गान्ड को उचका दिया.. मौके पे चौका मारते हुए..एक धक्का और कस्के मारा.. मेरा तीन चौथाई लंड उसकी गान्ड में धुंस गया..

अब तो मारे दर्द के उसका बुरा हाल था.. अगर किसी जंगल उंगले में ये चुदाई हो रही होती ना, तो शर्तिया वो दहाड़ें मार-2 के चिल्ला रही होती..

थोड़ी देर रुक के मे फिरसे उसकी चूत मे अपनी दो उंगली डाल दी और दूसरे हाथ से उसके निपल को मसल दिया…

निपल के मसल्ने से उसका दर्द गान्ड से निपल में आ गया और उसीका फ़ायदा उठाते हुए मैने पूरा लंड उसकी गान्ड में ठूंस दिया.. उसका दर्द और बढ़ गया.. 

पर अब मैने रुकने की वजे धीरे-2 लंड को अंदर बाहर करने लगा, और दोनो चुचियों को मसल्ने लगा.. कुछेक ही देर में उसकी गान्ड मेरे लंड के हिसाब से सेट हो गयी, और उसका दर्द अब मज़े में बदलने लगा.

वो भी अब अपने गान्ड को आगे-पीछे करने लगी…आज मैने भी पहली बार गान्ड मारी थी, लेकिन इसमे एक अलग ही तरह का मज़ा आरहा था.

कसी हुई गान्ड ने मेरे लंड को जल्दी ही पस्त कर दिया और मे 10 मिनट. में ही उसकी गान्ड में झड गया.. मेरे वीर्य की गर्मी अपनी गान्ड में महसूस करके वो भी झड़ने लगी..

कितनी ही देर मे उसके उपर पड़ा रहा.. उसकी गद्देदार गान्ड के उपर से उठने का मन ही नही कर रहा था.. पर उठना तो था ही..

हम दोनो बुरी तरह थक चुके थे, और समय भी अब 4 बजने वाले थे, सो 

भाभी अपने कपड़े पहन कर अपने रूम में चली गयी और में खाली पाजामा पहन कर ही सो गया.

सुबह देर तक मेरी आँख नही खुली, आज भाभी भी चाइ लेके नही आई, शायद उसकी भी नींद नही खुली हो.

8 बजे के करीब धनंजय मेरे रूम में आया, तब उसने उठाया, 

धनंजय- क्या बात है भाई, आज सारे नियम ताक पे रखके अभी तक सो रहा है..

मे- हां यार देर रात तक नींद ही नही आई, सो सुबह आँख नही खुली..

धनंजय- चल अब उठ फ्रेश हो चाइ नाश्ता करके निकलते हैं, शहर की तरफ कोई मूवी-ुओवी देख के आते हैं. अमिताभ बच्चन की नयी मूवी लगी है.

मैने कहा ठीक है, तू चल मे एक घंटे में तैयार होता हूँ फिर चलते हैं.

चाइ नाश्ता करके जब हम रेडी हुए, धनंजय ने अपने पिता जी से शहर जाने के लिए बात की और बताया कि क्या प्लान है तो उसकी मम्मी बोली, कि तुम लोग रेखा को भी साथ ले जाओ, वो भी देख आएगी.

हम तीनों चल दिए शहर की ओर, साधन के नाम पे उसके यहाँ एक बजाज का स्कूटर था, उसे लेके चल दिए. धनंजय स्कूटर चला रहा था, मे बीच में था, मेरे पीछे रेखा बैठ गयी दोनो पैर एक तरफ को करके.

बजाज स्कूटर की दो अलग-2 सीट होती हैं, मे आधा आगे की सीट पे और आधा पीछे की सीट पे अड़जस्ट हो गया. रेखा के लिए भी पीछे ज़्यादा जगह नही बची थी, सो वो मेरी पीठ से सटी हुई थी, वो थोड़ी तिर्छि होके बैठी थी, तो उसकी एक राइट साइड की चुचि मेरी पीठ में गढ़ रही थी, या वो जान-बुझ के और ज़्यादा गढ़ा रही थी.

उसकी कठोर चुचि मेरी पीठ से दबी हुई थी, उसके आभास से मेरा लॉडा तन्तनाने लगा, अब मुझे ये भी डर था कि साला कहीं आगे धनंजय की गान्ड में जाके ठोकर ना मारने लगे..इस वजह से मे और थोड़ा पीछे को दब गया,.

रेखा ने पकड़ने के लिए मेरी कमर में हाथ डाल दिया, और अब वो एक तरह से मेरी पीठ पे सवार ही थी, मेरी हालत बहुत खराब थी साला एक तो आगे को नही जा सकता, दूसरा वो पीछे से मुझे ठेस रही थी.


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अब तो वो पूरा अड्वॅंटेज लेने पे उतरती जा रही थी, उसका हाथ अब प्रोहाइबिटेड एरिया की तरफ भी आने लगा, और मेरे लंड पे अपनी उंगलिया टच करने लगी.

मेरे से रहा नही गया और मैने उसका हाथ पकड़के उपर कमर पे रख दिया, अब वो कुछ संभली, और थोड़ा ठीक से बैठी लेकिन चुचि ठोकना बंद नही किया, रास्तों के झटकों का पूरा-2 लाभ लेती रही.

राम-राम करके शहर पहुँचे, शो में थोड़ा टाइम था तो कुछ आइस्क्रीम वग़ैरह खाई.. फिर टिकेट लेके हॉल के अंदर चले गये.

उपर की सीट मिली तो मे धनंजय के बाजू में बैठ गया और रेखा जानबूझ कर मेरे बाजू में बैठ गयी, मतलब मे दोनो के बीच में था.

मूवी शुरू हुई, थोड़ी देर मे वो भी शुरू हो गयी, मैने मन में कहा, ये लौंडिया तो बड़ी गरमा रही है यार.. क्या करूँ दोस्त की बेहन है.. कुछ गड़बड़ ना हो जाए.. साला टेन्षन होने लगा था मुझे अब.

मूवी शुरू होने के थोड़ी ही देर के बाद रेखा ने अपना हाथ मेरी जाँघ पे रख दिया, थोड़ी देर वो ऐसे ही हाथ रखे रही, सिनिमा हॉल में झापा-झप्प अंधेरा था. हाथ को हाथ सुझाई नही दे रहा था, सो लेने लगी उसका फ़ायदा.

अब उसका हाथ धीरे-2 मेरी जाँघ को सहला रहा था, मूवी अच्छी थी, मेरे मनपसंद सूपर स्टार की “नमक हलाल”, पर क्या करूँ साला ध्यान बार-2 भटक रहा था..

उसका हाथ जैसे ही मेरे लंड के उपर आया, मैने उसका हाथ हटा दिया, और उसके कान में बोला- दीदी क्या कर रही हो ठीक से बैठो ना प्लस्सस..

वो भी मेरे कान में बोली, भाभी के साथ तो रात भर खूब मज़े किए, मेरे हाथ में काँटे निकल आए…हान्ं..?

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया….!

इंटर्वल हो गया था, टाय्लेट वग़ैरह जाने के बाद वेंडर’स लॉबी में आके कुछ खाने-पीने को लिया, और फिर से हॉल में आ गये.

इंटर्वल के बाद फिल्म फिर शुरू हो गयी, धनंजय मूवी में खो गया, मैने रेखा के कान में जाके पुछा, दीदी क्या कह रही थी तुम..?

रेखा- मैने तुम्हारी और भाभी की रात वाली पूरी मूवी देखी है अब अगर तुमने ज़्यादा शरीफ बनने की कोशिश की तो देख लेना.. हां.

मे- लेकिन तुम मेरी दीदी जैसी हो वो भाभी है,

रेखा – दीदी जैसी ही तो हूँ, दीदी तो नही.. फिर थोड़े रिक्वेस्ट वाले स्वर में बोली- प्लीज़.. अरुण मे भी तुम्हें पसंद करने लगी हूँ, मेरा दिल आ गया है तुम्हारी मर्दानगी पर, देखो मना मत करना.

मे मन में-ये साली मर्दानगी क्या दिखाई, यहाँ तो जिसे देखो पीछे ही पड़ गया है यार, अब क्या करूँ..? इसको मना करता हूँ तो पता नही क्या हंगामा खड़ा कर दे.. ? फिर कुछ सोच के..

अच्छा दीदी एक बताओ, पहले भी किसी के साथ….? मेरा मतलब है कि…

रेखा- नही .. नही… अरुण ! मे उस टाइप की लड़की नही हूँ, वो बस तुम भा गये हो मन को इसलिए, और फिर तुम्हारा भाभी के साथ वो सब देखा तो ….. और फिर से उसने मेरी जाँघ पे हाथ रख के मेरे गाल को चूम लिया..

मैने भी अब अपना हाथ उसकी जाँघ पर रख दिया और सहलाने लगा..इसका मतलब अभी तक कुवारि हो…?

रेखा- हां..! और शर्म से नज़रें झुका ली..

अब मेरी भी झिझक कम होती जा रही थी, सोचा एक नयी चूत का उद्घाटन करने को और मिल रहा है, अपना क्या जाता है, लौंडिया सामने से ही कह रही है तो कर देते हैं इसकी भी इक्षा पूरी, और उसकी कुवारि चूत पे सलवार के उपर से ही हाथ ले जा कर सहला दिया.

ससिईई…! हाइईई...! उसकी सिसकी निकल गयी, धनंजय बोला क्या हुआ दीदी…?

रेखा- कुछ नही भाई, कोई कीड़ा शायद पैर पे आ गया था, अब चला गया तू मूवी देख..! मैने पैर झटक कर हटा दिया है.

मैने एक हाथ उसके गर्दन के पीछे से ले जाकर उसकी चुचि पे रख दिया… कसम से क्या सॉलिड चुचि थी उसकी बिल्कुल रिंकी के जैसी..!

मेरा एक हाथ उसकी चुचि पे, दूसरा हाथ उसकी चूत पे था, कैसा लग रहा है दीदी मैने उसके कान में पुछा…!

धीमी आवाज़ मे सिसकी लेते हुए.. सीयी.. आह.. बहुत अच्छा..! कह कर मेरा लंड पकड़ लिया उसने पेंट के उपर से ही और मरोड़ दिया..!

मे तो सिसक भी नही सकता था, वरना धन्नु को पता चल जाना था, मे उसी की तरफ जो था. फिर भी उसके कान में फुसफुसाकर कहा..! क्या करती हो दीदी..? तोड़ॉगी क्या उसे,,?

तूने भी तो मेरी पेंटी का बुरा हाल कर दिया है कमिने..! सच मुच उसकी सलवार तक गीली हो चुकी थी..!

अब इससे ज़्यादा यहाँ हम कुछ नही कर सकते थे, सो अब मूवी ख़तम होने का इंतजार करने लगे..!


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

मूवी ख़तम हुई, बाहर आकर थोड़ी बहुत खरीददारी की, मैने अपनी तरफ से रेखा के लिए कानों के लिए बलियाँ खरीदी, और भाभी के लिए एक अंगूठी.

फिर उसी स्कूटर पे लौट लिए घर को, लेकिन अब मुझे इतनी टेन्षन नही थी हम दोनो धनंजय के पीछे बैठे-2 गुप-चुप मस्तियाँ करते रहे रास्ते भर.

घर आते-2 शाम हो गयी थी, थोड़ा बहुत बैठके बातें की, मूवी की, इधर-उधर की..! इस दौरान भाभी नज़र नही आई..! मैने आंटी से पुछा भी.., तो उन्होने कहा, उसकी तबीयत ठीक नही है, कुछ कमर में दर्द बता रही थी.. 

मे और रेखा कुछ-2 समझ रहे थे उसकी प्राब्लम..!

मैने कहा मे देखता हूँ क्या प्राब्लम है, और उनके कमरे में चला गया..! भाभी बिस्तेर पे लेटी हुई थी, एक बाजू आँखों के उपर रखा था..!

मे- भाभी..क्या हुआ आपको..? वो चोंक के उठी..!

वो- दर्द देकर पूछते हो क्या हुआ..? पूरी गान्ड पके फोड़े की तरह दुख रही है, बैठा भी नही जा रहा है, चलने फिरने की तो बात ही छोड़ो..!

मे हंसते हुए..! अरे तो गरम पानी से सेंक ही ले-लेती.. चलो लो ये टॅबलेट खलो, और मैने एक पेन किल्लर उनके हाथ में रख दी, जग से पानी लिया और खिला दी.

अब देखो 10-15 मिनट. दर्द कम हो जाएगा..!

वो- तुम बताओ, देख आए मूवी.. ?

मे- हां..! अच्छी मूवी थी.. मे आपके लिए कुछ लाया हूँ..? और रिंग निकाल कर उनकी उंगली में पहना दी..

वो- रिंग देख कर.. तुम लाए हो..? मेरे लिए..?

मे- हां.. क्यों आपको पसंद नही आई..? तो मे वापस रख लेता हूँ..!

वो- अरे नही..नही..नही..! सच में बहुत अच्छी है, मुझे तो बहुत पसंद आई.. !

मे- तो आज इसका इनाम मिलेगा..?

वो- अरे नही..नही..! आज तो बिल्कुल भी नही.. वरना कल तो खड़ी भी नही हो पाउन्गी.. !

मे- ठीक है, वैसे भी आज संभव नही है.. !

वो- क्यों आज रात कहीं जा रहे हो..?

मे- नही.. जा कहीं नही रहा..! किसी से कुछ वादा किया है..!

वो- क्या..? किससे..?

और फिर मैने रेखा वाली बात बताई…! वो अवाक रह गयी और बोली- हे राम.. अब क्या होगा.. ? उसने किसी से इसका जिकर कर दिया तो..?

मे- इसलिए तो आज उसका मुँह बंद करना है, कुछ तो उसको भी देना ही पड़ेगा..?

वो- क्या वो करने देगी..?

मे- अरे उसी ने पूरे रास्ते मुझे परेशान किया, सिनिमा हॉल में भी छेड़ती रही, जब मैने उसे रोकने की कोशिश की, तो उसने सामने से ये बात बताई और प्रॉमिस लिया कि वो उसको भी वो सब देगा जो भाभी को दिया है, तभी चुप रहेगी.

वो- इसका मतलब ये लड़की भी महा चालू है..!

मे- नही…! वो अभी तक कुवारि है..!

वो- सच !!, फिर तो बड़ा मुश्किल होगी उसे आज..!

मे- क्यों ? आपने पहली बार किया था तो आपको मुश्किल हुई थी..?

वो- ज़्यादा तो नही..! पर तुम्हारा हथियार बहुत तगड़ा है इसलिए कह रही हूँ, रेखा की तो आज खैर नही, थोड़ा ध्यान से, कहीं ज़्यादा चीख पुकार कोई सुन ना ले..!

मे- आप चिंता ना करो, आपकी गान्ड फाडी.. तो आपने क्या घर सर पे उठा लिया था 

क्या.. ? वो भी समझती है ये सब..!

थोड़ी देर में उसका दर्द कम हो गया, और मे वहाँ से आकर सब के साथ बैठ गया, रेखा ने इशारों में पुछा क्या हाल है अब, मैने भी आँखों के इशारे से बता दिया की सब ठीक है.


RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा... - sexstories - 12-19-2018

रात का खाना-वाना खा पीके, सब लोग अपने-2 कमरों में सोने चले गये, मे और धनंजय थोड़ी देर गाप्पें लड़ाते रहे, आनेवाले समय के बारे में कैसे क्या करना होगा ये सब, फिर कोई 11 बजे हम दोनो भी सोने चले गये..!

वैसे रेखा ने कुछ बोला तो नही था, कि आज वो आएगी या नही मेरे पास पर मुझे पक्का पता था कि उसकी चूत ज़रूर कुलबुला रही होगी..!

मे अभी लेटा ही था, सोने की कोशिश कर ही रहा था कि आहट हुई…!!

मैने आँख खोल कर देखा तो रेखा अंदर से दरवाजा बंद कर रही थी…!

मे- अरे दीदी तुम यहाँ क्यों आई हो,,? और ये गेट क्यों बंद किया..?

वो- मेरे पास बिस्तर पर बैठती हुई..! अच्छा जैसे तुम्हें कुछ पता ही नही..? हाइन.. कैसे बन रहे हो..?

मे- अरे मुझे कैसे पता होगा…? जानते बुझते उसे चिड़ाते हुए बोला..!

वो मेरे सीने पर प्यार से मुक्के बरसाते हुए बोली- बहुत बुरे हो तुम.. अरुण..!, आग लगा कर पूछते हो कि ये कैसे लगी.. आम्मुन्च.. और मेरे होठों को चूम लिया.. 

वो बहुत बेसब्री हो रही थी, मैने भी उसको अपनी बाहों में कस लिया और उसके होत चुसते हुए बोला- दीदी क्या ये हम सही कर रहे है..? 
किसी को पता चला तो लोग क्या कहेंगे, कि देखो कितना नीच है, अपने दोस्त की बेहन को भी नही छोड़ा..!

वो- अब ये सब सोचने का समय निकल गया है अरुण, मे वादा करती हूँ तुम्हें कोई आँच नही आने दूँगी..! और वैसे भी किसी को पता कैसे चलेगा..? क्या तुम किसी को बताओगे..? या में.?

और मेरे पूरे चेहरे पर चुम्मनों की बारिश सी करदी उस बेसब्री लौंडिया ने, वास्तव मे उसे अब कोई रोक नही सकता था..!

मे पलंग के सिरहाने से टिका बैठा था, उसकी कमीज़ उतार के उसे मैने अपनी गोद में बिठा लिया अपने दोनो ओर पैर करके.. !

मैने उसके 32” मम्मों को अपने दोनो हाथों मे लेके रगड़ दिया..!
सीयी… हआइई… रामम्म… मारीइ…रीए.. धीरीए.. ड्ड.आ.र.ड्ड..हो..त.त्ता.आ. है….!
लगता था, उसके संतरों पर भी अभी तक कोई काम नही हुआ था, थोड़ा बहुत उसी ने उनको छेड़ा होगा..!

उसकी ब्रा निकाल के बिस्तर पे डाल दी.. , वाउ ! क्या चुचियाँ थी, उन्हें देख कर मुझे रिंकी की याद आ गई और उसके हल्के गुलाबी निपल को होंठो से पकड़ के खींच दिया..!

ससुउुुआाहह…मुंम्मिईिइ.. मरी रीई… ओह माआ.. ये क्या हो रहाआ.. है.. मुझीए…ओह्ह्ह…अरुण.. बहुत मज़ाअ.. आरहा है… चूसो इनको… खा जाओ… मेरे राज आआ..!

दूसरे निपल को अंगूठे और उंगलियों के बीच मसल दिया हल्के से…! अब तो रेखा आसमानों में उड़ने लगी..आँखें बंद करके, औंत की तरह गर्दन उठाके मेरे मुँह को बुरी तरह अपनी चुचि पे दबा दिया..!

मेरा मुँह उसकी मुलायम चुचि में दब गया, मुझे सांस लेने में भी मुश्किल होने लगी..!

अरे दीदी मेरा दम घोंटोगी क्या..? मुँह हटा के बोला मे.. वो बुरी तरह शरमा गई..!

फिर मैने दूसरी चुचि के कांचे जैसे खड़े निपल को मुँह में लेके चूसा और दूसरी चुचि को हाथ में भर के ज़ोर्से मसल दिया…!

हआइईईई…ऊहह.. वो हाँफने सी लगी…! मे उसके बारी-2 से निपल चूस्ता रहा, और मेरे हाथ उसकी सलवार का नाडा खोलने में बिज़ी हो गये, इस बीच उसने भी मेरा कुर्ता मेरे शरीर से अलग कर दिया..!

रेखा को बेड पे लिटके, उसकी सलवार निकल दी, और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी कोरी करारी मुनिया को अपने हाथ से सहलाते हुए मुट्ठी में भींच लिया..!

ग़ज़ब ही हो गया…! उसकी कमर धनुष की तरह उपर उठी, और आआययईीीई…न्नाऐईयइ… करती हुई धप्प से गिरी.. उसका ओरगिस्म हो चुका था, पेंटी चूत रस से सराबोर हो चुकी थी…!

अब उसकी पेंटी का वहाँ कोई काम नही रहा.. तो उसको मैने हाथ से खिच के फाड़ ही डाला..! उसको कोई फ़र्क नही पड़ा वो तो बस मस्ती में आखे बंद किए हुए, अभी-2 जो उसके साथ हुआ था उसी में खोई हुई थी…!

मे- दीदी कैसा लग रहा है…?

वो- ये…क्या..था अरुण..? तुम कोई जादूगर हो क्या…? मुझे लगा में यहाँ हूँ ही नही.. किसी और दुनिया में हूँ.. सच में.

फिर मैने अपना पाजामा भी उतार दिया, मेरे नत्थूलाल तो अकड़ के लोहे के डंडे के माफिक खड़े थे, और मेरे अंडरवेर से निकलने के लिए उतावले हुए जा रहे थे. 

मैने प्यार से हाथ फेरा और पुच्कार्ते हुए कहा… पूकक्च… शांत मेरे शेर, सब्र कर सब कुछ मिलेगा..

रेखा ये देख कर शरमाते हुए, मंद-मंद मुस्करा रही थी.

मैने अपने लंड को रेखा के होठों पर रख कर इधर-से-उधर फिराया. 

चूँकि वो ये सब कल रात को देख चुकी थी, सो उसने जीभ से सुपाडे को चाट लिया जिस पर एक बूँद शुद्ध देशी घी लगा था, 

उसको स्वाद अच्छा लगा तो मुँह खोल दिया और सुपाडे को गडप्प कर गई, और मेरी आँखों में देखते हुए इशारे से कह रही हो मानो कि अच्छा टेस्ट है….!

थोड़ी देर तक उससे अपना लंड चुसवाने के बाद, मैने उसे लिटा दिया, और उसकी टाँगे खोलके उसकी मुनिया पर हाथ फिराया..

उसकी मुनिया की फाँकें एक-दूसरे से चिपकी हुई थी मानो गले मिल रही हों..! एक बार अपनी जीभ को नीचे से उपर को पूरी लंबाई तक उसकी कोरी चूत के उपर फिराया.. तो उसकी सिसकी एक बार फिर निकल गयी..!


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उसकी कोरी चूत ऐसी लग रही थी मानो किसी छोटी बच्ची अपने पतले पतले होठों को बंद किए हो. सिर्फ़ एक दरार सी बस, उपर को एक छोटी सी चिड़िया की चोंच जैसी बाहर मुँह चमका रही थी.

उसे देख कर मेरे मुँह और लंड दोनो में पानी आ गया. एक-दो बार पूरी चूत पर जीभ से चाटने के बाद, मैने उसकी फांकों को दोनो हाथों के अंगूठों की मदद से उसके चीरे को खोला…!

मासा अल्लाह !! एक गुलाबी रंग की छटा उसकी चूत के अंदर दिखी..! सिर्फ़ एक बार ही अपनी जीभ फिराई मैने उसके अन्द्रूनि भाग में और फिर अपने लंड को उसमें भिड़ा दिया..!

रेखा आँखें बंद किए मज़े का अनुभव कर रही थी.., धक्का देने से पहले मैने रेखा से कहा…!

दीदी थोड़ा कंट्रोल करना.. दर्द हो सकता है.. ओके.. वारना ज़ोर से चीख पड़ी तो कोई सुन लेगा..!

उसने बस हां में गर्दन हिला के हामी भर दी, 

मैने हल्का सा पुश किया अपनी कमर को और सुपाडा पूरी तरह से अड्जस्ट हो गया उसकी अन्चुदी चूत के छोटे से छेद में.

उसको हल्का सा दर्द का आभास हुआ लेकिन सह गई..!

फिर उसके कंधों पर हाथ रख के एक तगड़ा सा धक्का मार दिया…!

लाख कोशिशों के बबजूद उसके मुँह से चीख निकल ही गयी…!

हाययययई….मुम्मिईिइ….मररर..गाइ…रीि…ऊहह… उउफ़फ्फ़… माआ….अरुण प्लस्सस.. निकालो अपना, मुझे नही करवाना.. हाईए.. जल्दी निकालो..मे.. मर्र्रीि…!

मे वही रुक गया और उसको नकली गुस्सा दिखाते हुए बोला… क्या बोली…? निकालो…? ठीक है मे निकाल लेता हूँ.. फिर मत आना मेरे पास अपनी अध-फटी चूत लेकर..! साला चूतिया समझ रखा है मुझे..?

आधा लंड चला गया, झिल्ली टूट चुकी है और अब बोल रही कि निकालो..! बोल क्या करूँ..? निकाल लूँ..?

वो कुछ नही बोली बस मुँह कस के बंद कर लिया, आँखो से पानी निकालती रही..!

मैने उसका दर्द कम करने के लिए, उसकी चुचिओ को मुँह से चूसने लगा और दूसरी को आहिस्ता-2 सहलाने लगा..!

उसका दर्द छमन्तर हो गया और फिर मेरी ओर आशा भारी नज़रों से देखने लगी..!

अब मैने उसके होठों को अपने होठों में जप्त करके एक और तेज झटका दिया कमर में…. सटकककक.. से पूरा लंड जड़ तक चूत के अंदर घुस गया..! उसके मुँह से गुउन्न्ं..गुउन्न्ं.. की आवाज़ निकल रही थी होठ मेरे होंठो से बंद थे, आँखें बरस रही थी मेरे नीचे पड़ी वो दर्द से छट-पटा रही थी..!

थोड़ी देर होंठ चूसने से और उसकी चुचियों को मसल्ने की वजह से वो जल्दी हो नॉर्मल हो गयी और अपनी कमर को जुम्बिश दे कर इशारा किया आगे बढ़ने का..

मैने बहुत ही धीरे से अपने लंड को बाहर की ओर खींचा तो वो फिरसे कराही, फिर अंदर किया तो फिर कराही, ऐसे ही मेने धीरे-2, कुछ देर आराम से लंड को अंदर बाहर किया..

अब उसकी चूत मे थोड़ा गीलापन बढ़ने लगा था, सो स्वाभविक है, दर्द भी कम हो रहा था, लंड और चूत के बीच का फ्रिक्षन कम होने लगा. मैने थोड़े धक्कों को गति दे दी, अब उसका दर्द सिसकियों में बदलता जा रहा था. 

वो भी अब अपनी कमर उचका उचका के चुदने लगी..! फिर तो वो तूफान आया--- कि बस पुछो मत, 20 मिनट में ही सब बह गया..! हम दोनो ही पसीना-2 हो गये थे.

साँसें इतनी गति से चल रही थी मानो मीलों की दौड़ लगा के आए हों.

कितनी ही देर हम एक दूसरे की बाहों में पड़े रहे.. जब होश आया और मैने उसकी ओर देखा, तो उसने शरमा कर अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया और मंद-2 मुस्कराने लगी…!

मैने उसके गाल को काट लिया, तब उसने मेरी ओर देखा, आयईयी… काट क्यों रहे हो निशान बन जाएँगे..!

मे- अच्छा और एक बहुत बड़ा निशान नीचे बना दिया तब कुछ नही कहा..?
वो शरमा गई और मेरे सीने में अपना मुँह छिपा लिया..

मे- दीदी.. , उम्म्म.. वो बोली, मे- खुश तो हो. वो- हमम्म.. बहुत.. और तुम्हारी एहसान मंद हूँ, कि तुमने मुझे औरत होने का एहसास करा दिया..

मे- दीदी.., इस बात को यही तक रखना.. दिल तक मत पहुँचने देना.. वरना बड़ा दुख देता है वो बाद में.

वो – नही अरुण में जानती हूँ, और तुम फ़िक्र ना करो.. इससे ज़्यादा की उम्मीद मे कभी होने भी नही दूँगी.

मे- हमम्म.. वैसे सच बताना, मज़ा तो आया ना…मैने उसके निपल को हल्के से उंगली से सहलाते हुए कहा..

वो- मेरे गाल को चूमती हुई.. सच कहूँ तो एक बार को लगा कि मर ही जाउन्गी अब, लेकिन तुम वाकई मे कोई जादू जानते हो..

अगले ही पल मुझे लगने लगा कि में स्वर्ग मे उड़ रही हूँ, इतना सुख, इतना मज़ा.. मैने कभी कल्पना भी नही की थी.. 

सहेलियों से सुना था जिनकी शादियाँ हो गयी हैं, या फिर जो ये सुख ले चुकी है, पर वो भी इतना नही बता पाई, ये तो बस… क्या कहूँ..?

मे- और लेना चाहोगी वो सुख..?

वो- हमम्म.. मन तो है, पर थोड़ा दर्द भी है..

मे- अरे वो तो एक मिनट. में छमन्तर हो जाएगा..
और फिर मैने उठके एक कपड़ा गीला करके उसकी चूत से खून और वीर्य को साफ किया और पूरे हाथ से सहलाने लगा.. उसकी आँखें बंद होती चली गयी..

अब मे पहली बार उसकी चूत चाटने वाला था, सो लग गया अपना हुनर दिखाने.. थोड़ी ही देर में वो अपना दर्द भूलके, उड़ चली ऊडन खटोले पे बैठ के आसमानों में, जब उतरी तो उसकी चूत आँसुओं से तर थी.


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